Hindi Story: सांवली

Hindi Story: शहर से काफी दूर बसा सज्जनपुर गांव पुराने समय से ही 3 हिस्सों में बंटा था. इस गांव के राजामहाराजा और बड़ेबड़े जमींदार एक जगह बसे थे. उन के सारे मकान पक्के थे. पैसे की कोई कमी नहीं थी, इसलिए उन के बच्चे अपना ज्यादा समय ऐशोआराम में बिताते थे.


दूसरे हिस्से में ब्राह्मण और राजपूत थे. कुछ मुसलिम भी थे. तीसरा हिस्सा पिछड़ी जाति या दलित तबके का था. उन लोगों की बस्ती अलग पहाड़ीनुमा टीले पर थी. उन के घर फूस के बने थे. वे लोग पैसे वाले जमींदारों, राजामहाराजाओं की मेहरबानी पर गुजरबसर कर रहे थे. उस गांव में एक प्राइमरी स्कूल था. 30-40 गांवों के बीच महज एक ही स्कूल था. आसपास की सारी सड़कें कच्ची और बड़ेबड़े गड्ढों वाली थीं.
उन सभी गांवों से स्कूल को जोड़ने वाली सड़कें जब पक्की हो गईं, तो स्कूल भी चल निकला और 2-3 साल में हाईस्कूल बन गया. फिर वहां इंटर तक की पढ़ाई शुरू हो गई थी.


दलित झोंपड़पट्टी का कोई बच्चा वहां पढ़ने नहीं आता था.
कहा जाता है कि महात्मा गांधी और भीमराव अंबेडकर भी एक बार वहां गए थे. दलितों के पक्के मकान बनवाने के वादे भी किए गए थे, पर महात्मा गांधी की हत्या के बाद उन दलितों की सुध लेने वाला कोई नहीं था. एक बार कलक्टर साहब का वहां दौरा हुआ. उन्होंने वहां के लोगों को समझाया कि आप अपने बच्चों को स्कूल क्यों नहीं भेजते हैं? अपने हक की जानकारी होने पर ही आप उस की मांग कर सकते हैं. सरकार बच्चों की सुविधा का खयाल करेगी, पहले उन्हें स्कूल में तो भेजिए.


बहुत समझाने के बाद एक निषाद की बेटी स्कूल जाने को तैयार हुई. फिर उस झोंपड़पट्टी के दूसरे बच्चे भी स्कूल जाने लगे. उस स्कूल के सारे मास्टर ऊंची जाति के थे. उन्हें दलित तबके के बच्चों से नफरत होने लगी, क्योंकि उन के कपड़े अच्छे नहीं होते थे. पैरों में जूते नहीं होते थे. शिष्टाचार की कमी भी थी.
स्कूल जाने वाली पहली दलित लड़की का नाम सांवली था. उसे शुरू से ही अपने कपड़ों का खयाल था. वह शिष्टाचार का पालन भी करती थी. एक तरह से वह सभी दलित बच्चों की हैड गर्ल बन गई थी. धीरेधीरे वह पढ़ने में भी होशियार हो गई.


बड़ीबड़ी आंखें, घुंघराले घने बाल, शरीर भी गठा हुआ. दुबली और मोटी. स्कूल में सब की चहेती थी सांवली. अपने महल्ले में भी सांवली का बहुत आदर होता था. लोग आपस में बात करते हुए कहते थे कि सांवली बड़ी हो कर अफसर बनेगी. कार में घूमेगी. सांवली के पिता मंगरू मल्लाह से लोग कहते, ‘देखो मंगरू, सांवली की पढ़ाई बंद मत करना. रुपएपैसे की किल्लत होगी, तो हम लोग आपस में चंदा कर के पैसे जुटाएंगे.’


जैसेजैसे सांवली बड़ी होती गई, वैसेवैसे उस की खूबसूरती भी बढ़ती गई. 9वीं जमात में आने पर सांवली के बदन पर जवानी भी दस्तक देने लगी थी. जब सांवली 7वीं जमात में थी, तब ऊंची जाति के एक मास्टर ने उस के अंकों को जानबूझ कर घटा दिया था, जिस से एक राजपूत की बेटी क्लास में फर्स्ट गई थी.
सांवली इस बात पर उस मास्टर से लड़ बैठी थी और उस ने हैडमास्टर से शिकायत भी कर दी थी. उन्होंने सांवली के साथसाथ सभी मास्टरों को बुलवा कर कहा था कि जो बच्चे जैसा लिखते हैं, उन्हें उतने ही अंक मिलने चाहिए. इस में जाति का फर्क नहीं होना चाहिए.


उस दिन से सांवली पढ़ने में ज्यादा मन लगाने लगी थी. उस की बस्ती में बिजली नहीं थी, इसलिए वह लालटेन की रोशनी में पढ़ती थी. तेल नहीं रहने पर महल्ले के कई लोग सांवली को तेल भरी लालटेन दे जाते थे. इधर सांवली का पिता मंगरू मल्लाह दिनभर मछली पकड़ता और शाम को नजदीक के बाजार में उन्हें बेचता था. अगर कुछ मछलियां बच जाती थीं, तो जमींदार को भी दे आता था. जमींदार मंगरू को कभी पैसे देते, कभी नहीं भी देते थे. सांवली 9वीं जमात में स्कूलभर में फर्स्ट आई थी. हर जगह उस की चर्चा होने लगी. राज्य सरकार ने अव्वल आने वाली लड़कियों को साइकिल देने का ऐलान किया था. सांवली को भी लाल रंग की साइकिल मिल गई थी.

