लेखक- वनश्री अग्रवाल

वह अपने बेटे सुशांत के पास पहली बार जा रही थीं. 3 महीने पहले ही सुशांत का विवाह अमृता से हुआ था. दोनों बंगलौर में नौकरी करते थे और शादी के बाद से ही मां को बुलाने की रट लगाए हुए थे. एक हफ्ते पहले सुशांत ने अपने प्रोमोशन की खबर देते हुए मां को हवाई टिकट भेजा और कहा कि मां, अब तो आ जाओ. इस पर बीना उस का आग्रह न टाल सकीं. विमान में पहुंचने पर एअर होस्टेस ने सीट तक जाने में बीना की मदद की और सीटबेल्ट लगाने का उन से आग्रह किया. नियत समय पर विमान ने उड़ान भरी तो नीचे का दृश्य बीना को अत्यंत मोहक लग रहा था. छोटेछोटे भवन, कहीं जंगल तो कहीं घुमावदार सड़क और इमारतें…सभी खिलौने जैसे दिख रहे थे. कुछ देर बाद विमान बादलों को चीरता हुआ बहुत ऊपर पहुंच गया.

थोड़ी देर तक तो बीना बाहर देखती रहीं, फिर ऊब कर एक पत्रिका उठा ली और उस के पन्ने पलटने लगीं. तभी उन की नजर एक विज्ञापन पर पड़ी जो उन के ही बैंक की आवासीय ऋण योजना का था. साथ ही उस में छपे एक खुशहाल परिवार का चित्र देख कर उन्हें अपने घरसंसार का खयाल आ गया.

उसे बैंक में नौकरी करते हुए अब 15 साल बीत चुके हैं. परिवार में वह और उस के 3 बेटे हैं और अब तो 2 बहुएं भी आ गई हैं. बड़ा बेटा प्रशांत अमेरिका में कंप्यूटर इंजीनियर है. मंझला सुशांत बंगलौर में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत है. निशांत सब से छोटा है और लखनऊ में डाक्टरी की पढ़ाई कर रहा है.

आज जब वह बच्चों की सफलता के बारे में सोचती हैं तो उन्हें अपने पति आनंद की कमी सहसा महसूस हो उठती है. आज वह जिंदा होते तो कितने खुश होते, अकसर यही खयाल मन में आता है. हृदयाघात ने 12 साल पहले आनंद को उन से छीन लिया था. बैंक की नौकरी, बच्चों की परवरिश और घर की जिम्मेदारी के बीच पति आनंद की कमी बीना को हमेशा महसूस होती रही पर अब जब बच्चे सक्षम हो कर उन से दूर चले गए हैं तब अकेलेपन का एहसास उन्हें अधिक सालने लगा है.

ये भी पढ़ें- रावण की शक्ल

कुछ साल पहले तक बीना यही सोच कर आश्वस्त हो जाया करती थीं कि यह स्थिति हमेशा के लिए थोड़े ही रहने वाली है. आफिस के सहकर्मी, नातेरिश्तेदार सभी सलाह देते कि अब तो बेटों की शादियां कर के भरेपूरे परिवार का आनंद उठाएं. इच्छा तो बीना की भी यही होती थी पर उन्हीं लोगों के अनुभवों के कारण उन की सोच बदलने लगी.

आफिस के मेहताजी का उदाहरण बीना को भीतर तक हिला गया था. अपने बेटे की शादी तय होने पर पूरे आफिस में मिठाई बांटते हुए उन्होंने कहा था कि अब वह रिटायरमेंट ले कर गृहस्थी का सुख भोगेंगे. बड़े चाव से उन्होंने सब को शादी का न्योता दिया और महल्ले भर में दिल खोल कर मिठाई बांटी पर महीना बीततेबीतते मेहताजी के चेहरे की चमक जा चुकी थी. पता चला कि अपना मकान उन्होंने उपहारस्वरूप जिस बेटेबहू के नाम कर दिया था, उन्होेंने ही अपने मातापिता को घर से निकालने में ज्यादा समय नहीं लगाया था.

