सरस सलिल विशेष

करीब 2 घंटे राकेश के परिवार के साथ बिताने के बाद कविता ने विदा ली. परिवार का हर सदस्य उसे कार तक छोड़ने आया था. अपनी जिंदगी के पहले के 23 साल कविता ने इसी शहर में गुजारे थे. फिर शादी हो गई और वह कई सौ किलोमीटर दूर ससुराल पहुंच गई.

पिछले 27 सालों में वह मुश्किल से 5-6 बार ही इस शहर में लौटी थी और यह पहला अवसर था जब उस ने राकेश के घर की दहलीज लांघी थी.

कविता को उस के जवान बेटे रोहित ने कुछ दिन पहले बड़ी गहरी उलझन में फंसा दिया था. उसी का हल ढूंढ़ने की इच्छा मन में ले कर वह इतने लंबे समय बाद अचानक राकेश के घर पहुंच गई थी.

उस के दिमाग में रोहित के कहे शब्द अब भी गूंज रहे थे : ‘मां, मैं कपूर साहब की बेटी गुंजन से शादी नहीं करूंगा,’ रोहित ने कुछ दिन पहले अचानक अपना यह फैसला बता कर कविता को बुरी तरह चौंका दिया था.

‘यह कैसी नासमझी दिखा रहा है?’ कविता फौरन गुस्सा हो उठी, ‘सारी बात पक्की हो चुकी है. दोनों तरफ से तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. तुम पर ‘हां’ कहने को किसी तरह का दबाव नहीं…’

‘मुझ पर दबाव था,’ रोहित ने उसे टोक दिया, ‘पापा ने कभी मुझ से मेरी राय नहीं पूछी. हर बात के लिए उन्होंने ‘हां’ कही है, मैं ने नहीं.’

‘तुम शादी नहीं करना चाहते थे, तो बोले क्यों नहीं?’

‘पापा की इच्छा के खिलाफ इस घर में कोई कुछ बोल सकता है क्या?’ ‘यह कोई जवाब नहीं हुआ, रोहित, वैसे तुम्हें परेशानी क्या है गुंजन से शादी करने में? लड़की सुंदर और शिक्षित है. कपूर साहब हम से ज्यादा ऊंची हैसियत के आदमी हैं. शहर में उन की बहुत इज्जत…’

‘मां, मैं शिखा से प्यार करता हूं. मेरी शादी उस से हो, इस के लिए पापा को आप ही किसी तरह राजी करो, प्लीज,’ अपनी आंखों में डर और चिंता के मिलेजुले भाव समेटे रोहित तब उस की छाती से आ लगा था.

कविता ने शिखा के बारे में उस से जानकारी ली. उस ने रोहित के साथ एम.बी.ए. किया था. उस के पिता स्कूल टीचर थे. अब वह 1 बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रही थी.

‘शिखा से प्रेम करने की जानकारी तुम ने आज तक हमें क्यों नहीं दी, रोहित? गुंजन के साथ रिश्ते की बात आगे बढ़ने देने से पहले ही तुम्हें अपना मुंह खोलना चाहिए था न,’ सारी जानकारी पा कर कविता फिर अपने बेटे पर गुस्सा हो उठी थी.

रोहित ने झिझकतेशर्माते अंदाज में सफाई दी, ‘मां, हम दोनों शुरू से ही बड़े अच्छे दोस्त थे, पर यह दोस्ती प्यार में बदल चुकी है, इस का एहसास हम दोनों को कुछ दिनों पहले ही तब हुआ था जब शिखा के रिश्ते की बात कहीं चल रही थी… वह परेशान थी… मैं उसे हिम्मत रखने को समझा रहा था और फिर अचानक हम दोनों ने एकसाथ स्वीकार किया कि अगर हम जीवनसाथी बनें तो जिंदगी बड़ी अच्छी गुजरेगी. मां, हमारी इस इच्छा को अब तुम्हें ही पूरा करवाना है, प्लीज.’

