लेखक- रेनू मंडल

लेकिन महत्त्वाकांक्षी चांदनी ने उसी राजीव के फैसले को इतनी बेदर्दी से ठुकरा दिया जिस के लिए उस ने अपना घर और घर वालों को छोड़ा था. कभीकभी जीवन की सचाइयां वर्षों के फैसलों को पल भर में बदल देती हैं. प्यार और भावनाओं के आवेश में किए गए वादे दौलत की चमक के आगे बेमानी जान पड़ते हैं और इनसान को लगने लगता है कि उस के पांव के नीचे का धरातल कितना कमजोर था, उस के विश्वास की बुनियाद कितनी खोखली थी.

अपने विवाह के निमंत्रणपत्र को निहारते हुए ऐसे न जाने कितने विचार राजीव के मन को मथ रहे थे. उस की यादों में वे लमहे कौंध गए, जब शाम के समय वह और चांदनी सागर के किनारे रेत पर जा बैठते थे. चांदनी बारबार रेत पर उस के नाम के साथ अपना नाम लिखती जिसे सागर की लहरें आ कर मिटा देती थीं. तब वह उस की बांहों को थाम स्नेहसिक्त स्वर में कहती, ‘आज ये नासमझ लहरें भले ही तुम्हारे नाम के साथ लिखे मेरे नाम को मिटा डालें किंतु कल जब हम दोनों का विवाह हो जाएगा तब तुम्हारे नाम के साथ मेरे नाम को कौन मिटा पाएगा?’ उन लमहों को याद कर राजीव के होंठों पर एक विद्रूप सी मुसकान तैर गई और वह अतीत की गहराइयों में उतरता चला गया.

उस शाम लायंस क्लब में काव्य गोष्ठी का आयोजन था. कई बड़ेबड़े कवि वहां आए हुए थे. साहित्य में रुचि होने के कारण राजीव भी अकसर ऐसे कार्यक्रमों में जाया करता था. उस दिन एक 20-21 साल की युवती की काव्य रचना को काफी सराहा गया था. शब्दों का चयन और भावों की अभिव्यक्ति के बीच सुंदर तालमेल था. कार्यक्रम की समाप्ति पर वह उस लड़की के करीब पहुंचा और बोला, ‘आप बहुत अच्छा लिखती हैं, इतनी कम उम्र में विचारों में इतनी परिपक्वता कम ही देखने को मिलती है.’

चांदनी हंस दी तो वह एकटक उसे निहारता रह गया था.

‘सच कहूं तो आप का नाम भी आप की कविता की तरह दिल को ठंडक पहुंचाने वाला है,’ वह बोला.

चांदनी खिलखिला पड़ी. उस की खनकती हंसी ऐसी थी मानो जलतरंग बज उठी हो. उस की सुंदर दंतपंक्तियों को देख लग रहा था मानो गुलाब की 2 पंखडि़यों के बीच में आकाश से तारे उतर कर सिमट गए हों.

राजीव मंत्रमुग्ध सा उसे निहारता ही रह गया. उसे लगा, चांदनी के रूप में विधाता ने स्वयं एक जीतीजागती काव्य रचना लिख डाली थी. जैसे ही घर जाने के लिए चांदनी ने बाहर की ओर कदम बढ़ाए, बादलों की गड़गड़ाहट ने बारिश की सूचना दे डाली.

चांदनी घबरा कर बोली, ‘अब मैं घर कैसे जाऊंगी?’

‘अगर आप को कोई एतराज न हो तो आप मेरे साथ कार में बैठ कर अपने घर चल सकती हैं,’ राजीव ने कहा.

पहले तो चांदनी के चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव उभरे फिर परिस्थिति की मजबूरी को समझते हुए उस ने सहमति में गरदन हिला दी. राजीव चांदनी को उस के घर छोड़ कर अपने घर लौट आया.

राजीव शहर के सब से बड़े ज्वैलर्स विजय सहाय का छोटा बेटा था. उस से बड़े दोनों भाई संजय और अजय बी.ए. तक पढ़ाई कर के पिताजी के व्यवसाय में उन का हाथ बटा रहे थे किंतु राजीव की पढ़ने में रुचि अधिक थी इसलिए वह अपने ही शहर के एक प्रतिष्ठित कालिज से एम.बी.ए. की पढ़ाई कर रहा था. शाम को वह अपनी दुकान पर चला जाता था.