उन की अपनी ननद सरिता की कहानी भी कम दुखदायी नहीं थी. उन के बेटे अमन को उच्च शिक्षा के लिए लंदन भेजते समय बीना ने ही अपने बैंक  से ऋण की व्यवस्था करवाई थी. अमन जो एक बार गया तो अपनी बहन अमिता की शादी पर भी न आ सका. अमिता ने अपने गहनों के शौक के आगे मातापिता की तंग आर्थिक स्थिति की बिलकुल परवा न की. बीना ने सरिता जीजी को चेताने की दबी हुई सी कोशिश की थी पर बेटी के मोह के कारण उन्होंने अपनी हैसियत से बढ़ कर शादी में खर्च किया.

2 महीने बाद जीजाजी को अचानक दिल का दौरा पड़ा और डाक्टर ने तुरंत आपरेशन की सलाह दी. जीजी ने बच्चों को बुलावा भेजा, अमन तो आफिस से छुट्टी नहीं ले पाया और अमिता ने अपने विदेश भ्रमण के कार्यक्रम को आगे बढ़ाना जरूरी न समझा. बीमार पिता तो कुछ दिनों में ठीक होने लगे पर जीजी को जो आघात मोह के बंधन के टूटने से लगा, उस से वह कभी उबर न सकीं.

आएदिन रिश्तों में आती कड़वाहट के किस्सों के चलते बीना ने मन ही मन एक निर्णय ले लिया कि चाहे जो हो जाए, वह मोह के बंधनों में नहीं बंधेंगी. न होगा बंधन, न रहेगा उस के टूटने का भय और उस के नतीजे में होने वाली वेदना. यद्यपि बीना जानती थीं कि उन के बेटे उन्हें बहुत प्यार करते हैं पर कल किस ने देखा है. एक अनजान भविष्य के अनचाहे डर ने धीरेधीरे उन्हें स्वयं में एक तटस्थ नीरवता लाना सिखला दिया.

पारिवारिक बिखराव का एहसास बीना को पहली बार तब हुआ जब प्रशांत के लिए दिल्ली के एक संभ्रांत परिवार का रिश्ता आया. बीना के मन में नई उमंगें जागने लगीं पर प्रशांत की न्यूयार्क जा कर पढ़ाई करने की जिद के आगे उन्होंने सिर झुका दिया. वह मान तो गईं पर मन में कुछ बुझ सा गया.

पढ़ाई के बाद प्रशांत ने वहीं की एक फर्म में नौकरी का प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया. आफिस में ही उस की मुलाकात जूही से हुई थी और उस ने विवाह करने का मन बना लिया. बीना ने भी स्वीकृति देने में देर नहीं की थी. शादी दिल्ली में हुई पर वीसा की बंदिशों के चलते 2 दिन बाद ही दोनों अमेरिका लौट गए. बीना के सारे अरमान उस के दिल में ही रह गए.

इस के साल भर बाद सुशांत ने एक दिन बताया कि उसे बंगलौर में नौकरी मिल गई है. सुन कर बीना थोड़ी अनमनी तो हुईं पर शीघ्र ही खुद को संयत कर के सुशांत को विदा कर दिया.

दीवाली पर सुशांत घर आया. बातोंबातों में उस ने अमृता का जिक्र किया कि दोनों ने मुंबई में एमबीए की पढ़ाई साथ में की थी और अब शादी करना चाहते हैं. बीना ने सहर्ष हामी भर दी.

सरस सलिल विशेष

जब सुशांत ने मां से कहा कि शादी उन के पैतृक निवास से ही होगी तो बीना को सुखद आश्चर्य हुआ था. शादी धूमधाम से संपन्न हो गई. अमृता शक्लसूरत से तो सामान्य थी पर व्यवहार से विनम्र और सुशील लगी थी. उस की शर्मीली मुसकान बीना को एक दुलहन के लिए स्वाभाविक ही लगी थी. फिर उस का संयमित व्यवहार शायद प्रेम विवाह के ढंग को मिटाने की एक कोशिश…इन्हीं विचारों ने बीना को तटस्थ बनाए रखा.

