उसकी मेरे औफिस में नईनई नियुक्ति हुई थी. हमारी कंपनी का हैड औफिस बैंगलुरु में था और मैं यहां की ब्रांच मैनेजर थी. औफिस में कोई और केबिन खाली नहीं था, इसलिए मैं ने उसे अपने कमरे के बाहर वाले केबिन में जगह दे दी. उस का नाम नीलिमा था. क्योंकि उस का केबिन मेरे केबिन के बिलकुल बाहर था, इसलिए मैं उसे आतेजाते देख सकती थी. मैं जब भी अपने औफिस में आती, उसे हमेशा फाइलों या कंप्यूटर में उलझा पाती. उस का औफिस में सब से पहले पहुंचना और देर तक काम करते रहना मुझे और भी हैरान करने लगा. एक दिन मेरे पूछने पर उस ने बताया कि पति और बेटा जल्दी चले जाते हैं, इसलिए वह भी जल्दी चली आती है. फिर सुबहसुबह ट्रैफिक भी ज्यादा नहीं रहता.
वह रिजर्व तो नहीं थी, पर मिलनसार भी नहीं थी. कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो आंखों को बांध लेते हैं. उस का मेकअप भी एकदम नपातुला होता. वह अधिकतर गोल गले की कुरती ही पहनती. कानों में छोटे बुंदे, मैचिंग बिंदी और नाममात्र का सिंदूर लगाती. इधर मैं कंपनी की ब्रांच मैनेजर होने के नाते स्वयं के प्रति बहुत ही संजीदा थी. दिन में जब तक 3-4 बार वाशरूम में जा कर स्वयं को देख नहीं लेती, मुझे चैन ही नहीं पड़ता. परंतु उस की सादगी के सामने मेरा सारा वजूद कभीकभी फीका सा पड़ने लगता.
लंच ब्रेक में मैं ने अकसर उसे चाय के साथ ब्रैडबटर या और कोई हलका नाश्ता करते पाया. एक दिन मैं ने उस से पूछा तो कहने लगी, ‘‘हम लोग नाश्ता इतना हैवी कर लेते हैं कि लंच की जरूरत ही महसूस नहीं होती. पर कभीकभी मैं लंच भी करती हूं. शायद आप ने ध्यान नहीं दिया होगा. वैसे भी मेरे पति उमेश और बेटे मयंक को तरहतरह के व्यंजन खाने पसंद हैं.’’ ‘‘वाह,’’ कह कर मैं ने उसे बैठने का इशारा किया, ‘‘फिर कभी हमें भी तो खिलाइए कुछ नया.’’ इसी बीच मेरा फोन बज उठा तो मैं अपने केबिन में आ गई.
एक दिन वह सचमुच बड़ा सा टिफिन ले कर आ गई. भरवां कचौरी, आलू की सब्जी और बूंदी का रायता. न केवल मेरे लिए बल्कि सारे स्टाफ के लिए. इतना कुछ देख कर मैं ने कहा, ‘‘लगता है कल शाम से ही इस की तैयारी में लग गई होगी.’’
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वह मुसकराने लगी. फिर बोली, ‘‘मुझे खाना बनाने और खिलाने का बहुत शौक है. यहां तक कि हमारी कालोनी में कोई भी पार्टी होती है तो सारी डिशेज मैं ही बनाती हूं.’’ नीलिमा को हमारी कंपनी में काम करते हुए 6 महीने हो गए थे. न कभी वह लेट हुई और न जाने की जल्दी करती. घर से तरहतरह का खाना या नाश्ता लाने का सिलसिला भी निरंतर चलता रहा. कई बार मैं ने उसे औफिस के बाद भी काम करते देखा. यहां तक कि वह अपने आधीन काम करने वालों की मीटिंग भी शाम 6 बजे के बाद ही करती. उस का मानना था कि औफिस के बाद मन भी थोड़ा शांत रहता है और बाहर से फोन भी नहीं आते.
एक दिन मैं ने उसे दोपहर के बाद अपने केबिन में बुलाया. मेरे लिए फुरसत से बात करने का समय दोपहर के बाद ही होता था. सुबह मैं सब को काम बांट देती थी. हमारी कंपनी बाहर से प्लास्टिक के खिलौने आयात करती और डिस्ट्रीब्यूटर्स को भेज देती थी. हमारी ब्रांच का काम और्डर ले कर हैड औफिस को भेजने तक ही सीमित था. नीलिमा ने बड़ी शालीनता से मेरे केबिन का दरवाजा खटखटा भीतर आने की इजाजत मांगी. मैं कुछ पुरानी फाइलें देख रही थी. उसे बुलाया और सामने वाली कुरसी पर बैठने का इशारा किया. मैं ने फाइलें बंद कीं और चपरासी को बुला कर किसी के अंदर न आने की हिदायत दे दी.