अब वह साइकिल से ही स्कूल आनेजाने लगी थी. क्लास में लड़कियों की तरफ ताकझांक करने की हिम्मत लड़कों में नहीं थी, पर लंच टाइम में सभी लड़के अपनेअपने ढंग से मनोरंजन करते थे. सभी अपनीअपनी पसंद की लड़की बताते थे. मनोज नाम का लड़का कहता, ‘‘नाम भी सांवली और रंग भी सांवला. सांवली होने के बावजूद यह कितनी अच्छी लगती है. जी करता है कि चूम लूं इसे. लेकिन इशारा करने पर भी नहीं देखती है.’’ यह सुन कर दिनेश ने कहा, ‘‘साइकिल पर घंटी बजाती हुई जब वह हम सब लड़कों के बीच से गुजरती है, तो दिल पर छुरी चला देती है.’’


जमींदार राय साहब के बेटे मधुरेश ने कहा, ‘‘सांवली कहीं अकेले में मिल जाए, तो कसम से मैं इसे सीने से लगा कर चूम लूंगा.’’ अब सांवली 10वीं जमात में थी. बोर्ड के इम्तिहान भी नजदीक रहे थे. सांवली का मन पढ़ाई में ज्यादा लग रहा था. इधर लड़कों का मन पढ़ने से उचट रहा था. उस स्कूल में ही नहीं, आसपास के सभी गांवों में सांवली की चर्चा होने लगी थी. मधुरेश के पिता राय साहब को मालूम हो गया था कि उन का बेटा पढ़ाई में जीरो है और सांवली हीरो.


एक दिन राय साहब ने मधुरेश से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे स्कूल में दलित की बेटी पढ़ाई में फर्स्ट आती है?’’
‘‘सांवली पहले से ही पढ़ाई में तेज है,’’ मधुरेश का जवाब था. एक दिन शाम को जब मंगरू राय साहब के यहां मछली देने आया, तो वे बोल पड़े,  ‘‘मंगरू, मुझे तुझ से जरूरी काम है. इधर .’’ जब मंगरू उन के नजदीक पहुंचा, तो राय साहब ने कहा  ‘‘देखो मंगरू, तुम्हारे खानदान का मेरे खानदान से आज का नाता नहीं है.’’


‘‘हां, सो तो है,’’ मंगरू ने कहा.
‘‘क्या सांवली तुम्हारी बेटी है?’’
‘‘हां सरकार, आप लोगों की दुआ से,’’ मंगरू बोला.
‘‘वह पढ़ाई में बहुत तेज है ?’’
‘‘जी हां मालिक?’’
फिर राय साहब बोल उठे, ‘‘मेरा एक बेटा है और 2 बेटियां हैं. बड़ी बेटी की शादी की बात चल रही है. दूसरी बेटी तो बहुत छोटी है.
‘‘चिंता है तो सिर्फ मधुरेश की. वह 10वीं जमात में गया है, पर उसे आताजाता कुछ नहीं है. अगर तुम्हारी बेटी सांवली उसे थोड़ा पढ़ा दे, तो वह जरूर 10वीं पास कर जाएगा.’’
मंगरू ने कहा, ‘‘अब हम क्या बताएं मालिक, यह तो सांवली ही जाने. वह क्या पढ़ती है, क्या लिखती है, मुझे नहीं मालूम.’’
‘‘देखो मंगरू, सांवली बहुत अच्छी लड़की है. वह तुम्हारी बात नहीं टालेगी. साइकिल से आएगीजाएगी. तुम जितना कहोगे, हम उस को फीस दे दिया करेंगे.’’
‘‘ठीक है मालिक,’’ मंगरू ने हाथ जोड़ कर कहा.


मंगरू रात को जब अपने घर पहुंचा, तो उस ने सांवली को राय साहब की बातें बता दीं. सांवली का कहना था, ‘‘हम दोनों तो 10वीं जमात में ही पढ़ते हैं, फिर मैं कैसे उसे पढ़ा सकती हूं?’’ लेकिन बहुत नानुकर के बाद सांवली राय साहब के यहां जा कर पढ़ाने को राजी हो गई. स्कूल से छूटती, तो सांवली सीधे राय साहब के यहां अपनी साइकिल से पहुंच जाती. मधुरेश को बिन मांगी मुराद पूरी होती नजर आई. 2-3 महीनों के बाद मधुरेश समझ गया कि सांवली बहुत भोली है, घमंड तो उस में बिलकुल नहीं. वह सांवली के गदराए बदन को देखदेख कर मजा उठाता रहा.

