सरस सलिल विशेष

कानपुर शहर के अरमापुर स्टेट के रहने वाले लोग सुबह टहलने के लिए निकले तो उन्हें कैलाशनगर पुलिया के पास सड़क के किनारे खून से लथपथ एक लाश पड़ी दिखाई दी. थोड़ी देर में वहां भीड़ लग गई. उसी भीड़ में से किसी ने इस बात की सूचना थाना अरमापुर पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी आशीष मिश्र पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे. घटनास्थल पर आने से पहले उन्होंने लाश पड़ी होने की सूचना पुलिस अधिकारियों को दे दी थी. यह 14 मई, 2017 की बात है.

घटनास्थल पर पहुंच कर आशीष मिश्र लाश का बारीकी से निरीक्षण करने लगे. लाश सड़क के किनारे खून से लथपथ पड़ी थी. उस के पास ही एक मोटरसाइकिल खड़ी थी. हत्या किसी मजबूत और भारी चीज से सिर पर प्रहार कर के की गई थी. उस के बाद पहचान मिटाने के लिए उस के चेहरे को ईंट से बुरी तरह कुचल दिया गया था. खून से सनी सीमेंट वाली वह ईंट वहीं पड़ी थी.

आशीष मिश्र लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि एसपी (पश्चिम) संजय कुमार यादव, सीओ ज्ञानेंद्र सिंह और नम्रता श्रीवास्तव भी आ पहुंची थीं. अधिकारियों के आदेश पर फोरैंसिक टीम भी आ गई थी. फोरैंसिक टीम ने अपना काम कर लिया तो पुलिस अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया.

घटनास्थल पर सैकड़ों लोग जमा थे, पर कोई भी लाश की पहचान नहीं कर सका था. इस से स्पष्ट था कि मृतक कहीं और का रहने वाला था. जब लोग लाश की पहचान नहीं कर सके तो एसपी संजय कुमार यादव ने मृतक के कपड़ों की तलाशी लेने को कहा. सिपाही रामकुमार ने मृतक के पैंट की जेब में हाथ डाला तो उस में एक परिचयपत्र और ड्राइविंग लाइसैंस मिला.

लाइसैंस और परिचयपत्र पर एक ही नाम सुरेंद्र कुमार तिवारी पुत्र नीरज कुमार तिवारी लिखा था. इस का मतलब दोनों चीजें उसी की थीं. दोनों पर पता मसवानपुर कच्ची बस्ती दर्ज था. परिचयपत्र के अनुसार, वह रक्षा प्रतिष्ठान में संविदा कर्मचारी था.

लाइसैंस और परिचयपत्र से मिले पते पर 2 सिपाहियों रामकुमार और मेवालाल को भेजा गया तो वहां एक लड़का मिला. उसे परिचयपत्र और ड्राइविंग लाइसैंस दिखाया गया तो उस ने कहा, ‘‘अरे, यह परिचयपत्र और लाइसैंस तो मेरे पिताजी का है. वह कहां हैं, कल रात 10 बजे घर से निकले तो अभी तक लौट कर नहीं आए हैं?’’

सिपाहियों ने उस का नाम पूछा तो उस ने अपना नाम जय तिवारी बताया. इस के बाद सिपाहियों ने बताया कि अरमापुर स्टेट स्थित कैलाशनगर पुलिया के पास एक लाश मिली है. उसी की पैंट की जेब से यह परिचयपत्र और लाइसैंस मिला है. वह उन के साथ चल कर लाश देख ले, कहीं वह लाश उस के पिता की तो नहीं है.

जय अपने चाचा सर्वेश तिवारी को साथ ले कर सिपाहियों के साथ चल पड़ा. घटनास्थल पर पहुंच कर उस ने लाश देखी तो फफकफफक कर रोने लगा. रोते हुए उस ने कहा, ‘‘सर, यह लाश मेरे पिता सत्येंद्र तिवारी की है. पता नहीं किस ने इन की हत्या कर दी.’’