‘तेरे पिताजी कभी राजी नहीं होंगे,’ कविता की इस घोषणा से रोहित सहमत था क्योंकि उस का चेहरा उतर गया और आंखों में चिंता के भाव और ज्यादा गहरा उठे थे.

अपने पति आनंद के गरम मिजाज से कविता बहुत अच्छी तरह से परिचित थी. कपूर साहब के साथ रिश्ता जुड़ने की बात से वह बहुत खुश थे. उन्होंने कई फायदे बारबार कविता को गिनाए भी थे.

रोहित एक स्कूल टीचर की बेटी से प्रेमविवाह करना चाहता है, ऐसी मूर्खतापूर्ण बात सुन कर वह ज्वालामुखी से फट पड़ेंगे, इस बात को ले कर कविता के मन में कोई शक नहीं था.

फिर वह एक रेस्तरां में शिखा से मिली. लड़की उन्हें पसंद भी आई. उस में आत्मविश्वास पूरा था. स्वभाव से मीठी और समझदार लगी.

लेकिन गुंजन भी उसे पसंद थी. बेहद अमीर बाप की बेटी होने के कारण उस का व्यक्तित्व ज्यादा चमकदमक से भरा व कुछ नखरीला जरूर था, पर ऐसा होना स्वाभाविक भी था.

‘हमारी सोसाइटी में शिखा से कहीं ज्यादा बेहतर तरीके से गुंजन फिट होगी, तुम इस बात पर भी गौर करो, रोहित,’ कविता ने एक बार फिर अपने बेटे को समझाने का प्रयास किया था.

‘मां, मेरी नजर में पैसे से कहीं ज्यादा प्रेम महत्त्वपूर्ण है,’ रोहित नाराज हो उठा था, ‘आप ने या पापा ने कभी प्रेम किया होता तो मेरे दिल का हाल आसानी से समझ लेते.’

रोहित का यह वाक्य कविता के दिलोदिमाग में गहरी उथलपुथल मचा गया था. अपने विवाहपूर्व के प्रेमी राकेश से जुड़ी अनगिनत यादों ने कुलबुला कर अपने सिर उठाने शुरू कर दिए थे. इन के कारण वह उस रात ठीक से सो नहीं सकी थी.

बहुत हद तक इतिहास अपनेआप को दोहरा रहा है. इस एहसास ने बारबार उस के मन में उठ कर उसे भावुक सा कर दिया.

कविता और राकेश भी साथसाथ कालिज में पढ़े थे. पढ़ने में होशियार व कालिज क्रिकेट टीम के कप्तान राकेश को कविता अपना दिल बहुत जल्दी दे बैठी थी. इन के प्रेमबंधन में बंधने से पहले ही कविता की मां व राकेश के पिता इस दुनिया से विदा हो चुके थे.

राकेश की पढ़ाई का खर्चा उस का दुकानदार बड़ा भाई कठिनाई से उठा रहा था. कविता के पिता शहर के बड़े व्यवसायी थे. अत: उस को सुखसुविधा की हर चीज उपलब्ध थी.

कविता ने पहली बार अपने प्रेम का जिक्र अपने पिता के सामने तब किया जब वह महानगर में रह रहे बड़े अमीर पिता के इकलौते बेटे आनंद से उस की शादी कर ने को हामी भर आए थे.

उस रात आनंद की बगल में बेचैनी से करवटें बदल रही कविता बारबार सोच रही थी कि अगर मेरी मां और राकेश के पिता उस वक्त जिंदा होते और हमारे प्रेम के पक्ष में अपनी आवाजें उठाते, तो क्या हम जीवनसाथी नहीं बन जाते?

कविता के पिता ने अपनी बेटी की भलाई की आड़ में उस के आंसुओं को नजरअंदाज कर अपनी जिद पूरी की और कविता दिल पर गहरा जख्म लिए किसी और की दुलहन बनने को मजबूर हो गई थी.

कुछ दिनों बाद कविता को अपनी मौसी के छोटे बेटे की सगाई में शामिल होने के लिए अपने मायके के शहर में आना था.