लेकिन जब मधुरेश की हिम्मत बढ़ती गई, तो सांवली ने पूछ लिया, ‘‘ऐसे क्यों घूरते हो मुझे?’’
सांवली के मुंह से यह सुन कर मधुरेश बहुत डर गया.
‘‘मधुरेश, तुम मेरी तरफ घूरघूर कर क्यों देखते हो? बोलो ?’’ सांवली ने फिर पूछा.
‘‘जी करता है कि मैं तुम्हें चूम लूं,’’ मधुरेश धीरे से बोला.
सांवली ने कहा, ‘‘तो चूम लो मुझे, पर दूसरी चीज मत मांगना.’’
मधुरेश चुप रहा.
सांवली अपने गालों को उस की तरफ बढ़ाते हुए बोली,  ‘‘तो चूम लो .’’
मधुरेश उस को चूमने लगा, तो सांवली उस के सीने से चिपक गई.
इस तरह मधुरेश और
सांवली का एकदूसरेके प्रति खिंचाव बढ़ता गया.
मैट्रिक बोर्ड का रिजल्ट गया था. सांवली का नंबर पूरे राज्य में पहला था और मधुरेश भी सैकंड डिविजन से पास हो गया था.
रिजल्ट के बाद जब वे दोनों मिले, तो सांवली बोली, ‘‘मधुरेश, तुम मुझे चाहते हो ? शादी करोगे मुझ से?’’
मधुरेश का जवाब था, ‘‘मैं वादा करता हूं.’’
‘‘तो अपने पिताजी को समझाओ.’’
मधुरेश ने कहा, ‘‘पिताजी तो मुझ से ज्यादा तुम से खुश रहते हैं.’’
रात को सांवली ने अपने मातापिता को मधुरेश की बात बता दी.
मंगरू उसे समझाते हुए बोला, ‘‘देखो सांवली, प्यार सिर्फ बड़े लोगों के लिए है, पैसे वालों के लिए है, हम जैसे गरीब को यह सुहाता नहीं है.
‘‘क्या राय साहब अपने बेटे की शादी हम जैसे गरीब निषाद से करेंगे? नामुमकिन. वैसे, राय साहब तुम्हारी
जीभर कर तारीफ करते हैं. देखता हूं कि वे क्या कहते हैं.’’
एक शाम को मंगरू मछली ले कर राय साहब के यहां पहुंचा और उन से हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘सरकार, मैं आप से एक भीख मागने आया हूं.’’
‘‘कैसी भीख? ’’
‘‘आप का बेटा मधुरेश मेरी बेटी
से शादी करना चाहता है,’’ मंगरू ने डरतेडरते कहा.
यह सुनते ही राय साहब अपना आपा खो बैठे और मंगरू पर गरज पड़े, ‘‘तुम्हारी बेटी की हिम्मत कैसे हुई मेरे बेटे पर डोरे डालने की…’’
फिर वे एक मोटा सा डंडा ले
आए और जानवरों की तरह मंगरू पर बरसाने लगे. मंगरू बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़ा. राय साहब के लोगों ने उसे उठा कर सड़क के किनारे पटक दिया. मंगरू के पीटे जाने की खबर चारों ओर फैल गई थी. दलित बस्ती के लोग उग्र हो चुके थे. जल्दी ही मंगरू को अस्पताल पहुंचाया गया. उस की हालत चिंताजनक थी.


सांवली यह खबर सुन कर बेहोश हो गई थी. 2 दिनों के बाद दलित बस्ती के टीले पर गांव वालों की सभा बुलाई गई. तय हुआ कि कोई भी दलित किसी भी काम के लिए ऊंची जाति की बस्ती में कभी कदम नहीं रखेगा. एक महीने बाद राय साहब की बेटी की शादी थी. घर में चहलपहल थी. सारे सामान दूसरे शहर से मंगवाए गए थे. आज राय साहब का घर जश्न में डूबा हुआ था, उधर दलित बस्ती में हाहाकार मचा था, क्योंकि मंगरू दम तोड़ चुका था. दाह संस्कार के बाद सारे गांव वाले थाने पर टूट पड़े. वहां आग लगा दी गई. थानेदार भाग कर राय साहब के घर में छिप गया था. अगले दिन से धीरेधीरे माहौल शांत हो गया, पर राय साहब का घमंड ज्यों का त्यों बना हुआ था.


बरसात का मौसम गया था. सज्जनपुर गांव के बगल का बांध अचानक टूट गया और ऐसी भयंकर बाढ़ आई कि पूरा गांव बह गया. दलितों की बस्ती बहुत ऊंची थी, इसलिए महफूज थी. वहां के लोगों ने अपनीअपनी नावों से बहुत से लोगों को बह जाने से बचाया था. सांवली निषाद की बेटी थी, इसलिए वह अच्छी तैराक भी थी. वह किनारे पर नाव ले कर खड़ी थी कि एक टूटीफूटी नाव में राय साहब का पूरा परिवार खुद को बचा रहा था. नाव में पानी भर गया था. उस में सेसांवली बचाओ’, ‘सांवली बचाओकी आवाजें रही थीं.


सांवली का चाचा चिल्ला उठा, ‘‘उन्हें मत बचाओ सांवली.’’
इतने में राय साहब की नाव पानी से पूरी तरह भर गई थी.
सांवली का दिल पिघल कर मोम हो गया. वह झट से अपनी नाव को बड़ी तेजी से उन की ओर बढ़ाने लगी. राय साहब के परिवार के सारे लोग सांवली की नाव को पकड़ने लगे.
कुछ देर बाद कोई चिल्लाया, ‘‘मधुरेश डूब गया है.’’
सांवली झट से पानी में कूद गई. एक डुबकी के बाद उसे मधुरेश का कुछ
पता नहीं चला, तो उस ने दूसरी बार डुबकी लगाई.


इधर किनारे पर खड़े राय साहब के परिवार के सदस्य रो रहे थे. जब सांवली ने तीसरी बार डुबकी लगाई, तो वह मधुरेश को खींचती हुई पानी से बाहर निकाल लाई. एक नाव में मधुरेश को अस्पताल ले जाया गया. राय साहब का पूरा परिवार वहां था. जैसे ही मधुरेश की आंखें खुलीं, सामने सांवली को देख कर उस ने उस के पैरों में सिर झुका दिया और रोने लगा. मधुरेश को बिलखता देख कर सांवली भी उसे अपनी छाती से लगा कर रोने लगी. राय साहब सिर झुकाए खड़े रहेवे अपने किए पर शर्मिंदा लग रहे थे.   