जय के साथ आए उस के चाचा सर्वेश ने भी लाश की पहचान अपने भाई सत्येंद्र तिवारी के रूप में कर दी थी. घटनास्थल पर मृतक का बेटा और भाई आ गए थे, लेकिन उस की पत्नी अभी तक नहीं आई थी. थानाप्रभारी आशीष मिश्र ने जय से उस की मां के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि उस की मां सुलभ विशधन गांव गई हैं.

थानाप्रभारी ने फोन द्वारा उसे सूचना दी तो थोड़ी देर में वह भी घटनास्थल पर आ गई. पति की लाश देख कर सुलभ बेहोश हो गई. तब साथ आई महिलाओं ने किसी तरह उसे संभाला. उस समय वह कुछ भी बताने की हालत में नहीं थी, इसलिए पुलिस उस से पूछताछ नहीं कर सकी.

सीओ ज्ञानेंद्र सिंह ने मृतक के बेटे जय से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पिता सत्येंद्र कल रात 10 बजे घर से यह कह कर निकले थे कि वह एक घंटे में वापस आ जाएंगे. जब काफी देर तक वह लौट कर नहीं आए तो उस ने यह बात अपने चाचा सर्वेश तिवारी को बताई. उस के बाद उस ने चाचा के साथ पिता की काफी खोज की, लेकिन उन का कुछ पता नहीं चला. सुबह सिपाहियों से पता चला कि उन की तो हत्या हो गई है.

थोड़ी देर बाद मृतक की पत्नी सुलभ सामान्य हुई तो पुलिस अधिकारियों ने उसे सांत्वना दे कर उस से भी पूछताछ की. उस ने बताया कि उस के पति आर्डिनैंस फैक्ट्री में ठेके पर काम करते थे. लेबर कौंट्रैक्ट कंपनी वृंदावन एसोसिएट्स द्वारा उन्हें ओएफसी में काम पर लगाया था.

इस कंपनी की ओर से मजदूरों का ठेका दिनेश खंडेलवाल और उन का मुंशी अमन लेता था. लगभग 5 महीने पहले उस के पति सत्येंद्र का पैसे के लेनदेन को ले कर ठेकेदार दिनेश और मुंशी अमन से झगड़ा हुआ था, जिस में मारपीट भी हुई थी.

इस के बाद से वह काफी परेशान रहते थे. वह शराब भी बहुत ज्यादा पीने लगे थे. कहीं ठेकेदार दिनेश और उस के मुंशी अमन ने ही तो उन की हत्या नहीं कर दी है. पूछताछ के बाद पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए लालालाजपत राय अस्पताल भिजवा दिया.

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इस के बाद थाने आ कर थानाप्रभारी आशीष मिश्र ने सत्येंद्र तिवारी की हत्या का मुकदमा दर्ज करा कर ठेकेदार दिनेश और उस के मुंशी अमन को हिरासत में ले लिया गया. थाने में दोनों से सत्येंद्र की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो दोनों ने साफ मना कर दिया.

अमन का कहना था कि पैसों को ले कर उस का सत्येंद्र से झगड़ा जरूर हुआ था, लेकिन वह झगड़ा ऐसा नहीं था कि बात हत्या तक पहुंच जाती. सत्येंद्र की पत्नी उसे गलत फंसा रही है. ऐसा ही दिनेश ने भी कहा था. उन की बातों से पुलिस को लगा कि दोनों निर्दोष हैं तो उन्हें छोड़ दिया गया था.

आशीष मिश्र को इस मामले में कोई सुराग नहीं मिल रहा था. जबकि अधिकारियों का उन पर काफी दबाव था. अंत में उन्होंने मुखबिरों का सहारा लिया. आखिर उन्हें मुखबिरों से मदद मिल गई. किसी मुखबिर से उन्हें पता चला कि सत्येंद्र की हत्या उस के बेटे जय ने ही की है. इस में उस की मां सुलभ और उस के प्रेमी दीपक कठेरिया का भी हाथ हो सकता है.

