सरस सलिल विशेष

70 वर्षीय भंवरलाल शाह मूलरूप से राजस्थान के जिला पाली के गांव रावड़ी के रहने वाले थे. घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण सालों पहले उन्होंने रोजीरोटी की तलाश में पुणे शहर की राह पकड़ी थी. उस समय पुणे छोटा सा शहर हुआ करता था. उन्होंने पुणे की वारजे मालवाड़ी में एक किराए की दुकान ली. उन के पास जो जमापूंजी थी, उस से उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया.

जैन धर्म के अनुयायी भंवरलाल ईमानदार, मधुर व्यवहार वाले नेकदिल इंसान थे. वह गरीबों की हरसंभव मदद किया करते थे. अगर किसी ग्राहक के पास पैसे नहीं होते तो वह उसे सामान भी उधार दे दिया करते थे. यही कारण था कि उस इलाके के सारे लोग उन की दुकान पर आते थे, जिस से उन्हें अच्छी आमदनी होने लगी.

जैसेजैसे उस इलाके की आबादी बढ़ती गई, वैसेवैसे उन की दुकान की आमदनी भी बढ़ती गई. इस के बाद वह बीवीबच्चों को भी राजस्थान से पुणे ले आए. इसी बीच उन्होंने किराए की दुकान छोड़ कर अपनी दुकान खरीद ली. उन के परिवार में पत्नी के अलावा उन के 3 बेटे मुकेश शाह, भरत शाह और विपुल शाह थे. तीनों बच्चे पढ़ रहे थे. छोटा बेटा विपुल परिवार में सब से छोटा था, इसलिए परिवार में सब से ज्यादा प्यार उसे ही मिलता था.

ज्यादा लाड़प्यार की वजह से वह जिद्दी स्वभाव का हो गया था, जिस से उस का पढ़ाई में मन नहीं लगता था. अकसर वह दोस्तों के साथ मटरगश्ती करता रहता था. वह अपने भाइयों की तरह कोई डिग्री वगैरह तो नहीं ले पाया लेकिन व्यवहारकुशल था. पिता ने विपुल को दुकान पर बैठाना शुरू कर दिया. भंवरलाल ने थोक में भी सामान बेचना शुरू कर दिया था, जिस से आमदनी और ज्यादा बढ़ गई.

भंवरलाल ने बेटों की पढ़ाई के बाद उन के व्यवसाय की भी व्यवस्था कर दी. अपने बड़े बेटे मुकेश के लिए उन्होंने धामरी में एक दुकान खुलवा दी तो भरत और विपुल के लिए वारजे मालवाड़ी स्थित चर्च के पीछे एक जनरल स्टोर खुलवा दिया. इस में वह किताबें और स्टेशनरी भी बेचने लगे.

भंवरलाल ने कारोबार बढ़ाया तो उन्होंने अपने गांव के कई लड़कों को बुला कर अपनी दुकान पर रख लिया था. थोड़े ही दिनों में उन की दुकान की पुणे के अन्य क्षेत्रों में भी शाखाएं हो गई थीं.

अपने तीनों बच्चों को अपने पैरों पर खड़े देख कर भंवरलाल बेफिक्र हो गए थे. बाद में उन्होंने उन की शादी कर दी तो 2-3 साल में उन के आंगन में नातीपोतों की किलकारियां भी गूंजने लगीं.

कुछ दिनों तक वह अपने नातीपोतों, बहू और बेटों के साथ रहे. जब उन्हें इस बात का विश्वास हो गया कि बेटे अब अपना कारोबार संभाल लेंगे, तब उन्होंने अपने धर्मगुरुओं से महावीर स्वामी का मंत्र ले लिया और सांसारिक मोहमाया को त्याग कर उन के साथ निकल गए.

अपने पिता के वहां मौजूद न रहने के बावजूद भाइयों ने कारोबार को बुलंदियों तक पहुंचाया. कारोबार अच्छा चल रहा था, परिवार सुखी था. किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. उन्होंने रहने के लिए पुणे के सिंहगढ़ रोड स्थित गंगा भाग्योदय इमारत में फ्लैट ले लिए थे. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था कि विपुल के जीवन में प्रेरणा कांबले नाम की एक ऐसी आंधी आई कि विपुल को जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ गया.