नीलिमा आप को हमारे यहां काम करते हुए 6 महीने से ज्यादा का समय हो गया. कंपनी के नियमानुसार आप का प्रोबेशन पीरियड समाप्त हो चुका है. यहां आप को कोई परेशानी तो नहीं? काम तो आपने ठीक से समझ ही लिया है. स्टाफ से किसी प्रकार की कोई शिकायत हो तो बताओ. ‘‘मैम, न मुझे यहां कोई परेशानी है और न ही किसी से कोई शिकायत. यदि आप को मेरे व्यवहार में कोई कमी लगे तो बता दीजिए. मैं खुद को सुधार लूंगी… मैं आप के जितना पढ़ीलिखी तो नहीं पर इतना जरूर विश्वास दिलाती हूं कि मैं अपने काम के प्रति समर्पित रहूंगी. यदि पिछली कंपनी बंद न हुई होती तो पूरे 10 साल एक ही कंपनी में काम करते हो जाते,’’ कह कर वह खामोश हो गई. उस की बातों में बड़ा ठहराव और विनम्रता थी.
‘‘जो भी हो, तुम्हें अपने परिवार की भी सपोर्ट है. तभी तो मन लगा कर काम कर सकती हो. ऐसा सभी के साथ नहीं होता है.’’ मैं ने थोड़े रोंआसे स्वर में कहा. वह मुझे देखती रही जैसे चेहरे के भाव पढ़ रही हो. मैं ने बात बदल कर कहा, ‘‘अच्छा मैं ने आप को यहां इसलिए बुलाया है कि अगला पूरा हफ्ता मैं छुट्टी पर रहूंगी. हो सकता है 1-2 दिन ज्यादा भी लग जाएं. मुझे उम्मीद है आप को कोई ज्यादा परेशानी नहीं होगी. मेरा मोबाइल चालू रहेगा.’’
‘‘कहीं बाहर जा रही हैं आप?’’ उस ने ऐसे पूछा जैसे मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. मैं ने कहा, ‘‘नहीं, रहूंगी तो यहीं… कोर्ट की आखिरी तारीख है. शायद मेरा तलाक मंजूर हो जाए. फिर मैं कुछ दिन सुकून से रहना चाहती हूं.’’
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‘‘तलाक?’’ कह जैसे वह अपनी सीट से उछली हो. ‘‘हां.’’
‘‘इस उम्र में तलाक?’’ वह कहने लगी, ‘‘सौरी मैम मुझे पूछना तो नहीं चाहिए पर…’’
‘‘तलाक की भी कोई उम्र होती है? सदियों से मैं रिश्ता ढोती आई हूं. बेटी यूके में पढ़ने गई तो वहीं की हो कर रह गई. मेरे पति और मेरी कभी बनी ही नहीं और अब तो बात यहां तक आ गई है कि खाना भी बाहर से ही आता है. मैं थक गई यह सब निभातेनिभाते… और जब से बेटी ने वहीं रहने का निर्णय लिया है, हमारे बीच का वह पुल भी टूट गया,’’ कहतेकहते मेरी आंखों में आंसू आ गए.
दरअसल, हमें यह सच्चाई स्वीकार करनी चाहिए कि ऐसा हमेशा से होता रहा है मानवीय संवेदना जहां मनुष्य की फितरत है वही धोखा देना भी एक ऐसी फितरत है जो हमेशा से रही है. अब सिर्फ एक सवाल है कि हम इससे कैसे बच सकते हैं क्योंकि इसके अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं है.
हम स्वयं जागरूक होंगे अपना बचाव करेंगे तो अपने कमाए हुए गाड़े धन की रक्षा कर सकते हैं. अगर हम स्वयं आंखें मूंद लेंगे तो धोखाधड़ी का शिकार होने की संभावना बनी रहेगी.
इस आलेख में हम यह प्रयास कर रहे हैं कि आपको कुछ ऐसी टिप्स दें ताकि आप बैंकिंग धोखा घड़ी से बच सके. इसी संदर्भ में आपको यह जानना भी जरूरी है कि हाल मैं बैंकिंग धोखा घड़ी की घटनाएं बढ़ती चली जा रही हैं. जैसे जैसे नियम कायदे कठोर हो रहे हैं प्रचार-प्रसार हो रहा है उसी स्पीड मैं धोखाधड़ी के मामले भी बढ़ते चले जा रहे हैं.
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चालू वित्त वर्ष (2021-22) की पहली छमाही में विभिन्न बैंकिंग कामकाज में धोखाधड़ी के मामले बढ़कर 4,071 हो गए, जबकि एक साल पहले की समान अवधि में यह संख्या 3,499 थी. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की बैंकिंग प्रवृत्ति एवं प्रगति के बारे में जारी रिपोर्ट में बताया गया कि बैंकिंग कामकाज से संबंधित धोखाधड़ी के मामले आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गए हैं.
सरकार और अमिताभ बच्चन
इस रिपोर्ट में आपको यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि बैंकिंग धोखा घड़ी को ले करके जहां सरकार भारतीय रिजर्व बैंक अलर्ट है और यह प्रयास लगातार जारी है कि लोगों में जागरूकता फैले.
यही कारण है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन को भी बैंकिंग धोखाधड़ी से बचाव के लिए हायर किया हुआ है.
देश और दुनिया में सबसे ज्यादा देखे जाने वाले -“कौन बनेगा करोड़पति” कार्यक्रम जिसके होस्ट स्वयं अमिताभ हैं कार्यक्रम में लगातार बीच-बीच में बैंकिंग धोखाधड़ी से बचाव के लिए लोगों को अपने अंदाज में जानकारियां देते जाते हैं.