बात थोड़ा हैरान करने वाली थी, लेकिन अवैध संबंधों में कुछ भी हो सकता है. यह सोच कर आशीष मिश्र ने मसवानपुर स्थित मृतक सत्येंद्र तिवारी के घर छापा मार कर जय और उस की मां सुलभ को गिरफ्तार कर लिया.

थाने ला कर सुलभ और जय से सत्येंद्र की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो दोनों कसमें खाने लगे. लेकिन पुलिस के पास जो सबूत थे, उस से पुलिस ने उन की बातों पर विश्वास नहीं किया और उन से सख्ती से पूछताछ की. फिर तो मांबेटे ने सत्येंद्र की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

पता चला कि जय ने पड़ोस में रहने वाले दीपक कठेरिया की मदद से पिता की हत्या की थी. क्योंकि सुलभ के दीपक कठेरिया से अवैध संबंध थे. सत्येंद्र इस बात का विरोध करता था. शराब के नशे में वह अकसर पत्नी और बेटे की पिटाई करता था. उस की इसी हरकत से तंग आ कर बेटे और प्रेमी की मदद से सुलभ ने पति की हत्या करवा दी थी.

सत्येंद्र की हत्या में दीपक का नाम आया तो पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया. थाने में दीपक ने जय और सुलभ को देखा तो उस ने भी सत्येंद्र की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद दीपक और जय ने हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड और खून सने अपने कपड़े बरामद करा दिए थे, जो जय ने अपने घर में छिपा रखे थे. सभी से पूछताछ में सत्येंद्र तिवारी की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

कानपुर शहर से 40 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर एक कस्बा बसा है बिल्हौर. इसी कस्बे से कुछ दूरी पर एक गांव है विशधन. ब्राह्मणबाहुल्य इस गांव में रमेशचंद्र दुबे अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटियां शुभि और सुलभ तथा एक बेटा अरुण था. रमेशचंद्र दुबे अध्यापक थे. उन के पास खेती की थोड़ी जमीन थी. इस तरह उन का गुजरबसर आराम से हो रहा था. बड़ी बेटी शुभि की शादी उन्होंने कन्नौज में की थी.

इस के बाद सुलभ शादी लायक हुई तो कानपुर शहर में मसवानपुर बस्ती में रहने वाले नीरज तिवारी के बेटे सत्येंद्र से उस की शादी कर दी. सत्येंद्र प्राइवेट नौकरी करता था. उस का रंग थोड़ा सांवला था और वह सुलभ से उम्र में भी बड़ा था. सुलभ काफी खूबसूरत थी. इस के बावजूद उस ने कभी कोई ऐतराज नहीं किया.

देखतेदेखते 5 साल कब बीत गए, पता ही नहीं चला. इस बीच सुलभ 2 बच्चों जय और पारस की मां बन गई. बच्चों के जन्म के बाद सत्येंद्र की नौकरी आर्डिनैंस फैक्ट्री में संविदा कर्मचारी के रूप में लग गई. लेबर कौंट्रैक्ट कंपनी वृंदावन एसोसिएट्स के तहत उसे काम पर रखा गया. यह कंपनी रक्षा प्रतिष्ठानों में मजदूर सप्लाई करने का ठेका लेती है. सत्येंद्र को वहां से ठीकठाक पैसे मिल रहे थे, इसलिए घर में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी.

बच्चे बड़े हुए तो घर में रहने की परेशानी होने लगी. सत्येंद्र बच्चों के साथ अलग मकान ले कर रहने लगा. सुलभ यही चाहती भी थी. बच्चे बड़े हुए तो खर्च बढ़ा, जिस से घर में पैसों को ले कर तंगी रहने लगी. उसी बीच सत्येंद्र शराब पीने लगा. उस की कमाई का एक हिस्सा शराब पर खर्च होने लगा तो घर खर्च को ले कर सुलभ परेशान रहने लगी. वह पति को शराब पीने को मना करती तो सत्येंद्र उस से लड़ाईझगड़ा ही नहीं करता, बल्कि मारपीट भी करता. इस का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ने लगा.

