New Year 2022: नई जिंदगी की शुरुआत

फूलमनी जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही बुतरू के स्टाइल पर फिदा हो गई. प्यार के झांसे में आ कर एक दिन बिना सोचेसमझे वह अपना घर छोड़ उस के साथ शहर भाग आई. शादीशुदा जिंदगी क्या होती है, दोनों ही इस का ककहरा भी नहीं जानते थे. भाग कर शहर तो आ गए, लेकिन बुतरू कोई काम ही नहीं करना चाहता था. वह बस्ती के बगल वाली सड़क पर दिनभर हंडि़या बेचने वाली औरतों के पास निठल्ला बैठा बातें करता और हंडि़या पीता रहता था. इसी तरह दिन महीनों में बीत गए और खाने के लाले पड़ने लगे.

फूलमनी कब तक बुतरू के आसरे बैठे रहती. उस ने अगल बगल की औरतों से दोस्ती गांठी. उन्होंने फूलमनी को ठेकेदारी में रेजा का काम दिलवा दिया. वह काम करने जाने लगी और बुतरू घर संभालने लगा. जल्द ही दोनों का प्यार छूमंतर हो गया.

बुतरू दिनभर घर में अकेला बैठा रहता. शाम को जब फूलमनी काम से घर लौटती, वह उस से सारा पैसा छीन लेता और गालीगलौज पर आमादा हो जाता, ‘‘तू अब आ रही है. दिनभर अपने भरतार के घर गई थी पैसा कमाने… ला दे, कितना पैसा लाई है…’’

फूलमनी दिनभर ठेकेदारी में ईंटबालू ढोतेढोते थक कर चूर हो जाती. घर लौट कर जमीन पर ही बिना हाथमुंह धोए, बिना खाना खाए लेट जाती. ऊपर से शराब के नशे में चूर बुतरू उस के आराम में खलल डालते हुए किसी भी अंग पर बेधड़क हाथ चला देता. वह छटपटा कर रह जाती.

एक तो हाड़तोड़ मेहनत, ऊपर से बुतरू की मार खाखा कर फूलमनी का गदराया बदन गलने लगा था. तरहतरह के खयाल उस के मन में आते रहते. कभी सोचती, ‘कितनी बड़ी गलती की ऐसे शराबी से शादी कर के. वह जवानी के जोश में भाग आई. इस से अच्छा तो वह सुखराम मिस्त्री है. उम्र में बुतरू से थोड़ा बड़ा ही होगा, पर अच्छा आदमी है. कितने प्यार से बात करता है…’

सुखराम फूलमनी के साथ ही ठेकेदारी में मिस्त्री का काम करता था. वह अकेला ही रहता था. पढ़ालिखा तो नहीं था, पर सोचविचार का अच्छा था. सुबहसवेरे नहाधो कर वह काम पर चला आता. शाम को लौट कर जो भी सुबह का पानीभात बचा रहता, उसे प्यार से खापी कर सो जाता.

शनिवार को सुखराम की खूब मौज रहती. उस दिन ठेकेदार हफ्तेभर की मजदूरी देता था. रविवार को सुखराम अपने ही घर में मुरगा पकाता था. मौजमस्ती करने के लिए थोड़ी शराब भी पी लेता और जम कर मुरगा खाता.

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फूलमनी से सुखराम की नईनई जानपहचान हुई थी. एक रविवार को उस ने फूलमनी को भी अपने घर मुरगा खाने के लिए बुलाया, पर वह लाज के मारे नहीं गई.

साइट पर ठेकेदार का मुंशी सुखराम के साथ फूलमनी को ही भेजता था. सुखराम जब बिल्डिंग की दीवारें जोड़ता, तो फूलमनी फुरती दिखाते हुए जल्दीजल्दी उसे जुगाड़ मसलन ईंटबालू देती जाती थी.

सुखराम को बैठने की फुरसत ही नहीं मिलती थी. काम के समय दोनों की जोड़ी अच्छी बैठती थी. काम करते हुए कभीकभी वे मजाक भी कर लिया करते थे. लंच के समय दोनों साथ ही खाना खाते. खाना भी एकदूसरे से साझा करते. आपस में एकदूसरे के सुखदुख के बारे में भी बतियाते थे.

एक दिन मुंशी ने सुखराम के साथ दूसरी रेजा को काम पर जाने के लिए भेजा, तो सुखराम उस से मिन्नतें करने लगा कि उस के साथ फूलमनी को ही भेज दे.

मुंशी ने तिरछी नजरों से सुखराम को देखा और कहा, ‘‘क्या बात है सुखराम, तुम फूलमनी को ही अपने साथ क्यों रखना चाहते हो?’’

सुखराम थोड़ा झेंप सा गया, फिर बोला ‘‘बाबू, बात यह है कि फूलमनी मेरे काम को अच्छी तरह समझती है कि कब मुझे क्या जुगाड़ चाहिए. इस से काम करने में आसानी होती है.’’

‘‘ठीक है, तुम फूलमनी को अपने साथ रखो, मुझे कोई एतराज नहीं है. बस, काम सही से होना चाहिए… लेकिन, आज तो फूलमनी काम पर आई नहीं है. आज तुम इसी नई रेजा से काम चला लो.’’

झक मार कर सुखराम ने उस नई रेजा को अपने साथ रख लिया, मगर उस से उस के काम करने की पटरी नहीं बैठी, तो वह भी लंच में सिरदर्द का बहाना बना कर हाफ डे कर के घर निकल गया. दरअसल, फूलमनी के नहीं आने से उस का मन काम में नहीं लग रहा था.

दूसरे दिन सुखराम ने बस्ती जा कर फूलमनी का पता लगाया, तो मालूम हुआ कि बुतरू ने घर में रखे 20 किलो चावल बेच दिए हैं. फूलमनी से उस का खूब झगड़ा हुआ है. गुस्से में आ कर बुतरू ने उसे इतना मारा कि वह बेहोश हो गई. वह तो उसे मारे ही जा रहा था, पर बस्ती के लोगों ने किसी तरह उस की जान बचाई.

सुखराम ने पड़ोस में पूछा, ‘‘बुतरू अभी कहां है?’’

किसी ने बताया कि वह शराब पी कर बेहोश पड़ा है. सुखराम हिम्मत कर के फूलमनी के घर गया. चौखट पर खड़े हो कर आवाज दी, तो फूलमनी आवाज सुन कर झोंपड़ी से बाहर आई. उस का चेहरा उतरा हुआ था.

सुखराम से उस की हालत देखी न गई. वह परेशान हो गया, लेकिन कर भी क्या सकता था. उस ने बस इतना ही पूछा, ‘‘क्या हुआ, जो 2 दिन से काम पर नहीं आ रही हो?’’

दर्द से कराहती फूलमनी ने कहा, ‘‘अब इस चांडाल के साथ रहा नहीं जाता सुखराम. यह नामर्द न कुछ करता है और न ही मुझे कुछ करने देता है. घर में खाने को चावल का एक दाना तक नहीं छोड़ा. सारे चावल बेच कर शराब पी गया.’’

