सरस सलिल विशेष

राजनेता अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी प्रारंभिक दिनों को छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों की ही आंखों का कांटा बनी रही है. अब जब उस के 20 विधायकों को सरकार में लाभ का पद पाने के आरोप में विधानसभा की सदस्यता खोनी पड़ी तो इन दोनों पार्टियों को असीम सुख मिला.

लाभ का पद देने का विषय पेचीदा है और एक तरह से यह मंत्री का सा पद आम विधायक को देना है जहां सरकार से वेतन व सुविधाएं मिलती रहें. कानून के अनुसार, लाभ का पद कोई विधायक या सांसद नहीं ले सकता. यह प्रावधान इसलिए रखा गया है ताकि अफसरशाही अपने प्रतिनिधि विधानमंडलों में न भेज सकें.

तकनीकी तौर पर चाहे वह नियुक्ति गलत थी पर मोटेतौर पर भ्रष्टाचार नहीं है. नौसिखिया अरविंद केजरीवाल कानूनी बारीकियों को समझ नहीं पाए, सो फंस गए हैं. हो सकता है कि अब उन्हें 20 सीटों पर फिर चुनाव लड़ना पड़े और कुछ सीटें हार भी जाएं पर यह पक्का है कि अरविंद केजरीवाल को जो भारी बहुमत मिला था उस की वजह से वे, नगरनिगमों की हार के बावजूद, तब तक सत्ता में बने रहेंगे जब तक कोई उन की पार्टी को तुड़वा न दे. यह बहुत संभव भी है क्योंकि देश में तोड़फोड़ की राजनीति जम कर चल रही है.

अरविंद केजरीवाल की अब तक की सफलता का राज यह है कि वे और उन की पार्टी जाति व धर्म के ऊपर हैं. उन की पार्टी पर आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप न के बराबर हैं. अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस की जगह लेनी चाही थी पर वे अपने व्यक्तित्व, महत्त्वाकांक्षाओं और जिद के चलते विवादों में ज्यादा घिरे रहे हैं.

भारत के तत्कालीन महालेखा नियंत्रक यानी सीएजी विनोद राय ने पिछले आम चुनावों से पहले कांग्रेस की छवि खराब की थी और उस का सुख भाजपा को मिला था. अब वैसा ही सुख भाजपा को चुनाव आयोग ने दिया है. राजनीतिक सफलता पर काला रंग पोतने में ये स्वतंत्र संस्थाएं आजकल राजनीतिक स्वार्थ साधने के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हो रही हैं. अरविंद केजरीवाल को समझना चाहिए कि सत्ता सैकड़ों समीकरणों के सहारे मिलती है, केवल वादों व निष्ठा से नहीं.

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