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विपुल की जिंदगी में आई प्रेरणा नाम की आंधी

32 वर्षीय विपुल 3 बच्चों का बाप बन चुका था. इस के बावजूद वह आशिकमिजाज था. मौका मिलने पर वह खूबसूरत लड़कियों को अपने जाल में फंसाने की कोशिश में लगा रहता था.

2015 में प्रेरणा कांबले और विपुल की मुलाकात उस समय हुई, जिस समय प्रेरणा कांबले अपने कोर्स की कुछ किताबें खरीदने के लिए विपुल की दुकान पर गई थी. शोख और चंचल स्वभाव की प्रेरणा को देखते ही विपुल के दिल में घंटियां बज उठीं. वह उसे अपलक देखता रह गया. उसे ऐसा लगा जैसे उस की दुकान पर कोई परी आई हो.

उस की नजरें देख कर एक बार को प्रेरणा भी शरमा गई थी. फिर उस ने अपनी किताबों की सूची विपुल की तरफ बढ़ाई. विपुल ने कुछ किताबें निकाल कर उस के सामने रख दीं और बाकी किताबें दुकान में उपलब्ध न होने की बात बता कर अगले दिन उपलब्ध कराने को कह दिया.

किताबों का उपलब्ध न होना सिर्फ एक बहाना था. उसे तो प्रेरणा कांबले को बारबार अपनी दुकान पर बुलाना था. उस का मानना था कि जितनी बार प्रेरणा उस की दुकान पर आएगी, उतनी बार उसे बात करने का मौका मिलेगा और बात आगे बढ़ेगी. वह प्रेरणा को पूरी तरह अपने दिलोदिमाग में बसा चुका था.

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प्रेरणा कांबले एक धार्मिक प्रवृत्ति के परिवार से थी. परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी. लेकिन परिवार खुशहाल था. यह परिवार दांगट पाटिल नगर की स्नेहा विहार सोसायटी में रहता था.

प्रेरणा कांबले उस परिवार की एकलौती संतान थी. परिवार की सारी जिम्मेदारी प्रेरणा कांबले की मां स्नेहा कांबले पर थी. प्रेरणा पढ़ाई में होशियार थी. छोटीमोटी नौकरी के साथ वह सौफ्टवेयर इंजीनियरिंग का कोर्स भी कर रही थी.

प्रेरणा महत्त्वाकांक्षी, आधुनिक और खुले विचारों वाली युवती थी. वह एक बार जिस से बात कर लेती थी, उस पर अपना प्रभाव जमा देती थी. तभी तो पहली बार मिलने पर विपुल भी उस का दीवाना हो गया था.

जहां एक तरफ विपुल के दिलोदिमाग पर प्रेरणा की छवि बस गई थी, वहीं दूसरी तरफ प्रेरणा भी विपुल के बातव्यवहार के असर को नजरअंदाज नहीं कर पाई थी. प्रेरणा जब भी विपुल शाह की दुकान पर जाती थी, वह प्रेरणा का मुसकरा कर स्वागत करता था. किताबों पर पर उसे भारी छूट देता था.

धीरेधीरे प्रेरणा कांबले का भी झुकाव विपुल की तरफ होने लगा था, जिस के बाद प्रेरणा किसी न किसी सामान के बहाने विपुल की दुकान पर जाने लगी. इसी समय मौका मिलने पर दोनों कुछ बातें कर लिया करते थे. धीरेधीरे दोनों के बीच खूब बातें होने लगीं.

उन्हें बात करने का मौका तो मिलता था लेकिन संकोच की वजह से विपुल उस से अपने मन की बात नहीं कह पाता था. इस की वजह यह थी कि विपुल का वैवाहिक जीवन उस के बीच आ रहा था. इस के अलावा दोनों की उम्र और जाति धर्म के बीच जमीनआसमान का फासला था.

लेकिन यह विचार कुछ दिन के लिए ही आए, क्योंकि प्यार उम्र, जाति और धर्म को नहीं देखता. इस तरह दोनों ही एकदूसरे को मन ही मन चाहने लगे.

शुरुआत प्यार की

मौका दिवाली के त्यौहार का था. विपुल हर दिवाली के त्यौहार पर अपने ग्राहकों को शुभकामनाओं के कार्ड के साथ कोई न कोई गिफ्ट देता था. इस बार विपुल ने प्रेरणा को एक महंगे गिफ्ट के साथ शुभकामनाओं का कार्ड भी दिया. कार्ड में लिखे मैसेज में विपुल ने प्रेरणा कांबले से अपने प्यार का इजहार किया था.

