लेखक- मेहा गुप्ता

‘‘मेरी प्यार बूआ, आप तो एकदम जंच रही हो, बिलकुल पंजाबी लड़कियों की तरह. पंजाबी सलवार… लिपस्टिक… क्या बात है,’’ नव्या ने दिल्ली से आई अपनी बूआ को कुहनी मारते हुए छेड़ा और फिर उन के गले लग गई और उन के गालों को चूम लिया.

नव्या की बूआ निकिता को उन के भैया ने कल फोन कर तुरंत बुढ़ाना आ जाने को कहा था.

‘हैलो निकिता, हम लोग 3 दिन के लिए शिमला जा रहे हैं. नव्या के फाइनल एग्जाम हैं और साथ में उस की तबीयत भी ठीक नहीं है. तुम हमारे पीछे से उस के पास आ जातीं, तो हमें परेशानी नहीं होती. अब जवान लड़की है, तो अकेले या आसपड़ोस वालों के भरोसे भी छोड़ कर जाने को मन नहीं मान रहा है.’

‘नहीं भाईसाहब, आप बिलकुल बेफिक्र हो कर जाइए, मैं कल सुबह की किसी बस से शाम तक वहां पहुंच जाऊंगी.’

‘‘क्या हुआ री नव्या तुझे? भाई साहब बता रहे थे कि तेरी तबीयत ठीक नहीं है,’’ निकिता बूआ ने आते ही चिंतित आवाज में पूछा, ‘‘और तू ने यह क्या पहन रखा है… यह फटी जींस और कटे शोल्डर वाला टौप. तुम यह सब कब से पहनने लगी?’’

‘‘अरे, कुछ नहीं बूआ, वही मंथली पीरियड…’’

‘‘मतलब, तू टाइम से है?’’ निकिता बूआ उछल कर खड़ी हो गईं और अपना गाल पोंछने लगीं, जहां पर एक मिनट पहले नव्या ने चूमा था. जैसे उन के गाल पर किसी ने कीचड़ मल दिया हो.

‘‘तेरी मां ने तुझे इतना भी नहीं सिखाया है कि इन दिनों में किसी नहाएधोए को छूना नहीं चाहिए. अब मुझे फिर से नहा कर आना पड़ेगा.’’

‘‘सौरी बूआ, आप पहले चाय तो ले लीजिए. मैं ने आप के लिए अदरक वाली चाय बना दी है और साथ में आप की पसंद के पालक के पकौड़े भी हैं,’’ बूआ का मूड अच्छा करने की गरज से नव्या ने बात बदलते हुए कहा.

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‘‘तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या? 3 दिन रसोई में जाना तो दूर उस के आसपास भी नहीं फटकना चाहिए. तुझे लगता है कि मैं तेरे हाथ का छुआ पानी भी पीऊंगी?’’ अब निकिता बूआ की आवाज कुछ कठोर हो गई थी.

नव्या को बूआ के गरममिजाज और दकियानूसी विचारों के बारे में मालूम था, जो दिल्ली में रहते हुए भी मानो बुढ़ाना में रह रही थीं, पर उन का ऐसा रूप देखने का मौका पहली बार पड़ा था.

नव्या कुछ समय के लिए सहम गई, फिर माहौल को बदलने के लिए अपनी बूआ को लाड़ लड़ाते हुए उन का हाथ पकड़ कर उन्हें सोफे पर बिठाने लगी.

‘‘अरे, तुझे अभी तो मना किया था मुझे छूने को… पर तू है कि तुझे कोई बात समझ ही नहीं आ रही है,’’ बूआ चिल्लाईं.

‘‘बूआ, मुझे इन सब चीजों की आदत नहीं है न, तो बारबार भूल जाती हूं,’’ नव्या ने निकिता के कंधे से अपना हाथ हटा लिया और उन के साथसाथ खुद भी सोफे पर बैठ गई.

नव्या के बैठते ही बूआ फिर से तुनक गईं, ‘‘अगर ये 3 दिन तुम थोड़ेबहुत नियम मान लोगी, तो तुम पर आसमान टूट कर गिर जाएगा क्या?