श्यामानंद झा

Crime Story: धोखाधड़ी-ऐसी भी लूट

Crime Story: रमेश नौकरी की तलाश में था. घर की माली हालत ठीक नहीं होने से अब आगे वह पढ़ते हुए नौकरी करना चाहता था. यहांवहां पूछतेपूछते 2 महीने हो गए थे, लेकिन उसे उस के लायक कहीं काम नहीं मिला.

अचानक रमेश के दिमाग में यह आइडिया कौंध गया, ‘क्यों मैं मोबाइल पर ही यह नौकरी ढूंढ़ लूं?’
गूगल पर सर्च करते ही वर्क फ्रौम होम के जबरदस्त इश्तिहात और वीडियो देख कर रमेश को खुशी हुई.
सिर्फ 2 घंटे मेहनत कर के महीने में एक लाख रुपए कमाओ, कंपनी दे रही है घर बैठे माल, पैंसिल पैकिंग बैस्ट वर्क फ्रौम होम, रिलायंसजिओ में टैलीककौलर की आवश्यताघर से काम करें और कमाएं हजारों रुपए…’

और भी तरहतरह के दसों विज्ञापन स्क्रीन पर उभर आए. रिलायंसजिओ का नाम देख कर रमेश को इस इश्तिहार में दम लगा. उस ने उस की वैबसाइट और औफिस डिटेल्स देख कर कौन्टैक्ट नंबर पर फोन किया. सामने से जवाब संतोषजनक था, ‘रजिस्ट्रेशन के लिए सिर्फ 2,000 रुपए आप को भरना है, हमारा बंदा वहां कर आप को लैपटौप दे जाएगा और साथ ही बताएगा कि घर बैठे कैसे आप को काम करना है?’

रमेश के पास इतने रुपए नही थे. उस ने मांपिता को भी यह बात नहीं बताई, क्योंकि वह जानता था उन के पास इतने रुपए नहीं है और ही बताने पर वे उस की कुछ मदद कर पाएंगेलिहाजा, रमेश ने 2,000 रुपए अपने चाचा से मांगे. चाचा ने उस की जरूरत समझ कर पैसे दे दिए. रमेश ने वे रुपए बैंक जा कर अपने अकाउंट में डाले और फिर जिओ के उस कंपनी अकाउंट पर ट्रांसफर कर दिए.

दूसरे दिन रमेश को फोन आया, ‘आप ने हमारे यहां वर्क फ्रौम होम के लिए रजिस्ट्रेशन किया है. आप को बहुतबहुत बधाई. आप को जल्द से जल्द लैपटौप और अदर एसैसरिज के इंश्योरैंस के लिए 10,000 रुपए भरने होंगे. हम आप से लैपटौप वगैरह का पैसा नहीं ले रहे. ये रुपए इंश्योरैंस कंपनी लेगी. अगर लैपटौप वगैरह खराब होता है, तो यह जिम्मेदारी उन की होगी. आप को जल्द रुपए भरने होंगे वरना आप की फाइल पैंडिंग पड़ी रहेगी.’

रमेश ने कहा, ‘‘सर, मुझे पहले ऐसा नहीं बताया गया था कि इतने रुपए देने होंगे. मैं ने बहुत मुश्किल से उन रुपयों का इंतजाम किया है. आप मेरे रुपए वापस दीजिए प्लीज.’’ जवाब मिला, ‘आप की फाइल बन चुकी है और इसी प्रोसैस के लिए ये रुपए थे. पड़ी है आप की फाइल, हम क्या करें इस फाइल का…’
रमेश ठगा सा रह गया. दिनभर उस का कहीं दिल नहीं लगा, रात में वह बिना खाना खाए ही सो गया.

सिमरन के मोबाइल की घंटी बजी. उसे बताया गया कि फलांफलां प्रतियोगिता में उस के मोबाइल नंबर पर इनाम लगा है, जिस में 50 लाख रुपए कैश उसे मिलने वाले हैं. इस के लिए सिर्फ 3,500 रुपए प्रोसैस फीस उसे देनी है, ताकि जल्द से जल्द प्राइज अमाउंट उस के अकाउंट नंबर पर ट्रांसफर किया जा सके.
सिर्फ 3,500 ही तो देने हैं. मैं अपनी जमा की गई पौकेट मनी में से दे देती हूं,’ यह सोच कर सिमरन मचल उठी थी, लेकिन उस के पिता ने उसे रोक लिया.

गली से आवाज आई, ‘अपना लकी ड्रा खोलें और सिर्फ 3,000 रुपए में पाएं फ्रिज, वाशिंग मशीन…’
संजना ने आवाज सुनी और उसे बुला लिया. उस सेल्समैन ने बताया कि सिर्फ 1,000 रुपए में आप को यह
2 चादरों का एक पैकेट खरीदना है. इस में एक कूपन है. कूपन स्क्रैच करने पर 21 इंच का कलर टीवी, फ्रिज, इंडक्शन सिगड़ी जो भी कूपन पर खुले, उसे 2,000 रुपए दे कर आप को लेना ही पड़ेगा.
मतलब सिर्फ 3,000 रुपए में 2 चादर, फ्रीज या कलर टीवी…’ यह सोच कर संजना ने कूपन लेना तय किया. उसे विश्वास भी था कि लकी ड्रा में इंडक्शन सिगड़ी खुलेगा और हुआ भी यही. 2,000 रुपए में इंडक्शन सिगड़ी उसे लेना ही पड़ा. बिना जरूरत के संजना के 3,000 रुपए खर्च हो गए.

