सरस सलिल विशेष

उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा की 3 और विधानसभा की 2 सीटों के लिये हुये उपचुनाव में भाजपा को करारी मात मिली. उत्तर प्रदेश की 2 लोकसभा सीटों में गोरखपुर और फूलपुर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य साल 2014 में सांसद बने थे. उस समय फूलपुर में केशव मौर्य को 52 फीसदी और योगी आदित्यनाथ को 51 फीसदी वोट मिले थे.

बिहार में अरहरिया लोकसभा सीट पर राष्ट्रीय लोकदल यानि आरजेडी के तस्लीमुददीन सांसद बने थे. बिहार की भभुवा और जहानाबाद में विधानसभा के उपचुनाव थे. जहानाबाद में मुद्रिका सिंह यादव आरजेडी से जीते थे और भभुवा से भाजपा के आनंद भूषण पांडेय चुनाव जीते थे. उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री और केशव मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद यहां उपचुनाव हुये. जबकि बिहार में तीनों सीटों से चुने गये प्रत्याशियों के न रहने से सीटे खाली हुई थी.

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भाजपा के लिये उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर सीट सबसे खास थी. गोरखपुर मुख्यमंत्री का क्षेत्र था. फूलपुर उपमुख्यमंत्री का क्षेत्र था. ऐसे में किसी को यह गुमान नहीं था कि भाजपा की यह हालत हो जायेगी. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद भाजपा की जीत पर किसी को कोई सुबहा नहीं रह गया था. 2017 में विधानसभा में मिली जीत के बाद भाजपा को करारी मात मिली. उत्तर प्रदेश में ही नहीं बिहार में भी भाजपा ने सरकार में शामिल होने के बाद खराब प्रदर्शन किया. उत्तर प्रदेश और बिहार के इन उपचुनावों के संकेत बड़े हैं. इनका असर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक के विधानसभा चुनाव पर पड़ेगा. उपचुनावों के नतीजों से साफ हो गया है कि ‘मोदी-योगी मैजिक’ अब अपनी चमक खो रहा है.

इसके लिये भाजपा की नीतियां, भाजपा नेताओं की हठधर्मिता, केवल धर्म का प्रचार जिम्मेदार है. 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने विकास की बात कही थी. चुनाव जीतने के बाद भाजपा सरकार अपनी बात पर कायम न रह कर केवल धर्म को बेचने लगी. धर्म का सहारा लेकर केवल मंदिर, आश्रम, बाबा सरकार पर हावी होने लगे. उत्तर प्रदेश में तो योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री ही बना दिया. उनकी योग्यता धार्मिक चेहरा होना ही था. भाजपा दलित और पिछड़ों को साथ लेकर नहीं चल पाई. खासकर दलितों को लेकर जो माहौल बना, उसने दलित पिछड़ों को एकजुट होने पर विवश कर दिया. ऐसे में जब बसपा और सपा करीब आये, तो भाजपा के लिये मुश्किल हो गया.

हिन्दू रक्षा के नाम पर जिस तरह गुंडे तत्व सक्रिय हुये उससे प्रदेश की कानून व्यवस्था बिगड़ गई. लोगों ने कानून की परवाह करनी बंद कर दी. दीवार से लेकर हर तरफ भगवा रंग फैलने लगा. जिस विकास की बात करके 2014 का लोकसभा चुनाव जीता वह दरकिनार हो गया. देश में बेरोजगारी फैलने लगी. जीएसटी और नोटबंदी ने लोगों को भुखमरी के करीब ला खड़ा किया. इसका गुस्सा अब बाहर आने लगा है. भाजपा पार्टी में लोकतंत्र की जगह पर तानाशाही फैल गई, जिससे परेशान भाजपा के लोगों ने उपचुनाव में वोट डालने और डलवाने का काम नहीं किया. जिसकी वजह से मतदाता वोट के लिये नहीं गया और भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा.

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