राकेश से शादी होती तो हमारी जिंदगी कैसी गुजर रही होती? इस सवाल का जवाब पा कर रोहित की समस्या का हल ढूंढ़ने की इच्छा मन में लिए कविता ने 27 साल बाद अपने प्रेमी के घर जाने का फैसला उसी रात कर लिया था.

पूरे 2 घंटे राकेश के घर में बिताने के बाद उस ने बहुत कुछ देख, सुन और समझ लिया था. दोनों परिवारों के घर, परिस्थितियों व सदस्यों के बीच लगातार तुलना करते रहने से वह खुद को रोक नहीं पाई थी. सिर्फ एक बात को छोड़ कर वह लोग हर तरह से उन से पिछड़े हुए और कमजोर स्थिति में थे.

सिर्फ राकेश का अपना स्वास्थ्य आनंद से कहीं बेहतर था. वह आनंद की तरह मोटापे, उच्च रक्तचाप व मधुमेह का शिकार नहीं बना था.

राकेश की पत्नी निशा साधारण गृहिणी थी. बेटे की नौकरी और बेटी की शादी उस की मुख्य चिंताएं थीं. क्लब, पार्टियां, समाज सेवा, फैशन जैसी गतिविधियों की समझ और रुचि उसे नहीं थी.

उन के बेटे विवेक ने भी एम.बी.ए. किया था. फिलहाल उसे अच्छी नौकरी की तलाश थी. बेटी रितु बी.एड. कर रही थी. उस की शादी की बात कहांकहां चल रही है, निशा और कविता के बीच वार्तालाप का बड़ा हिस्सा इसी से संबंधित था.

जब राकेश उस के पास अकेला बैठा था, तब उस ने गहरी सांस खींच कर कहा, ‘यह अच्छा ही हुआ कि हमारी शादी नहीं हुई. मैं तुम्हें कभी वह ठाटबाट नहीं दे पाता जो आज तुम्हारी जिंदगी का हिस्सा है.’

‘तुम मुझे कभी याद करते हो?’ उस ने झटके से सवाल पूछ ही लिया था.

‘शुरू में बहुत करता था…अब कभीकभी याद आती हो…जब कभी अकेलेपन का एहसास दम सा घोटने लगता है, तब.’

‘तुम खुश तो हो न?’

‘उतना नहीं, जितनी तुम हो,’ राकेश अचानक हलकेफुलके अंदाज में हंस पड़ा था और फिर उन के बीच वार्तालाप का विषय परिवर्तित हो गया था.

मैं कितनी खुश रही हूं अपनी अब तक की विवाहित जिंदगी में? कार से घर वापस लौटते हुए कविता इस सवाल से भी देर तक उलझी रही.

नईनवेली दुलहन बन कर जब वह ससुराल आई तब उस के दिल पर गहरा जख्म था. मन ऐसी पीड़ा लगातार महसूस करता जिसे वह किसी के सामने जाहिर नहीं कर सकती थी.

उस ने तो राकेश को अपना जीवनसाथी माना था. तभी आनंद के लिए उस के दिल में प्रेम की कोमल भावनाएं पैदा नहीं हो सकीं.

हनीमून के दौरान वह आनंद के साथ हंसनेमुसकराने का प्रयास जबरदस्ती करती और अकेली होते ही आंसू बहाती.

उस के अंदर जोश व उत्साह की कमी को देख आनंद कभीकभी चिढ़ कर पूछता, ‘क्या समस्या है तुम्हारी, कविता? तुम बीमार हो? दर्द है कहीं?’

वह इनकार में सिर हिलाती, तो पूछता, ‘क्या मैं पसंद नहीं हूं तुम्हें?’

वह फिर इनकार करती तो आनंद नाराज हो जाता, ‘हम गोआ मौजमस्ती करने आए हैं…एकदूसरे को समझने का मौका है यह और तुम हो कि न हंसतीबोलती हो, न खुश नजर आती हो.’

तब कविता खुश रहने का नाटक करती पर दिल में बनी रहने वाली टीस कम होने का नाम न लेती.

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शादी के बाद आनंद ने अपना बिजनेस फैलाया था. वह भी गर्भवती हो गई. पति की व्यस्तता ने उसे उस की शिकायती व नाराजगी भरी नजरों से बचा लिया था.