उस दिन भी राजीव कुछ ग्राहकों को आभूषण दिखा रहा था, जब चांदनी अपनी मां के साथ वहां आई. उसे देख वह प्रसन्न हो उठा. चांदनी भी उसे दुकान में देख कर हैरान रह गई थी.

‘अरे, तुम यहां? लगता है, पढ़ाई के साथसाथ  पार्टटाइम नौकरी भी करते हो?’

राजीव मुसकराया, ‘ऐसा ही कुछ समझ लो. फिर उस की मां से बोला, ‘हां, तो बताइए आंटी, क्या दिखाऊं?’

‘बेटी के लिए हलका सा हार चाहिए.’

‘अभी लीजिए,’ और इसी के साथ राजीव ने वार्डरोब से कई डब्बे निकाल कर उन के सामने रख दिए. एक के बाद एक कर के कई डब्बे देखने के बाद एक लाल मोतियों के हार पर चांदनी की नजर अटक गई. उस ने उस हार को अपने गले में पहना और खुद को शीशे में निहारते हुए राजीव से पूछा, ‘कैसा लग रहा है?’

प्रशंसात्मक नजरों से राजीव ने चांदनी को देखा और बोला, ‘आप के गले में पड़ कर यह हार नहीं जीत लग रहा है.’

‘हार से ज्यादा सुंदर तो आप की बातें हैं,’ चांदनी बोली, ‘क्या कीमत है इस की?’

‘किस की, हार की या मेरी जबान की?’ राजीव हंसा फिर बोला, ‘5 हजार रुपए.’

चांदनी ने हार खरीद लिया. राजीव ने अपने पिताजी से कह कर उस की कीमत कुछ कम करवा दी. चांदनी उस के हाथ से रसीद लेते हुए बोली थी, ‘लगता है तुम्हारा यहां अच्छा रसूख है.’

राजीव हंस दिया था. अगली शाम वह दुकान पर जब पहुंचा तो चांदनी को वहां पहले से ही आ कर बैठे देखा. वह उस के पिताजी से पूछ रही थी, ‘आप का वह राजीव नाम का कर्मचारी आज नहीं आया?’

पिताजी पहले तो हंसे, फिर बोले, ‘बेटी, वह मेरा कर्मचारी नहीं, मेरा सब से छोटा बेटा है.’

तभी चांदनी की नजर राजीव पर पड़ी. उस ने आंखें तरेर कर उस की तरफ देखा तो उस ने अभिवादन में हलका सा सिर झुका दिया.

चांदनी को हार के साथ के टाप्स चाहिए थे. राजीव ने एक हफ्ते बाद उसे आने के लिए कहा परंतु 3 दिन में ही टाप्स तैयार करवा कर वह उन्हें ले कर चांदनी के घर पहुंच गया.

राजीव को घर आया देख चांदनी बहुत खुश हुई और जल्दी से चाय बना कर ले आई. वह मध्यवर्गीय परिवार की लड़की थी. उस के पिता बिजली विभाग में क्लर्क थे. घर में मांबाप के अलावा एक छोटी बहन भी थी.

चाय पीते हुए चांदनी ने पूछा था, ‘राजीव, तुम इतने बड़े ज्वैलर्स के बेटे हो, घर का जमाजमाया व्यवसाय है, फिर भला तुम्हें एम.बी.ए. करने की क्या सूझी?’

‘मुझे शुरू से ही पढ़ाई का शौक रहा है. पढ़ाई कभी व्यर्थ नहीं जाती, चांदनी. एक न एक दिन काम आती  ही है,’ उस ने तर्क दिया.

चांदनी ने कंधे उचकाए फिर लापरवाही से बोली, ‘पता नहीं, एम.बी.ए. तुम्हारे ज्वैलरी के व्यवसाय में क्या काम देगा? मेरे विचार में तो पढ़ाईलिखाई का चक्कर छोड़ कर तुम्हें जल्द से जल्द अपने व्यवसाय पर अपनी पकड़ मजबूत करनी चाहिए.’

राजीव खामोश रहा.

वह बोली, ‘क्या सोचने लगे?’

‘सोच रहा था कि अगली बार तुम्हारे घर किस बहाने से आऊंगा?’

उस की बात पर वह खिलखिला कर बोली, ‘राजीव, अब तुम्हें मेरे घर आने के लिए किसी बहाने की जरूरत नहीं है. जब भी दिल करे बेझिझक आया करो.’