मगर इस सब के बावजूद बैंक में रखे हुए धन में सोशल मीडिया के माध्यम से सेंध लगाए जाने का अपराध बदस्तूर जारी है. इसका यही बचाव है कि हम जागरूक हो और अपने बैंकों के दस्तावेजों आदि की जानकारी शेयर नहीं करें और गोपनीय रखें.
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आंकड़े है चौकानेवाले
हालांकि अप्रैल-सितंबर, 2021 के दौरान हुई धोखाधड़ी में शामिल रकम 36,342 करोड़ रुपए रही, जो एक साल पहले की समान अवधि में 64,261 करोड़ रुपए थी चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में बैंकों ने 35,060
करोड़ रुपए मूल्य के अग्रिम भुगतान से संबंधित धोखाधड़ी के 1,802 मामले दर्ज किए गए. चिंता का सबब यह है कि इसके अलावा 1,532 मामले कार्ड भुगतान एवं इंटरनेट भुगतान से संबंधित थे, जिनकी कुल राशि 60 करोड़ रुपए थी.
पहली छमाही में जमाओं से संबंधित धोखाधड़ी के 208 मामले सामने आए, जिसमें 362 करोड़ रुपए की राशि का हेरफेर किया गया. बैंकिग धोखाधड़ी के
मामले में एक खास बात यह है कि इसमें आधे से भी अधिक हिस्सा निजी क्षेत्र के बैंकों का है लेकिन मूल्य के संदर्भ में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का हिस्सा इस धोखाधड़ी में अधिक रह है.
वहीं वर्ष 2020-21 में 1,38, 42 करोड़ रुपए मूल्य के कुल 7,363 धोखाधड़ी मामले दर्ज किए गए थे.यह संख्या व 2019-20 में 8,703थी, जिनमें 1,85, 46: करोड़ रुपए की धोखाधड़ी हुई थी. इस तरह 2020-21 में बैंकिंग धोखाधड़ी के मामले एक साल पहले की तुलना में कम हो गए. रिपो कहती है कि वर्ष 2020-21 में सामने आ कई मामले असल में पहले के थे, लेकिन इस समय उन्हें दर्ज किया गया. इस अवधि में निज बैंकों का अंशदान धोखाधड़ी की मात्रा ए मूल्य दोनों में अधिक रहा. यह रिपोर्ट आंकड़े हमें सूचित करते हैं कि अगर हम स्वयं जागरूक नहीं होंगे तो अभी भी बैंकिंग धोखाधड़ी का शिकार हो सकते हैं.
31 साल की कामकाजी महिला नीलम को शादी के 3 साल बाद भी बच्चा न होने से वह घबरायी और डौक्टर के पास गयी, शुरुआती जांच के बाद डॉक्टर ने पाया कि उसका सब कुछ ठीक है,लेकिन ओव्यूलेशन सही समय पर नहीं हो रहा है. उसकी काउंसिलिंग की गई, तो पता चला कि उसकी मासिक धर्म का समय भी ठीक नहीं, इसकी वजह जानने के बाद पता चला कि उसका कैरियर ही उसकी इस समस्या का जड़ है. उसकी चिंता और मूड स्विंग इतना अधिक था कि उसे नार्मल होने में समय लगा और करीब एक साल के इलाज के बाद वह आईवीएफ के द्वारा ही मां बन पायी.
दरअसल आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पूरे दिन का एक बहुत बड़ा भाग व्यक्ति अपने मोबाइल फोन से चिपके हुए बिताता है. खासकर आज के युवा पूरे दिन डिजिटल वर्ल्ड में व्यस्त रहते हैं, ऐसे में उनकी शारीरिक अवस्था धीरे-धीरे बिगड़ती जाती है, जिसमें फर्टिलिटी की समस्या सबसे अधिक दिखाई पड़ रही है. इस बारें में वर्ल्ड औफ वुमन की फर्टिलिटी एक्सपर्ट डा. बंदिता सिन्हा का कहना है कि डिजिटल वर्ल्ड के आने से इसकी लत सबसे अधिक युवाओं को लगी है. वे दिनभर मोबाइल पर व्यस्त रहती हैं. 19 से 25 तक की युवा कुछ सुनना भी नहीं चाहतीं, उन्हें कुछ मना करने पर विद्रोही हो जाती हैं. ऐसे में उनके साथ अधिक समस्या है. 5 में से एक लड़की को कुछ न कुछ स्त्री रोग जनित समस्या इसकी वजह से आज है.
ऐसी ही एक 25 साल की लड़की मेरे पास आई जो बहुत परेशान थी, क्योंकि उसका मासिक धर्म रुक चुका था. उसे नीद नहीं आती थी. वह पोलीसिस्टिक ओवेरियन डिसीज की शिकार थी. जिसमें उसका वजन बढ़ने के साथ-साथ, डिप्रेशन, मूड स्विंग और हार्मोनल समस्या थी. इसे ठीक करने में 2 साल का समय लगा. आज वह एक अच्छी जिंदगी जी रही है, लेकिन यही बीमारी अगर अधिक दिनों तक चलती, तो उसे फर्टिलिटी की समस्या हो सकती थी.