रोहित के आगमन ने उस के दिल में जीने का जोश फिर से भर दिया. बेटे की देखभाल करते हुए उस की हंसी वापस लौट आई थी.

रोहित बोर्डिंग स्कूल में रह कर पढ़ा था. तब उस के पास काफी समय बचने लगा और उस ने अपनी सहेलियों का दायरा बढ़ाते हुए सामाजिक गतिविधियों में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी.

आनंद के साथ उस के संबंधों में कभी भी प्रेम की गरमाहट बहुत तेज नहीं हुई. उसे कभीकभी आनंद के किसी स्त्री के साथ चल रहे इश्क के चर्चे सुनने को मिल जाते, पर यह कभी खास चिंता या परेशानी का कारण नहीं बने.

उस ने कभी किसी पुरुष में दिलचस्पी नहीं ली. राकेश के कारण दिल पर लगी चोट ने उसे इस संबंध में पत्थर दिल बना दिया था.

लंच के समय तक कविता घर पहुंच गई. रोहित घर पर ही था और उस के परेशान चेहरे पर एक नजर डालते ही कविता समझ गई कि कुछ गड़बड़ हो चुकी है.

रोहित और शिखा का मामला उलझ कर सचमुच विस्फोटक हो गया था उस की अनुपस्थिति में.

रोहित ने उसे बताया कि पिछली शाम को शिखा के मामा, ताऊजी और पिता आफिस में जा कर पापा से मिले थे.

‘‘मां, मुझे मालूम होता तो उन्हें रोक लेता, पर मुझे पता नहीं था. पापा उन सब के साथ बड़े गलत ढंग से पेश आए, जोकि बिलकुल ठीक नहीं है,’’ रोहित को शायद पहली बार कविता ने इतने ज्यादा गुस्से में देखा था.

‘‘जरा शांत हो कर मुझे सारी बात बता,’’ कविता ने अपनी आवाज में चिढ़ या गुस्सा नहीं पैदा होने दिया पर उस का मन अजीब सी चिंता से भर उठा.

‘‘मां, पापा मुझे कैसी भी धमकी से डरा नहीं सकते. यह आप उन्हें साफसाफ बता देना. मुझे उन की धनदौलत से एक फूटी कौड़ी नहीं चाहिए…जरूरत पड़ी तो मैं यह घर छोड़ कर अलग रहने को भी तैयार हूं, पर शिखा से मेरी शादी जरूर होगी,’’ भावावेश के कारण रोहित की आवाज कांप रही थी.

‘‘इतने तैश में आने की जरूरत नहीं है, रोहित,’’ कविता ने उसे प्यार से समझाया, ‘‘मैं तुम्हारे पापा से बात करूंगी और…’’

‘‘और आप को उन्हें इस शादी के लिए राजी करना ही होगा, नहीं तो मैं कोर्ट मैरिज कर लूंगा.’’

रोहित की इस धमकी को दरवाजे पर खड़े आनंद ने भी सुना. इन दोनों को उस के आगमन की खबर नहीं हुई थी.

‘‘अगर तुम ने फैसला कर ही लिया है मेरी इच्छा के खिलाफ कदम उठाने का तो अपना कोई और ठिकाना ढूंढ़ लो. तुम जैसे बेवकूफ और बददिमाग बेटे से मुझे कोई संबंध नहीं रखना है,’’ आनंद ने गंभीर लहजे में अचानक अपना फैसला सुनाया तो उन दोनों को तेज धक्का लगा.

‘‘ऐसी कठोर बातें अपने इकलौते बेटे के लिए मुंह से मत निकालिए…’’

‘‘तुम बीच में बिलकुल मत बोलो,’’ आनंद ने कविता को इतनी जोर से डांटा कि वह घबरा गई.

‘‘मैं इस मामले में कैसे चुप रह सकती हूं? आप को शांति से रोहित की बात सुननी चाहिए,’’ कविता के मन की घबराहट अब नाराजगी में बदल गई.

