सरस सलिल विशेष

आखिरकार इमरान खान ने भी मान ही लिया कि व्यक्तिगत करिश्मे या महज अपनी पार्टी के कार्यक्रमों के बूते चुनावी नैया पार नहीं लगने वाली. पीएमएल-एन और आसिफ जरदारी की पीपीपी की तरह अब उन्होंने भी चुनावों में ‘जिताऊ उम्मीदवारों’ पर ही दांव लगाने का फैसला किया है.

बनीगला में पार्टी कार्यकर्ताओं के सामने अपने इस इरादे की घोषणा करते हुए उन्होंने बिल्कुल साफ कर दिया कि पार्टी उन्हीं को टिकट देगी, जो ‘चुनाव जीतने की कला’ में माहिर होंगे. यह कहकर इमरान ने साफ कर दिया है कि उनकी गलतफहमी अब दूर हो चुकी है और वह जीत के लिए लहर जैसी कोई चीज पैदा करने की स्थिति में खुद को नहीं पा रहे हैं.

यह सब 1970 के उन चुनावों की याद दिला रहा है, जब जुल्फिकार अली भुट्टो ने भी कमोबेश यही तकनीक अपनाई और बाद में उसका खामियाजा भुगता.

साफ है कि इमरान का यह सब कहना और करना उनकी हताशा दिखाता है, लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि ‘जिताऊ’ लोगों पर निर्भरता का मतलब होगा, सत्ता के लिए सभी उसूलों को ताक पर रखकर खुद को ऐसी ताकतों के हवाले कर देना. ऐसे लोग बार-बार एहसास कराएंगे कि वे अपने बूते जीते हैं, और उनकी न चलने दी गई, तो वे कभी भी, किसी और का दामन थाम सकते हैं.

इमरान कम से कम बलूचिस्तान से ही सबक ले लेते, जहां पीएमएल-एन सरकार महज इसलिए ताश के पत्तों के महल की तरह भरभराकर गिर गई, क्योंकि वहां ‘पार्टी वफादारों’ को अचानक नए चरागाह की हरियाली भा गई थी. उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि ‘अपने बूते’ जीतकर आए कुख्यात धनकुबेर-माफिया या ऐसे लोग किस तरह उन्हें घेरेंगे और इमरान की हालत एक डोर के सहारे नाचने वाली कठपुतली जैसी होकर रह जाएगी.

इमरान के इर्द-गिर्द ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो महज निजी फायदे के लिए कुछ भी करने को तैयार बैठे हैं. पार्टी की अंतर्कलह भी छिपी नहीं है. चीजें जिस मोड़ पर हैं, उसमें इमरान के पास सब-कुछ खामोशी से देखते रहने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है. यह तो आने वाले वक्त की आहट मात्र है.