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जब प्रणीता ने तलाक की अर्जी लगाई तो उस के पापा ने इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. सिर्फ यह कहा कि सब को अपनी जिंदगी जीने का हक है. प्रणीता ने जो भी फैसला लिया होगा, सोचसमझ कर ही लिया होगा.

कोर्ट में प्रणीता की तलाक की अर्जी तुरंत मंजूर हो गई. इस का महीप ने विरोध नहीं किया. जेल जाने के बाद से ही उस की जिंदगी बदल गई थी. उस को अब प्रणीता में कोई दिलचस्पी नहीं रह गई थी.

प्रणीता को यह जान कर कोफ्त हुई कि जेल में कई सजायाफ्ता कैदी सुधरने के बजाय बिगड़ जाते हैं. आखिर किसी अपराधी को सजा देने का क्या मकसद है?

अब प्रणीता महीप से मुक्त थी. वह पूरे मन से अपना क्लिनिक संभालती और कई गरीब मरीजों का मुफ्त में इलाज करती. इस से उस के मन को काफी सुकून मिलता.

ऐसे ही उस की जिंदगी बीत रही थी. अब उस की जिंदगी मरीजों के लिए थी. मरीजों से कम फीस लेने, उन को सही सेवा देने और उन के साथ अच्छा बरताव करने के चलते उस के यहां इतने मरीज जुटने लगे कि उस को 2-3 जूनियर डाक्टर रखने पड़ गए.

इसी बीच हिमांशु का तबादला कानुपर हो गया. अब कभीकभी हिमांशु प्रणीता के घर आने लगा. प्रणीता उस से मिल कर काफी सुकून महसूस करती. उस के आने से प्रणीता के मातापिता को भी काफी खुशी होती.

हिमांशु का स्वभाव और विचार प्रणीता से काफी मिलते थे. दोनों एकदूसरे को स्कूल से ही जानते थे. अब हालात के चलते दोनों अकेले थे. दोनों के अपने दुख थे.

कभीकभी प्रणीता काफी उदास हो जाती तो कहती, ‘‘बलात्कारी यह कब समझेंगे कि उन की एक छोटी सी नादानी कितनी जिंदगियां बरबाद कर देती है. सच कहूं हिमांशु तो इन हैवानों को जीने का हक नहीं है.’’

‘‘अब इस घटना को भूल जाने में ही भलाई है प्रणीता. इन घावों को कुरेदने से क्या फायदा. इस से जख्म तो हरे ही होंगे न,’’ हिमांशु उसे समझाता.

‘‘तुम ठीक कहते हो हिमांशु, लेकिन मैं यह कैसे भूल सकती हूं कि तुम ने रश्मि को भी खोया है और इस के पीछे महीप का ही हाथ था.’’

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रश्मि का नाम सुनते ही हिमांशु का चेहरा उदास हो गया. उसे रश्मि की याद आ गई थी. रश्मि के जाने के बाद से वह भी तो अकेला पड़ गया था. अब उस की जिंदगी उदासी की छाया में बीत रही थी. उसे किसी से कोई लगाव नहीं रह गया था. वह सिर्फ अपने काम से काम रखता. दिन में एक नौकरानी आ कर खाना पका जाती. रात के लिए कुछ रोटियां छोड़ जाती, रात में वही खा कर हिमांशु सो जाता. कभीकभी मन में आता तो बाहर होटल में खा लेता.

प्रणीता अपने पिता के साथ रहती थी. उस का एक छोटा बेटा भी था, जो इंजीनियरिंग करने के बाद अमेरिका गया तो वहीं का हो कर रह गया. उस ने वहीं अपनी शादी कर ली. अब वह घर पर कभीकभी ही आता था.

प्रणीता अपने पापा से अलग एक फ्लैट किराए पर ले कर रहना चाहती थी, लेकिन उस के पापा के कहने पर वह उन्हीं के साथ रहने लगी.

जब से प्रणीता का भाई अमेरिका गया था, तब से वे भी अकेलेपन का दंश झेल रहे थे. प्रणीता के आने के बाद उन का भी मन लग जाता था. उस के पापा को मैडिकल प्रैक्टिस से भी अच्छीखासी आमदनी थी.