ये समस्या केवल महिलाओं में ही नहीं, पुरुषों में भी अधिक है. इस बारें में मनिपाल फर्टिलिटी के चेयरमैन और यूरो एनड्रोलोजिस्ट डा. वासन एस एस बताते हैं कि वैज्ञानिको ने सालों से इलेक्ट्रोमेग्नेटिक रेडिएशन (ईएमआर) का मानव शरीर पर प्रभाव के बारें में शोध किया है. यह हमारे आसपास के वातावरण और घरेलू उपकरणों जिसमें ओवन, टीवी, लैपटौप, मेडिकल एक्सरे आदि सभी से कुछ न कुछ मात्रा में आता रहता है, लेकिन इसमें सबसे खतरनाक है हमारा मोबाइल फोन. जिसे आजकल व्यक्ति ने अपने जीवन का खास अंग बना लिया है. अध्ययन कहता है कि इलेक्ट्रोमेग्नेटिक के अधिक समय तक शरीर में प्रवेश करने से कैंसर, सिरदर्द और फर्टिलिटी की समस्या सबसे अधिक होती है.
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ऐसा देखा गया है कि जिन पुरुषों ने अपने से आधे मीटर की दूरी पर सेल फोन रखा, उनके भी ‘स्पर्म काउंट’ पहले से कम हुए. इतना ही नहीं 47 प्रतिशत लोग जिन्होंने मोबाइल फोन को अपनी पेंट के जेब में पूरे दिन रखा, उनका ‘स्पर्म काउंट’ अस्वाभाविक रूप से 11 प्रतिशत आम पुरुषों से कम था और यही कमी उन्हें धीरे-धीरे इनफर्टिलिटी की ओर ले जाती है. इतना ही नहीं जो लोग एक दिन में एक घंटे से अधिक मोबाइल फोन का प्रयोग करते हैं, उनमें भी 60 प्रतिशत असामान्य रूप से ‘सीमेन कंसंट्रेशन’ आम 35 प्रतिशत पुरुषों की अपेक्षा कम पाया गया.
रिसर्च यह भी बताती है कि पूरे विश्व में 14 प्रतिशत मध्यम और उच्च आयवर्ग के कपल जिन्होंने मोबाइल फोन का लगातार प्रयोग किया है, उन्हें गर्भधारण करने में मुश्किल आई. ये सेल फोन पुरुष और महिला दोनों के लिए समान रूप से घातक हैं.
इसके आगे डा.वासन कहते हैं कि मोबाइल के इस्तेमाल से फर्टिलिटी के कम होने की वजह को लेकर भी कई मत हैं. कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि मोबाइल से निकले इलेक्ट्रोमेग्नेटिक रेडिएशन स्पर्म के चक्र को पूरा करने में बाधित करती है या यह डीएनए को कम कर देती है, जबकि दूसरे मानते हैं कि मोबाइल से निकले रेडिएशन के द्वारा उपजी हीट से स्पर्म काउंट कम होता जाता है. 30 से 40 प्रतिशत फर्टिलिटी के केसेज में अधिकतर पुरुषों में ही पुअर क्वालिटी की स्पर्म देखी गयी, जो चिंता का विषय है.
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मोबाइल फोन के अधिक प्रयोग से उसके रेडिएशन का लॉन्ग टर्म प्रभाव है, ये विश्व में साबित हो चुका है, क्योंकि मोबाइल के अधिक प्रयोग से दिमाग में उत्तेजना पैदा होती है, जिससे हार्मोनल इम्बैलेंस होता है, फलस्वरूप नींद पूरी न होना, तनावग्रस्त रहना, मूड स्विंग होना आदि समस्या होती है, ऐसे में कुछ सावधानियां रखनी जरुरी है.
– मोबाइल फोन का प्रयोग कम से कम करें, पुराने आप्शन लैंड लाइन का अधिक से अधिक प्रयोग करने की कोशिश करें.
– मोबाइल फोन में स्पीकर औन कर बात करें.
– अपने जेब में औन मोबाइल फोन को न रखें.
– रात में सोते समय मोबाइल फोन को अपने से दूर टेबल पर रखें, अलार्म के लिए बैटरी वाले घड़ी का इस्तमाल करें.
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– पुरुष मोबाइल फोन को ‘कैरी बैग’ में हमेशा रखने की कोशिश करें.
– रेडिएशन को कम करने वाले कवर का प्रयोग मोबाइल के लिए करें.
– पुरुष या महिला लैपटौप को हमेशा टेबल के ऊपर रखकर काम करें.
– ऐसा करने पर आप केवल अपने आप को ही स्वस्थ नहीं रखते, बल्कि एक स्वस्थ भविष्य के निर्माण के लिए भी खुद तैयार रहते है.
भोजपुरी एक्ट्रेस रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) सोशल मीडिया (Social Media) पर काफी एक्टिव रहती हैं. वह आए दिन फैंस के साथ अपनी फोटोज और वीडियोज शेयर करती रहती हैं. अब एक्ट्रेस का ट्रांसपेरेंट ड्रेस में तस्वीर जमकर वायरल हो रही है.
तस्वीरो में रानी चटर्जी की खूबसूरती देख फैंस दीवाने हो गये हैं. दरअसल, रानी चटर्जी ने इंस्टाग्राम पर ये फोटो शेयर की है. इस फोटो में रानी ब्लैक कलर की ड्रेस में दिखाई दे रही हैं और उन्होंने जालीदार टॉप पहन रखा है.
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फोटोज में एक्ट्रेस ने अपने लुक को कंप्लीट करने के लिए ब्लैक आउटफिट के साथ खुले बालों के साथ रेड लिपस्टिक का इस्तेमाल किया है. इसके साथ ही वो इसमें दिलकश पोज दे रही हैं.