धीरेधीरे चांदनी, राजीव की अच्छी दोस्त बन गई. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला बढ़ने लगा. दोस्ती के इस रिश्ते में कब प्यार की कोंपलें फूटने लगीं उसे पता ही नहीं चला. अकसर वह और चांदनी समुद्र के किनारे जा बैठते थे. ऐसी ही एक सुनहरी शाम को राजीव ने चांदनी का हाथ अपने हाथ में ले कर पूछा था, ‘चांदनी, मुझ से शादी करोगी?’

यह सुन कर उस के गाल शर्म से  लाल हो उठे थे. वह बोली थी, ‘तुम इतने पैसे वाले बाप के बेटे हो. तुम से विवाह करने का सौभाग्य मिले, इस से ज्यादा खुशी की बात मेरे लिए और क्या हो सकती है? मेरे घर वाले तुरंत राजी हो जाएंगे.’

चांदनी का जवाब पा कर राजीव का मन मयूर नाच उठा था किंतु साथ ही उसे यह चिंता भी थी कि पिताजी प्रेम विवाह के सख्त खिलाफ थे. मंझले भैया एक लड़की को चाहते थे पर पिताजी ने उन की एक न सुनी और भाई का विवाह अपनी पसंद की लड़की से कर दिया. चांदनी के साथ उस के प्रेम की बात उन के कानों में पड़ेगी, तब पता नहीं उन पर क्या प्रतिक्रिया हो. आखिर उस ने सबकुछ समय पर छोड़ दिया.

राजीव का एम.बी.ए. पूरा हो चुका था. अब वह पिताजी के साथ पूरी तरह उन के व्यवसाय में व्यस्त हो गया. एक दिन उस के पिताजी ने काम के सिलसिले में उसे देहरादून जाने के लिए कहा और बोले, ‘देखो बेटे, देहरादून में मेरे बचपन का दोस्त लक्ष्मीकांत रहता है. तुम उन्हीं के घर ठहरना. लक्ष्मीकांत का भी देहरादून में ज्वैलरी का व्यवसाय है. तुम अपने काम में उन की मदद लोगे तो तुम्हारा काम जल्दी हो जाएगा.

देहरादून पहुंच कर राजीव को लक्ष्मीकांत की कोठी तलाशने में कोई कठिनाई नहीं हुई. उसे देख कर वह बहुत प्रसन्न हुए. ड्राइंगरूम में राजीव को बैठा कर उन्होंने आवाज लगाई, ‘अरे, पूजा बेटी, राजीव आ गया है. चाय ले कर आओ.’

थोड़ी देर बाद परदा हटा और ट्रे हाथ में लिए पूजा ने कमरे में प्रवेश किया. लक्ष्मीकांतजी ने राजीव से पूजा का परिचय कराया तो वह धीरे से ‘हैलो’ बोली और नजरें नीची किए चाय बनाने लगी.

दोनों को चाय दे कर जब वह जाने को हुई तो लक्ष्मीकांत बोले, ‘पूजा बेटी, राजीव हमारे घर दोचार दिन रुकेगा. यह पहली बार देहरादून आया है, इसे घुमाना तुम्हारा काम है.’

‘ठीक है, पापा. आज शाम को मैं इन्हें सहस्रधारा ले कर जाऊंगी.’

नाश्ता कर के राजीव और लक्ष्मीकांत काम के सिलसिले में बाहर चले गए. शाम को वह वापस लौटा तो पूजा तैयार खड़ी थी. दोनों कार से सहस्रधारा पहुंचे. सहस्रधारा का प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता था.

पूजा व राजीव दोनों पानी के बीच में पड़े पत्थरों पर बैठ गए.

राजीव ने पूछा, ‘पूजा, आजकल तुम क्या कर रही हो?’

‘एम.ए. करने के साथसाथ मैं ज्वैलरी डिजाइनिंग का कोर्स कर रही हूं ताकि पापा के व्यवसाय में उन का हाथ बटा सकूं,’ पूजा बोली थी, ‘और तुम क्या कर रहे हो?’ उस ने राजीव से पूछा.

सरस सलिल विशेष

‘मैं ने एम.बी.ए. किया है. अब पिताजी के व्यवसाय में हाथ बंटा रहा हूं.’

