सरस सलिल विशेष

चीन ने अपने वन बैल्ट वन रोड इनीशिएटिव को अमली जामा पहना कर नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया नारे पर पानी फेर दिया है. भारत का मेक इन इंडिया प्रोग्राम मुख्यतया उन देशों के लिए उपयुक्त था जो यूरोप से महंगा सामान नहीं खरीद सकते थे और चीन के एकाधिकार से भयभीत थे. पश्चिमी एशिया, पूर्वी यूरोप, दक्षिणपूर्व एशिया और दक्षिण एशिया के देश ही भारतीय सामान को खपा सकते हैं जो क्वालिटी में ठीक न होते हुए मगर सस्ते हो सकते थे.

अब चीन ने इन देशों तक अपनी फैक्टरियों का सामान पहुंचाने का प्रबंध करना शुरू कर दिया है और साथ ही, इन देशों के श्रमिकों को चीन आने का रास्ता सुलभ कर दिया है.

चीन बड़े पैमाने पर दूसरे देशों में रेलें, बंदरगाह, सड़कें, पुल, सुरंगें बना रहा है और चूंकि पैसा चीन का लग रहा है चाहे उधार का, वही इन का अधिकारपूर्वक उपयोग कर पाएगा.

18वीं व 19वीं शताब्दी में इंगलैंड, फ्रांस, डच देशों ने बड़ी नौसेनाएं विकसित की थीं ताकि वे एशिया से व्यापार करने का अधिकार अपने हाथ में रख सकें. ब्रिटिश साम्राज्य के पीछे उस का समुद्री मार्गों पर कब्जा था.

अब चीन अपने विशाल भूभाग का इस्तेमाल कर रहा है. वह मंगोलिया, रूस, पाकिस्तान, कोरिया, जापान, दक्षिणपूर्व एशिया से सीधे जुड़ा है और उन के माध्यम से उस की रेलें अब लंदन, मैड्रिड पहुंचने लगी हैं चीनी माल भरभर कर.

भारत अब अलगथलग पड़ गया है. शंघाई कोऔपरेशन और्गेनाइजेशन की सहायता मिलने के बावजूद भारत का कहीं स्थान नहीं है. और यही वजह है कि भारत की उत्पादन वृद्धि दर अचानक घटने लगी है.

हमारे नेताओं का ध्यान वैसे भी गौपूजा, कश्मीर, हिंदू संस्कृति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने में लगा है. उत्पादन नहीं, हमें नोटबंदी की वाहवाही और गाय के आधारकार्ड की पड़ी है. दोनों से फैक्टरियां तो नहीं चलेंगी, यह पक्का है.

हम हल्ला चाहे जितना मचा लें पर असल में हम फैक्टरियों के नहीं, आश्रमों, गौशालाओं, घाटों, मंदिरों के निर्माण में लगे रहेंगे, यह पक्का है. इन दोनों में नौकरियां हैं पर वर्गजाति विशेष के लिए, आम भारतीयों के लिए नहीं.