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इस पोस्ट पर फैंस जमकर कमेंट कर रहे हैं. एक यूजर ने लिखा है, ‘कितना प्यार करते हैं तुमसे हमें कहना नहीं आता, बस इतना जानते हैं तुम्हारे बिन रहना नहीं आता.’
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रानी की फोटोज को फैंस खूब पसंद कर रहे हैं. एक्ट्रेस भोजपुरी फिल्मों के साथ-साथ टीवी शोज और वेब सीरीज में भी काम कर चुकी हैं. वह अपनी एक्टिंग और अदाओं से सभी को दीवाना बनाते हुए नजर आती हैं.
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टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupamaa) में हाईवोल्टेज ड्रामा चल रहा है. जिससे दर्शकों को एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिल रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि अनुज ने वनराज-मालविका की पार्टनरशिप को लेकर रिएक्ट करता है लेकिन अनुपमा समझाती है कि उसे अपनी बहन पर भरोसा करना चाहिए. और वनराज का भी फोकस सिंर्फ अपने काम पर है. वह इतना भी घटिया इंसान नहीं है. शो के आने वाले एपिसोड में बड़ा ट्विस्ट आने वाला है. आइए बताते हैं, शो के नए एपिसोड के बारे में.
शो में दिखाया जा रहा है कि मालविका शाह परिवार के लोगों के साथ मिलकर क्रिसमस पार्टी की तैयारी कर रही है. वह अपनी बेबाकी और मासूमियत से सबका दिल जीत रही है. वह बा को भी क्रिसमस पार्टी के डोकोरेशन के लिए मना लेती है.
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तो वहीं दूसरी तरफ मालविका अनुपमा को पार्टी में आने के लिए इनवाइट करती है और कैरेट केक लेकर आने के लिए कहती है. शो के अपकमिंग एपिसोड में बड़ा धमाका होने वाला है. क्रिसमस पार्टी के दौरान अनुज-अनुपमा साथ दिखाई देंगे.
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तो दूसरी तरफ मालविका दोनों की जोड़ी की जमकर तारीफ करेगी. मालविका बापूजी से कहेगी कि उनको अनुज और अनुपमा की शादी करवा देनी चाहिए. वह ये भी कहेगी कि मालविका अनुपमा को भाभी बुलाना चाहती है. ये बात सुनते ही अनुपमा मालविका को टोक देगी.
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तो वहीं अनुपमा के रिएक्शन से मालविका गुस्सा हो जाएगी और शाह हाउस छोड़कर चली जाएगी. ऐसे में अनुपमा मालविका को रोकेगी. अनुपमा उसे समझाएगी और कहेगी कि भारत में शादी को लेकर लोग कितने गंभीर रहते हैं. मालविका अनुपमा को समझेगी और शाह हाउस वापस लौट आएगी.
क्रिसमस पार्टी में राखी दवे की भी एंट्री होगी. राखी दवे आते ही अनुपमा को ताना मारना शुरू करेगी. अब ये देखना होगा कि अनुपमा राखी दवे को कैसे सबक सिखाती है.
शकुंतला सिन्हा
और आगे निजी बातें पूछने के लिए सुगंधा से बहुत फटकार मिली. जब मैं ने कहा कि आप ने मेरे निकटतम मित्र की जिंदगी बरबाद कर दी है और वह आप की याद में काफी दिनों तक शराब के नशे में डूबे इधरउधर भटक रहा था.’’
मैं ने पूछा ‘‘उस ने क्या कहा?’’
वह बोली ‘‘मैं अनिल को बहुत प्यार करती थी और उन का सम्मान आज भी करती हूं. वे बहुत टैलेंटेड हैं और वे अपने काम में ज्यादा ध्यान न दे कर मेरे पीछेपीछे अपना समय बरबाद कर रहे थे. मैं उन्हें ऊंचाईयों पर देखना चाहती हूं. मुझे लगा कि मैं उन की उन्नति में बाधा बन गई थी इसीलिए दिल पर पत्थर रख कर उन से दूर चली गई.’’
‘‘अगर आज वे कहीं से मिल जाएं तो आप दोबारा उन्हें स्वीकार करेंगी?’’ मेरे कलीग के पूछने पर सुगंधा बोली, ‘‘अगर अनिलजी मेरे सामीप्य से अपने मुकाम तक पहुंचने में कामयाब होंगे तो मैं समझूंगी कि मेरा त्याग और मेरी उपासना सफल रही और मैं अपने को खुशनसीब समझूंगी.’’
‘‘अगर मैं कहूं कि मेरा वह दोस्त आज भी आप के इंतजार में पलकें बिछाए बैठा है और अब उस ने इतना कुछ हासिल कर रखा है जिसे जान कर आप को गर्व होगा और आप इसे अपने वर्षों की उपासना का नतीजा ही समझें.’’
‘‘वे कहां है आजकल? मुझे बस इतना पता है कि मैनेजमैंट करने के बाद वे विदेश चले गए थे.’’ सुगंधा ने मेरे कलीग से कहा.