‘‘जितना सहोगी उतना ही जुल्म होगा तुम पर. अब मैं तुम से क्या कहूं. कल काम पर आ जाना. तुम्हारे बिना मेरा मन नहीं लगता है,’’ इतना कह कर सुखराम वहां से चला आया.

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सुखराम के जाने के बाद बहुत देर तक फूलमनी के मन में यह सवाल उठता रहा कि क्या सचमुच सुखराम उसे चाहता है? फिर वह खुद ही लजा गई. वह भी तो उसे चाहने लगी है. कुछ शब्दों के एक वाक्य ने उस के मन पर इतना गहरा असर किया कि वह अपने सारे दुखदर्द भूल गई. उसे ऐसा लगने लगा, जैसे सुखराम उसे साइकिल के कैरियर पर बैठा कर ऐसी जगह लिए जा रहा है, जहां दोनों का अपना सुखी संसार होगा. वह भी पीछे मुड़ कर देखना नहीं चाह रही थी. बस आगे और आगे खुले आसमान की ओर देख रही थी.

अचानक फूलमनी सपनों के संसार से लौट आई. एक गहरी सांस भरी कि काश, ऐसा बुतरू भी होता. कितना प्यार करती थी वह उस से. उस की खातिर अपने मांबाप को छोड़ कर यहां भाग आई और इस का सिला यह मिल रहा है. आंखों से आंसुओं की बूंदें टपक आईं. बुतरू का नाम आते ही उस का मन फिर कसैला हो गया.

अगले दिन सुबहसवेरे फूलमनी काम पर आई, तो उसे देख कर सुखराम का मन मयूर नाच उठा. काम बांटते समय मुंशी ने कहा, ‘‘सुखराम के साथ फूलमनी जाएगी.’’

साइट पर सुखराम आगेआगे अपने औजार ले कर चल पड़ा, पीछेपीछे फूलमनी पाटा, बेलचा, सीमेंट ढोने वाला तसला ले कर चल रही थी.

सुखराम ने पीछे घूम कर फूलमनी को एक बार फिर देखा. वह भी उसे ही देख रही थी. दोनों चुप थे. तभी सुखराम ने फूलमनी से कहा, ‘‘तुम ऐसे कब तक बुतरू से पिटती रहोगी फूलमनी?’’

‘‘देखें, जब तक मेरी किस्मत में लिखा है,’’ फूलमनी बोली.

‘‘तुम छोड़ क्यों नहीं देती उसे?’’ सुखराम ने सवाल किया.

‘‘फिर मेरा क्या होगा?’’

‘‘मैं जो तुम्हारे साथ हूं.’’

‘‘एक बार तो घर छोड़ चुकी हूं और कितनी बार छोडंू? अब तो उसी के साथ जीना और मरना है.’’

‘‘ऐसे निकम्मे के हाथों पिटतेपिटाते एक दिन तुम्हारी जान चली जाएगी फूलमनी. क्या तुम मेरा कहा मानोगी?’’

‘‘बोलो…’’

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‘‘बुतरू एक जोंक की तरह है, जो तुम्हारे बदन को चूस रहा है. कभी आईने में तुम ने अपनी शक्ल देखी है. एक बार देखो. जब तुम पहली बार आई थीं, कैसी लगती थीं. आज कैसी लग रही हो. तुम एक बार मेरा यकीन कर के मेरे साथ चलो. हमारी अपनी प्यार की दुनिया होगी. हम दोनों इज्जत से कमाएंगेखाएंगे.’’

बातें करतेकरते दोनों उस जगह पहुंच चुके थे, जहां उन्हें काम करना था. आसपास कोई नहीं था. वे दोनों एकदूसरे की आंखों में समा चुके थे.

New Year 2022: नई जिंदगी- भाग 1: क्यों सुमित्रा डरी थी

लेखक-अरुणा त्रिपाठी

कई बार इनसान की मजबूरी उस के मुंह पर ताला लगा देती है और वह चाह कर भी नहीं कह पाता जो कहना चाहता है. सुमित्रा के साथ भी यही था. घर की जरूरतों के अलावा कम उम्र के बच्चों के भरणपोषण का बोझ उन की सोच पर परदा डाले हुए था. वह अपनी शंका का समाधान बेटी से करना चाहती थीं पर मन में कहीं डर था जो बहुत कुछ जानसमझ कर भी उन्हें नासमझ बनाए हुए था.

पति की असामयिक मौत ने उन की कमर ही तोड़ दी थी. 4 छोटे बच्चों व 1 सयानी बेटी का बोझ ले कर वह किस के दरवाजे पर जाएं. उन की बड़ी बेटी कल्पना पर ही घर का सारा बोझ आ पड़ा था. उन्होंने साल भर के अंदर बेटी के हाथ पीले करने का विचार बनाया था क्योंकि बेटी कल्पना को कांस्टेबल की नौकरी मिल गई थी. आज बेटी की नौकरी न होती तो सुमित्रा के सामने भीख मांगने की नौबत आ गई होती.

बच्चे कभी स्कूल फीस के लिए तो कभी यूनीफार्म के लिए झींका करते और सुमित्रा उन पर झुंझलाती रहतीं, ‘‘कहां से लाऊं इतना पैसा कि तुम सब की मांग पूरी करूं. मुझे ही बाजार में ले जाओ और बेच कर सब अपनीअपनी इच्छा पूरी कर लो.’’

कल्पना कितनी बार घर में ऐसे दृश्य देख चुकी थी. आर्थिक तंगी के चलते आएदिन चिकचिक लगी रहती. उस की कमाई से दो वक्त की रोटी छोड़ खर्च के लिए बचता ही क्या था. भाई- बहनों के सहमेसहमे चेहरे उस की नींद उड़ा देते थे और वह घंटों बिस्तर पर पड़ी सोचा करती थी.

कल्पना की ड्यूटी गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पर थी. वह रोज देखती कि उस के साथी सिपाही किस प्रकार से सीधेसादे यात्रियों को परेशान कर पैसा ऐंठते थे. ट्रेन से उतरने के बाद सभी को प्लेटफार्म से बाहर जाने की जल्दी रहती है. बस, इसी का वे वरदी वाले पूरा लाभ उठा रहे थे.

‘‘कोई गैरकानूनी चीज तो नहीं है. खोलो अटैची,’’ कह कर हड़काते और सीधेसादे यात्री खोलनेदिखाने और बंद करने की परेशानी से बचने के लिए 10- 20 रुपए का नोट आगे कर देते. सिपाही मुसकरा देते और बिना जांचेदेखे आगे बढ़ जाने देते.

यदि कोई पैसे देने में आनाकानी करता, कानून की बात करता तो वे उस की अटैची, सूटकेस खोल कर सामान इस कदर इधरउधर सीढि़यों पर बिखेर देते कि उसे समेट कर रखने में भी भारी असुविधा होती और दूसरे यात्रियों को एक सबक मिल जाता.

ऐसे ही एक युवक का हाथ एक सिपाही ने पकड़ा जो होस्टल से आ रहा था. सिपाही ने कहा, ‘‘अपना सामान खोलो.’’

लड़का किसी वीआईपी का था, जिसे सी.आई.एस.एफ. की सुरक्षा प्राप्त थी. इस से पहले कि लड़का कुछ बोलता उस के पिता के सुरक्षादल के इंस्पेक्टर ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘अरे, यह मेरे साहब का लड़का है.’’