एक दिन सत्येंद्र के साथ एक युवक आया, जिस के बारे में उस ने सुलभ को बताया कि यह उस का दोस्त दीपक कठेरिया है. वह भी मसवानपुर में ही रहता था. दोनों साथसाथ खातेपीते थे. दीपक ने खूबसूरत सुलभ को देखा तो पहली ही नजर में उस पर मर मिटा. दीपक शरीर से हृष्टपुष्ट और सुलभ से कमउम्र का था, इसलिए सुलभ भी उस की ओर आकर्षित हो गई. दीपक उस दिन करीब एक घंटे तक घर में रहा. इस बीच दोनों एकदूसरे को ताकते रहे.

एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि एक दिन सत्येंद्र फिर दीपक को घर ले आया. उस का आना सुलभ को अच्छा लगा. बातोंबातों में दीपक ने सुलभ का फोन नंबर ले लिया. इस के बाद दीपक ने बहाने से सुलभ को फोन किया तो उस ने बातचीत में दिलचस्पी दिखाई. फिर तो दोनों में बातें होने लगीं.

एक दिन सुलभ घर में अकेली थी. वह आंगन में खड़ी अपने बाल सुखा रही थी, तभी दीपक आ गया. उस दिन वह दीपक को कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लगी. उस की निगाहें सुलभ के चेहरे पर जम गईं. यही हाल सुलभ का भी था. अपनी स्थिति को भांप कर सुलभ ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘तुम तो मुझे ऐसे देख रहे हो, जैसे पहली बार देखा है.’’

‘‘इस तरह अकेली तो पहली बार देख रहा हूं. इस के पहले तो चोरीचोरी देखना पड़ता था. आज खुल कर देखने का मौका मिला है. अब पता चला कि तुम कितनी खूबसूरत हो.’’

‘‘ऐसा क्या है मुझ में, जो मैं तुम्हें इतनी खूबसूरत लग रही हूं?’’ सुलभ ने दीपक की आंखों में आंखें डाल कर पूछा.

‘‘हीरे की परख जौहरी ही कर सकता है. मैं बड़ा नसीब वाला हूं, जिसे तुम्हारी खूबसूरती देखने का मौका मिला है.’’

‘‘वैसे आप हैं बहुत बातें बनाने वाले. बातों में उलझा कर आप मुझे फंसाना चाहते हैं. किसी की बीवी को फंसाने में तुम्हें डर नहीं लगता, ऐसा करते शरम नहीं आती?’’

‘‘कैसी शरम, खूबसूरत चीज को कौन नहीं पाना चाहता. अगर मैं तुम्हें पाना चाहता हूं तो इस में मेरा क्या दोष है?’’ कह कर दीपक ने सुलभ को अपनी बांहों में भर लिया.

सुलभ कसमसाई भी और बनावटी विरोध भी जताया, लेकिन उस के बाद खुद को समर्पित कर दिया. दीपक ने उस दिन सुलभ को जो सुख दिया, उस से वह भावविभोर हो उठी. दीपक से असीम सुख पा कर सुलभ उस की दीवानी बन गई. वह यह भी भूल गई कि वह 2 जवान बच्चों की मां है.

अवैध संबंधों का सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो वक्त के साथ बढ़ता ही गया. ऐसे रिश्ते छिपे भी नहीं रहते. सत्येंद्र को भी इस की जानकारी हो गई. फिर तो वह सुलभ पर बरस पड़ा, ‘‘मैं तुम्हारे बारे में क्या अनापशनाप सुन रहा हूं, मेरा नहीं तो कम से कम बच्चों का तो खयाल किया होता?’’