जब कभी प्रणीता की मां उस की शादी की बात छेड़ती, तो वह दुखी हो जाती. जब से महीप के ऊपर रेप के आरोप लगे थे, तभी से उस को शादी से नफरत सी हो गई थी. सच बात तो यह थी कि उस के मन में पति शब्द से ही नफरत हो गई थी.

एक दिन रात में हिमांशु उस के घर आया हुआ था. उस दिन प्रणीता के पिता का जन्मदिन था. खाने पर उस के पिता ने अपने कुछ दोस्तों को बुलाया था. महीप के पिताजी भी आए थे.

पता नहीं, महीप के पिता को भी अचानक क्या सूझा, खाने की मेज पर उन्होंने प्रणीता से कहा, ‘‘बेटी, तुम्हें एक सुझाव देना चाहता हूं, बुरा तो नहीं मानोगी?’’

महीप से प्रणीता के चाहे जो भी मतभेद रहे हों, उस के पापा का वह बहुत आदर करती थी. वह एक बहुत ही अच्छे इनसान थे.

जिस समय प्रणीता अपना निजी क्लिनिक खोलना चाहती थी, न उस के पास पैसे थे, न महीप के पास, पर उन्होंने उन की इच्छा जान कर इस के लिए खुद ही पैसेका इंतजाम किया था. यही नहीं, जब महीप से उस का तलाक हुआ,

उस ने प्रणीता को क्लिनिक दे दिया था और अब उस का किराया वह खुद वसूल करती थी.

‘‘क्यों बुरा मानूंगी बाबूजी, आप बोलिए,’’ वह आदर से बोली.

‘‘मैं यह कहना चाहता था बेटी, भले ही कानूनन तुम मेरी बहू नहीं हो, लेकिन मेरी नजर में अभी भी तुम्हारी वही जगह है. तुम्हारे पापा मेरे अभी भी पक्के दोस्त हैं.

‘‘इस परिवार का शुभचिंतक होने के नाते मैं यह कहना चाहता हूं कि हिमांशु से तुम्हारी पुरानी दोस्ती है, तुम दोनों के विचार आपस में मिलते भी हैं, फिर क्यों न तुम दोनों…’’

अभी महीप के पिता अपना वाक्य पूरा करते, इस के पहले ही प्रणीता बोल उठी, ‘‘लेकिन बाबूजी, अब मैं शादी नहीं करना चाहती.’’

‘‘लेकिन, क्यों बेटी, शादी के बाद कई वजहों से पतिपत्नी में नहीं पटती, फिर भी आपसी तालमेल बना कर कई लोग जीते हैं, कई तलाक ले लेते हैं, ताकि आगे एक नई और खुशहाल जिंदगी की शुरुआत कर सकें. तलाक का यही मकसद भी है.’’

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‘‘तलाक एक इलाज है, न कि नई बीमारी,’’ प्रणीता की सास बोलीं.

‘‘यही तो हमें भी चिंता सताती है वंदनाजी, अभी प्रणीता की उम्र ही क्या है, यह तलाकशुदा जिंदगी कब तक जिएगी,’’ प्रणीता की मां ने कहा.

‘‘अरे हिमांशु से भी तो पूछ लो या आप लोग खुद ही फैसला ले लेंगे,’’ एक डाक्टर दोस्त बोले.

उस समय हिमांशु चुपचाप खाना खाते हुए उन की बातें सुन रहा था.

‘‘लेकिन, शादी तो मैं भी नहीं करना चाहता अंकल,’’ उस ने प्रणीता के पिता की ओर मुखातिब होते हुए कहा.

हिमांशु की बात सुनते ही खाने की मेज पर चुप्पी छा गई.

उस दिन के बाद घर में कोई इस की चर्चा नहीं करता था, लेकिन उस दिन की बातचीत से प्रणीता और हिमांशु के मन में इस का बीज तो पड़ ही गया.

एक दिन प्रणीता अपने क्लिनिक में अकेली थी. रात के 8 बज रहे थे. आज होली के बाद पहला दिन था, इसलिए मरीज कम थे. केवल आपरेशन वाले ही मरीज थे.

कभीकभी अकेलापन मन को अतीत में ले जाता है और न चाहते हुए भी मन अतीत में ही विचरने लगता है. आज उसे स्कूल के दिन याद आने लगे थे. यह भी याद आने लगा था कि किस तरह वह हिमांशु की खूबसूरती और उस के मधुर बरताव से उस की तरफ खिंच गई थी.