‘एम.बी.ए. कर के तुम कोई दूसरा काम भी कर सकते हो. किसी कंपनी में नौकरी कर सकते हो. मार्केटिंग कर सकते हो. टीचिंग भी कर सकते हो.’

‘सलाह तुम अच्छी दे रही हो किंतु मुझे यह सब करने की क्या जरूरत है, जब पिताजी का जमाजमाया व्यवसाय है.’

‘तुम्हारे बारे में तो मैं नहीं जानती पर अपने बारे में मैं बता सकती हूं कि तुम्हारी जगह अगर मैं होती तो कम से कम कुछ महीनों तक अपने बलबूते अपने पैरों पर खड़ी होने का प्रयास जरूर करती. मुझे पता तो चलता कि मेरे अंदर कितनी क्षमता है,’ पूजा एक पल के लिए रुकी थी फिर बोली, ‘जीवन में अपनी अलग पहचान बनानी भी बहुत जरूरी है. संघर्ष करने से इनसान के जीवन में निखार आता है. पापा का व्यवसाय तो कभी भी अपनाया जा सकता है.’

राजीव पूजा की बातों से बहुत प्रभावित हुआ था. शाम हो चली थी. घर जाने के लिए दोनों उठ खड़े हुए. अभी राजीव ने कदम आगे बढ़ाया ही था कि अचानक पत्थर पर से पैर फिसल गया. इस से पहले कि वह लड़खड़ा कर गिरता, पूजा ने उसे संभाल लिया था. दर्द की तीखी लहर उस के शरीर में दौड़ गई थी.

‘लगता है पांव में मोच आ गई है,’ राजीव ने अपना पांव मसलते हुए कहा.

‘एक मिनट  ठहरो,’ पूजा तेजी से कार की ओर लपकी और वहां से दवा का डब्बा उठा लाई. दर्द की दवा पैर पर मल कर उस ने क्रेप बैंडेज बांध दी. पूजा ने ड्राइविंग सीट संभाल ली. राजीव उस के बराबर में जा बैठा और वह दक्षता से कार चलाती हुई उसे घर ले आई थी.

3 दिन देहरादून में रुक कर राजीव अपने घर लौट आया. अपने मित्र का हालचाल जानने के बाद पिताजी बोले, ‘राजीव, पूजा तुम्हें कैसी लगी?’

‘पिताजी, पूजा बहुत अच्छी लड़की है. बहुत बुद्धिमान और साहसी. आजकल ज्वैलरी डिजाइनिंग का कोर्स कर रही है.’

‘मुझे पूरी उम्मीद थी कि पूजा तुम्हें पसंद आएगी,’ पिताजी बोले, ‘बेटे, मैं और लक्ष्मीकांत तुम्हारा और पूजा का विवाह करना चाहते हैं.’

‘क्या? पिताजी, ऐसा कैसे हो सकता है?’ राजीव ने हैरानी से मां और पिताजी को बारीबारी से देखा.

‘क्यों नहीं हो सकता? पूजा अच्छी लड़की है. घर अच्छा है, फिर तुम्हें और क्या चाहिए?’ पिताजी ने उसे घूरा.

राजीव की उन से कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं हुई. वह उठ कर अपने कमरे में आ गया.

मां राजीव के कमरे में आईं और उस के समीप बैठ कर स्नेह से बोलीं, ‘मुझे बता बेटा, क्या बात है? क्या पूजा तुझे पसंद नहीं?’

उस दिन सबकुछ बताने का समय आ गया था, राजीव ने मां की तरफ देखा. हिम्मत जुटा कर धीमे स्वर में बोला, ‘मां, मैं चांदनी से प्यार करता हूं. यही सच है और एक न एक दिन आप सब को इस सचाई को स्वीकारना ही पड़ेगा.’

‘तू जानता है राजीव, तेरे पिताजी यह बात कभी नहीं मानेंगे. उन के दिल में तेरे विवाह को ले कर कितने अरमान हैं. क्या बीतेगी उन के दिल पर, जब उन्हें यह पता चलेगा?’ मां के चेहरे पर चिंता की लकीरें सिमट आईं.

‘मां, पिताजी के अरमानों के लिए क्या मैं अपने प्यार को कुर्बान कर दूं?’

