सरस सलिल विशेष

अजमत खान उत्तर प्रदेश पुलिस में सर्विलांस ऐक्सपर्ट सिपाही था. वह बुखार से पीडि़त हुआ. 11 अक्तूबर, 2015 को वह उत्तर प्रदेश के जनपद बुलंदशहर के जिला अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचा. उस वक्त वहां तैनात इमर्जैंसी प्रभारी डाक्टर सचिन ने अजमत खान को 2 इंजैक्शन लगा दिए. अजमत खान खुश था कि अब उसे आराम मिल जाएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. घर पहुंचने के 24 घंटे के अंदर ही अजमत खान के बदन में सूजन आ गई. हालत ज्यादा बिगड़ने पर उसे तुरंत एक प्राइवेट अस्पताल में भरती कराया गया. वहां पता चला कि बिना जांचपड़ताल किए और मर्ज को ठीक से समझे बिना ही दिए गए इंजैक्शनों ने उस की यह हालत की थी.

डाक्टर की यह करतूत जब सुर्खियों में आई, तो बजाय कोई कार्यवाही करने के अस्पताल प्रशासन ने उसे छुट्टी पर ही भेज दिया.

उधर अजमत खान का शरीर गलना शुरू हो गया. गंभीर हालत के चलते उसे दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भरती कराया गया. उस के शरीर से खून रिसने लगा. वह कोमा में चला गया और उस के गुरदों ने भी काम करना बंद कर दिया. कई दिनों के बाद उस ने दम तोड़ दिया.

मामले ने तूल पकड़ा और आरोपी डाक्टर को मरीज की अनदेखी का जिम्मेदार माना गया. डाक्टर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया. नौसिखिया डाक्टर भी हर बड़ेछोटे अस्पतालों में पाए जाते हैं. कहने को उन के पास डिगरियां होती हैं, लेकिन वे असल होती हैं या थोड़ीबहुत पढ़ाई कर के हासिल की गई होती हैं, इसे कोई नहीं जानता.

कई बार डिगरी लेने के तुरंत बाद ही डाक्टर अपना निजी अस्पताल खोल कर बैठ जाते हैं. वे अनुभव को तवज्जुह नहीं देते, जिस के नतीजे कभीकभी घातक साबित होते हैं.

गाजियाबाद के रहने वाले फूड इंस्पैक्टर शिवराज सिंह दिल की बीमारी से पीडि़त थे. 29 नवंबर, 2015 को उन्होंने एक लैब में ब्लड सैंपल दिया. सैंपल लेने वाला नौजवान नौसिखिया था. उस की लापरवाही से हाथ में इंजैक्शन से हवा चली गई. नतीजतन, शिवराज का हाथ सूज कर नीला पड़ गया.

उस लैब को चलाने वालों ने अपनी लापरवाही से पल्ला झाड़ने की कोशिश की, लेकिन पुलिस को खबर की गई, तो उन्होंने गलती मानी. पता चला कि लोगों का ब्लड सैंपल एक नौसिखिया ले रहा था. उस के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी गई.

बरेली जिले की एक डाक्टर ने तो अनाड़ीपन की हदों को ही लांघ दिया. जचगी के दर्द के बाद नाजिम नामक नौजवान ने अपनी पत्नी मेराज को सुभाष नगर इलाके में डाक्टर राधा शर्मा के घर में बने अस्पताल में भरती कराया. डिलीवरी के दौरान उस से 10 हजार रुपए जमा कराने को कहा गया, जो उस ने जमा करा दिए.

मेराज ने नौर्मल डिलीवरी से एक बेटी को जन्म दिया. डाक्टर ने सिंकाई की बात कह कर नवजात के सीने पर इलैक्ट्रौनिक सिंकाई मशीन रख दी. इस से उस का सीना जल गया. कुछ देर बाद ही उस की मौत हो गई.

मामला बिगड़ने पर डाक्टर राधा शर्मा ने समझौते की कोशिश की, लेकिन इस बात की शिकायत पुलिस से की गई, तो पुलिस ने डाक्टर राधा शर्मा को गिरफ्तार कर लिया.