तुरंत सिपाही के हाथों की पकड़ ढीली हो गई और वह बेशर्मी से हंस पड़ा. एक बुजुर्ग यह कहते हुए निकल गए, ‘‘बरखुरदार, आज रिश्वतखोरी में नौकरी से हाथ धो बैठते.’’

कल्पना यह सबकुछ देख कर चकित रह गई लेकिन उस सिपाही पर इस का कुछ असर नहीं पड़ा था. उस ने वह वैसे ही अपना धंधा चालू रखा था. जाहिर है भ्रष्ट कमाई का जब कुछ हिस्सा अधिकारी की जेब में जाएगा तो मातहत बेखौफ तो काम करेगा ही.

कल्पना का जब भी अपनी मां सुमित्रा से सामना होता, वह नजरें नहीं मिलाती बल्कि हमेशा अपने को व्यस्त दर्शाती. उस के चेहरे की झुंझलाहट मां की प्रश्न भरी नजरों से उस को बचाने में सफल रहती और सुमित्रा चाह कर भी कुछ पूछने का साहस नहीं कर पातीं.

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कमाऊ बेटी ने घर की स्थिति को पटरी पर ला दिया था. रोजरोज की परेशानी और दुकानदार से उधार को ले कर तकरार व कहासुनी से सुमित्रा को राहत मिल गई थी. उसे याद आता कि जब कभी दुकानदार पिछले कर्ज को ले कर पड़ोसियों के सामने फजीहत करता, वह शर्म से पानीपानी हो जाती थीं पर छोटेछोटे बच्चों के लिए तमाम लाजशर्म ताक पर रख उलटे  हंसते हुए कहतीं कि अगली बार उधार जरूर चुकता कर दूंगी. दुकानदार एक हिकारत भरी नजर डाल कर इशारा करता कि जाओ. सुमित्रा तकदीर को कोसते घर पहुंचतीं और बाहर का सारा गुस्सा बच्चों पर उतार देती थीं.

आज उन को इस शर्मिंदगी व झुंझलाहट से नजात मिल गई थी. कल्पना ने घर की काया ही पलट दी थी. उन्हें बेटी पर बड़ा प्यार आता. कुछ समय तक तो उन का ध्यान इस ओर नहीं गया कि परिस्थिति में इतना आश्चर्यजनक बदलाव इतनी जल्दी कैसे और क्यों आ गया किंतु धीरेधीरे उन के मन में कुछ शंका हुई. कई दिनों तक अपने से सवालजवाब करने की हिम्मत बटोरी उन्होंने और से पूछा, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता कल्पना बेटी कि तुम दिन की ड्यूटी के बाद फिर रात को क्यों जाती हो…’’

अभी सुमित्रा की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कल्पना ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, ‘‘मां, मैं डबल ड्यूटी करती हूं. और कुछ पूछना है?’’

कल्पना ने यह बात इतने रूखे और तल्ख शब्दों में कही कि वह चुप हो गईं. चाह कर भी आगे कुछ न पूछ पाईं और कल्पना अपना पर्स उठा कर घर से निकल गई. हर रोज का यह सिलसिला देख एक दिन सुमित्रा का धैर्य टूट गया. कल्पना आधी रात को लौटी तो वह ऊंचे स्वर में बोलीं, आखिर ऐसी कौन सी ड्यूटी है जो आधी रात बीते घर लौटती हो. मैं दिन भर घर के काम में पिसती हूं, रात तुम्हारी चिंता में चहलकदमी करते बिताती हूं.

मां की बात सुन कर कल्पना का प्रेम उन के प्रति जाग उठा था पर फिर पता नहीं क्या सोच कर पीछे हट गई, मानो मां के निकट जाने का उस में साहस न हो.

‘‘मां, तुम से कितनी बार कहा है कि मेरे लिए मत जागा करो. एक चाबी मेरे पास है न. तुम अंदर से लाक कर के सो जाया करो. मैं जब ड्यूटी से लौटूंगी, खुद ताला खोल कर आ जाया करूंगी.’’

‘‘पहले तुम अपनी शक्ल शीशे में देखो, लगता है सारा तेज किसी ने चूस लिया है,’’ सुमित्रा बेहद कठोर लहजे में बोलीं.

कल्पना के भीतर एक टीस उठी और वह अपनी मां के कहे शब्दों का विरोध न कर सकी.

सुबह का समय था. पक्षियों की चहचहाहट के साथ सूर्य की किरणों ने अपने रंग बिखेरे. सुमित्रा का पूरा परिवार आंगन में बैठा चाय पी रहा था. उन की एक पड़ोसिन भी आ गई थीं. कल्पना को देख वह बोली, ‘‘अरे, बिटिया, तुम तो पुलिस में सिपाही हो, तुम्हारी बड़ी धाक होगी. तुम ने तो अपने घर की काया ही पलट दी. तुम्हें कितनी तनख्वाह मिलती है?’’

कल्पना ऐसे प्रश्नों से बचना चाहती थी. इस से पहले कि वह कुछ बोलती उस की छोटी बहन ने अपनी दीदी की तनख्वाह बढ़ाचढ़ा कर बता दी तो घर के बाकी लोग खिलखिला कर हंस दिए और बात आईगई हो गई.

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सुमित्रा बड़ी बेटी की मेहनत को देख कर एक अजीब कशमकश में जी रही थीं. इस मानसिक तनाव से बचने के लिए सुमित्रा ने सिलाई का काम शुरू कर दिया पर बडे़ घरों की औरतें अपने कपड़े सिलने को न देती थीं और मजदूर घरों से पर्याप्त सिलाई न मिलती इसलिए उन्होंने दरजी की दुकानों से तुरपाई के लिए कपडे़ लाना शुरू कर दिया. शुरुआत में हर काम में थोड़ीबहुत कठिनाई आती है सो उन्हें भी संघर्ष करना पड़ा.

जैसेजैसे सुमित्रा की बाजार में पहचान बनी वैसेवैसे उन का काम भी बढ़ता गया. अब उन्हें घर पर बैठे ही आर्डर मिलने लगे तो उन्होंने अपनी एक टेलरिंग की दुकान खोल ली.

5 सालों के संघर्ष के बाद सुमित्रा को दुकान से अच्छीखासी आय होने लगी. अब उन्हें दम मारने की भी फुरसत नहीं मिलती. कई कारीगर दुकान पर अपना हाथ बंटाने के लिए रख लिए थे.

New Year 2022- नई जिंदगी: क्यों सुमित्रा डरी थी

अनुपमा के सामने खुलेगा अनुज के अतीत का राज, क्या वनराज चलेगा नई चाल?

रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly), सुधांशु पांडे (Sudhanshu Pandey) स्टारर  सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupama) में इन दिनों लगातार ट्विस्ट दिखाया जा रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि शाह हाउस में क्रिसमस सेलीब्रेट किया जा रहा है. इस पार्टी में मालविका बापूजी से कहती है कि अनुपमा को वह भाभी कहना चाहती है. वे अनुज-अनुपमा की शादी करवा दें. ऐसे में अनुपमा मालविक को टोक देती है और वह नाराज होकर चली जाती है. लेकिन अनुपमा मालविका को मना कर शाह हाउस वापस लाती है.शो के अपकमिंग एपिसोड में बड़ा ट्विस्ट आने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो में दिखाया जाएगा कि बापूजी और गोपी काका अनुपमा से बात करेंगे. वह कहेंगे कि अनुपमा को अनुज से अपने दिल की बात कह देना चाहिए. इसके बाद अनुपमा भी मन बनाती है कि वह अनुज को बता देगी कि वह भी उससे प्यार करती है.