‘मेरे लिए किसी को कोई कुर्बानी देने की जरूरत नहीं है राजीव की मां,’ पिताजी ने कमरे में आते हुए कहा और कुरसी खींच कर बैठते हुए बोले, ‘देखो राजीव, पिता होने के नाते तुम्हें समझाना मेरा फर्ज है. विवाह कोई हंसीखेल नहीं. जीवन भर का बंधन है. तुम्हारा भाई अजय भी यह गलती करने जा रहा था पर वक्त रहते वह संभल गया. देखो, मैं कितनी अच्छी बहू लाया हूं उस के लिए. आज वह कितना खुश है.’

‘भैया संभले नहीं थे, आप से डर गए थे इसलिए आप के आगे झुक गए. पर मैं झुकने वाला नहीं. अपने प्यार का बलिदान नहीं कर सकता मैं.’

‘अच्छा बताओ, तुम कितने दिन से चांदनी को जानते हो?’ राजीव की ओर देख पिताजी व्यंग्यात्मक लहजे में बोले.

‘लगभग 6 माह से,’ धीमे स्वर में राजीव बोला.

‘और मैं ने पूजा को बचपन से बड़ा होते देखा है. 15 साल की थी वह जब उस की मां चल बसी थीं. तभी से उस ने अपने घर को संभाल लिया था. उस में बहुत ठहराव है…’

अपने पिताजी की बात बीच में काटते हुए राजीव बोला, ‘आप और मां एक बार चांदनी को देख तो लीजिए. पिताजी, चांदनी बहुत सुंदर है. उस के संस्कार बहुत ऊंचे हैं, जबकि आधुनिक परिवेश में पलीबढ़ी पूजा हमेशा जींस टाप पहने रहती है. ऐसी लड़की हमारे घर में कैसे सामंजस्य बैठा पाएगी?’

‘देखो राजीव, किसी के पहनावे से उस के संस्कारों का पता नहीं चलता है. चांदनी एक साधारण परिवार की लड़की है. मैं दावे से नहीं कह रहा हूं पर इस बात की संभावना हो सकती है कि वह तुम से  नहीं तुम्हारे पैसे से प्यार करती हो.’

अपने पिताजी की बात पर राजीव गुस्से से भन्ना कर बोला, ‘आप समझते हैं कि दुनिया में पैसा ही सबकुछ है, भावनाएं कुछ भी नहीं. आप को अपने पैसे पर इतना ही घमंड है तो मैं अभी यह घर छोड़ कर चला जाता हूं. आप को अपने पैरों पर खड़ा हो कर दिखाऊंगा. आप का पैसा और रुतबा न होने पर भी चांदनी मुझ से ही शादी करेगी, देख लीजिएगा.’

‘अगर ऐसा हुआ तो मैं खुद अपनी बहू को घर ले कर आऊंगा,’ पिताजी बोले.

राजीव ने अपने कपड़े अटैची में रखे और मां पिताजी के पांव छू अटैची उठा घर से बाहर आ गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह कहां जाए, तभी सौरभ का खयाल आते ही वह आटो पकड़ कर सौरभ के घर की ओर चल दिया.

सौरभ को राजीव ने सारी स्थिति बता दी तो वह बोला, ‘घर से तू चला आया, अब करेगा क्या?’

‘कुछ न कुछ तो करूंगा ही. चांदनी को पाने के लिए अपनी अलग पहचान बनाना बहुत जरूरी है.’

शाम को राजीव काफी हाउस में चांदनी से मिला और सारे हालात के बारे में उसे बताया. घर से अलग होने की बात सुन कर चांदनी स्तब्ध रह गई. वह नाराजगी जाहिर करते हुए बोली, ‘राजीव, तुम्हें घर नहीं छोड़ना चाहिए था. घर में रह कर भी तो तुम पिताजी को मना सकते थे.’

‘पिताजी मानने वाले नहीं थे, फिर अजय भैया के वक्त भी वह कहां माने थे? आखिरकार भाई को ही झुकना पड़ा था. मैं नहीं चाहता कि हमारे प्यार का भी वही हश्र हो इसलिए मुझे घर छोड़ना पड़ा.’

‘किंतु राजीव, मैं नहीं चाहती कि मेरी खातिर तुम अपने घर वालों को छोड़ो. लोग तो मुझे ही बुरा कहेंगे न.’

‘जिसे जो कहना है, कहने दो. मुझे किसी की परवा नहीं है. मैं अपना घर छोड़ सकता हूं चांदनी, किंतु तुम्हें नहीं छोड़ सकता.’

‘फिर अब क्या करने का इरादा है?’

