कहते हैं कि रेप की शिकार का 2 बार रेप होता है. एक बार तब जब उस के अंगों में प्रवेश किया जाता है और दूसरा तब जब वह उस पहले रेप की शिकायत करने जाती है. भोपाल की एक लड़की के साथ गैंगरेप हुआ पर रेप के बाद 4 दिनों तक वह थानों के चक्कर काटती रही. एक दिन उसे एफआईआर लिखाने में लगा. दूसरे दिन पुलिस ने सारे दिन उस के बयान लिए. तीसरे दिन मैडिकल चैकअप के लिए पुलिस वालों के साथ अस्पताल में रही और चौथे दिन सोनोग्राफी के लिए गई.

बारबार उस से पूछा गया कि उस के साथ क्या हुआ, कैसे हुआ, कितना हुआ, कितने लोग थे, वे लोग किस तरह के दिखते थे. इस तरह के सवाल कांस्टेबलों ने ही नहीं पूछे बल्कि अफसरों, यहां तक कि महिला अफसरों ने भी पूछे. किसी को हमदर्दी नहीं थी, किसी ने सांत्वना नहीं दी, किसी ने मामले को तुरंत समाप्त करने की कोशिश नहीं की.

इस तरह के हर मामले में रेप पीडि़ता को परेशान किया जाता है क्योंकि पुलिस थानों में इस तरह के रेप करना बहुत आम है. देशभर के पुलिस वाले अपराधी महिलाओं और अपराधियों की मां, बहनों, बेटियों के साथ अपराधी को तोड़ने के लिए उन के सामने रेप करने के हथकंडे अपनाते हैं. यह मामला शिकायत नहीं बनता क्योंकि उस से अपराधी का मामला बिगड़ जाता है. फिर शिकायत केवल मीडिया में की जा सकती है या अदालत में और अपराधी के परिवार वालों की गंभीरता से कोई सुनता ही नहीं.

यही वजह है कि आमतौर पर रेप विक्टिम चुप ही रह जाती हैं क्योंकि वे अपने कीमती साल बरबाद नहीं करना चाहतीं.

समाज की मानसिकता भी वही है जो पुलिस वालों की है कि रेप की गई लड़की ने कहीं न कहीं कोई गलती तो की ही होगी. घरों में जब रेप न हो तो इस तरह के सवाल उठते ही हैं और घरों में होने वाले रेप की शिकायत करने का अर्थ है घर वालों और रिश्तेदारों का गुस्सा सहना.

वैसे भी पुरुष मानसिकता को बदलना फिलहाल कठिन ही है कि औरत प्रजाति बनी ही सैक्स के लिए है. पुलिस वाले तो आते ही उस पृष्ठभूमि से हैं जहां औरतों को वैसे भी पैर की जूती समझा जाता है. उन्हें उस तरह की लड़कियों से कोई सहानुभूति नहीं होती है. वे तो उस रेप की शिकार लड़की का रेप करने को उत्सुक रहते हैं. उन के सवाल और उन की निगाहें ही दूसरा रेप करती हैं.

यह रेप कम नहीं होता. जैसेजैसे मामला बढ़ता है, यह और तीखा होता है. अदालतों में सालों लगते हैं. अपराधी जहां खुले सांड की तरह घूमता है वहीं लड़की हर रोज तड़पती है, रोती है, कलपती है, तीखी निगाहों का शिकार बनती है. अगर वह चुप रहती तो दर्द 2-4 दिनों में चला जाता, पर अधिकार के लिए बोल कर वह दर्द को सौ गुना कर डालती है. जिस समाज में मासिकधर्म में मुंह छिपाया जाता है वहां रेप पीडि़ता को न आदर मिलता है न राहत.

यह समाज बदलेगा, भूल जाइए.

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