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इसी बीच यहां पार्टी में एक गेम होगा, जिसमें सबको आंखों पर पट्टी बांधकर, किसी के गले में माला डालकर, एक दूसरे से कुछ मांगना है. ऐसे में अनुपमा, अनुज से कहेगी कि वह तैयार रहे क्योंकि वह माला उसके गले में डालकर कुछ मांगने वाली है. इसके जवाब में अनुज कहेगा कि वह दिल तो पहले ही दे चुका है अब अनुपमा को क्या चाहिए.

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शो के आने वाले एपिसोड में आप देखेंगे कि अनुज मालविका को एक ऐसा सच बताएगा जिसे सुनकर सब शॉक्ड हो जाएंगे. अनुज बताएगा कि वह अपने पेरेंट्स का गोद लिया हुआ बच्चा है. अनुज मालविका का  सगा भाई नहीं है. कपाड़िया परिवार की असली वारिस मालविका है. अनुपमा और मालविका के सामने जल्द ही ये सच सामने आएगा.

 

शो में अब ये देखना होगा कि अनुज का अतीत सामने आने के बाद वनराज मालविका के साथ पार्टनरशिप को लेकर कोई नई चाल चलेगा?

गुम है किसी के प्यार में की पाखी-विराट निकले हनीमून मनाने, देखें Photos

सीरियल गुम है किसी के प्यार में स्टार ऐश्वर्या शर्मा और नील भट्ट  कुछ दिन पहले ही शादी के बंधन में बंधे हैं. ऐसे में कपल को इंतजार था क्वालिटी टाइम स्पेन्ड करने का. और अब ये कपल अपना हनीमून और न्यू ईयर सेलीब्रेट करने के लिए वेकेशन पर जा चुके हैं. जी हां आपके चहिते सितारे पाखी-विराट हनीमून मनाने के लिए  निकल चुके हैं. आइए आपको दिखाते हैं पाखी-विराट के हनीमून की फोटोज.

ऐश्वर्या शर्मा और नील भट्ट लगातार अपने वेकेशन की फोटोज फैंस के साथ शेयर कर रहे हैं. ये कपल राजस्थान के जैसलमेर पहुंच गए हैं. यहां पर ये कपल एक-दूसरे के साथ समय बिता रहे हैं. ये दोनों नये साल का भी स्वागत राजस्थान में ही करेंगे. ऐश्वर्या शर्मा और नील भट्ट जैसलमेर में अपने वेकेशन को एंजॉय कर रहे हैं.

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सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया है, इस वीडियो में ऐश्वर्या शर्मा और नील भट्ट ठंड से ठिठुरते नजर आ रहे हैं. एक फोटो में नील भट्ट अपनी पत्नी को गले लगाते नजर आ रहे हैं. ये फोटो फैंस को काफी पसंद आ रहा है.

 

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आधी रात को ऐश्वर्या शर्मा और नील भट्ट एक साथ राजस्थानी फोक डांस एंजॉय करते नजर आए. ऐश्वर्या शर्मा और नील भट्ट ने अपनी कुछ रोमांटिक फोटोज भी शेयर की हैं. इन तस्वीरों में ये दोनों रोमांटिक अंदाज में नजर आ रहे हैं.

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गुम है किसी के प्यार में की कहानी में जल्द ही दिखाया जाएगा कि सई चौहान हाउस छोड़ देगी. वह विराट से दूर चली जाएगी और लखनऊ में अपना घर बसाएगी. यहां पर सई की मुलाकात एक नए परिवार से होने वाली है. ऐसे में ये देखना होगा कि क्या विराट सई को मना पाएगा?

बस तुम्हारी हां की देर है: भाग 3

तुम सब को तो जेल होगी ही और तुम्हारा बाप, उसे तो फांसी न दिलवाई मैं ने तो मेरा भी नाम मनोहर नहीं,’’ बोलतेबोलते मनोहर का चेहरा क्रोध से लाल हो गया.

मनोहर की बातें सुन कर सब के होश उड़ गए, क्योंकि झूठे और गुनहगार तो वे लोग थे ही अत: दिन में ही तारे नजर आने लगे उन्हें.

‘‘क्या सोच रहे हो रोको उसे. अगर वह पुलिस में चला गया तो हम में से कोई नहीं बचेगा और मुझे फांसी पर नहीं झूलना.’’ अपना पसीना पोछते हुए नीलेश के पिता ने कहा.

उन लोगों को लगने लगा कि अगर यह बात पुलिस तक गई तो इज्जत तो जाएगी ही, उन का जीवन भी नहीं बचेगा. बहुत गिड़गिड़ाने पर कि वे जो चाहें उन से ले लें, जितने मरजी थप्पड़ मार लें, पर पुलिस में न जाएं.

‘कहीं पुलिसकानून के चक्कर में उन की बेटी का भविष्य और न बिगड़ जाए,’ यह सोच कर मनोहर को भी यही सही लगा, लेकिन उन्होंने उन के सामने यह शर्त रखी कि नीलेश दिव्या को जल्द से जल्द तलाक दे कर उसे आजाद कर दे.

मरता क्या न करता. बगैर किसी शर्त के नीलेश ने तलाक के पेपर साइन कर दिए, पहली सुनवाई में ही फैसला हो गया.

वहां से तो दिव्या आजाद हो गई, लेकिन एक अवसाद से घिर गई. जिंदगी पर से उस का विश्वास उठ गया. पूरा दिन बस अंधेरे कमरे में पड़ी रहती. न ठीक से कुछ खाती न पीती और न ही किसी से मिलतीजुलती. ‘कहीं बेटी को कुछ हो न जाए, कहीं वह कुछ कर न ले,’ यह सोचसोच कर मनोहर और नूतन की जान सूखती रहती. बेटी की इस हालत का दोषी वे खुद को ही मानने लगे थे. कुछ समझ नहीं आ रहा था उन्हें कि क्या करें जो फिर से दिव्या पहले की तरह हंसनेखिलखिलाने लगे. अपनी जिंदगी से उसे प्यार हो जाए.

‘‘दिव्या बेटा, देखो तो कौन आया है,’’ उस की मां ने लाइट औन करते हुए कहा तो उस ने नजरें उठा कर देखा पर उस की आंखें चौंधिया गईं. हमेशा अंधेरे में रहने और एकाएक लाइट आंखों पर पड़ने के कारण उसे सही से कुछ नहीं दिख रहा था, पर जब उस ने गौर से देखा तो देखती रह गई, ‘‘अक्षत,’’ हौले से उस के मुंह से निकला.