शादी के बाद बंगलौर से बेटाबहू के फोन अकसर आते रहते थे जिन में एक ही जिज्ञासा होती थी कि मां, हमारे पास आप कब आ रही हैं? अमृता की मीठी गुजारिश तो मात्र एक औपचारिकता थी क्योंकि इस प्रेममय बुलावे में बीना को उन की अनकही आस का आभास होता था. शायद मां को खुश कर उस के पैसे और मकान की इच्छा…इसी ऊहापोह में बीना उन के आग्रह को हर बार टाल जाती थीं पर इस बार जब सुशांत फोन पर भावुक हो उठा तो उन्होंने सोचा कि चलो, चल कर देख ही लिया जाए कि क्या होता है.

बंगलौर हवाई अड्डे पर सामान के साथ बीना जब बाहर निकलीं तो भीड़ में सुशांत हाथ हिलाता हुआ नजर आया पर अमृता कहीं दिखाई नहीं दी तो उन्होंने सोचा शायद आफिस से छुट्टी नहीं मिली होगी. फिर खयाल आया कि आज तो रविवार है, आफिस तो बंद होगा. यहीं से हो गई अवहेलना की पहली शुरुआत, सोचते हुए वह सुशांत के साथ कार की ओर बढ़ गईं.

ये भी पढ़ें- जेल में है रत्ना

कार चलाते हुए सुशांत मां को बंगलौर के बारे में बताता जा रहा था. बीना ने महसूस किया कि उस की आवाज में बहुत उत्साह था. चलो, कुछ देर को ही सही, बेटा उसे देख कर खुश तो हुआ और यही सोच कर उन्हें अच्छा लगा. कुछ ही देर में गाड़ी गोल्डन अपार्टमेंट के गेट पर आ कर रुकी.

सुशांत का फ्लैट पहले तल पर था. सामान ले कर वह मां के साथ सीढि़यों की ओर चल पड़ा. बीना ऊपर पहुंचीं तो देखा काफी लोग जुटे थे ओर शोरगुल की आवाजें आ रही थीं. उन्होंने सोचा शायद किसी के यहां शादीब्याह का मौका होगा, तभी एक आवाज आई, ‘‘अरे देखो, आंटी आ गई हैं.’’ इतना सुनते ही सब लोग ‘स्वागतम् सुस्वागतम्’ का मंगलगान करने लगे. दरवाजे पर रंगोली सजी थी और अमृता आरती का थाल लिए खड़ी थी. ‘‘अपने घर में आप का स्वागत है, मांजी,’’ कहते हुए उस ने बीना के चरण स्पर्श किए और फिर आरती उतार कर घर में ले आई.

‘‘क्यों मांजी, कैसा रहा हमारा सरप्राइज?’’ सुशांत ने शरारत से कहा, ‘‘अमृता ने यह सारी तैयारी आप के शानदार स्वागत के लिए की थी.’’

बीना का मन पुलकित हो उठा. ऐसे स्वागत की तो उस ने कल्पना भी नहीं की थी. जी चाहा बहू का माथा चूम ले. फिर सहसा मन में खयाल आया कि यह सब तो पहले दिन का खुमार है, जल्दी ही उतर जाएगा. यही सोच कर उन्होंने खुद को संयमित किया और दोनों को आशीर्वाद दे कर आगे बढ़ गईं.

अमृता ने उन्हें उन का कमरा दिखाया. कमरा सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया गया था. सामने की ओर बालकनी थी जिस में आरामकुरसी पड़ी थी. बाथरूम में जरूरत का सब सामान करीने से लगा था. यह सब देख कर बीना को अच्छा लगा.