महंगा गिफ्ट पा कर प्रेरणा बहुत खुश हुई. चूंकि वह भी विपुल को चाहती थी, इसलिए उस ने भी कार्ड का जवाब कार्ड से ही दिया, जिस में उस ने अपने प्यार का इजहार कर दिया था.

इस के बाद उन की फोन पर बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया. वह मिलनेजुलने के लिए बाहर जाने लगे. विपुल शाह के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी. वह प्रेरणा के ऊपर दिल खोल कर पैसे खर्च करता था. उसे महंगे उपहार देता और महंगे होटलों में जा कर खाना खिलाता. प्रेरणा का वह हर तरह से खयाल रखने लगा था.

इसी दौरान वह पल भी आ गया, जब एक होटल में उन्होंने अपनी हसरतें पूरी कीं. विपुल ने उस से शादी करने का वादा भी कर लिया. प्रेरणा कांबले विपुल शाह की फरेबी बातों में आ गई. वह विपुल का हर कहा मानने लगी. दोनों काफी खुश थे.

प्रेरणा कांबले विपुल को ले कर अपने गृहस्थ जीवन के ख्वाब देखने लगी, लेकिन विपुल की सच्चाई सामने आने पर उस का यह भ्रम टूट गया. प्रेरणा कांबले को जब पता चला कि विपुल शादीशुदा है तो जैसे उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

जो विपुल उस के तनमन से खेल रहा था, वह फरेबी निकला. विपुल की पत्नी को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस के पति का किसी और से चक्कर चल रहा है. पर यह बात आखिर कब तक छिपी रह सकती थी. एक न एक दिन तो सच्चाई सामने आनी ही थी.

प्रेरणा को अपनी भूल पर पछतावा होने लगा. उसे विपुल पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था, लेकिन अब वह कर भी क्या सकती थी. काफी सोचनेविचारने के बाद विपुल शाह के प्रति उस के मन में जो इज्जत थी, अब वह नफरत में बदल गई. उस ने विपुल को सबक सिखाने का फैसला कर लिया.

उस ने तय कर लिया कि विपुल ने उस के साथ जो धोखा किया है, उस की वह पूरी कीमत वसूलेगी. वह विपुल से खुद के रहने के लिए एक फ्लैट खरीदने के लिए पैसों की मांग करने लगी. पुणे जैसे शहर में फ्लैटों की कीमत करोड़ों रुपयों में आंकी जाती है. विपुल इतनी बड़ी रकम उसे देना नहीं चाहता था, फिर भी उस ने प्रेरणा कांबले को कुछ लाख रुपए दे कर उस से दूरियां बनानी शुरू कर दीं.

उगने लगे नफरत के बीज

लेकिन प्रेरणा कांबले भी इतनी आसानी से उस का पीछा छोड़ने वालों में से नहीं थी.  विपुल शाह ने उसे प्यार और मोहब्बत के नाम पर छला था. शादी का वादा कर के उस के शरीर और जज्बात से खेला था. इसलिए प्रेरणा ने उस से कहा कि अगर वह उसे फ्लैट खरीदने के पैसे नहीं देगा तो वह अपने और उस के संबंधों की जानकारी उस की पत्नी और परिवार को दे देगी.

प्रेरणा कांबले की इस धमकी से विपुल डर गया और वक्तबेवक्त प्रेरणा की बातों को  मान कर उसे पैसे देता रहा. लेकिन प्रेरणा कांबले नाम की फांस उस के गले में फंस गई थी. अब वह उस दिन को कोसने लगा, जिस दिन प्रेरणा से उस की मुलाकात हुई थी. उसे अब अपनी भूल पर पछतावा हो रहा था.

उस का चैन और सुकून सब उड़ गया था. वह अकसर इस विचार में खोया रहता था कि उस के भविष्य का क्या होगा. प्रेरणा की धमकी और उस की ब्लैकमेलिंग के भूत से कब तक डरता रहेगा. वह प्रेरणा की मंशा जान चुका था कि अब वह उस से सिर्फ अपना प्रतिशोध ले रही है, जो कभी खत्म होने वाला नहीं है.

