सरस सलिल विशेष

लालू प्रसाद यादव के परिवार ने वर्षों पहले साल 2006 में हेराफेरी की थी या नहीं, या कैसे की थी, यह साबित होने में अभी वर्षों लगेंगे. लालू प्रसाद यादव के खिलाफ चारा घोटाले के मामले 20 सालों से चल रहे हैं और कोई लंबा चौड़ा पैसा पकड़ा नहीं गया है. अदालतों में सरकारी सुबूतों पर कुछ सजाएं दी गई हैं, पर वे पूरा न्याय हैं, कहा नहीं जा सकता.

जिस देश के हमाम में सभी नंगे और काले हों वहां नेताओं को, खासतौर पर दूसरी पार्टी के नेताओं को जांच एजेंसियों के मारफत फंसा कर राजनीतिक उद्देश्य पूरा करने का काम पूरी दुनिया में होता है. रूस के लगभग तानाशाह व्लादिमीर पुतिन ने अपने विरोधियों के धंधे भी छीन लिए और उन्हें पकड़ कर बंद भी कर दिया, ताकि उन की सत्ता को कोई चैलेंज न कर सके.

इस में शक नहीं है कि नेता लोग अपनी ताकत का इस्तेमाल भरपूर पैसा कमाने में लगाते हैं, पर जिस देश में मंदिरों, आश्रमों, मठों में अरबों रुपया टपकता हो, लोग कालीसफेद कमाई चढ़ाते रहते हों, इन को चलाने वाले एक कानी कौड़ी का हिसाब न देते हों, वहां नेताओं को ही बलि का बकरा क्यों बनाया जाए?

नेतागीरी शराफत से तो चल ही नहीं सकती. आज मुफ्त के कार्यकर्ता किसी को भी नहीं मिलते. भारतीय जनता पार्टी के बहुत से पैरोकार सीधे पार्टी से पैसा नहीं लेते, पर वे आश्रमों, जागरण पार्टियों, भजन मंडलियों, स्कूलों, कालेजों से जुड़े होते हैं, जहां बरसने वाला पैसा बेहद काला होता है, क्योंकि वह झूठे सपने दिखा कर वसूला जाता है. उन्हें फूलों की बारिश मिले और नेताओं को अदालतों की हाजिरियां, यह राजनीति में चलेगा, पर सही हो जरूरी नहीं.

लालू प्रसाद यादव के परिवार ने साल 2006 में जो बेईमानियां की हैं, उन्हें साबित तो होने दें. सिर्फ जांच शुरू करना या मुकदमा चलाना तो काफी नहीं है. पहले उमा भारती, लाल कृष्ण आडवाणी, नितिन गडकरी आदि को भी पद छोड़ने पड़े थे, जो गलत था, क्योंकि आखिर में सब बरी हो गए. क्या मालूम, लालू प्रसाद यादव का परिवार भी छूट निकले.