लूट के इन तरीकों में एक नया तरीका सामने आया, जब पता चला कि एक नामचीन मैरिज मैट्रीमोनी का नाम बोल कर किसी ने उस मैट्रीमोनी औफिस के नाम पर 20-25 लोगों से 4 से 5 हजार रुपए ऐंठ लिए.
एक कहावत है किकाली गाय कांटा खाए’. रोजगार की खोज में यहांवहां फंस रहे बेरोजगार नौजवानों के साथ यही हो रहा है. वे नएनए तरह के लालच में फंसते जा रहे हैं. यह साफ करना जरूरी नहीं है कि जो लूट रहे हैं, वे रोजगार नहीं चाहते. हो सकता है उन की भी बुरी हालत हो. भूखे मरने की जगह उन्होंने इस गलत रास्ते को अपना लिया हो.

मतलब यह है कि रोजगार के हालात इतने बदतर हैं कि हर महीने चंद हजार रुपए किए 10-10 घंटे काम करना पड़ रहा है. जरूरत है कि सरकार गांवशहरों में समय के मुताबिक रोजगार के सही रास्ते दिखाने की कोशिश करे और ठगने वालों पर कठोर कानून कार्रवाई करे.  

Crime Story: गोंडा में औनर किलिंग – लड़की को करंट लगा कर मारा

Crime Story: उत्तर प्रदेश का गोंडा जिला अपनी चीनी इंडस्ट्री के लिए मशहूर है, पर यहीं से एक ऐसी खबर आई है, जो समाज और परिवार में फैले जहर की दर्दनाक मिसाल है. यहां के पांडेय बाबा पुरवा इलाके में रहने वाली 19 साल की शिवानी पांडेय की 30 जनवरी, 2026 की सुबह संदिग्ध हालात में मौत हो गई थी. इस बारे में शिवानी के पिता चंद्र प्रकाश पांडे और भाई राहुल ने सुबह 7 बजे पुलिस को सूचना दी और बताया कि शिवानी कपड़े इस्तरी कर रही थी और करंट लगने से उस की मौत हो गई.


पर यह मामला इतना सीधा था नहीं, क्योंकि इसी बीच शिवानी के प्रेमी ने उस के पिता और भाई के खिलाफ हत्या का केस दर्ज करा दिया. इस के बाद पुलिस मौके पर पहुंची. शिवानी की लाश को पोस्टमौर्टम के लिए भेज कर जांच शुरू की. साथ ही, पुलिस को यह भी पता चला कि शिवानी का गांव में रहने वाले परमेश्वर पाठक से तकरीबन 5 साल से अफेयर चल रहा था. जब यह बात शिवानी के पिता और भाई को मालूम हुई, तो उन्होंने शिवानी को सम?ाने की कोशिश की, लेकिन शिवानी यह रिश्ता तोड़ने के लिए तैयार नहीं थी.


इस के बाद पुलिस ने शिवानी के भाई और पिता को गिरफ्तार कर लिया. कड़ाई से हुई पूछताछ में उन दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. क्यों हुआ यह कांड 28 मई, 2025 को शिवानी के प्रेमी परमेश्वर पाठक ने उस के पिता चंद्र प्रकाश पांडे से शादी को ले कर बात की थी, लेकिन उन्होंने शादी करने से इनकार कर दिया. बाद में किसी तरह नवंबर, 2025 में शादी तय हुई, लेकिन उस से पहले ही परमेश्वर पाठक के पिता की मौत हो गई और यह शादी टल गई.


हाल ही में फिर से शादी की बात उठी, लेकिन शिवानी के घर वालों ने साफ मना कर दिया. इतना ही नहीं, वे शिवानी के साथ मारपीट भी करने लगे. इस बात से तंग आई शिवानी ने अपने प्रेमी परमेश्वर पाठक को 2 बार चिट्ठी लिख कर भेजी और उस ने डर जाहिर किया कि उस के साथ कुछ भी गलत हो सकता है. इधर, शिवानी के पिता और भाई गुस्से में थे. पुलिस पूछताछ में इन दोनों आरोपियों ने बताया कि वारदात वाले दिन शिवानी सुबह के तकरीबन 5 बजे घर से चुपचाप भागने की फिराक में थी. यह पता चलने पर वे शिवानी को कमरे में ले गए और भाई राहुल ने उसे तख्त पर लिटा दिया, फिर उस के हाथों को मफलर से बांध दिया.


इस के बाद पिता चंद्र प्रकाश ने शिवानी के मुंह को दुपट्टे से बांधा और बिजली की इस्तरी के तार से उस के पैर में करंट लगाया गया. इस से कुछ देर में तड़पतड़प कर उस की मौत हो गई. इस पूरे मामले के बारे में एसपी विनीत जायसवाल ने बताया कि बेटी की पिता और भाई ने मिल कर हत्या की थी और पुलिस को गुमराह करने के लिए करंट से मौत की सूचना दी थी, पर पोस्टमौर्टम रिपोर्ट और आरोपियों के कुबूलनामे
से मामले का खुलासा हो गया और दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.                                

Social Story: एक क्लिक पर खत्म कमाई

Social Story: को कहता है, ‘‘बैंक खाता बंद हो जाएगा.’’
कोई कहता है, ‘‘लोन की वसूली होगी.’’
कोई कहता है, ‘‘पुलिस केस हो गया है.’’
कोई कहता है, ‘‘गिरफ्तार कर लेंगे.’’