मुंहहाथ धो कर बीना बाहर आईं तो देखा अमृता ने मेज पर खाना लगा दिया था. खाने में सब चीजें उन्हीं की पसंद की थीं. तीनों ने साथ बैठ कर भोजन किया. उस के बाद बातों का जो सिलसिला शुरू हुआ तो फिर बीना के कहने पर ही सब सोने के लिए उठे.

अगले दिन जब वह सुबह उठीं तो घड़ी 9 बजा रही थी. ‘आज तो उठने में बहुत देर हो गई. अब तक तो बच्चे आफिस के लिए निकल चुके होंगे,’ उन के मुंह से निकला. कमरे से बाहर आईं तो देखा सुशांत अखबार पढ़ रहा था और अमृता रसोई में थी.

‘‘गुडमार्निंग, मांजी,’’ कहते हुए अमृता ने आ कर उन के पैर छुए और बोली, ‘‘आप पहले चाय लेंगी या सीधे नाश्ता ही लगाऊं?’’

बीना ने कहा, ‘‘अरे, मैं नाश्ता खुद बना लूंगी, तुम लोग आफिस जाओ, तुम्हें बहुत देर हो जाएगी.’’

सुशांत रोनी सूरत बना कर कहने लगा, ‘‘मां, अमृता ने तो 10 दिन की छुट्टियां ले रखी हैं और मैं ने सोचा था कि आप को थोड़ा घुमा लाएं, फिर आफिस चला जाऊंगा. पर लगता है आप तो भूखे पेट ही आफिस भेज देंगी आज.’’

बेटे के मुंह से यह सुन कर बीना को एक सुखद आश्चर्य का अनुभव हुआ. पर फिर थोड़ा  गुस्सा भी आया. आखिर हद होती है दिखावे की भी. वह यहां किसी को तकलीफ देने नहीं आई हैं. यही सोच कर उन्होंने कहा, ‘‘देखो बहू, मैं कोई बच्ची थोड़े ही हूं. तुम जाना चाहो तो आराम से आफिस जा सकती हो. मुझे कोई तकलीफ नहीं होगी.’’

‘‘पर मांजी मुझे तो होगी,’’ अमृता ने कहा, ‘‘मुझे तो आप के साथ रहने का मौका ही नहीं मिल पाया था इसलिए मैं ने आफिस से छुट्टी ले ली ताकि मैं आराम से अपना सारा समय आप के साथ बिता सकूं.’’

अमृता के शब्दों में एक अपनापन था और आंखों में प्यार की गरमाहट जिन्हें देख कर बरबस ही बीना के मुंह से आशीर्वाद निकल पड़ा.

नाश्ते के बाद सुशांत तो आफिस के लिए निकल गया और सासबहू में वार्त्तालाप शुरू हो गया. बातोंबातों में अमृता ने सास से उन की पसंदनापसंद, खानपान, सेहत, रीतिरिवाज आदि के बारे में जानकारी हासिल कर ली. शाम को दोनों पास के  पार्क में चली गईं.

रात को सुशांत के आने पर सब ने एकसाथ बैठ कर खाना खाया. बीना जब पानी लेने रसोई में जाने लगीं तो अमृता ने देखा कि वह ठीक से चल नहीं पा रही हैं.

सुशांत के पूछने पर बीना को बताना पड़ा कि शाम को घूमते हुए शायद पैर में मोच आ गई थी इसीलिए दर्द हो रहा था. यह सुनते ही अमृता दर्दनिवारक बाम उठा लाई. बीना के बहुत मना करने पर भी वह उन्हें कमरे में ले गई और उन के पैर में मालिश करनी शुरू कर दी. धीरेधीरे बीना को आराम आ गया और वह सो गईं.

सुबह उठने पर सुशांत ने पूछा, ‘‘मां, अब आप का पैर कैसा है? चलिए, जल्दी से तैयार हो जाइए, हमें अस्पताल जाना है.’’