इन्हीं सब सोचविचारों में फंसे विपुल के मन में प्रेरणा कांबले के लिए एक खतरनाक योजना ने जन्म ले लिया, जिस से उसे प्रेरणा, उस की धमकी और ब्लैकमेलिंग से आजादी मिल जाए. विपुल ने उस का काम तमाम करने की ठान ली, जिस से न रहे बांस और न बजे बांसुरी. लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था. इस के लिए उसे किसी विश्वसनीय व्यक्ति की जरूरत थी.

इस बारे में जब उस ने अपने चारों ओर नजरें दौड़ाईं तो उसे अपनी दुकान का नौकर लहु गोनते नजर आया. लहु गोनते उस का पुराना नौकर था. जरूरत पड़ने पर वह कार ड्राइव भी कर लेता था. कभीकभी कार ड्राइव करने के लिए विपुल उसे अपने साथ भी ले कर जाया करता था. हर काम में वह उस की मदद करने को तैयार रहता था. विपुल ने जब उस से बात की तो वह थोड़े से पैसों के लालच में साथ देने को तैयार हो गया.

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अपनी योजना के अनुसार 15 मार्च, 2018 को दोपहर 12 बजे के बाद विपुल ने लहु गोनते को अपनी एमएच12पी 2412 नंबर की कार को बाहर निकालने के लिए कहा. इस के बाद उस ने प्रेरणा को यह कह कर बुलाया कि वह पथरी की दवा लेने मुंबई जा रहा है. अगर वह आएगी तो बातचीत में सफर कट जाएगा और घूम कर भी आ जाएंगे. प्रेरणा उस के साथ जाने को तैयार हो गई. वैसे भी वह अकसर विपुल के साथ लंबी ड्राइव पर जाती थी.

बन गई मौत की भूमिका

अपनी मौत से अनभिज्ञ प्रेरणा कार में पिछली सीट पर विपुल के साथ बैठ कर मुंबई की ओर रवाना हो गई. कार विपुल का नौकर चला रहा था. लगभग एक घंटे बाद कार लोनावाला के करीब बाघराई मंदिर के पास रुक गई. वहां पर तीनों ने चाय पी. चाय पीने के बाद लहु वापस कार में आ कर बैठ गया. जबकि प्रेरणा और विपुल थोड़ा समय बिताने के लिए मंदिर के पीछे वाली एक चट्टान पर जा कर बैठ गए. कुछ मिनटों तक इधरउधर की बातें करने के बाद प्रेरणा कांबले अपने मतलब की बात पर आ गई.

‘‘विपुल, तुम मेरे फ्लैट के बारे में क्या कर रहे हो? मैं देख रही हूं कि तुम्हें मेरे फ्लैट में कोई दिलचस्पी नहीं है. कुछ दिनों से मेरे प्रति तुम्हारा व्यवहार भी ठीक नहीं है. तुम मुझ से दूरियां बना रहे हो. मेरा फोन भी रिसीव नहीं करते. आखिर तुम्हारे मन में चल क्या रहा है? तुम मुझे फ्लैट के लिए पैसे दोगे या नहीं? या फिर मुझे अपने संबंधों के बारे में तुम्हारे परिवार और तुम्हारी बीवी को बताना पड़ेगा?’’

विपुल प्रेरणा के इन जहरीले सवालों का जवाब उसी समय देना चाहता था, लेकिन वक्त अनुकूल नहीं था. वहां से आ कर दोनों कार में बैठ गए. प्रेरणा उस से नाराज हो गई थी, इसलिए वह कार की आगे की सीट पर बैठ गई. विपुल के लिए यह मौका अच्छा था. अपने साथ लाई रस्सी से उस ने प्रेरणा के गले को पूरी तरह कस दिया. थोड़ी देर तक हाथपैर मारने के बाद उस के प्राणपखेरू उड़ गए.

तब तक सूरज पूरी तरह से डूब चुका था. चारों ओर अंधेरा हो गया था. कार ग्रामीण पुलिस थाने पौड़ की सीमा में प्रवेश कर चुकी थी. लहु गोनते ने प्रेरणा कांबले की लाश को ठिकाने लगाने के लिए कार विसाधर पहाडि़यों के जंगलों में ले जा कर रोक दी.