नूतन और मनोहर जानते थे कि कभी दिव्या और अक्षत एकदूसरे से प्यार करते थे पर कह नहीं पाए. शायद उन्हें बोलने का मौका ही नहीं दिया और खुद ही वे उस की जिंदगी का फैसला कर बैठे. ‘लेकिन अब अक्षत ही उन की बेटी के होंठों पर मुसकान बिखेर सकता था. वही है जो जिंदगी भर दिव्या का साथ निभा सकता है,’ यह सोच कर उन्होंने अक्षत को उस के सामने ला कर खड़ा कर दिया.

बहुत सकुचाहट के बाद अक्षत ने पूछा, ‘‘कैसी हो दिव्या?’’ मगर उस ने कोई जवाब

नहीं दिया. ‘‘लगता है मुझे भूल गई? अरे मैं अक्षत हूं अक्षत…अब याद आया?’’ उस ने उसे हंसाने के इरादे से कहा पर फिर भी उस ने कोई जवाब नहीं दिया.

धीरेधीरे अक्षत उसे पुरानी बातें, कालेज के दिनों की याद दिलाने लगा. कहने लगा कि कैसे वे दोनों सब की नजरें बचा कर रोज मिलते थे. कैसे कैंटीन में बैठ कर कौफी पीते थे. अक्षत उसे उस के दुख भरे अतीत से बाहर लाने की कोशिश कर रहा था, पर दिव्या थी कि बस शून्य में ही देखे जा रही थी.

दिव्या की ऐसी हालत देख कर अक्षत की आंखों में भी आंसू आ गए. कहने लगा, ‘‘आखिर तुम्हारी क्या गलती है दिव्या जो तुम ने अपनेआप को इस कालकोठरी में बंद कर रखा है? ऐसा कर के क्यों तुम खुद को सजा दे रही हो? क्या अंधेरे में बैठने से तुम्हारी समस्या हल हो जाएगी या जिसने तुम्हारे साथ गलत किया उसे सजा मिल जाएगी, बोलो?’’

‘‘तो मैं क्या करूं अक्षत, क्या कंरू मैं? मैं ने तो वही किया न जो मेरे मम्मीपापा ने चाहा, फिर क्या मिला मुझे?’’ अपने आंसू पोंछते हुए दिव्या कहने लगी. उस की बातें सुन कर नूतन भी फफकफफक कर रोने लगीं.

दिव्या का हाथ अपनी दोनों हथेलियों में दबा कर अक्षत कहने लगा, ‘‘ठीक है, कभीकभी हम से गलतियां हो जाती हैं. लेकिन इस का यह मतलब तो नहीं है कि हम उन्हीं गलतियों को ले कर अपने जीवन को नर्क बनाते रहें… जिंदगी हम से यही चाहती है कि हम अपने उजाले खुद तय करें और उन पर यकीन रखें. जस्ट बिलीव ऐंड विन. अवसाद और तनाव के अंधेरे को हटा कर जीवन को खुशियों के उजास से भरना कोई कठिन काम नहीं है, बशर्ते हम में बीती बातों को भूलने की क्षमता हो.

‘‘दिव्या, एक डर आ गया है तुम्हारे अंदर… उस डर को तुम्हें बाहर निकालना होगा. क्या तुम्हें अपने मातापिता की फिक्र नहीं है कि उन पर क्या बीतती होगी, तुम्हारी ऐसी हालत देख कर. अरे, उन्होंने तो तुम्हारा भला ही चाहा था न… अपने लिए, अपने मातापिता के लिए,

तुम्हें इस गंधाते अंधेरे से निकलना ही होगा दिव्या…’’

अक्षत की बातों का कुछकुछ असर होने लगा था दिव्या पर. कहने लगी, ‘‘हम अपनी खुशियां, अपनी पहचान, अपना सम्मान दूसरों से मांगने लगते हैं. ऐसा क्यों होता है अक्षत?’’

‘‘क्योंकि हमें अपनी शक्ति का एहसास नहीं होता. अपनी आंखें खोल कर देखो गौर से…तुम्हारे सामने तुम्हारी मंजिल है,’’ अक्षत की बातों ने उसे नजर उठा कर देखने पर मजबूर कर दिया. जैसे वह कह रहा हो कि दिव्या, आज भी मैं उसी राह पर खड़ा तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं, जहां तुम मुझे छोड़ कर चली गई थी. बस तुम्हारी हां की देर है दिव्या. फिर देखो कैसे मैं तुम्हारी जिंदगी खुशियों से भर दूंगा.

अक्षत के सीने से लग दिव्या बिलखबिलख कर रो पड़ी जैसे सालों का गुबार निकल रहा हो उस की आंखों से बह कर. अक्षत ने भी उसे रोने दिया ताकि उस के सारे दुखदर्द उन आंसुओं के सहारे बाहर निकल जाएं और वह अपने डरावने अतीत से बाहर निकल सके.

बाहर खड़े मनोहर और नूतन की आंखों से भी अविरल आंसू बहे जा रहे थे पर आज ये खुशी के आंसू थे.

गहरी पैठ

लोकतंत्र का मतलब होता है कि सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्यों की या फिर पंचायतों की ही क्यों न हो, जनता की जरूरत के हिसाब से जनता की राय से कानून व नियम बनाए जाने चाहिए. नरेंद्र मोदी की सरकार जिस दिन से सत्ता में आई है उसे लगा है कि उसे तो सारी ताकत हिंदू देवीदेवताओं ने दी है जिन के बखान पुराणों में भरे हैं जो जनता तो दूर, राजाओं तक के लिए आदेश बनाते रहते थे, बिना किसी से पूछे और बिना यह सोचे कि यह कितना गलत होगा.

नरेंद्र मोदी ने रातोंरात नोटबंदी का फैसला लिया, बिना किसी से पूछ के, बिना जरूरत के. बिना सहमति के जीएसटी थोपा. बिना पूरी तरह बात किए कश्मीर में 370 अनुच्छेद में हेरफेर किया. बिना जांचेपरखे जनवरी, 2020 में कह डाला कि उन्होंने कोविड पर जीत हासिल कर ली, और, बिना राय लिए, बिना जरूरत के, किसानों की रोजीरोटी छीनने वाले 3 कृषि कानून आननफानन में पहले और्डिनैंस से और फिर संसद से पास करा लिए.

पहली बार जनता इस धौंस के खिलाफ खड़ी हुई. बुरी तरह से मार खाने के बाद भी किसान लगभग पूरे साल दिल्ली के चारों ओर बैठे रहे. उन्होंने पानी की बौछारें सहीं, गालियां सुनीं, मोदीभक्त मीडिया ने उन्हें देशद्रोही, खालिस्तानी, अमीर किसान, विदेशियों की सुनने वाला बताया पर वे टिके रहे. भाजपा के नेताओं की हिम्मत तो उन से जिरह करने की नहीं हुई, पर भाजपा भक्त टीवी चैनलों ने जम कर नेताओं से ऐसे जिरह की मानो वे अपराधी हों, गुनाहगार हों.