कभीकभी तो रातभर उसे उसी की याद आती, इसीलिए एक लंबे समय के बाद भी उस ने बसस्टैंड पर एक ही नजर में उसे पहचान लिया था.

प्रणीता को यह भी लगता था कि रश्मि की मौत में वह भी कुसूरवार है. वह तो महीप की हवस के  बारे में पहले से ही जानती थी, इस के बावजूद उस ने महीप को रात में रश्मि के साथ अकेले छोड़ा. वह चाहती तो कैब से भी जा सकती थी. वह तो खुद डाक्टर थी, उसे महीप के बहाने को भी समझना चाहिए था. वह चाहती तो अकेले जा सकती थी या वह रश्मि को भी साथ ले जा सकती थी.

जब यादों का सिलसिला चला, तो महीप इस से दूर कैसे हो सकता था. उसे याद आया, जब उस के पापा ने पहली बार घर में महीप की चर्चा चलाई थी, तो एक बार हिमांशु का चेहरा उस की नजर के सामने घूम गया था. उसे लगा था, अब हमेशाहमेशा के लिए हिमांशु उस की जिंदगी से दूर हो गया है.

वह महीप के बारे में कुछ नहीं जानती थी, लेकिन पापा की इच्छा थी और मां ने भी इस रिश्ते के प्रति खुशी जताई थी, तो वह बिना किसी विरोध के इस शादी के लिए तैयार हो गई थी.

फिर अचानक ही प्रणीता के हाथ की उंगलियां मोबाइल फोन पर हिमांशु का नंबर तलाशने लगीं. हिमांशु के फोन पर जब रिंग बजी, तब वह खाने की तैयारी कर रहा था. उसे फोन आने से कोई अटपटा नहीं लगा. कभीकभी प्रणीता इस समय भी उस के हालचाल के लिए फोन करती थी.

‘‘अभी क्या कर रहे हो हिमांशु?’’

‘‘बस कुछ खापी कर सोने की तैयारी…’’

‘‘क्या खाओगे आज?’’

‘‘दिन में नौकरानी ने कुछ रोटियां बना कर रखी हैं, बस उन्हीं को…’’

‘‘रात में उस से खाना क्यों नहीं बनवा लेते?’’

‘‘अभी जवान है वह… रात में उसे यहां नहीं रखना चाहता.’’

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‘‘हां भई, तुम मर्दों का क्या भरोसा, जाने कब क्या कर बैठो,’’ प्रणीता ने मजाक किया, तो हिमांशु बोला, ‘‘इसीलिए तो तुम्हारे साथ भी रात में अकेले रहना नहीं चाहता.’’

‘‘हिमांशु, आज मैं अकेले बहुत बोर हो रही हूं, आ जाओ न प्लीज, आज डिनर साथ ही करते हैं,’’ प्रणीता ने कहा, तो वह बोला,’’ ठीक है, आता हूं. लेकिन रात में मत रोकना.’’

‘‘पहले आओ तो…’’

हिमांशु जब प्रणीता के क्लिनिक पर पहुंचा, तब वह उसी का इंतजार कर रही थी.

उसे देखते ही उस की आंखें चमक उठीं. वह बोली, ‘‘आज मुझे स्कूल के दिन याद आ गए थे.’’

‘‘उस में मैं कहां से आ गया?’’

‘‘अरे, पहला प्यार कभी कोई भूलता है क्या…’’

‘‘सच?’’

‘‘हां हिमांशु, हमारे मातापिता यही चाहते हैं, महीप के पिताजी का भी यही विचार है, फिर क्यों न हम एक नया सफर शुरू करें?’’

हिमांशु कुछ न बोला, तो प्रणीता उस के पास खिसक आई, फिर उस की कमीज के बटन पर हाथ फिराने लगी.

‘‘पहले ही से बटन लगाने की प्रैक्टिस हो रही है क्या?’’ हिमांशु मुसकराया.

प्रणीता ने उस के सीने में अपना चेहरा छिपा लिया. उन दोनों का पहला प्यार जीवनसाथी में बदलने के लिए बेकरार था.

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