इस के बाद दोनों ने शव को कार से बारह निकाल कर सहारा सिटी के पीछे की घनी झाडि़यों के बीच ले जा कर डाल दिया. लाश को कोई पहचान न सके, इसलिए उन्होंने वहां पड़े पत्थरों से मारमार कर उस के चेहरे को क्षतविक्षत कर दिया. फिर वे घर लौट आए.

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लेकिन विपुल रात भर इस डर से नहीं सो पाया कि कहीं प्रेरणा के शव से पुलिस को कोई ऐसा सूत्र न मिल जाए, जिस की वजह से उसे जेल जाना पड़े. इस से बचने के लिए वह नौकर के साथ सुबह उठ कर घटनास्थल की ओर निकल गया. उस ने एक बोरी साथ ले ली थी.

मुंबई-पुणे रोड स्थित पावना झील के पास पैट्रोल पंप से इन लोगों ने 5 लीटर पैट्रोल खरीदा और मौकाएवारदात पर पहुंच कर प्रेरणा के शव को बोरी में लपेट कर उसे पैट्रोल से जला दिया. अपने अपराधों का सबूत मिटाने के बाद दोनों पुणे लौट आए. इस के बाद नौकर लहु गोनते अपने गांव चला गया. अब विपुल एकदम निश्चिंत हो गया था.

जुर्म बोलता है

24 घंटे बीत जाने के बाद जब प्रेरणा कांबले घर नहीं पहुंची तो घर वालों को उस की चिंता सताने लगी. बिना किसी को कुछ बताए वह कहां चली गई, यह उन की समझ में नहीं आ रहा था.

अपनी तरफ से काफी खोजबीन के बाद भी जब प्रेरणा का कहीं पता नहीं चला, तब निराश हो कर प्रेरणा कांबले की मां स्नेहा कांबले वारजे मालवाड़ी थाने पहुंची. स्नेहा ने थानाप्रभारी बाजीराव मोले से मिल कर उन्हें सारी बातें बता दीं और प्रेरणा कांबले की गुमशुदगी की शिकायत दर्ज करवा दी.

थानाप्रभारी बाजीराव मोले ने इस मामले को गंभीरता से लिया और स्नेहा कांबले से प्रेरणा की फोटो और हुलिया ले कर उन्हें घर भेज दिया. इस मामले की जांच उन्होंने सहायक इंसपेक्टर बालासाहेब शिंदे, एएसआई जगन्नाथ मोरे, हेडकांस्टेबल चंद्रकांत जाधव उर्फ मंगी और राजेंद्र खामकर को सौंप दी. यह बात 17 मार्च, 2018 की है.

अपने वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में पुलिस टीम ने तेजी से प्रेरणा की गुमशुदगी की जांच शुरू कर दी. उन्होंने प्रेरणा कांबले की उम्र, हुलिया और फोटो के विवरण शहर और गांवों के पुलिस थानों में भेज दिए. जब प्रेरणा कांबले के मोबाइल डाटा और काल रिकौर्ड निकलवाए गए तो उन के हाथ शीघ्र ही विपुल शाह और उस के नौकर लहु गोनते की गरदन तक पहुंच गए. वे दोनों पुलिस गिरफ्त में आ गए.

इस बीच थाना पौड़ की पुलिस ने विसाधर पहाडि़यों के जंगल से प्रेरणा का जला हुआ शव बरामद कर के केस दर्ज कर लिया था. इस की सूचना थाना वारजे मालवाड़ी को भी दे दी गई थी.

चूंकि यह मामला लोनावला ग्रामीण पुलिस थाने पौड़ के अंतर्गत आता था, अत: वारजे मालवाड़ी पुलिस अधिकारियों ने विपुल शाह और गोनते को उन के हवाले कर दिया पौड़ पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर सुरेश निबांलकर और सहायक इंसपेक्टर उद्धव खांडे ने उन से विस्तार से पूछताछ की. पुलिस ने आरोपी विपुल और उस के नौकर के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 120बी, 34 के तहत गिरफ्तार कर उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक विपुल भंवरलाल शाह और लहु गोनते लोनावला जेल में बंद थे. इस मामले की जांच टीम को पुणे डेक्कन विभाग के एसीपी बाजीराव मोहिते ने प्रशस्तिपत्र दे कर सम्मानित किया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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