‘अब नौकरी तलाश करूंगा. तुम निराश मत हो चांदनी, सब ठीक हो जाएगा.’

एक माह के अंदर ही राजीव को नौकरी मिल गई. एक प्रोफेशनल कालिज में वह बी.बी.ए. के छात्रों को पढ़ाने लगा. शाम के समय 9वीं और 10वीं के बच्चे उस के पास ट्यूशन पढ़ने आने  लगे थे. इस से अच्छी आमदनी होने लगी थी उसे. कुछ दिन बाद राजीव ने सौरभ के घर के पास ही एक फ्लैट किराए पर ले लिया. अब वह बहुत खुश था. उस का एम.बी.ए. करना सार्थक हो गया था. धीरेधीरे घर की आवश्यक वस्तुएं जुटाने में 3 माह बीत गए.

एक रात वह अपने कमरे में बैठा टेलीविजन पर फिल्म देख रहा था, तभी बड़े भैया का फोन आया, ‘राजीव, जल्दी से सिटी नर्सिंगहोम पहुंचो, मां को हार्टअटैक पड़ा है.’

राजीव का दिल धक् से रह गया. जल्दी से स्कूटर स्टार्ट कर वह नर्सिंगहोम पहुंचा. घर के सभी सदस्य आई.सी.यू. के बाहर जमा थे. वह पिताजी के निकट चला आया, उसे देख उन की आंखें भर आईं. उन के हाथों को कस कर थाम राजीव रुंधे कंठ से बोला, ‘हिम्मत रखिए पिताजी, मां को कुछ नहीं होगा?’

‘दर्द में भी तुम्हारी मां बारबार तुम्हें ही याद कर रही थी,’ कहते हुए पिताजी फूटफूट कर रो पड़े थे.

राजीव ने उन्हें बहुत मुश्किल से संभाला. 1 घंटे बाद डाक्टर आई.सी.यू. से बाहर निकले. मां अब खतरे से बाहर थीं. सारी रात हम ने आंखों में काट दी. सुबह नर्स ने आ कर सूचना दी कि आप लोग मां से मिल सकते हैं. पहले राजीव और पिताजी मां के पास गए. राजीव को देख उन के चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट आई. अपलक उसे देखती मां ने धीमे स्वर में कहा, ‘राजीव बेटे, तू घर लौट आ. मैं तेरे बगैर जी नहीं पाऊंगी.’

एक हफ्ता नर्सिंगहोम में रह कर मां घर आ गईं. मां और पिताजी के कहने पर राजीव ने अपना फ्लैट छोड़ दिया और सामान ले कर घर वापस आ गया. चांदनी उन दिनों अपनी मौसी के पास गई हुई थी, इसलिए वह उसे कुछ भी न बता सका.’

एक शाम मां और पिताजी के पास राजीव लान में बैठा था तो पिताजी बोले, ‘राजीव, तुम चांदनी से विवाह की बात कर लो. मैं और तुम्हारी मां जल्द से जल्द उस के मांबाप से मिलना चाहते हैं.’

राजीव का दिल उमंग से भर उठा. एक सप्ताह बाद चांदनी लौटी तो वह उस से मिलने पहुंचा. उस दिन वह गुलाबी साड़ी और सफेद मोतियों के हार में बहुत खूबसूरत लग रही थी. उस की आंखों में झांक कर राजीव बोला था, ‘चांदनी, अब वक्त आ गया है कि तुम दुलहन बन कर मेरे घर आ जाओ. बताओ, मैं तुम्हारे घर वालों से कब बात करने आऊं?’

राजीव ने उस से यह बात छिपा ली कि उस के घर वाले अब उस से विवाह के लिए राजी थे. उस ने सोचा कि जब अचानक मां और पिताजी को ले कर वह चांदनी के घर पहुंचेगा, तब उसे कितनी प्रसन्नता मिलेगी.

चांदनी कुछ क्षण खामोश रही फिर बोली, ‘पहले मैं तुम से कुछ मांगना चाहती हूं, बताओ दोगे?’

सरस सलिल विशेष

‘मांगो, क्या मांगती हो? कहो तो आसमान से चांदसितारे तोड़ कर तुम्हारे कदमों में बिछा दूं,’ मुसकराते हुए राजीव बोला.

‘राजीव, मजाक मत करो. मैं गंभीर हूं.’