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किसान न केवल जमीनों, मंडियों और अनाज जमा करने वाले काले कानूनों को हटवा सके, अपने पर लादे गए हजारों मुकदमे वापस करवा सके और न्यूनतम समर्थन मूल्य का वादा सभी फसलों के लिए ले सके. किसानों की यह जीत एक दंभी और अपने को दुर्वासा ऋषि के समान समझने वाली सरकार के खिलाफ अड़ने की थी. अगर श्रीराम दुर्वासा की गलत बात को नहीं मानते तो उन्हें लक्ष्मण को नहीं खोना पड़ता, अगर एकलव्य गुरु द्रोणाचार्य की गलत बात नहीं मानता तो उसे अंगूठा नहीं कटवाना पड़ता.

आज का किसान समझदार हो गया?है. किसान ही पिछले कई सौ सालों से राजाओं को सैनिक देते रहे हैं. किसान ही आज सेना और पुलिस में भी हैं और अब किसानों में घुसपैठ कर के भारतीय जनता पार्टी मंदिरों को चलवा रही है, मुसलिमों के खिलाफ डंडे बरसाती है. अगर किसानों ने भारतीय जनता पार्टी का पूरी तरह से बौयकौट कर दिया तो न सिर्फ केंद्र व राज्यों की सत्ता हाथ से निकल जाती, मंदिरों का धंधा भी आधाअधूरा रह जाता.

किसानों को अपने मामले खुद तय कर देने दें. किसान अपनी जमीन किसे किस कीमत पर देना चाहते हैं, उस के कानून वही हों जो शहरियों की जमीनों के होते हैं. किसानों को अपने किस काम के पैसे मिलें यह वैसा ही जरूरी है जैसा सरकार अपनी खरीद टैंडर से करती है और बेचने वाले की लागत से दाम को मोटामोटा तय करती है. अखबारों के विज्ञापन भी सरकार अखबारों के खर्च के हिसाब से तय करती है. फिर किसानों से खरीद करने और सिर्फ लागत मूल्य देने में कोई हर्ज नहीं है.

हो सकता है कि सरकार पर बोझ बढ़ जाए पर यह बोझ नरेंद्र मोदी और निर्मला सीतारमन थोड़ी ही जेब से पूरा करेंगे? ये तो टैक्स से जमा करेंगे जिस का मतलब होगा कि किसानों को फसल के जो पैसे मिलेंगे यदि भारी उपज की वजह से कम हो रहे हों तो सब उस का बोझ उठाएंगे.

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किसानों की इस जीत ने शासन को एक सबक सिखाया है और जनता को रास्ता दिखाया है. सरकार की कोई गलत बात नहीं मानो और जनता का हित देख कर फैसले करो. सिर्फ इसलिए कि 15-20 साल अच्छे पद पर अफसर बन कर कुछ लोग देश का आगापीछा तय नहीं कर सकते. देशों ने हिटलरों, मुसोलिनियों, माओ जैसे हठधर्मी शासकों का कहर बहुत सहा है. अब और नहीं. किसानों को तो पूरे देश को शुक्रिया कहना चाहिए कि उन्होंने बहुत ढंग से पूरे साल आंदोलन चलाया, दंगे नहीं होने दिए, सड़कें रोकीं पर शहरों को चलने दिया. यह जीत जनता की जीत है, लोकतंत्र की जीत है और सही शासन करने की नीति समझाने की जीत है.

समस्या: बौयफ्रैंड के साथ कहां करें सैक्स

बिहार के जिला बेगूसराय के इलाके साहेबपुर कमाल की चंदा बीबी का इश्क साल 2016 से ही राजीव कुमार से चल रहा था, जो पेशे से आटोरिकशा ड्राइवर था. दोनों पहली दफा बलिया के डिज्नीलैंड मेले में मिले थे और पहली नजर में ही एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

प्यार करने वाले धर्मकर्म, अमीरीगरीबी और जातपांत नहीं देखते, यह इन दोनों ने भी साबित कर दिखाया था, क्योंकि चंदा मुसलमान थी और राजीव हिंदू था. यह हकीकत सम?ाते हुए भी दोनों दिल के मारे अपने प्यार को शादी की मंजिल तक पहुंचाने के लिए कोई भी खतरा उठाने तैयार थे.

यहां तक कि दोनों अपने घर वालों से कह भी चुके थे कि अब कोई दीवार उन का रास्ता नहीं रोक सकती. तय है कि ये दोनों हर लिहाज से एकदूसरे के हो चुके थे, इसलिए घर और समाज से हार मानने को तैयार नहीं थे. इधर प्यार के दुश्मन भी मौका तलाश रहे थे कि कब इन्हें रंगे हाथ पकड़ें और इन की राह में जुदाई के कांटे बोए जाएं.

आखिर वह मौका 25 अगस्त, 2021 को मिल ही गया, जब राजीव बेसब्री से उस का इंतजार कर रही चंदा से मिलने  रात को उस के घर जा पहुंचा. लेकिन इस बार चंदा के घर वाले चौकन्ने थे, जिन्होंने दोनों को प्यार करते देख लिया. बस, फिर क्या था. चंदा के घर वाले भूखे भेडियों की तरह राजीव पर टूट पड़े और उसे मारमार कर अधमरा कर दिया.

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चंदा अपने आशिक की पिटाई बरदाश्त नहीं कर पाई और उस ने जहर खा लिया. दोनों का इलाज चला, लेकिन बदनामी मुफ्त उन के हिस्से में आई. मामला चूंकि हिंदू लड़के और मुसलमान लड़की का था, इसलिए बात को दबा दिया गया.

ऐसा ही एक मामला बिहार के ही कटिहार से 14 नवंबर, 2021 को देखने में आया था. भवानीपुर का रहने वाला एक आशिक अपनी माशूका पार्वती (बदला हुआ नाम) से मिलने उस के गांव मोहना चांदपुर आदिवासी टोला जा पहुंचा.

समय वही सूरज ढलने के बाद का था. दोनों ने अभी अपनेअपने कपड़े खिसका कर सैक्स करना शुरू किया ही था कि एकाएक ही घात लगाए बैठे गांव वाले दोनों पर मधुमक्खियों की तरह टूट पड़े. उन दोनों की खासी धुनाई की गई और फिर उन्हें रातभर मवेशियों की तरह खूंटे से बांध कर रखा गया.

बाहर भी गारंटी नहीं

इन प्रेमियों की बड़ी परेशानी यह होती है कि सैक्स कहां करें. वैसे, सब से मुनासिब और महफूज जगह तो घर ही है, लेकिन वहां भी देखे और पकड़े जाने का खतरा कम नहीं. इस के अलावा सभी के घरों की बनावट ऐसी नहीं होती कि आशिक आसानी से सब से नजरें बचा कर दाखिल हो सके और इतमीनान से दोनों सैक्स कर सकें.

लेकिन खतरे बाहर भी कम नहीं हैं. भोपाल के नजदीक सीहोर की रहने वाली एक 24 साला लड़की करिश्मा (बदला हुआ नाम) की मानें, तो उसे भोपाल के बस कंडक्टर नरेश (बदला हुआ नाम) से इश्क हो गया और दोनों सैक्स करने के लिए राजी हो गए.

रजामंदी के बाद दिक्कत पेश आई जगह की, जिस के बाबत दोनों ने बस से ?ांक?ांक कर सिविल इंजीनियरों की तरह लोकेशन देखी, लेकिन हर जगह इमारतें खड़ी नजर आईं. कुछ जगहे ठीकठाक लगी, पर पकड़े जाने का डर वहां भी था.