और इस डर में अच्छेअच्छों की सम? काम नहीं करती. बदलती दुनिया में मोबाइल फोन अब केवल एक गैजेट नहीं रहा, बल्कि यह हमारी जेब में रखा एक पूरा बैंक, पहचानपत्र, दफ्तर, फोटो अलबम, पर्स और संचार का साधन बन चुका है, लेकिन इसी बदलाव ने अपराधियों के लिए भी एक नया दरवाजा खोल दिया है.


आज मोबाइल पर एक गलत क्लिक से आप अपनी पूरी जमापूंजी खो बैठते हैं. नौजवान, जो डिजिटल दुनिया को सब से ज्यादा सम?ाते हैं, वे भी अपराधियों की तकनीक देख कर भरम में पड़ जाते हैं और मिडिल क्लास लोग, जिन के लिए हर पाई की अहमियत बहुत ज्यादा होती है, उन के लिए डिजिटल ठगी सिर्फ माली नुकसान नहीं है, बल्कि यह इज्जत, आत्मविश्वास और मानसिक शांति की दुश्मन बन जाती है.
भारत में रोजाना हजारों लोग डिजिटल ठगी के शिकार होते हैं. हम अखबार में पढ़ते हैं :


महिला के खाते से 85,000 की ठगी. बुजुर्ग से केवाईसी अपडेट के नाम पर पैसा उड़ाया. फर्जी पुलिस अफसर बन कर नौजवान से 3 लाख की ठगी. ये खबरें तो हम पढ़ लेते हैं, पर इन में हमें पीडि़तों का दर्द नहीं दिखता. बिहार के सहरसा जिले की 40 साल की शशि देवी को सुबहसुबह मोबाइल फोन पर मैसेज आया कि आप का बैंक खाता केवाईसी अपडेट होने के चलते बंद किया जा रहा है. मैसेज के साथ एक लिंक भी था. शशि देवी ने उस लिंक पर क्लिक किया. मोबाइल पर एक परिचित जैसा फार्म खुलानाम, खाता संख्या, पता.


उन्हें लगा कि यह सामान्य प्रक्रिया है. उन्होंने फार्म भर दिया. इस के 2 घंटे बाद बैंक से फोन आया कि आप के खाते से 97,500 रुपए निकाले गए हैं. शशि देवी का पहला वाक्य था कि हम तो खाते में इतने पैसे होना भी नहीं जानते थे. इतना पैसा हम ने 10-10 रुपए बचा कर जमा किया था. डिजिटल दुनिया का
असली सच लोग तकनीक नहीं, डर से हारते हैं. हर डिजिटल अपराध में एक बात कौमन होती है कि अपराधी डर पैदा करता है. छपरा, बिहार के शिवनंदन प्रसाद, जो पूरी जिंदगी पोस्ट औफिस में लोगों के पैसे संभालते रहे, एक दिन खुद ठगी का शिकार हो गए. उन्हें फोन आया कि आप का पैंशन कार्ड ब्लौक हो गया है. वैरिफिकेशन कराइए, नहीं तो अगले महीने पैंशन नहीं आएगी.


शिवनंदन ने कहा कि बाबू, मैं बूढ़ा आदमी हूं, बताओ क्या करना है? उन्होंने ठग के कहने पर एक ऐप डाउनलोड किया और कुछ ही मिनट में उन के खाते से डेढ़ लाख से ज्यादा रुपए गायब हो गए.
शिवनंदन का दुखद वाक्य यह था कि मैं तो जिंदगीभर लोगों को सम?ाता रहा कि कागज सही रखो, अब मु? कौन सम?ाएगा कि डर क्या होता है? पहचान का गलत इस्तेमाल अपराधी अब सिर्फ पैसे नहीं, चेहरा और आवाज भी चुराते हैं. डिजिटल अपराध का सब से डरावना पक्ष है पहचान की चोरी. आज अपराधियों के हाथों में ऐसे उपकरण हैं, जिन से आप की फोटो एडिट की जा सकती है. आप की आवाज क्लोन की जा सकती है. आप की डीपफेक वीडियो बनाई जा सकती है. किसी भी पहचान को मिनटों में बदला जा सकता है. यह सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि मानसिक आतंक है.


पटना, बिहार में 22 साल की रीता को एक दिन व्हाट्सऐप पर फोन आया. लोन ऐप के गुंडे कह रहे थे कि आप ने लोन लिया है, वापस कीजिए. नहीं तो आप की अश्लील फोटो बना कर सब को भेज देंगे.
रीता सदमे में गई. उस ने कहा कि मैं ने कोई लोन नहीं लिया. लेकिन अपराधियों ने 10 मिनट में उस की फोटो को विकृत कर के आधे से ज्यादा दोस्तरिश्तेदारों को भेज दिया. रीता ने रोते हुए कहा कि पैसा तो नहीं गया, लेकिन मेरी इज्जत, मेरा आत्मविश्वास सब चला गया. औनलाइन कस्टमर केयर,
बड़ा धोखा लोग गूगल पर कस्टमर केयर नंबर खोजते हैं और सब से ऊपर दिखाई देता है फर्जी नंबर, जिसे अपराधियों ने विज्ञापन दे कर ऊपर चढ़ाया होता है. नवादा के एक टीचर राजेश कुमार एक छोटा सामान लौटाने के लिए फ्लिपकार्ट कस्टमर केयर खोजते हैं. पहले नंबर पर फोन किया. सामने से आवाज आई कि आप का रिफंड शुरू कर रहे हैं, स्क्रीन शेयरिंग औन कीजिए.