‘‘फिलहाल मुझे भी ठीक से पता नहीं है फिर भी मैं जल्द ही पता कर आप को बता दूंगा. वैसे आप का जौइनिंग लैटर रैडी है. आज फ्राइडे है, आप मंडे को ज्वाइन करेंगी. तब तक हमारे चीफ भी यहां होंगे और आप सीधा उन्हें ही रिपोर्ट करेंगी.’’ मेरे कलीग ने कहा.
मैं मुंबई आ गया. सोमवार को अपने केबिन में बैठा था, मेरी पीए ने फोन पर कहा ‘‘सर, सुगंधा मैम हैज कम. शी इज गोइंग टू रिपोर्ट यू.’’
‘‘सैंड हर इन.’’
‘‘गुड मौर्निंग सर, दिस इज सुगंधा योर सौफ्टवेयर इंजीनियर रिपोर्टिंग टू यू.’’ सुगंधा ने कहा.
‘‘वैलकम इन अवर फैमिली, मेरा मतलब मेरी कंपनी में. मेरी कंपनी ही मेरी फैमिली रही है अब तक.’’
सुगंधा मुझे अभी भी नहीं पहचान सकी थी. मैं ने उस से कहा ‘‘आप अपने केबिन में जा कर अपनी जौब की जानकारी लें. कल सुबह आप मुझे मिलेंगी फिर बाकी काम मैं समझा दूंगा.’’
दूसरे दिन सुबह मैं ने अपने केबिन डोर पर अपना नेम प्लेट ‘अनिल कुमार’ लगवा दी थी. मैं क्लीन शेव्ड हो कर अपनी कुर्र्सी पर बैठा था. सुगंधा नौक कर मेरे केबिन में आई
और मुझे देख कर ठिठक कर खड़ी हो गई और बोली ‘‘आप?’’
‘‘लगता है तुम ने मेरी नेम प्लेट नहीं देखी?’’
‘‘मैं ने गौर नहीं किया.’’
‘‘यही मेरी कंपनी और फैमिली है. आज से तुम भी इसी फैमिली की अतिविशिष्ट सदस्य हुई. मुझे उम्मीद थी मेरी सुगंधा एक न एक दिन जरूर आएगी इसीलिए तुम्हारे सिवा किसी और के बारे में मैं ने आज तक सोचा ही नहीं.’’
मेरे कलीग ने तुम्हारे दूर जाने का कारण मुझे बता दिया था. मुझे तुम पर नाज है और तुम्हें सैल्यूट करना होगा.
मैं ने उठ कर सैल्यूट किया और उसे गले लगाया. मेरा कलीग केबिन के शीशे के पारदर्शी दीवार के उस पार से यह नजारा देख रहा था. उस ने मुझे कनखी मारी और हम तीनों मुस्करा उठे.
संदीप बाहर धूप में बैठे सफेद कागजों पर आड़ी तिरछी रेखाएं बनाबना कर भांति भांति के मकानों के नक्शे खींच रहे थे. दोनों बेटे पंकज, पवन और बेटी कामना उन के इर्दगिर्द खड़े बेहद दिलचस्पी के साथ अपनी अपनी पसंद बतलाते जा रहे थे.
मुझे हमेशा की भांति अदरक की चाय और कोई लजीज सा नाश्ता बनाने का आदेश मिला था.
बापबेटों की नोकझोंक के स्वर रसोईघर के अंदर तक गूंज रहे थे. सभी चाहते थे कि मकान उन की ही पसंद के अनुरूप बने. पवन को बैडमिंटन खेलने के लिए लंबेचौड़े लान की आवश्यकता थी. व्यावसायिक बुद्धि का पंकज मकान के बाहरी हिस्से में एक दुकान बनवाने के पक्ष में था.
कामना अभी 11 वर्ष की थी, लेकिन मकान के बारे में उस की कल्पनाएं अनेक थीं. वह अपनी धनाढ्य परिवारों की सहेलियों की भांति 2-3 मंजिल की आलीशान कोठी की इच्छुक थी, जिस के सभी कमरों में टेलीफोन और रंगीन टेलीविजन की सुविधाएं हों, कार खड़ी करने के लिए गैराज हो.
संदीप ठठा कर हंस पड़े, ‘‘400 गज जमीन में पांचसितारा होटल की गुंजाइश कहां है हमारे पास. मकान बनवाने के लिए लाखों रुपए कहां हैं?’’
‘‘फिर तो बन गया मकान. पिताजी, पहले आप रुपए पैदा कीजिए,’’ कामना का मुंह फूल उठा था.
‘‘तू क्यों रूठ कर अपना भेजा खराब करती है? मकान में तो हमें ही रहना है. तेरा क्या है, विवाह के बाद पराए घर जा बैठेगी,’’ पंकज और पवन कामना को चिढ़ाने लगे थे.
बच्चों के वार्त्तालाप का लुत्फ उठाते हुए मैं ने मेज पर गरमगरम चाय, पकौड़े, पापड़ सजा दिए और संदीप से बोली, ‘‘इस प्रकार तो तुम्हारा मकान कई वर्षों में भी नहीं बन पाएगा. किसी इंजीनियर की सहायता क्यों नहीं ले लेते. वह तुम सब की पसंद के अनुसार नक्शा बना देगा.’’
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संदीप को मेरा सुझाव पसंद आया. जब से उन्होंने जमीन खरीदी थी, उन के मन में एक सुंदर, आरामदेह मकान बनवाने की इच्छाएं बलवती हो उठी थीं.
