सरस सलिल विशेष

जिस बंगलादेश को भारत ने 1971 में बनवाया था और उस की साढ़े 7 करोड़ जनता को पाकिस्तान के जुल्मों के कहर से मुक्ति दिलाई थी वही अब भारत को आंख दिखा रहा है. मई 2014 में अपने राजसिंहासन पर चढ़ते समय सफलतापूर्वक सातों पड़ोसी देशों के अध्यक्षों को बुला कर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो आशा बंधाई थी, वह बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में डूब सी गई है.

बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद ने साफसाफ कह दिया है कि भारत को बंगलादेशचीन संबंधों के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है.  बंगलादेश का हक है कि वह अपने विकास के लिए कहीं से भी और किसी से भी सहायता ले सकता है. पाकिस्तान, मालदीव, श्रीलंका, नेपाल और यहां तक कि भूटान भी हमारी विदेश नीति को झटका दे चुके हैं जबकि भारत का साउथ ब्लौक केवल हार पहनाने और झूला झुलाने का काम कर सका था, दोस्त बनाने का नहीं.

भारत जैसे देश के लिए पड़ोसियों से बना कर रखना हमेशा ही कठिन रहा है. नेहरू के जमाने से भारत के पड़ोसी भारत से खार खाए हुए हैं क्योंकि हमारे विदेश मंत्रालय की नाक हमेशा टेढ़ी रही है. जेब में पैसा न होने के बावजूद हम विशाल भूमि, नदियों और निकम्मी व गरीब जनसंख्या के बल पर रोब झाड़ने की कोशिश करते रहे हैं, पर इसी विदेश मंत्रालय के राजनयिक जब गोरों के आगे सहायता के लिए चिरौरियां करते दिखते थे तो उस की कलई खुल जाती थी.

एक देश की विदेश नीति तब सफल होती है जब लेनदेन बराबरी के स्तर पर किए जाएं. देश के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री सदा छोटे देशों पर अपना रोब, बिना कुछ दिए, गांठते रहते थे जो उन देशों को खलता था. चीन ने हाल के सालों में भरपूर कमाया है और उस की मेहनती जनता ने दूसरे कई देशों की जनता के मुकाबले कई गुना काम कर के सिद्ध कर दिया कि धर्म, जाति, रीतिरिवाजों और संकीर्णता से ज्यादा उत्पादन नहीं होता और किसी को कुछ देने लायक बचता भी नहीं.

बंगलादेश की इस बंदर घुड़की को चेतावनी समझना चाहिए. देश के प्रधानमंत्री या सत्तारूढ़ पार्टी के बिछाए जाल के बावजूद हम सब को कड़ी मेहनत करनी चाहिए ताकि अगर हम चीन, अमेरिका, ब्रिटेन पर रोब न गांठ सकें तो कम से कम पाकिस्तान, बंगलादेश को तो जता सकें कि भारत से अलग हो कर उन्होंने भयंकर भूल की है. फिलहाल तो उन्हें लगता है कि 1947 में वे अलग न होते तो भारत धर्मयुद्ध की आग में जल रहा होता और जनता भूखी मर रही होती.