‘‘मैं सब बकवास सुन चुका हूं और मेरा फैसला भी तुम दोनों को मालूम है.’’

‘‘ऐसे मामले में गुस्सा और जिद करने से बात ज्यादा बिगड़ जाती है और…’’

‘‘बात बिगड़ने की मुझे परवा नहीं है. तुम्हारा बेटा अपने दो कौड़ी के इश्क की खातिर समाज में मेरी इज्जत और साख को मिट्टी में नहीं मिला सकता है.’’

‘‘और आप अपनी इज्जत और साख की खातिर अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुनने के मेरे हक को छीन नहीं सकते हैं, पापा.’’

‘‘इस छत के नीचे रहना है तो तुम्हें मेरी मरजी से ही चलना होगा, रोहित.’’

‘‘अगर आप की ऐसी जिद है तो मैं घर छोड़ दूंगा,’’ रोहित ने दबने या झुकने से इनकार किया और कमरे से बाहर जाने को चल पड़ा.

‘‘यह कैसी बेवकूफी कर रहे हैं आप?’’ कविता ने गुस्से से चीखते हुए अपने पति से सवाल किया.

‘‘वैसी ही, जैसी मुझे तुम्हारे साथ करनी चाहिए थी,’’ आनंद का स्वर नफरत के  जहर से भर उठा.

‘‘मेरे साथ? क्यों?’’ कविता जोर से चौंक पड़ी.

‘‘क्यों मिलने गई थीं तुम आज सुबह राकेश से?’’

‘‘आप को कैसे पता है इस बात का?’’

‘‘तुम ने क्या सोचा था कि तुम अपने पुराने आशिक से इश्क लड़ाने जाओगी और मुझे खबर नहीं होगी?’’ आनंद ने उसे गुस्से से घूरा.

‘‘यह कैसी गलत बात मुंह से निकाल रहे हैं आप?’’ कविता बोली

‘‘मैं गलत नहीं हूं,’’ आनंद चुभते स्वर में बोले, ‘‘राकेश के साथ तुम ने खूब गुलछर्रे उड़ाए हैं, यह बात मुझे शादी के महीने भर बाद ही पता लग गई थी. अगर तुम मेरे बेटे की मां न बनने वाली होतीं तो मैं ने उसी समय तुम्हें अपनी जिंदगी से निकाल फेंका होता. तुम अपने आशिक की याद में रोती थीं और मेरा मन नफरत की आग में सुलगता था. मेरे साथ जो नाइंसाफी हुई है उस के लिए मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा.’’

आनंद की आंखों में अपने लिए नफरत, गुस्से व हिंसा के गहरे भावों को पढ़ कर कविता सकते में आ गई. उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया. एक जबरदस्त कमजोरी की लहर उस के सिर से पांव तक दौड़ी, आंखों के सामने अंधेरा छाया और वह बेहोश हो कर फर्श पर गिर पड़ी थी.

होश में आने के बाद पलंग पर लेटी कविता अपने पति के चेहरे की तरफ देखती और बारबार रोने लगती. कई बार उस ने कुछ कहने का प्रयास किया पर कांपते होंठों से कोई शब्द नहीं निकला.

‘‘आई एम सौरी… आई एम सौरी,’’ यही 3 शब्द कविता का हाथ अपने हाथ में ले कर अजीब से अपराधबोध का शिकार बने आनंद बारबार दोहरा रहे थे.

काफी देर कोशिश कर के कविता यह कह पाई, ‘‘मैं किसी की जूठन कभी नहीं थी…मैं सच बोल रही हूं.’’

‘‘मुझे मालूम है…मैं गुस्से में बेकार की बात मुंह से निकाल गया,’’ आनंद ने अफसोस जाहिर किया.

‘‘यही बात मेरी आंखों में आंखें डाल कर कहिए.’’

‘‘अब भूल भी जाओ मेरे कहे को,’’ आनंद ने मुसकराने की कोशिश की पर कविता की आंखों से अपनी आंखें मिला कर नहीं रख सके.