संदीप अपने रिश्तेदारों, मित्रों से इस विषय में विचारविमर्श करते रहते थे. कई मकानों को उन्होंने अंदर से ले कर बाहर तक ध्यानपूर्वक देखा भी था. कई बार फुरसत के क्षणों में बैठ कर कागजों पर भांतिभांति के नक्शे बनाएबिगाड़े थे, परंतु मन को कोई रूपरेखा संतुष्ट नहीं कर पा रही थी. कभी आंगन छोटा लगता तो कभी बैठक के लिए जगह कम पड़ने लगती.
परिवार के सभी सदस्यों के लिए पृथकपृथक स्नानघर और कमरे तो आवश्यक थे ही, एक कमरा अतिथियों के लिए भी जरूरी था. क्या मालूम भविष्य में कभी कार खरीदने की हैसियत बन जाए, इसलिए गैराज बनवाना भी आवश्यक था. कुछ ही दिनों बाद संदीप किसी अच्छे इंजीनियर की तलाश में जुट गए.
एकांत क्षणों में मैं भी मकान के बारे में सोचने लगती थी. एक बड़ा, आधुनिक सुविधाओं से पूर्ण रसोईघर बनवाने की कल्पनाएं मेरे मन में उभरती रहती थीं. अपने मकान में गमलों में सजाने के लिए कई प्रकार के पेड़पौधों के नाम मैं ने लिख कर रख दिए थे.
एक दिन संदीप ने घर आ कर बतलाया कि उन्होंने एक भवन निर्माण कंपनी की मालकिन से अपने मकान के बारे में बात कर ली है. अब नक्शा बनवाने से ले कर मकान बनवाने तक की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं की होगी.
सब ने राहत की सांस ली. मकान बनवाने के लिए संदीप के पास कुल डेढ़दो लाख की जमापूंजी थी. घर के खर्चों में कटौती करकर के वर्षों में जा कर इतना रुपया जमा हो पाया था.
संदीप एक दिन मुझे भवन निर्माण कंपनी की मालकिन विनीता से मिलवाने ले गए.
मैं कुछ ही क्षणों में विनीता के मृदु स्वभाव, खूबसूरती और आतिथ्य से कुछ ऐसी प्रभावित हुई कि हम दोनों के बीच अदृश्य सा आत्मीयता का सूत्र बंध गया.
हम उन्हें अपने घर आने का औपचारिक निमंत्रण दे कर चले आए. मुझे कतई उम्मीद नहीं थी कि वह हमारे घर आ कर हमारा आतिथ्य स्वीकार करेंगी. लेकिन एक शाम आकस्मिक रूप से उन की चमचमाती विदेशी कार हमारे घर के सामने आ कर रुक गई. मैं संकोच से भर उठी कि कहां बैठाऊं इन्हें, कैसे सत्कार करूं.
विनीता शायद मेरे मन की हीन भावना भांप गई. मुसकरा कर स्वत: ही एक कुरसी पर बैठ गईं, ‘‘रेखाजी, क्या एक गिलास पानी मिलेगा.’’
मैं निद्रा से जागी. लपक कर रसोई- घर से पानी ले आई. फिर चाय की चुसकियों के साथ वार्त्तालाप का लंबा सिलसिला चल निकला. इस बीच बच्चे कालिज से आ गए थे, वे भी हमारी बातचीत में शामिल हो गए. फिर विनीता यह कह कर चली गईं, ‘‘मैं ने आप की पसंद को ध्यान में रख कर मकान के कुछ नक्शे बनवाए हैं. कल मेरे दफ्तर में आ कर देख लीजिएगा.’’
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विनीत के जाने के बाद मेरे मन में अनेक अनसुलझे प्रश्न डोलते रह गए थे कि उस का परिवार कैसा है? पति कहां हैं और क्या करते हैं? इन के संपन्न होने का रहस्य क्या है?
कभीकभी ऐसा लगता है कि मैं विनीता को जानती हूं. उन का चेहरा मुझे परिचित जान पड़ता, लेकिन बहुत याद करने पर भी कोई ऐसी स्मृति जागृत नहीं हो पाती थी.
कभी मैं सोचने लगती कि शायद अधिक आत्मीयता हो जाने की वजह से ऐसा लगता होगा. अगले दिन शाम को मैं और संदीप दोनों उन के दफ्तर में नक्शा देखने गए. एक नक्शा छांट कर संतुष्ट भाव से हम ने वैसा ही मकान बनवाने की अनुमति दे दी.
बातों ही बातों में संदीप कह बैठे, ‘‘रुपए की कमी के कारण शायद हम पूरा मकान एकसाथ नहीं बनवा पाएंगे.’’
विनीता झट आश्वासन देने लगीं, ‘‘आप निश्ंिचत रहिए. मैं ने आप का मकान बनवाने की जिम्मेदारी ली है तो पूरा बनवा कर ही रहूंगी. बाकी रुपए मैं अपनी जिम्मेदारी पर आप को कर्ज दिलवा दूंगी. आप सुविधानुसार धीरेधीरे चुकाते रहिए.’’
संदीप उन के एहसान के बोझ से दब से गए. मुझे विनीता और भी अपनी सी लगने लगीं.
नक्शा पास हो जाने के पश्चात मकान का निर्माण कार्य शुरू हो गया.