‘‘तुम्हें तो लड़ने का बहाना चाहिए. मैं ने ऐसा क्या गलत कर डाला, जो लोग मेरे बारे में अनापशनाप बक रहे हैं?’’ सुलभ ने कहा.

‘‘मुझे पता चला है कि दीपक वक्तबेवक्त घर आता है. तुम उस से हंसहंस कर बातें करती हो. तुम्हारे दीपक के साथ नाजायज संबंध हैं. आखिर मेरी जिंदगी को नरक क्यों बना रही हो?’’

‘‘नरक तो तुम ने मेरी और बच्चों की जिंदगी बना रखी है. पत्नी और बच्चों को जो सुखसुविधा चाहिए, वह तुम ने कभी नहीं दी. तुम जो कमाते हो, शराब में उड़ा देते हो. दीपक हमारी मदद करता है तो उस पर इलजाम लगाते हो.’’

सुलभ अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि सुरेंद्र का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. वह सुलभ को बेरहमी से पीटने लगा. पीटते हुए उस ने कहा, ‘‘मेरा खाती है और मुझ से ही जुबान लड़ाती है.’’

इस के बाद यह रोज का नियम बन गया. देर रात सुरेंद्र नशे में धुत हो कर आता और बातबेबात सुलभ से मारपीट करता. दोनों बच्चे जय और पारस मां को बचाने आते तो वह उन्हें भी गालियां तो देता ही, उन की पिटाई भी कर देता. अब वह रातदिन नशे में डूबा रहने लगा था. कभी काम पर जाता, कभी नहीं जाता. वेतन कम मिलता तो वह ठेकेदार और मुंशी से भी लड़ने लगता.

रोजरोज की मारपीट से सुलभ और उस का बेटा जय आजिज आ चुका था. आखिर उन्होंने सत्येंद्र से छुटकारा पाने की योजना बना डाली. उस योजना में सुलभ ने अपने प्रेमी दीपक कठेरिया को भी शामिल कर लिया.

दीपक इसलिए योजना में शामिल हो गया था, क्योंकि सत्येंद्र उस के संबंधों में बाधक बन रहा था. सुलभ की पिटाई उसे भी चुभती थी. योजना के तहत दीपक मसवानपुर स्थित पवन औटो से एक लोहे की रौड खरीद लाया और मैडिकल स्टोर से एक पत्ता नशीली गोलियों को.

12 मई, 2017 को योजना के तहत सुलभ अपने मायके विशधन चली गई. अगले दिन रात 8 बजे सत्येंद्र घर आया तो उस की तबीयत ठीक नहीं थी. वह चारपाई पर लेट गया. तभी जय ने दीपक को बुला लिया. योजना के तहत जय ने जूस में नशीली गोलियां घोल कर पिता को पिता दीं.

कुछ देर बाद वह बेहोश हो गया तो दीपक और जय उसे उसी की मोटरसाइकिल पर बैठा कर अरमापुर स्टेट स्थित कैलाशनगर पुलिया पर ले गए.

वहां सन्नाटा पसरा था. दोनों ने सत्येंद्र को मोटरसाइकिल से उतारा और सड़क किनारे पुलिया के पास लिटा कर लोहे की रौड से उस के सिर पर कई वार किए, जिस से उस का सिर फट गया और वह तड़प कर मर गया. जय को पिता से इतनी नफरत थी कि उस ने सड़क के किनारे पड़ी सीमेंट की ईंट उठाई और उस के चेहरे को कुचल दिया. हत्या करने के बाद जय और दीपक पैदल ही घर आ गए.

18 मई, 2017 को पूछताछ के बाद थाना अरमापुर पुलिस ने अभियुक्त दीपक, जय और सुलभ को कानपुर की अदालत में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया. कथा संकलन तक उन की जमानतें नहीं हुई थीं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित