सरस सलिल विशेष

इस बार 10वीं व 12वीं परीक्षाओं के अलगअलग परीक्षा बोर्डों के परिणाम लगभग एकसाथ आए और 99.3 से 99.6 फीसदी तक अंक पाने वाले ही फर्स्ट रैंक पा सके. अधिक आश्चर्य की बात यह रही कि ज्यादातर बोर्डों की परीक्षाओं में लड़कियों को ही पहला रैंक मिला. एक और बात जो सामने आई, वह यह कि अब गरीब घरों के बच्चे बहुत अच्छे नंबर ला रहे हैं. अंगरेजी मीडियम स्कूलों के बोर्डों में भी जो मैरिट लिस्ट में आए हैं उन में लड़कियां और साधारण पैसे वाले परिवारों के बच्चे हैं जबकि बेहद अमीर घरानों के बच्चे लाख कोचिंग के बावजूद रैंकों में नहीं दिखे.

मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों वाले परीक्षा बोर्ड ने अपने परिणाम इस बार जाति के आधार पर बांट कर घोषित किए. पर इस से यह साफ हुआ कि अब अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़े वर्ग के बच्चों के भी जम कर नंबर आए और उन की संख्या सामान्य वर्ग के छात्रों के फर्स्ट डिविजन पाने वालों से कहीं ज्यादा है.

रैंक, लड़कियां और गरीब घरों के बच्चों की शिक्षा के प्रति दिलचस्पी देखते हुए साफ है कि अगले 5-7 वर्षों में लाखों नहीं, करोड़ों फर्स्ट डिविजन लाने वाले विद्यार्थी नौकरियों के लिए कतार में खड़े होंगे. वे आरक्षण के हकदार हों या न हों, उन की ऐबिलिटी व कैपेबिलिटी बराबर की सी होगी. सरकार के लिए यह चैलेंज होगा कि वह उन्हें जौब्स दे. उन की मेहनत का फल उन्हें मिलना चाहिए. पर सरकार की जो नीतियां हैं, उन के मद्देनजर उन युवाओं को न तो नौकरियां मिल पाएंगी और न उन्हें अपने काम शुरू करने के मौके. बस, वे ईकौमर्स कंपनियों का माल पीठ पर लादे घरघर पहुंचाते नजर आएंगे.

सरकार की लचर नीतियां पढ़ाई का ऐसा नुकसान करने वाली हैं कि देश किसी केऔस में डूब जाए तो सरप्राइज न होगा. आगे की गुफा में अंधेरा है और अंधेरे के आगे रोशनी नहीं, यह साफ लग रहा है.

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