राजेश ने सोचा कि कस्टमर केयर वाला ही तो है. उन्होंने स्क्रीन शेयर किया और 2 लाख, 70,000 रुपए गायब. राजेश बोले कि गलती मेरी नहीं है. गूगल मु? सही नंबर क्यों नहीं दिखाता? ठग बन बैठे हैं नएजमींदारबक्सर के रामचरण को कोई बिजली महकमे का आदमी बन कर ठग काल करता है कि हम कनैक्शन काट देंगे, तुरंत अपडेट कराइए. फिर ठग एक ऐप डाउनलोड कराता है. रामचरण कहता है कि हम पढ़ेलिखे नहीं है. हमें क्या करना है? ठग कहता है कि बस उंगली स्क्रीन पर रखें और ऐसा करते ही 68,000 रुपए गायब.


रामचरण की पत्नी रोते हुए कहती है कि हमारे घर में तो कभी 68,000 रुपए एकसाथ नहीं रहे. जो भी था, उसी ठग ने ले लिया. फर्जी पुलिस, सब से बड़ा डर आजकल अपराधी खुद को पुलिस अफसर, साइबर सैल प्रमुख, एनआईए अफसर, सीबीआई अफसर, इनकम टैक्स अफसर, कोर्ट का क्लर्क बता कर फोन करते हैं. वे वरदी में वीडियो काल भी कर देते हैं. दिल्ली के करनदीप को वीडियो काल पर 2 आदमी वरदी में दिखे. उन्होंने कहा कि आप के नाम पर ड्रग्स वाला पार्सल पकड़ा गया है. तुरंत जुर्माना भरिए.
करनदीप डर के मारे कांपने लगा. उस ने 4 लाख रुपए भेज दिए. बाद में पता चला कि वह वीडियो डीपफेक थी.


लोग क्यों फंसते हैं अपराधी साधारण नहीं होते. उन के पास पूरी टीम होती है जैसे मनोविज्ञान सम?ाने वाले, स्क्रिप्ट लेखक, टैक्निकल एक्सपर्ट, काल सैंटर चलाने वाले, डाटा बेचने वाले. वे लोगों की कमजोरी जानते हैं. डर, लालच, शर्म, अनजान तकनीक, भरोसा जीतना, तेजी से बात करना, घबराहट पैदा करनाठग यही खेल खेलते हैं. सिस्टम है कमजोर साइबर ठगी के ज्यादातर मामलों को पुलिस वाले गंभीरता से लेते हैं, पर समस्या यह है कि अपराधी दूसरे राज्यों में होते हैं. फर्जी बैंक खाते, फर्जी सिम, वीपीएन लोकेशनऔर मिनटों में पैसा विदेश भेजना. केस करोड़ों में दर्ज, लेकिन रिकवरी 5 से 10 फीसदी.
एक साइबर अफसर ने कहा कि अपराधी हर महीने तकनीक बदल देता है. पुलिस के पास उतने संसाधन नहीं हैं.


अपराधियों का इकोनौमिक मौडल डिजिटल ठगी का खेल एक उद्योग की तरह चलता है. कमाई का तरीका. एक काल सैंटर, 15-20 मुलाजिम. रोज तकरीबन 1000 काल. 40-50 लोग फंसते हैं. रोजाना कमाई 10 लाख से 50 लाख. महीने में करोड़ों रुपए. पैसे नेपाल, बंगालदेश, दुबई, चीन तक भेजे जाते हैं.
राजस्थान की एक बुजुर्ग औरत 2 घंटे तक रोती रहीं. उन्हें किसी का बैंक मैनेजर बन कर फोन आया. ठग बोला कि आप का खाता ब्लौक हो गया, जल्दी करें. बुजुर्ग औरत ने 3 बार कहा कि बेटा, मैं बूढ़ी हूं. ठग बोलता गया और खाते से एक लाख से ज्यादा रुपए निकल गए.बुजुर्ग औरत ने रोते हुए कहा कि बेटा, हम को लगा तू ही बैंक वाला है.

हमारी आवाज सुन कर भी तू ने दया नहीं दिखाई? जनता को डिजिटल भाषा सिखानी होगी सुरक्षा सब से पहले जनता को ही सम?ानी होगी. ध्यान रखना होगा ओटीपी किसी को नहीं बताना होगा. बैंक कभी फोन नहीं करता. स्क्रीन शेयरिंग भूल कर भी करें. पुलिस वीडियो काल नहीं करती. डिजिटल अरैस्टिंग नहीं होता. केवाईसी लिंक के नाम पर 100 फीसदी धोखा. कस्टमर केयर नंबर गूगल से खोजें. अनजान ऐप डाउनलोड करें. बिजली, गैस, बैंक मैसेज नकली भी हो सकता है. कोई डरा रहा है, तो इस का मतलब साइबर अपराधी है. 1930 नंबर पर तुरंत शिकायत करें.