अब वह भी संजीदा हो उठा. सवालिया नजरों से उस की तरफ देखा था.

‘राजीव, मैं चाहती हूं कि विवाह से पहले तुम अपनी नौकरी छोड़ दो और अपने पिताजी का बिजनेस संभाल लो.’

‘लेकिन क्यों? अच्छीभली नौकरी है, क्या बुराई है इस में,’ राजीव ने हैरत से उस की तरफ देखा.

‘बुराई कुछ भी नहीं परंतु सोचो, कहां यह 2 हजार रुपए की छोटी सी नौकरी और कहां तुम्हारे पिताजी का लाखों का बिजनेस. उस में जो शान और इज्जत होगी वह तुम्हारी इस नौकरी में नहीं होगी.’

‘और कुछ?’ चांदनी का चेहरा गौर से देखते हुए राजीव बोला.

‘विवाह से पहले, उस 2 कमरों के फ्लैट को छोड़ कर अपनी कोठी में चले आओ, क्योंकि तुम्हारे घर से अलग रहने पर तुम्हारी इतनी बड़ी कोठी पर तुम्हारे दोनों भाइयों का कब्जा हो जाएगा.’

‘अच्छा हुआ चांदनी, विवाह से पहले ही तुम ने अपने मन की बात साफ कह दी,’ बुझे मन से राजीव बोला.

‘मेरी बात का बुरा मत मानना राजीव, हर लड़की की कुछ आकांक्षाएं होती हैं, कुछ सपने होते हैं. मैं ने हमेशा अभाव में जीवन काटा है. बचपन से मेरी इच्छा थी कि किसी बहुत बड़े आदमी के बेटे से मेरा विवाह हो. मैं भी कारों में घूमूं, आलीशान कोठी में रहूं. आज मेरा सपना पूरा होने जा रहा है तो तुम इसे व्यर्थ के आत्मसम्मान के चक्कर में पड़ कर मत तोड़ो,’ चांदनी विनती करते हुए बोली.

राजीव चुपचाप उठ कर वहां से चला आया और सीधे घर न जा कर समुद्र के किनारे रेत पर जा बैठा और आतीजाती लहरों को देखने लगा. कितनी शामें उस ने यहां चांदनी के साथ बिताई थीं. भविष्य के कितने सतरंगी सपने संजोए थे. किंतु आज उसे सबकुछ अर्थहीन लग रहा था. रहरह कर पूजा की कही बातें उस के जेहन में गूंज रही थीं :

‘अपने बलबूते कुछ करने का प्रयास करो. थोड़ा सा भी कमाओगे तो तुम्हारा आत्मविश्वास बढ़ेगा. तुम्हें सच्ची खुशी हासिल होगी.’

कितना फर्क था दोनों की सोच में. अब राजीव को अपने जीवन का फैसला लेने में अधिक देर नहीं लगी. शांत मन से वह घर चला आया और मां और पिताजी से बोला था, ‘पिताजी, मैं पूजा से विवाह करना चाहता हूं.’

आश्चर्य से वे दोनों बेटे का चेहरा देखने लगे.

‘आप ने बिलकुल ठीक कहा था पिताजी कि भावावेश में लिए गए फैसले अकसर गलत होते हैं. आप का अनुमान सही था. चांदनी मुझ से नहीं बल्कि आप के पैसे से प्यार करती थी. अच्छा ही हुआ पिताजी, जो आप ने उस दिन मुझे घर से जाने दिया, अन्यथा मुझे चांदनी की भावनाओं का कभी पता नहीं चलता. जीवन का वह मोड़ मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण था. उसी मोड़ पर आ कर मैं भंवर में फंसने से बच गया. मेरे जीवन को सही दिशा मिली.’

‘अच्छी तरह सोच लो राजीव, तुम्हें अपने फैसले पर अफसोस तो नहीं होगा?’ पिताजी बोले.

‘अब कैसा अफसोस पिताजी? मैं उस मृगतृष्णा से बाहर आ चुका हूं. पूजा जैसे हीरे को छोड़ मैं पत्थर तराश रहा था.’

पिताजी उठे और देहरादून फोन कर के लक्ष्मीकांत को यह खुशखबरी सुनाने चल दिए मां और भाभियां विवाह की तैयारियों में जुट गईं.

सोचतेसोचते राजीव अतीत से वर्तमान में आ गया.

अपने विवाह के निमंत्रणपत्र पर अपने नाम के सा

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