बीना ने कहा, ‘‘अरे, तू तो नाहक ही परेशान हो रहा है. मामूली सी मोच होगी भी तो 1-2 दिन में ठीक हो जाएगी.’’

‘‘चलिए, फिर भी डाक्टर को दिखा लेने में क्या हर्ज है?’’ सुशांत बोला, ‘‘मां, इसी के साथ आप का पूरा हेल्थ चेकअप भी हो जाएगा.’’

‘‘अरे, अब इस की क्या जरूरत है? मैं तो बिलकुल ठीक हूं,’’ बीना ने हैरानी से कहा.

‘‘मां, कई बार जैसा दिखता है वैसा होता नहीं है. और फिर यह तो निशांत भैया का हुक्म था कि मां जैसे ही बंगलौर आएं उन का पूरा मेडिकल चेकअप होना चाहिए. मैं तो बस, भैया की आज्ञा का पालन कर रहा हूं.’’

दूर रह कर भी निशांत मां की सेहत के लिए फिक्रमंद था, यह जान कर बीना को अच्छा लगा.

अस्पताल पहुंच कर सुशांत ने सब से पहले बीना के पैर की जांच कराई. डाक्टर ने बताया कि मोच नहीं आई थी. बस, पैर हलका सा मुड़ गया था. उस ने दवा देते हुए आराम करने की सलाह दी. फिर बीना अलगअलग कमरों में अनेक प्रकार के परीक्षणों से गुजरीं. सुशांत ने हर डाक्टर से अलग से समय ले रखा था इसलिए कहीं कोई तकलीफ नहीं आई.

घर पहुंचतेपहुंचते बीना काफी थक गई थीं. अमृता ने सब का खाना मांजी के कमरे में ही लगा दिया. फिर बातें होने लगीं. साथ ही साथ अमृता ने बीना के पैर में डाक्टरों द्वारा दी गई दवा लगा दी. फिर उन्हें नींद ने आ घेरा.

इन 2-3 दिनों में ही वे अमृता की ओर झुकाव महसूस करने लगी थीं जबकि उन्होंने तो सुशांत के प्रति भी ज्यादा लगाव न रखने की सोची थी. क्या वह गलत थीं या अब गलती कर रही थीं? काफी देर तक ऐसी ही अनिश्चितता की स्थिति बनी रही.

रोज की मालिश और दवा ने कमाल दिखाया तो 2 दिन में ही उन के पैर में आराम आ गया. अगले दिन वे सब घूमने निकल पड़े. बच्चों ने उन्हें एक शानदार मौल में घुमाया, कुछ शापिंग हुई और फिर सब ने चाट का आनंद लिया. बीना ने बहुत समय के बाद इतना सैरसपाटा किया था. उन का मन खुश हो उठा.

सरस सलिल विशेष

अगले दिन सुशांत ने मां को बताया कि इस रविवार को वह अपनी तरक्की होने की खुशी में दोस्तों को पार्टी दे रहा है और पार्टी घर में ही रखी गई है तो बीना सोच में पड़ गईं कि उन सब अनजान चेहरों के बीच वह तो अलगथलग ही पड़ जाएंगी.

तभी सुशांत बोल पड़ा, ‘‘मां, उस दिन आप को हमारे साथ अपने वित्तीय अनुभव शेयर करने होंगे. उन से हमें भविष्य की योजना बनाने के लिए सही दिशा मिलेगी.’’

सुशांत की इस पेशकश ने बीना की उलझन को पल में सुलझा दिया पर साथ ही उन्हें हैरानी भरे एक नए मंजर में छोड़ दिया. वह तो उन दोनों से एक दूरी बनाए रखने की निरंतर कोशिश कर रही थीं पर उन्होंने उसे दूर होने कहां दिया था. क्या उन्हें अपनी जिंदगी में सचमुच मां की जरूरत थी या फिर यह एक दिखावा भर था? बारबार ऐसे खयाल उन के जेहन में आ रहे थे पर वे किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही थीं.