डिजिटल अपराध सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि एक सामाजिक समस्या भी है. डिजिटल ठगी ने भारत के हर घर को प्रभावित किया है. यह सिर्फ मोबाइल और ऐप की समस्या नहीं, यह भरोसे, सम?, डर, सिस्टम और समाज की समस्या है. हम अगर जागरूक नहीं हुए, तो आने वाले समय में डिजिटल ठगी किसी महामारी की तरह फैल जाएगी. अपराधी तकनीक से तेज हैं और हमें भी अपनी सम?ाबू? से तेज होना पड़ेगा.  Social Story

Hindi Kahani: आंखों से एक्सरे 

Hindi Kahani: जवानी की दहलीज पर खड़े दिवाकर की एक अजीब आदत थी कि जहां भी कोई लड़की दिख जाती, उस की आंखें उसी पर टिक जातीं. राह चलती, बाजार जाती, मंदिर या कालेज जाती, कोई भी लड़की दिवाकर की पारखी निगाहों से बच नहीं पाती. वह हर लड़की को ऊपर से नीचे तक ऐसे ताड़ता, जैसे उस की आंखों में सचमुच एक्सरे मशीन लगी हो.


एक दिन बाजार जाते समय की बात है. इसी हरकत को देख कर दिवाकर के एक दोस्त सोमेश ने पूछ ही लिया, ‘‘यार, इस तरह लड़कियों को घूरने से तुम्हें क्या मिलता है?’’ दिवाकर तुरंत उछल पड़ा और बोला,‘‘नयनसुख, पार्टनर नयनसुख. देखना तो मेरा शौक है , कोई गुस्ताखी थोड़े ही कर रहा हूं.’’ सोमेश ने गंभीर हो कर कहा, ‘‘लेकिन यह गलत बात है. किसी को यों घूरना भी एक तरह की बदतमीजी है, पता है ?’’


दिवाकर ने हंसते हुए हाथ ?ाटका, ‘‘अरे यार, मैं कौन सा लड़की छेड़ रहा हूं या भद्दे कमैंट्स पास कर रहा हूं? बस, खामोशी से आंखें ही तो सेंकता हूं. मेरी आंखें एक्सरे हैं, जो देखना होता है, देख लेती हैं. हाहाहा.’’ दिवाकर की बेशर्मी देख कर सोमेश ने सब्र रखते हुए कहा, ‘‘तुम्हें अंदाजा है कि तुम्हारी इसटकटकीसे लड़कियां कितना अनकंफर्टेबल महसूस करती हैं?’’ दिवाकर ने जैसे कुछ सुना ही हो और बोला, ‘‘अरे यार, अब तू मत शुरू हो जा किसी सत्संगी बाबा की तरह प्रवचन ले कर. इस उम्र में यह सब करूं तो क्या बुढ़ापे में करूंगा?’’


सोमेश ने बात बढ़ाना बेकार समझ पर दोस्ती के नाते सम?ाता हुआ साथ चलता गया. इसी दौरान वे दोनों कालेज की ओर जाने वाली सड़क पर पहुंच गए. अचानक दिवाकर की नजर सड़क किनारे खड़ी एक लड़की पर गई. वह उस की छोटी बहन दिव्या थी, जो बुरी तरह परेशान हो कर स्कूटी स्टार्ट करने की कोशिश कर रही थी. दिवाकर फौरन दौड़ पड़ा और बोला, ‘‘क्या हुआ दिव्या?’’ दिवाकर को देख कर दिव्या ने राहत की सांस ली और बोली, ‘‘अच्छा हुआ भैया कि आप गए. मेरी स्कूटी बंद हो गई है. आज कालेज में मेरा इंटरनल टैस्ट है, अगर इसे घर रख कर जाती हूं, तो पेपर छूट जाएगा. अच्छा हुआ कि आप मिल गए.’’


दिवाकर एकदम से बोला, ‘‘तुम टैंशन मत लो.’’फिर सोमेश को स्कूटी थमाते हुए दिवाकर बोला, ‘‘यार, इसे गैराज पहुंचा देना. मैं दिव्या को कालेज छोड़ कर आता हूं.’’ कालेज 7 किलोमीटर की दूरी पर था. मोड़ पर शहर जाने वाली बस कर रुकी, जिस में वे दोनों चढ़ गए. बस खचाखच भरी थी. समय की मजबूरी में उन्हें उसी बस में चढ़ना पड़ा. बस चल पड़ी. कुछ ही देर में दिवाकर ने देखा कि कई लड़के दिव्या को घूर रहे थे, बिलकुल उसी ढिठाई से, जैसा वह किया करता था.


कुछ लड़के अपने दोस्तों के साथ कानाफूसी कर रहे थे. कोई टेढ़ी मुसकान फेंक रहा था, तो कोई दिव्या को ऊपरनीचे ताड़ रहा था. दिव्या बारबार दुपट्टा ठीक कर रही थी. वह कभी नजरें ?ाका कर फर्श की ओर देखने लगती, कभी पीछे हटने की नाकाम कोशिश करती. दिवाकर यह सब देख रहा था. पहली बार उसे लगा कि बस में कईदिवाकरबैठे हुए हैं और उस की बहन का जिस्म उन की आंखों से एक्सरे की तरह भेद रहा है. उस का खून खौल रहा था, पर भीड़ भरी बस में वह उतना ही बेबस था, जितनी दिव्या.


उस पल दिवाकर को कुछ एहसास हुआ, वही एहसास जिसे सोमेश उस की सम? में सालों से डालने की कोशिश कर रहा था. हर लड़की, जिसे वह नयनसुख की चीज सम? कर ताड़ता था, शायद यही शर्मिंदगी महसूस करती होगी. दिवाकर ने बस में खड़ेखड़े पहली बार आंखें ?ाका लीं और शायद पहली बार उसे सम? आया किनयनसुखकह कर की गई उस की हर हरकत, किसी की जिंदगी में कितना बड़ादुखबन सकती है. Hindi Kahani  

लेखक –   विनोद कुमार विक्की

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