‘‘अच्छा है, अम्मां यह सब देखने से पहले ही इस दुनिया से विदा हो गईं, नहीं तो वे यह सब देख कर जीतेजी मर जातीं. तेरी मां का राज आते ही पूरे घर में अपवित्रता आ गई.

‘‘मुझे कहना तो नहीं चाहिए, पर जिस घर में ऐसा पाप हो रहा हो, वहां कहां से कुलदीपक आता. अब चाहे देवीदेवताओं की लाख मन्नतें कर लो, कुछ हासिल नहीं होने वाला है, जब घर में ही ऐसा अनर्थ.

‘‘अम्मां थीं तब तक शहर से ब्याह कर आई तेरी संस्कारहीन मां को सबकुछ मानना पड़ा, चाहे डंडे के जोर पर ही. पर अब तो लगता है, यहां जंगल राज आ गया है.’’

निकिता बूआ इस बार 8-9 साल बाद बुढ़ाना आई थीं. घर का खाका ही बदल गया था. तख्त की जगह सोफा था, टीवी भी नया था.

अब तक सब्र से काम लेती हुई नव्या को भी गुस्सा आ गया. घर से निकलते हुए उस की मम्मी द्वारा दी गई सारी नसीहतों को भी वह भूल गई, क्योंकि अब बात उस की मम्मी के संस्कारों पर आ गई थी.

‘‘बूआ, मम्मी के संस्कारों की तो आप बात न ही करें तो बेहतर होगा. भूल गईं आप अपना समय… जब पहली बार अपने कपड़ों पर धब्बे देख कर कितना डर गई थीं आप.

आप को लगा था कि आप कैंसर जैसी किसी खतरनाक बीमारी की चपेट में आ गई हैं. आप रोतेरोते दादी के पास गई थीं और पूजा करती हुई दादी ने आप के कपड़े देख कर आप को पुचकारने के बजाय अपने से दूर धकेल दिया था.

‘तब आप बदन के दर्द के साथसाथ हुई इस बेइज्जती के दर्द से घबरा कर रोने लगी थीं और वह भी तब जब आप अपनी गलती से बिलकुल अनजान थीं.

‘‘तब मम्मी ही आप को अपने साथ अपने कमरे में ले गई थीं. आप के आंसुओं को पोंछ कर गले से लगा लिया था. तभी दादी भी कमरे में आ गई थीं और मम्मी को आप के पास बैठा देख बहुत गरम हुई थीं.

‘‘तब मम्मी ही थीं, जिन्होंने आप को मानसिक संबल दे कर इन दिनों रखने वाली हाइजीन के बारे में सबकुछ समझाया था.

‘‘यही नहीं, दादी ने आप को 3 दिन बिलकुल अलगथलग कर दिया था, तब आप शर्म से कितनी दुखी हुई थीं. तब मम्मी ही थीं, जो भरी ठंड में भी दादी द्वारा आप को जमीन पर बिछाने के लिए दिए पतले से बिछौने से उठा कर ले आई थीं और आप को अपने पास ही सुला लिया था.’’

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‘‘बसबस, चुप कर… देख रही हूं कि बहुत पटरपटर जबान चलने लगी है तेरी. और तू तो ऐसे कह रही है, जैसे यह सब तू ने अपनी आंखों से देखा हो…’’

‘‘बूआ, चाहे यह सब देखने को मैं वहां मौजूद नहीं थी, पर मम्मी ने ये सब बातें मुझे तब बता दी थीं, जब मैं 12 साल की थी, जिस से मैं इस बदलाव से घबरा नहीं जाऊं और इस के लिए दिमागी रूप से तैयार रहूं.’’

‘‘जो भी हो, उस समय मैं नादान थी, मुझे अच्छेबुरे की परख नहीं थी, पर अब मैं एक जिम्मेदार बहू, बेटी और मां हूं. बरसों से हमारे समाज द्वारा बनाई गई कुछ सामाजिक परंपराएं हैं, जिन के मानने में हमारा ही फायदा है और जब तक मैं ही इन परंपराओं का पालन नहीं करूंगी, तो आने वाली पीढ़ी को किस मुंह से सिखाऊंगी,’’ बूआ ने कहा.