जांच में पता चला कि राधा शर्मा के पास एक ट्रेनिंग सैंटर से प्रसव सहायक का सर्टिफिकेट था. इस के बल पर उस ने खुद को डाक्टर घोषित कर के घर में ही अस्पताल खोल लिया था.

4 कमरों के अस्पताल में उस ने एक कमरे में ओपीडी बनाई हुई थी. फरवरी महीने में वह 2 नवजात बच्चों की मौत के मामले में जेल गई थी, लेकिन हाईकोर्ट से जमानत ले कर बाहर आ गई थी.

जेल से बाहर आ कर भी डाक्टर राधा शर्मा का अनाड़ीपन खत्म नहीं हुआ और न ही कोई सबक लिया गया. उस ने फिर से नया कारनामा कर दिया. इस के बाद पुलिस ने न केवल उस के अस्पताल को सील कर दिया, बल्कि उसे पेशेवर अपराधी घोषित कर दिया.

सहारनपुर के रहने वाले अनिल कुमार को बुखार था. वह एक डाक्टर के पास पहुंचा. उसे वहां इंजैक्शन लगाया गया. इस के बाद उस की तबीयत अचानक बिगड़ गई और देखते ही देखते उस की मौत हो गई. इस मामले में मुकदमा दर्ज करा दिया गया.

पता चला कि जिस ने अनिल को इंजैक्शन लगाया था, वह नौसिखिया कंपाउंडर टीटू था. बुलंदशहर जिले के किसान छोटू गिरी के 6 साला बेटे अजय की खेलते समय कुहनी की हड्डी टूट गई. वे उसे इलाज के लिए जिला अस्पताल ले गए. डाक्टर ने उस का एक्सरे कराया और प्लास्टर लगा दिया गया. अगले 5 दिनों में आराम मिलना तो दूर अजय की हालत और भी ज्यादा बिगड़ गई.

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बाद में उन्होंने दिल्ली ले जा कर बेटे का इलाज कराया, तो पता चला कि डाक्टर ने हड्डी ही गलत तरीके से जोड़ दी थी, जिस की वजह से अजय बहुत परेशान था.

हड्डी जोड़ने वाले उस डाक्टर के खिलाफ पुलिस में शिकायत की गई.

गाजियाबाद जनपद में मोतियाबिंद के आपरेशन के चक्कर में 8 मरीजों की जिंदगी में अंधेरा छा गया. आंखों के एक अस्पताल के बाहर औफर वाला बोर्ड लगा था कि उन के यहां मोतियाबिंद का सफल आपरेशन केवल 2 हजार रुपए में किया जाता है.

डाक्टरों ने एक ही दिन में कई आपरेशन कर डाले. इसे लापरवाही कहें या नौसिखियापन, 8 मरीजों की एक आंख की रोशनी जाती रही. इन मरीजों में फूलवती, राजेंद्री देवी, जगवती, फरजाना, जुम्मन, अमाना खातून, शिक्षा देवी व नेपाल शामिल थे. मामले के खुलने पर अस्पताल के खिलाफ जांच बैठा दी गई.

इस तरह के मामले यह बताने के लिए काफी हैं कि मरीजों की जिंदगी से नौसिखिया डाक्टर किस हद तक खिलवाड़ कर रहे हैं.

लाला लाजपतराय मैडिकल कालेज के सुपरिंटैंडैंट डाक्टर सुभाष सिंह कहते हैं कि किसी डाक्टर को डिगरी मिल जाना ही काफी नहीं होता, उसे प्रैक्टिस भी करनी होती है. डाक्टरी का पेशा गंभीर है. मामूली सी लापरवाही भी किसी मरीज की जिंदगी ले सकती है.

इस मसले पर डाक्टर वीपी सिंह कहते हैं कि किसी डाक्टर पर शक हो, तो उस की जांच कराई जा सकती है. लापरवाही और अनाड़ीपन से बचने के लिए डाक्टर के बारे में उचित जांचपड़ताल भी मरीजों को कर लेनी चाहिए.