आखिर में थकहार कर दोनों ने तय किया कि कोई सस्ता सा लौज या होटल में चला जाए, वहां कोई खतरा नहीं रहेगा.

नरेश की जानपहचान भोपाल के नजदीक के कुछ होटल वालों से थी लेकिन उन की मदद लेने में राज खुल जाने का डर था, इसलिए दोनों ने उज्जैन का रुख किया और रेलवे स्टेशन के पास एक लौज में कमरा ले लिया.

होटल के रजिस्टर में खानापूरी करने के बाद वे दोनों कमरे में पहुंचे, तो दरवाजा बंद कर एकदूसरे में गुंथ गए, क्योंकि मुद्दत से प्यारमुहब्बत और सैक्स की बातें दिन में बस में और रात में ह्वाट्सएप पर करतेकरते दोनों रातदिन सैक्स के ही सपने देखा करते थे.

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उज्जैन के लौज में यह सपना पूरा हुआ और दोनों ने जीभर कर खुद की और एकदूसरे की प्यास बु?ाई. अभी दोनों कपड़े ठीक कर के भोपाल वापस जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि फिल्मी स्टाइल में दरवाजा खटखटाया गया.

‘होगा कोई वेटर…’ यह सोचते हुए नरेश ने दरवाजा खोला तो सामने एक लेडी सबइंस्पैक्टर 2 सिपाहियों समेत खड़ी थी.

नरेश के तो होश फाख्ता हो गए, जब पुलिस वालों ने उन दोनों पर देह धंधे का इलजाम लगा डाला. जैसेतैसे मामला रफादफा हुआ, लेकिन इस में उन दोनों की जेब खाली हो गई.

गिड़गिड़ाने पर पुलिस वाली ने वापसी का किराया भर छोड़ा. इस तरह दोनों को सैक्स तकरीबन 4,000 रुपए का पड़ा.

जाएं तो जाएं कहां

तो फिर सैक्स की अपनी जरूरत पूरी करने के लिए प्रेमी जोड़े कहां जाएं? यह बहुत पेचीदा सवाल है. गांवदेहात में भी अब न पहले सी ?ाडि़यां, पेड़ और ?ारमुट हैं और न ही टीलेटोले बचे हैं. सड़कें बन जाने से वहां भी आशिक और माशूक आधा घंटे की तनहाई के लिए तरस जाते हैं.

शहर में पार्कों में भीड़ है, जहां बैठ कर प्रेमी बातें और थोड़ी छेड़छाड़ तो एकदूसरे से कर सकते हैं, लेकिन सैक्स नहीं कर सकते. पैसे वाले तो अपनी यह जरूरत दौड़ती कार में पूरी कर लेते हैं या एकांत में कहीं रोक कर कार के काले शीशे चढ़ा लेते हैं. दिक्कत कम पैसे वाले जोड़ों को ज्यादा होती है, जो बेचारे शांत और सूनी जगह के लिए तरस जाते हैं.

धर्मकर्म है एक सहारा

लेकिन प्रेमी जोड़े भी ‘तू डालडाल मैं पातपात’ वाली कहावत को अमल में लाते हुए यह ख्वाहिश पूरी कर ही लेते हैं, जिस में कभीकभी प्यार और सैक्स का दुश्मन धर्मकर्म ही उन का सहारा बनता है.

विदिशा की एक लड़की की मानें, तो उस ने पहली बार सैक्स धर्म की आड़ में ही किया था. दुर्गा ?ांकियों के दौरान उसे शाम को घर से जाने की इजाजत मिली, तो उस ने अपने बौयफ्रैंड को शहर से 3 किलोमीटर दूर बेतवा नदी के किनारे बने एक मंदिर में बुला लिया. पहले दोनों ने दर्शन किए और फिर मंदिर के नीचे जा कर ?ाडि़यों में सैक्स किया.

गुजरात का गरबा बहुत मशहूर है, जिस में नवरात्रि के दौरान लाखों नौजवान लड़केलड़की सैक्स करते हैं. इस पर हर साल खूब होहल्ला भी कट्टरवादी मचाते हैं, लेकिन इन्हें रोक नहीं पाते.

धार्मिक जलसों में इफरात से भीड़भाड़ होती है. ये प्रेमी दूर अकेले में जा कर सैक्स करते हैं और बाद में धूल ?ाड़ते फिर नाचनेगाने लगते हैं यानी धर्म के सहारे सैक्स करना महफूज है, जो सदियों से प्रेमी करते आ रहे हैं. ?ांकियों के दिनों में गुजरात में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में इफरात से कंडोम बिकते हैं.

साल 1973  में आई फिल्म ‘हीरा’ का आशा पारेख और सुनील दत्त पर फिल्माया गया एक गाना तब के नौजवानों में खूब मशहूर हुआ था. उस गाने के बोल थे, ‘मैं तु?ा से मिलने आई मंदिर जाने के बहाने…’

सहेलियों की लें मदद

बौयफ्रैंड से सैक्स करने में सहेलियों की मदद लेना ज्यादा कारगर साबित होता है. कैसे? इस का खुलासा करते हुए भोपाल की 20 साला गौरी बताती है कि उस ने अपनी सहेली खुशबू की मदद ली थी और अभी भी लेती रहती है.

खुशबू के घर जब कोई नहीं होता था, तब वह और उस का बौयफ्रैंड उस के घर पहुंच जाते थे और अंदर के कमरे में सैक्स का लुत्फ उठाते थे.

होता यह था कि जब तीनों को इतमीनान हो जाता था कि किसी ने नहीं देखा है तो खुशबू घर पर ताला लगा कर चली जाती थी और एहतियात के तौर पर ये भी अंदर से कुंडी लगा लेते थे.

फारिग हो जाने के बाद गौरी खुशबू को फोन कर देती थी. उस के आने के बाद दोनों एकएक कर निकल जाते थे. इस में खतरा कम है.

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गौरी बताती है कि क्योंकि कोई शक नहीं करता और कभी पकड़े भी गए तो आशिक को रिश्ते का भाई बता कर बचने का भी उस ने सोच रखा है. इस तरीके में जरूरी यह है कि सहेली भरोसेमंद हो और जरूरत पड़ने पर आप भी उस की इसी तरह मदद करें.

हालांकि होटल और लौज भी सहूलियत वाली जगह हैं, लेकिन इस में भी बहुत एहतियात बरतना जरूरी है. मसलन, दोनों के नाम से अलगअलग कमरे अलगअलग वक्त में लिए जाएं और फिर एक कमरे में सैक्स किया जाए. कमरे का सलीके से मुआयना भी कर लेना चाहिए कि उस में कहीं कैमरा न लगा हो.

पुलिस के खतरे से बचने के लिए नामपता सही लिखाना चाहिए और डरना नहीं चाहिए, क्योंकि पुलिस को भी यह हक नहीं कि वह ?ाठे मामले में फंसा सके. घर हो या होटल दोनों ही जगह रात के बजाय दिन में सैक्स प्लान करना कम खतरे वाला काम होता है, नहीं तो कभीकभी हालत चंदा और पार्वती जैसी भी हो सकती है.