कविता आनंद का हाथ चूम कर रोंआसे स्वर में बोली, ‘‘यह सच है कि मैं राकेश से बहुत प्यार करती थी, पर शादी के बाद उस से कैसा भी संबंध रखने का खयाल भी मेरे मन में कभी नहीं आया. मेरी इस बात का आप विश्वास करें.’’

‘‘मुझे विश्वास है और गुस्से में मेरे मुंह से…’’

‘‘गुस्से में वही बात मुंह से निकलती है जो मन को  परेशान करती रही हो. शादी के बाद मेरे व्यवहार में बहुत सी कमियां रहीं…राकेश की याद ने हमारे प्रेम संबंध को कभी मजबूत नहीं होने दिया… आज आप के दिल के अंदर झांकने का मौका मिला है, तो मेरा मन अपनी उन नासमझियों को याद कर के बड़ी ग्लानि महसूस कर रहा है…कितना दुखी किया मैं ने आप को.’’

‘‘अब इस बारे में मत सोचो, प्लीज,’’ आनंद ने प्यार से अपनी पत्नी का गाल थपथपाया.

‘‘अपने बारे में नहीं, पर रोहित के बारे में तो हमें सोचना ही पड़ेगा,’’ कविता उन का सहारा ले उठ कर बैठी और भावुक लहजे में बोली, ‘‘परिस्थितियों के वश में हो कर हम दोनों ने अपने दिलों के बीच दूरियां बनाए रखीं, क्या हम रोहित को अपने जैसी अफसोस, दर्द व शिकायत भरी जिंदगी की तरफ धकेलने का प्रयास नहीं कर रहे हैं?’’

‘‘तुम क्या कहना चाह रही हो, मैं समझा नहीं.’’

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‘‘देखिए, रोहित कपूर साहब की बेटी गुंजन के साथ रहते हुए अगर शिखा को नहीं भूला, तो क्या होगा? हमारे बेटे ने शिखा से प्यार किया है, तो इस की सजा निर्दोष गुंजन क्यों पाए?’’

‘‘दूसरी तरफ आप की जिद के कारण बेचारी शिखा को कहीं और शादी करनी पड़ी और कल को उस के पति ने उसे रोहित की झूठन मानते हुए नजरों से गिरा दिया, तो उस की नरक सी जिंदगी के जिम्मेदार क्या हम नहीं होंगे?’’

सोच में डूबे आनंद ने कोई जवाब नहीं दिया, तो कविता ने उन से विनती की, ‘‘रोहित की जिंदगी को अपनी इच्छानुसार नियंत्रित करने के बजाय हमें अपने अनुभवों से सीखते हुए उसे सही राह दिखानी चाहिए. प्रेम बड़ी नाजुक चीज है. एक बार खोया प्रेम नष्ट हो जाए तो बड़ी मुश्किल से दोबारा मिलता है. आप भी अपने बेटे को छाती से लगा कर उसे उस का प्रेम उपहार में दे दीजिए…शिखा के इस घर में कदम पड़ने से शायद हमारे हृदय भी परिवर्तित हो जाएं…मैं आप का प्रेम पाने के काबिल बन जाऊं.’’

कविता को आनंद ने अपनी छाती से लगाया तो वह रो पड़ी. अचानक ही आनंद को भी अपनी पलकें गीली होती महसूस हुईं, तो वह मन ही मन हैरान हो उठे. उन्हें ऐसी कोई घटना नहीं याद आई जब बड़े होने के बाद कभी आंसू बहाने की नौबत आई हो.

उन का मन अचानक बेहद हलका और प्रसन्न हो उठा. उन्होंने प्यार से कविता का माथा चूमा और मुसकराते हुए बोले, ‘‘जाओ, जा कर अपने सलीम से कहो कि इस अकबर सम्राट ने उसे उस की नारकली दे दी है. शिखा ही हमारी बहू बन कर आएगी.’’

‘‘थैंक यू,’’ कविता जोर से उन से लिपटी और फिर अपनी सारी कमजोरी भूल कर रोहित को यह खुशखबरी देने को दौड़ती सी कमरे से बाहर चली गई.

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