अब तक विनीता का हमारे यहां आनाजाना बढ़ गया था. अब वह खाली हाथ न आ कर बच्चों के लिए फल, मिठाइयां और कुछ अन्य वस्तुएं ले कर आने लगी थीं.
कुमुद भटनागर
‘‘शांत हो जाइए, पापा. हुआ तो गलत ही पर उसे सुधारने के लिए अब कुछ नहीं हो सकता,’’ श्रेया ने असहाय भाव से कहा.
‘‘बहुतकुछ हो सकता है यानी सब ठीक हो सकता है श्रेया, अगर तुम चाहो तो.’’
‘‘मैं समझी नहीं, पापा. मैं भला क्या कर सकती हूं?’’ श्रेया ने हैरानी से पूछा.
‘‘मेरी वंशबेल को बढ़ा सकती हो, मुझे मेरे खून का वारिस दे कर,’’ ब्रजेश ने आकुलता से कहा.
‘‘वह तो समय आने पर मिल ही जाएगा पापा,’’ श्रेया ने शरमा कर कहा.
‘‘गौतम का नहीं, मेरे अपने खून का वारिस, श्रेया,’’ ब्रजेश ने शब्दों पर जोर दिया, ‘‘जिसे मैं पापा की अंतिम इच्छानुसार अपने पुरखों की विरासत सौंप सकूं. पापा ने वसीयत में बगैर किसी शर्त के सारी जायदाद मेरे नाम कर दी है जिस का मैं कुछ भी कर सकता हूं. केवल उस व्यक्तिगत पत्र में अपनी इच्छा जाहिर की है जिस का मेरे सिवा किसी को कुछ पता नहीं है. लेकिन मैं ग्लानिवश न उस जायदाद का स्वयं उपयोग कर रहा हूं न गीता और गौतम को करने दूंगा. उस का उपयोग केवल पापा के खून का वह असली वारिस करेगा जो दुनिया की नजरों में तो गौतम की पहली संतान होगी पर वास्तव में वह मेरी…ब्रजेश की होगी. गौतम की उस पहली संतान के नाम हर्षावेग में आ कर अपनी पुश्तैनी जायदाद करने पर किसी को न शक होगा न कुछ पता चलेगा.’’
ब्रजेश की बात का मतलब समझ आते ही श्रेया सिहर गई. इतनी घिनौनी, इतनी अनैतिक बात पापा जैसा संभ्रांत व्यक्ति कैसे कर सकता है? तो यह वजह थी पापा का उस पर इतना स्नेह लुटाने की? अच्छा सिला दे रहे थे पापा गौतम के प्यार और विश्वास का? लेकिन वह तो गौतम से विश्वासघात नहीं कर सकती, मगर गौतम को पापा की कलुषित भावनाओं के बारे में बताए भी तो कैसे? अव्वल तो गौतम इस बात पर विश्वास ही नहीं करेगा और करने पर सदमा बरदाश्त नहीं कर पाएगा…तो फिर क्या करे वह?
‘‘घबराओ मत श्रेया, न तो मैं तुम से जोरजबरदस्ती करूंगा और न ही कोई अश्लील या अनैतिक हरकत,’’ ब्रजेश ने समझाने के मकसद से कोमल स्वर में कहा, ‘‘मेरे पास इस समस्या का बहुत ही सरल समाधान है. बस, तुम्हें थोड़ी सी सतर्कता और गोपनीयता रखनी होगी. तुम ने स्पर्म ट्रांसप्लांट यानी आईवीएफ तकनीक के बारे में सुना होगा? जी, पापा सुना है.’’
श्रेया का स्वर कांप गया. पूर्णतया सक्षम पति के रहते किसी अन्य के वीर्य को अपनी कोख में रखने का विचार मात्र ही असहनीय था. लेकिन ब्रजेश की कातरता और विवशता, गौतम के लिए असीम मोह, गौतम का ब्रजेश से लगाव और उस के प्रति कृतज्ञता उसे बाध्य कर रही थी कि वह अपनी भावनाओं को कुचल कर, ब्रजेश की वंशबेल को हरीभरी रखे. इस के सिवा उस के पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था. ब्रजेश को मना कर सकती थी लेकिन उस के बाद अगर वे उदास या व्यथित रहने लगे तो स्वाभाविक है उन पर जान छिड़कने वाला गौतम भी परेशान रहने लगेगा और एक खुशहाल परिवार अवसादग्रस्त हो जाएगा.
‘‘डा. अवस्थी मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं, उन के क्लीनिक में सबकुछ बहुत सावधानी से हो सकता है,’’ ब्रजेश ने कहा.
‘‘तो करवा लीजिए, पापा. आप जब कहेंगे मैं वहां चली जाऊंगी,’’ श्रेया ने दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘चलिए, वापस चलते हैं. आप की क्लास का समय हो रहा है.’’
ब्रजेश ने विस्फारित नेत्रों से श्रेया को देखा. उन्होंने बहुत पौराणिक कथाएं पढ़ रखी थीं लेकिन जो श्रेया करने जा रही थी ऐसा तो उन काल्पनिक कथाओं की किसी भी नायिका ने कभी नहीं किया था. हाईपरसैंसिटिव और ईगोइस्ट ससुर की व्हिम्ज का दंश भोगने वाली श्रेया शायद पहली आधुनिक कर्तव्यनिष्ठ पुत्रवधू व पत्नी थी.