रविवार की सुबह सुशांत ने पूछ लिया कि मां, आप की टाक का विषय क्या रहेगा?

‘‘अब यह तो शाम को ही पता चलेगा. सब्र करो, सब्र का फल मीठा होता है, क्यों मांजी?’’ अमृता ने चुटकी ली तो तीनों हंस पड़े.

बीना ने तैयारी तो की थी पर वह असमंजस में थीं कि क्या इतनी बड़ीबड़ी कंपनियों में काम करने वाले लोगों के लिए उस की बातों का कुछ महत्त्व होगा.

शाम हुई तो एकएक कर मेहमानों का आना शुरू हो गया. अमृता और सुशांत गर्व से सब से मां का परिचय कराते जा रहे थे. थोड़ी देर बाद सुशांत ने सब का ध्यान आकर्षित किया, ‘‘दोस्तो, पार्टी है तो मौजमस्ती तो होगी ही पर साथ ही एक्सपर्ट एडवाइज भी हो जाए तो क्या बात है. तो मिलिए, आज की हमारी वित्तीय एक्सपर्ट श्रीमती बीना वर्मा से.’’

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बीना सामने आईं और उन्होंने ‘सुरक्षित वित्तीय निवेश’ के तरीकों पर प्रकाश डाला. सभी ने बहुत ध्यान से उन की बातें सुनीं और प्रशंसा की. थोड़ी देर में डिनर खत्म हो गया. सब ने सुशांत को फिर से बधाई दी और पार्टी संपन्न हो गई.

आज की शाम बीना को जो सम्मान मिला था उतना सम्मान तो उन्हें अपने आफिस में भी कभी नहीं मिला था जहां के लोगों को वह हमेशा अपना समझती थीं.

वह अभी इसी ऊहापोह में थीं कि सुशांत और अमृता आ गए. अमृता ने पूछा, ‘‘मांजी, पार्टी कैसी रही? हमें तो आप की टाक ने बहुत प्रभावित किया पर आज आप बहुत थक गई होंगी. चलिए, अब आराम कीजिए.’’

सुशांत ने उसी समय 2 लैपटाप दिखाते हुए कहा, ‘‘देखिए मां, प्रशांत भैया ने हमारे लिए क्या भेजा है? बिलकुल लेटेस्ट टेक्नोलाजी का लैपटाप. यह मेरी तरक्की का उन की ओर से गिफ्ट है.’’

‘‘चलो, यह तो बहुत अच्छा हुआ,’’ बीना बोलीं, ‘‘अब तुम दोनों घर पर अपने पर्सनल लैपटाप पर काम कर सक ोगे.’’

‘‘मांजी, यह दूसरा वाला तो आप के लिए है,’’ अमृता ने कहा, ‘‘भैयाजी ने खास आप के लिए भेजा है ताकि दूर रह कर भी आप हमसब के पास रह सकें. कल मैं आप को इस पर बातें करना सिखाऊंगी. सच, बड़ा मजा आएगा.’’

बीना भौचक्की रह गईं. क्या प्रशांत उन के बारे में इतना सोचता है? वह तो अब तक यही सोचती थीं कि परदेस में उसे मां की याद कहां आती होगी पर उन की सोच शायद गलत थी.

अगले दिन सुशांत ने उन्हें अपने लैपटाप पर प्रशांत और जूही द्वारा उन के लिए भेजे गए संदेश दिखाए. उन्हें पढ़ कर बीना की आंखें नम हो उठीं. इतना प्यार भरा था उन शब्दों में कि उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ.

प्रशांत ने उन से अपने लिए एक ईमेल अकाउंट खोलने के लिए बहुत बार कहा था पर उन्होंने कभी ध्यान ही नहीं दिया. आज पता चला कि प्रशांत उन की कितनी कमी महसूस करता है. आज बीना का दिल एक अजीब सी खुशी महसूस कर रहा था.

