पिछले 5 सालों में उमा भारती और सुषमा स्वराज के मंत्री पद पर रहते हुए भी अपने कार्यालयों या संसद में चाहे कोई विशेष योगदान न रहा हो पर फिर भी 2019 के लोकसभा चुनावों को न लड़ने की उन की खुल्लमखुल्ला घोषणा, वह भी 2018 में 5 राज्यों के चुनावों से पहले, कर देना यह साफ कर देता है कि भाषणबाजी के राज का असर कम हो रहा है.

केंद्र सरकार के पूरे होते कार्यकाल के दौरान देश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ताली बजाते भाषण लगभग हर रोज सुने. 17 घंटे काम करने वाले कहे जाने वाले प्रधानमंत्री जितने घंटे भाषणों में लगाते थे, वे कम कर दिए जाएं तो कार्यालय में बैठ कर योजनाओं पर विचार करने के लिए कितने घंटे बचते होंगे, अंदाजा लगाया जा सकता है.

दूसरे बहुत बोलने वाले अरुण जेटली, जो राज्यसभा में आए, पर 2013 में भाजपा में प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का समर्थन करने के बदले दूसरे सर्वोच्च स्थान पर बैठे हैं, भी ज्यादा बोलते रहे हैं. वे यह बखान जरूर करते रहे कि भारत दुनिया का सब से तेजी से बढ़ने वाले देशों में से है पर वे यह नहीं बताते थे कि 1,800 डौलर के 7 प्रतिशत और 9,000 डौलर के 6 प्रतिशत में कितना अंतर होता है. भारत की प्रतिव्यक्ति आय 1,800 डौलर है, चीन की 9,000 और अमेरिका की 59,000 डौलर. अगर चीन 6 प्रतिशत से और अमेरिका

3 प्रतिशत से बढ़ रहा है तो भारत हर साल कितना पिछड़ता जाएगा, इस का अंदाजा अगर वित्तमंत्री नहीं लगाते और बताते, तो या तो वे पद के लायक नहीं या फिर झूठ बोलते हैं.

सुषमा स्वराज और उमा भारती ने समझ लिया है कि भाजपा का भविष्य ऐसे ही लोगों के हाथों में रहेगा जो बड़बोले हैं. पिछले 5 सालों में धर्म के व्यापार के अलावा सारे व्यापार ठप हुए हैं. ऐसे माहौल में पार्टी चाहे न छोड़ी जाए, कम से कम चुनावी जद्दोजेहद से तो बचा जाए.

एक व्यक्ति पर केंद्रित भाजपा गांधी परिवार को चाहे कितना कोस ले, कांग्रेस में फिलहाल ज्यादा सक्रिय नेता हैं. फिर दूसरी पार्टियों के तो नेता हैं ही, जिन में ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, चंद्रबाबू नायडू, नवीन पटनायक, महबूबा मुफ्ती, लालू प्रसाद यादव शामिल हैं. इस के मद्देनजर ही इन दोनों भाजपाई महिला नेताओं ने सोचा कि क्यों जोखिम लिया जाए

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