‘‘बूआ, आप जिन रिवाजों की बात कर रही हैं, वे काफी समय पहले बनाए गए थे. वे सब ढकोसले थे. पंडों की सिखाई बातें थीं. हम लोग सचाई की तह तक जाए बिना या लकीर के फकीर बन कर उन हालात का बोझ ढोते चले जा रहे हैं.’’

‘‘देख रही हूं, तेरी मां ने तुझे कुछ ज्यादा ही छूट दे रखी है. छोटी जगह है, इनसान जैसे माहौल में रहे, उसी के हिसाब से बरताव करना चाहिए. क्या कहेंगी आसपड़ोस की औरतें, जब उन्हें पता चलेगा कि इस घर में ऐसा घोर अनर्थ हो रहा है? मैं नहीं मानती, पता चलने के बाद कोई इस घर का पानी भी पीएगा.

‘‘अरे इनसान तो क्या, ऐसे घर में तो पितर भी अन्न ग्रहण नहीं करते, इसीलिए तो इतने पूजापाठ के बाद भी तेरी मां की कोख ने बेटा नहीं जना. बस, अब तू मेरा ज्यादा मुंह मत खुलवा,’’ निकिता बूआ ने अपने हाथ नचाते हुए कहा.

‘‘बूआ, अभीअभी तो आप ने कहा कि इनसान को अपने माहौल के मुताबिक बदलाव करना चाहिए, तो मैं ने तो सुना है कि पंजाबी औरतों को इन 3 दिनों के दरमियान भी गुरुद्वारे जाने की छूट है, फिर आप इतने साल दिल्ली में रह कर भी अपनी सोच को क्यों नहीं बदल पाईं?

‘‘आप ने उन का पहनावा, रहनसहन तो अपना लिया, पर दिल में आप अभी भी छोटी सोच को अपनाए हुए हो,’’ कहते हुए नव्या की आंखें छलक आईं.

कहना तो वह और भी बहुतकुछ चाहती थी, पर उस की शिक्षा ने उसे इस की इजाजत नहीं दी. बूआ तो पापा के इतना बुलाने पर यहां आई थीं, इसलिए उस ने अपना मुंह बंद कर लिया.

बातों की इस चोट से एक पल के लिए तो निकिता बूआ तिलमिला उठीं, पर अगले ही पल हालात को भांपते हुए थोड़ी नरम पड़ते हुए वे कहने लगीं, ‘‘देख बेटी, यह हमारे शरीर की गंदगी होती है. यह गंदगी जो बाहर आती है तो थोड़ाबहुत तो शुद्धअशुद्ध का विचार तो रखना ही चाहिए न? यह तो तू भी मानती होगी?’’

‘‘गंदगी कैसी बूआ? यह तो हमारे बदन की दूसरी हरकतों की ही तरह एक आम हरकत है. कुदरत का औरत को प्रदान किया गया तोहफा है. इसे मर्द को नहीं दिया गया है. इस के दम पर तो एक औरत को मां बनने का मौका मिलता है और यह सृष्टि चलती रहती है. अगर यह इतनी जरूरी चीज है, तो इस से इतनी ज्यादा चिढ़ क्यों?’’

‘‘चल, अब पहले मैं नहा कर आती हूं.’’

नव्या समझ गई थी कि वह इतनी देर से भैंस के आगे बीन बजा रही थी. बूआ को समझाने का कोई मतलब नहीं है. निकिता बूआ रसोई से बाहर आईं तो उन्होंने देखा कि नव्या डाइनिंग टेबल पर खाना लगा रही थी.

‘‘यह सब क्या करने लगी तू?’’

‘‘बूआ देखो, आप के लिए मैं ने पसंदीदा छोलेभटूरे बनाए हैं. चख कर बताइए कि कैसे बनाए हैं?’’

‘‘अभी तो तुझे मैं ने इतना समझाया, लगता है कि तेरे दिमाग में कुछ नहीं बैठा दिखता है.’’

