बस्ती, उत्तर प्रदेश के विशुनपुरा गांव के दलित जाति के रामदीन को जब औलाद नहीं हुई तो उन्हें एक बाबा ने बताया कि यह सब उस के पिछले जन्म में किए गए बुरे कर्मों के चलते हुआ है जिस वजह से उसे औलाद नहीं हुई. अगर उस ने इस जन्म में अपने कर्मों को नहीं सुधारा तो फिर से अगले जन्म में उसे इसी तरह बेऔलाद रहना पड़ेगा.

रामदीन को लगा कि हो न हो, बाबा सही कह रहे हैं. उस ने बाबा के कहे मुताबिक इस समस्या का उपाय पूछा तो बाबा ने कहा कि उसे पिछले जन्म में किए गए बुरे कर्मों के पापों से छुटकारा पाने के लिए 9 दिनों तक कथा सुननी होगी. साथ ही, ऊंची जाति के लोगों को भोजन भी कराना होगा.

बाबा की बात सुन कर रामदीन ने कहा कि वह अपने घर कथा तो सुन लेगा लेकिन दलित होने के चलते कोई भी ऊंची जाति का आदमी उस के घर भोजन नहीं करेगा.

बाबा ने कहा कि वह किसी ऊंची जाति के आदमी के घर भोजन तैयार करने का पैसा दे दे और उसी के घर पर भोज का इंतजाम हो जाएगा.

रामदीन को बाबा की बात जंच गई और उस ने अपने घर पर 9 दिनों के लिए कथा का आयोजन किया और ऊंची जाति के लोगों के लिए एक बड़े जाति के आदमी के घर पर भोजन का इंतजाम शुरू कर दिया.

एक गरीब रिकशा चालक रामदीन को 9 दिनों तक कथा के आयोजन, भोजन के इंतजाम व दानदक्षिणा के लिए तकरीबन 2 लाख रुपए की जरूरत थी. उस ने पिछले जन्मों के बुरे कर्मों से छुटकारा पाने के लालच में थोड़े से खेत व पत्नी के गहनों को बेच कर पैसों का इंतजाम किया और उस बाबा के कहे मुताबिक कथा सुनने लगा.

लेकिन बाद में बाबा ने और भी खर्चे बढ़ा दिए जिस के चलते रामदीन को अपना घर तक गिरवी रख कर ब्याज पर पैसे उठाने पड़े, तब कहीं जा कर उस ने कथा, दानदक्षिणा व भोजन का इंतजाम करने में कामयाबी पाई.

पिछले जन्म के बुरे कर्मों से छुटकारा पाने के लालच के चलते रामदीन ने अपनी माली हालत बहुत ही खस्ता कर ली थी जिस से उस के घर में खाने तक के लाले पड़ गए क्योंकि उस ने अपनी सारी जमापूंजी पुण्य कमाने के लालच में गंवा दी थी.

बेवकूफी और निकम्मापन पुण्य कमाने, पिछले जन्मों के बुरे कर्मों के डर से छुटकारा पाने का लालच दलितों में बेवकूफी व निकम्मेपन की तरफ इशारा करता है जिस का फायदा शातिर किस्म के बाबा उठाते हैं और सदियों से उन्हें बेवकूफ बनाते आ रहे हैं. इस वजह से दलित तबका गरीबी व पिछड़ेपन के दलदल से निकल ही नहीं पा रहा है. आज भी यह तबका बदहाली का शिकार बना हुआ है, जबकि सरकार इस को आगे बढ़ाने के लिए तमाम तरह की सहूलियतें दे रही है.

सरकार की सहूलियतों के चलते दलित और पिछड़ों में जो भी आगे बढ़े हैं वे अपनी जाति के दूसरे लोगों को आगे बढ़ाने के लिए पीछे मुड़ कर नहीं देखते हैं और न ही उन को ऊंचा उठाने के लिए कोई काम करते हैं, बल्कि वे भी ऊंची जाति की जमात में शामिल होने की कोशिश करते हैं.

पोंगापंथ के साए में दलित पिछड़े अपनी बदहाली के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं क्योंकि उन की बेवकूफी का फायदा बाबाओं द्वारा उठाया जाता है. बाबाओं द्वारा धर्मकर्म का डर दिखा कर उन की जेब खाली कर दी जाती है और ये इन बाबाओं से लुटने को हर वक्त तैयार भी रहते हैं. इन्हें अगले जन्म में ऊंची जातियों में जन्म लेने का लालच दिया जाता है.

दलितों के मन में धर्मकर्म और अंधविश्वास का डर इस कदर समाया हुआ है कि ये बेवकूफ इन बाबाओं के बहकावे में आ कर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं.

जहां दलित तबका पुण्य कमाने और पिछले जन्म के बुरे कर्मों से छुटकारा पाने की जुगत में अपनी जेबें खाली करने में लगा है वहीं दूसरे तबकों से कहीं ज्यादा इस तबके के लोगों में अंधविश्वास की जड़ें फैली हुई हैं. दलित तबके से जुड़े लोग हर छोटीमोटी बीमारी और समस्या की वजह भूतप्रेत और काली शक्तियों को मानते हैं. ऐसे में ये लोग डाक्टर से इलाज न करा कर झाड़फूंक से समाधान ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं.

अंधविश्वास का दायरा सिर्फ यहीं तक नहीं सिमटा है, बल्कि इस तबके से जुड़े लोग तंत्रतंत्र से अमीर होने के सपने भी देखते हैं. झाड़फूंक के दौरान इन तबके की औरतों और लड़कियों की इज्जत लुटना आम बात है.

दलित जातियों में तांत्रिकों और झाड़फूंक करने वालों की तादाद में बड़ी तेजी से इजाफा हुआ है और ये तांत्रिक हर छोटीमोटी बीमारी में भूतप्रेत का डर दिखा कर झाड़फूंक का नाटक करते हैं. इसी की आड़ में बाबाओं द्वारा दलित जाति की लड़कियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ भी किया जाता रहा है.

अपनों से लुटते दलित जहां एक तरफ ऊंची जातियों के हाथों दलित धर्मकर्म और पोंगापंथ के चक्कर में पड़ कर लुटते रहे हैं, वहीं दलित जातियों में भी कुछ शातिर किस्म के लोग अपनी ही जाति के लोगों को धर्मकर्म के नाम पर बेवकूफ बना कर लूटने में लगे हैं.

दलित जातियों में से ही कुछ लोग बाबागीरी का चोला ओढ़ कर दलित जातियों के लोगों को बौद्ध कथा और अंबेडकर कथा सुनाने के नाम पर उनसे मोटी रकम खर्च करवाते हैं. और अब तो इन के शादीब्याह भी दलित जाति के बाबाओं द्वारा किए जाने लगे हैं.

ये दलित जाति के बाबा ऊंची जाति के बाबाओं से कम शातिर नहीं होते हैं. चूंकि दलित जातियों के बाबा उन की अपनी जाति के होते हैं इसलिए उन की कही बातों पर यह जल्दी विश्वास कर लेते हैं और धर्मकर्म, अंधविश्वास और झाड़फूंक के चक्कर में पड़ कर अपनी माली हालत को खस्ता कर लेते हैं. इस के चलते बाद में वे नुकसान का सामना करते हैं.

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