अपराध: पसंद नहीं आया पति के साथ मोना का सोना

शारदा ने अपने पति को काफी सम?ाया था कि दूसरी औरत के चक्कर में अपना परिवार और बिजनैस चौपट न करे. हर बार बिल्डर राजू अपनी बीवी से माफी मांगता और प्रेमिका से नाता तोड़ लेने के वादे करता. पर असल में वह अपनी प्रेमिका से दूरी बना ही नहीं रहा था.

पिछले दिनों जब शारदा को पता चला कि उस के पति ने अपनी प्रेमिका को जमीन का प्लौट गिफ्ट में दिया है, तो उस के सब्र का बांध टूट गया. उसे अपना घरपरिवार बिखरता नजर आने लगा और आखिरकार उस ने मोना को रास्ते से हटाने की साजिश रच डाली.

दरअसल, बिल्डर राजू का मोना राय उर्फ अनीता देवी नाम की एक मौडल से इश्क चल रहा था. राजू उस के इश्क में इस कदर डूबा हुआ था कि उसे अपने बसेबसाए घरपरिवार की भी चिंता नहीं रही.

मोना का सारा खर्च वही उठाता था, यहां तक कि जिस किराए के मकान में मोना रहती थी, उस का किराया तक राजू ही देता था.

मोना और राजू के प्रेम के किस्से की भनक मोना के पति को भी थी, पर माली तौर पर कमजोर होने की वजह से वह चुप्पी साधे रहता था.

‘मिस ग्लोबल बिहार कौंटैस्ट’ में ‘बेस्ट आई’ यानी ‘सब से सुंदर आंखें’ का अवार्ड जीतने वाली मौडल मोना राय को अपराधियों ने कमर में गोली मार कर घायल कर दिया.

पटना के राजीवनगर महल्ला के रामनगरी सैक्टर-3 में उस के घर के मेन गेट के पास ही गोली मारी गई. वह अपनी बेटी आरोही के साथ पास के ही एक मंदिर से लौटी थी.

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जैसे ही मेन गेट खोल कर वह अपनी स्कूटी अंदर करने लगी, तभी पीछे से अपराधियों ने उस पर गोलियां बरसा दीं. उस के बाद अपराधी मोटरसाइकिल से फरार हो गए.

गोली लगने के बाद मोना चीखती और तड़पती हुई जमीन पर गिर पड़ी, अपनी मां को खून से लथपथ देख उस की बेटी जोरजोर से चिल्लाने लगी, तो मोना के पति सुमन कुमार और परिवार के बाकी लोग घर से बाहर निकले.

लोगों ने पुलिस को सूचना दी. उस के बाद उसे अस्पताल ले जाया गया. पुलिस ने मोना के घर, मोबाइल फोन और लैपटौप की छानबीन की. उस के घर में रखे फ्रिज से शराब की बोतल मिली है.

12 अक्तूबर की रात को उस पर गोलियां दागी गईं. 5 दिनों तक मौत से जंग लड़ने के बाद 17 अक्तूबर को उस की मौत हो गई.

मोना की मौत के बाद कई राज उस के साथ ही दफन हो गए. गोली मोना के कमर में लगी थी और लिवर में जा कर फंस गई थी, जिस से उस का लिवर डैमेज हो गया था.

पुलिस की जांच में भी बिल्डर राजू और मोना की नजदीकियों का खुलासा हुआ. उन दोनों के इश्क के चर्चे उन के परिवार वालों तक पहुंच चुके थे. पुलिस ने राजू को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

पहले राजू और मोना फुलवारीशरीफ इलाके में रहते थे और पड़ोसी थे. वहीं दोनों की नजरें मिलीं और उन के बीच प्रेम की खिचड़ी पकने लगी.

इस बात की जानकारी जब राजू की बीवी को हुई, तो उस ने खूब हंगामा मचाया. हंगामे के बाद मोना ने घर बदल लिया और रामनगरी महल्ले में रहने लगी. मोना ने घर भले ही बदल लिया, लेकिन राजू और मोना का इश्क परवान चढ़ता रहा.

पुलिस की जांच में पता चला कि बिल्डर राजू की बीवी शारदा देवी ने ही मोना की हत्या की साजिश रची थी. पुलिस जब उसे पकड़ने गई, तो पता चला कि वह अपने नाबालिग बेटे को ले कर फरार हो गई है. उसे पकड़ने के लिए 10 से ज्यादा ठिकानों पर छापामारी की गई, लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं आ सकी.

इस मामले में आरा जिले के उदवंतनगर के भगवतीपुर गांव से एक अपराधी भीम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है.

भीम ने पुलिस को जानकारी दी कि शारदा ने ही सुदेश, विश्वकर्मा, शंकर और राहुल नाम के शूटरों को मोना की हत्या की सुपारी दी थी. विश्वकर्मा ने ही मोना पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई थीं.

भीम ने पुलिस को यह भी बताया कि बिल्डर का नाबालिग बेटा भी मोना की हत्या की साजिश में शामिल है. उसी ने मोना का फोटो शूटर्स को दिखाया था. उस के बाद वही शूटरों को ले कर मोना के घर के पास गया था और घर के बाहर खड़ी मोना की ओर इशारा करते हुए बताया कि उसी औरत को मारना है.

फुलवारीशरीफ में रहने वाले बिल्डर राजू से मोना का गहरा रिश्ता था. तकरीबन 3 महीने पहले राजू ने मोना के नाम से जमीन का एक प्लौट खरीदा था, जिस की कीमत तकरीबन 25 लाख रुपए है.

राजू और मोना की नजदीकियों से राजू की बीवी शारदा खफा रहती थी. इस मसले को ले कर दोनों के बीच अकसर तकरार होती रहती थी. जब राजू ने मोना को प्लौट गिफ्ट में दिया, तो शारदा के सब्र का बांध टूट गया और उस ने मोना को ठिकाने लगाने की ठान ली.

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इस के लिए उस ने अपने भतीजे राहुल से कौंट्रैक्ट किलर से बात करने को कहा. राहुल ने शारदा की कोई मदद नहीं की. उस के बाद शारदा ने अपने दूर के रिश्तेदार सुदेश से मोना की हत्या कराने की बात की. 5 लाख रुपए में मोना को मारने की बात तय हुई थी. विश्वकर्मा, शंकर और भीम को सुदेश ने 97,000 रुपए बतौर एडवांस दिए.

अनीता उर्फ मोना बिहार के रोहतास जिले के विक्रम ब्लौक की रहने वाली थी. साल 2006 में उस की शादी सुमन के साथ हुई थी. सुमन एक प्राइवेट कंपनी में सेल्स एक्जीक्यूटिव का काम करता है.

सुमन ने पुलिस को बताया कि अनीता उर्फ मोना पिछले 2-3 सालों से टिकटौक वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डालती थी. उस के फौलोअर की तादाद एक लाख पार कर चुकी थी. उस के बाद वह मौडलिंग करने लगी और अपना नाम बदल कर मोना रख लिया था. वह कई प्रोग्राम में हिस्सा लेती थी और काफी लोगों से उस का मिलनाजुलना होने लगा था. मोना के 2 बच्चे हैं. बेटे का नाम नैतिक और बेटी का नाम आरोही है.

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