‘‘आखिर भतीजी किस की हूं. पापा तो मुझे बातबात पर कहते हैं कि मैं बिलकुल अपनी बूआ पर गई हूं. आप जिद्दी तो मैं महाजिद्दी,’’ नव्या ने अपने कंधे उचकाते हुए कहा.

‘‘तेरी यह जिद तेरी मां के सामने ही चलती होगी. जब तक मैं यहां हूं, मेरी ही मरजी चलेगी. बाद में तुम लोग जानो और तुम्हारा काम जाने.’’

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‘‘बूआ, मैं ने इतने मन से बनाए हैं. आज के दिन मान जाइए, कल से वही होगा जो आप चाहेंगी,’’ नव्या के हथियार डाल देने पर भी निकिता बूआ नहीं पिघलीं. गुस्से में नव्या ने वह खाना कूड़े की बालटी में डाल दिया.

रात में नव्या अपनी बूआ के गुस्से के डर से बैडरूम में न सो कर ड्राइंगरूम में ही लेट गई. पर बाद में रसोई में होने वाली खटरपटर से उस की नींद खुल गई.

‘‘क्या हुआ बूआ, आप को कुछ चाहिए क्या?’’ नव्या ने बूआ को आवाज लगाते हुए पूछा.

‘‘कुछ नहीं, हींग ढूंढ़ रही थी. पेट में बहुत दर्द है. गैस हो गई दिखती है.’’

‘‘बूआ, आप को हींग नहीं मिलेगी, लाइए, मैं निकाल देती हूं,’’ कहते हुए नव्या रसोई में घुस गई.

‘‘तू बाहर ही खड़ी रह. बोल कर भी तो बता सकती है कि कहां रखी है.’’

उस के बाद भी नव्या ने महसूस किया कि बूआ सोई नहीं हैं. वे बेचैन सी पल में बैठ रही थीं और दूसरे पल फिर से लेट जाती थीं.

बूआ की ऐसी हालत देख कर नव्या को लगा कि दाल में कुछ काला है. जब दवा देने पर भी फर्क नहीं पड़ा तो अब नव्या की भी चिंता बढ़ गई.

‘‘चलिए बूआ, मैं आप को डाक्टर को दिखा लाती हूं. यहां पास में ही सरकारी अस्पताल है, कोई न कोई डाक्टर तो मिल ही जाएगा.’’

‘‘पड़ोस में से किसी को बुला ला, इतनी रात गए हम अकेली कैसे जाएंगी?’’

‘‘बूआ, आप चिंता छोडि़ए, मैं सब संभाल लूंगी,’’ नव्या ने बूआ को सहारा देने के लिए उन का हाथ पकड़ना चाहा, तो निकिता ने झटके से उसे अपने से दूर कर दिया.

‘‘आप… आप भी सच में हद करती हैं. मैं गाड़ी निकालती हूं, आप ताला लगा कर बाहर आइए. रस्सी जल गई, पर बल नहीं गया,’’ भुनभुनाते हुए नव्या बाहर निकल गई.

‘‘पर, गाड़ी को तू धक्का मार कर अस्पताल तक ले जाएगी क्या?’’

‘‘नहीं बूआ चला कर,’’ नव्या को ड्राइविंग सीट पर बैठे देख निकिता बूआ ऐसे हैरान हुईं जैसे उन्होंने किसी दूसरे ग्रह के प्राणी को ड्राइविंग करते देख लिया हो.

अस्पताल में नाइट ड्यूटी पर तैनात स्टाफ को सोते देख नव्या ऐसे भड़की कि रिसैप्शनिस्ट से ले कर नर्स तक सब हरकत में आ गए. उन्होंने ड्यूटी डाक्टर को उठाया.

इस छोटे से शहर का सरकारी अस्पताल भी ठीकठाक था. डाक्टर ने जरूरी टैस्ट के बाद सोनोग्राफी की.

‘‘इन्हें अपैंडिक्स का दर्द है. मैं यह दर्द रोकने के लिए एक इंजैक्शन लगा देती हूं,’’ डाक्टर बोलीं.

