देश में ही नहीं लगभग दुनिया भर में सिंगल पेरेंट को अलग निगाहों से देखा जाता है. आमतौर पर लोग सिंगल पेरेंट को अकेले रहने का गुनहगार मारते हैं और यह भी कह डालते हैं कि उस की गलती से बच्चों को मातापिता दोनों का प्यार व सुरक्षा नहीं मिल रही. सिंगल पेरेंट को यदाकदा ही दोहरा ही नहीं तीहरा बोझ उठाने के लिए शाबाशी दी जाती है. तीहरे बोझ का अर्थ है काम कर घर भी चलाना.

अभी हाल में चेन्ने हाई कोर्ट के एक जज ने टिप्पणी की कि सिंगल पेरेंट की प्रवृत्ति गलत है. यानी न्यायिक सोच है कि किसी भी सहूलियत के लिए कोर्ट के दरवाजे खटखटाने वाले सिंगल पेरेंट को सहानुभूति तो मिलेगी पर उसे दोषी भी ठहराया जाएगा. दुनिया भर में 230 करोड़ बच्चों में से 32 करोड़ बच्चे आज सिंगल पेरेंटों के साथ पल रहे हैं. बच्चों का मतलब है 17 साल तक के बच्चे.

इतने सारे बच्चों का बोझ उठाने के बावजूद हर जगह सिंगल पेरेंट शक और लालफीताशाही के शिकार रहते हैं. सिंगल पेरेंटों को शादी करने के लायक साथी मुश्किल से ही मिलते हैं, उन्हें दोस्त भी नहीं मिलते. शादीशुदा दोस्त सोचते हैं कि उन पर कभी कभार बच्चों का बोझ न डाल दिया जाए और अविवाहित बच्चों की चिलपों से घबराते हैं. उन्हें अकेलेपन का दर्द भी सहना पड़ता है.

अफसोस यह है कि कानून भी सिंगल पेरेंटों को महत्व नहीं देता. चूंकि ज्यादातर मामलों में बच्चों का बोझ सिंगल मां को उठाना पड़ता है. पुरुष कानून व नियम बनाने में ढीले रहते हैं. हर दफ्तर में सिंगल औरत को ला…. नजरों से देखा जाता है. हर कोई लालफीताशाही के नाम पर उन्हें लूटने की कोशिश करता है.

छोटे बच्चों को पालने वाली अकेली मांएं और पिता दोनों सिस्टम के बहुत ज्यादा लाचार हैं. उन्हें न आसानी से मकान किराए पर मिलते हैं न दोस्त. परिवार भी साथ नहीं देता और समाज व सरकार भी नहीं. अगर यह अकेलापन तलाक या बिना विवाह मां बनने के कारण हुआ हो तो लोग अपराधी ही समझते हैं और पूरी तरह कन्नी काट लेते हैं. पुनर्विवाह यदाकदा ही होता है और बस फिल्मों में दिखता है.

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