अगला दिन पैकिंग करने में बीता. बीना सोचती रहीं कि 15 दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला. शाम हुई तो सुशांत और अमृता फिर से दोहराने लगे, ‘‘मां, अब भी समय है, टिकट कैंसिल करा देते हैं. कुछ दिन और आप हमारे साथ रह जाओ. अभी तो जी भर के बातें भी नहीं हो पाई हैं.’’

ये भी पढ़ें- दो पहलू

‘‘बेटा, आनाजाना तो लगा ही रहेगा. फिर अब तो यह लैपटाप आ गया है न. इस से चैट करूंगी तुम सब से,’’ बीना ने मजाक के लहजे में कहा और अमृता को पास बुलाया फिर एक सुंदर सा हार उसे भेंट में दिया. उन्हें तो गहनों का कोई मोह रह नहीं गया था इसलिए वह चाहती थीं कि उन की चीजें बच्चों के काम आ जाएं. गहनों के लिए बहुएं आपस में लड़ें या उन में मनमुटाव हो, ऐसी स्थिति से वह बचना चाहती थीं और यही सोच कर हार बंगलौर ले आई थीं.

हार देख कर अमृता मुसकराने लगी तो बीना ने यह सोचा कि कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की कि शायद पुराने डिजाइन के बारे में वह उन से शिकायत नहीं करना चाहती होगी.

तभी सुशांत मां के हाथ में एक चाबी थमाते हुए बोला, ‘‘ठीक है, मांजी, आप इस हार को भी नए लौकर में रख दीजिएगा.’’

बीना हैरानी से बेटे की ओर देखने लगीं तो सुशांत ने बताया कि अमृता के कहने पर ही उस ने मोहननगर में आप के नाम से एक लौकर खुलवाया था. अमृता ने शादी में मिले सभी जेवर व नकदी, यह कहते हुए उस में रख दिए थे कि ये सब निशांत की शादी में काम आएंगे. आज उपहार- स्वरूप उन दोनों ने मां को उसी की चाबी भेंट की थी.

इतना जानना था कि बीना सोफे पर गिर सी गई. वह तो सदा इसी बात से आशंकित रहीं कि बच्चों का प्यारमनुहार शायद स्वार्थ से प्रेरित एक दिखावा था. अनेक अवसर आए जब उन का जी चाहा था कि बच्चों को गले से लगा लें पर अपने दिल की आवाज को दबाए रखा क्योंकि वह मोह के बंधन से आजाद रहना चाहती थीं. ऐसे मोह का परिणाम दुखद ही होगा, यही उन का विश्वास था पर आज उन्हें एहसास हुआ कि मोह के बंधन में न बंधने के चक्कर में वह तो बच्चों से स्नेह करना ही भूल गईं और इस सब में उन के बच्चे उन से कहीं आगे निकल गए. अलगथलग रहने के प्रण ने उन्हें पल भर भी बच्चों के साथ का सच्चा आनंद नहीं उठाने दिया था पर अब उन की आंखें खुल गई थीं.

तभी सुशांत ने मां को हिलाते हुए पूछा, ‘‘मां, कहां खो गई थीं आप?’’

बीना ने बेटे को गले लगाते हुए कहा, ‘‘बेटा, सोच रही थी कि तेरी बात मान ही लूं.’’

सुनते ही सुशांत और अमृता के चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ गई. अमृता ने फौरन कहा, ‘‘चलो, मांजी, फिर कुछ दिन तो मैं इस हार को जरूर पहन पाऊंगी,’’ यह सुन कर सब हंस पड़े. बीना ने खुशीखुशी बहू को अपना हार पहना दिया.

आज उन के चेहरे पर संतुष्टि की नई दमक थी. बच्चों के प्यार ने उन्हें रोक जो लिया था क्योंकि उन के मोह में पड़ने को उस का मन ललक उठा था. आखिर मोह को बंधन मानने के बंधन से उन्हें मुक्ति जो मिल गई थी.

Tags:
COMMENT