नव्या को लगा, अब बूआ अपनी तबीयत के चलते 2 दिन अपने सारे नियमकानून ताक पर रख देंगी, पर उस के अंदाजे के उलट सुबह उठते ही वे वही रोबीली बूआ थीं.

उन्होंने उठते ही अपनी बेटी को फोन लगाया और उसे सारे हालात के बारे में बताया.

‘‘पूजा, तेरे पापा तो टूर पर गए हैं, पर तू अभी कोई बस पकड़ कर यहां आ जा.’’

‘‘मां, मैं अकेली कैसे आऊंगी? यहां से बसस्टैंड तक जाना, बस में बैठना…’’ बूआ चुप थीं, क्योंकि वे जानती थीं कि बस से यहां अकेले आना तो दूर उन्होंने तो बेटी को अपनी गली से भी कभी अकेले नहीं निकलने दिया. हमेशा उसे छुईमुई बना कर रखा. पर अब क्या हो सकता था. एक दिन में तो कुछ भी बदला नहीं जा सकता.

कल से आज तक का सारा घटनाक्रम बूआ के जेहन में चलने लगा. न चाहते हुए भी वे अपनी बेटी की तुलना नव्या से करने लगीं. कितना दंभ था उन्हें अपने दिल्ली जैसे शहर में रहने का. अपने स्टाइलिश कपड़ों का, नएनए होटलों में घूमने का, बच्चों के हाईफाई स्कूलों का. इन के बूते पर वे अपने भाईभाभी को नीचे दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ती थीं.

इतने में नव्या चाय और बिसकुट लिए उन के सामने खड़ी मुसकरा रही थी. उस ने सबकुछ सुन लिया था. अब चौंकने की बारी नव्या की थी. निकिता बूआ ने उसे अपने गले से लगा लिया.

‘‘मेरी बहादुर बच्ची, तू ने मेरी आंखें खोल दीं. जिस तरह से तू ने कल रात को मुसीबत में मुझे संभाला, तेरी उम्र का कोई लड़का भी क्या संभाल पाता. मुझे तुझ पर गर्व है.’’

‘‘कहां तो मैं तेरा खयाल रखने आई थी, उलटा तुझे एक दिन में परेशान कर डाला. मुझे माफ कर दे,’’ कहते हुए निकिता बूआ रोंआसी हो गईं.

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तीसरे दिन नव्या के मम्मीपापा के आते ही निकिता बूआ उस की तारीफों के पुल बांधने लगीं, ‘‘भाभी, आप ने बहुत अच्छी परवरिश की है नव्या की. इन 3 दिनों में उस ने मुझे अच्छे से सिखा दिया कि ‘वे 3 दिन’ औरत के लिए सजा नहीं, उस की सहने की ताकत को मापने का पैमाना है.

‘‘नव्या ने मुझे जिंदगी का वह गूढ़ मंत्र भी दे दिया, जो मैं इतने सालों में भी नहीं सीख पाई. इनसान बड़े शहरों में रहने से, सुखसुविधाएं अपना लेने से मौडर्न नहीं बनता, बल्कि वह मौडर्न बनता है अपनी नई सोच से.

‘‘मैं भी घर पहुंचते ही अपनी बेटी को ड्राइविंग स्कूल में भेज दूंगी और सोच रही हूं मौका मिलते ही महीनेभर उसे आप के पास भेज दूं. कुछ दिन नव्या के पास रहेगी, तो वह भी थोड़ी स्मार्ट बनेगी.

‘‘लगता है कि मेरे कठोर अनुशासन ने उसे दब्बू बना दिया है,’’ कहते हुए बूआ ने नव्या को गले लगा लिया.

‘‘मैं अपनी सोच पर बहुत शर्मिंदा हूं भाभी. किसी ने सही कहा है कि हमारे समाज में औरत ही औरत की दुश्मन है.’’

मम्मी अपनी ननद के मुंह से ये सब बातें सुन कर चकित सी नव्या की तरफ देखने लगीं, तो उन्होंने पाया कि उन की दबंग बेटी अपना कौलर ऊंचा किए मुसकरा रही थी. वह मैचो गर्ल थी न, पापा की.

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