सरस सलिल विशेष

दोस्तो, मुझे पकौड़े बनाने का कोई तजरबा नहीं है. मैं ने तो कभी घर में भी पकौड़े नहीं बनाए थे. पर जब सरकार ने कहा है कि पकौड़ों में लखपति बनाने की ताकत है तो मैं ने सरकार के पकौड़ों का हिस्सा होने के लिए आव देखा न ताव, घर के स्टोर से टूटीफूटी कड़ाही निकाली, दादा के वक्त का कैरोसिन का चूल्हा साफ किया और एक परात में बेसन के बदले मक्के का आटा, नमक, मिर्च पता नहीं किस के स्वाद के हिसाब से मिला, सड़े आलू काट अपने महल्ले के किनारे की सरकारी जमीन पर शान से पकौड़ा भंडार खोल दिया और उस का नाम रखा ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’. पकौड़ों के उस भंडार का नाम सरकारी था इसलिए किसी भी सरकारी मुलाजिम की मुझ से यह पूछने की हिम्मत न हुई कि सरकारी जमीन पर पकौड़ा भंडार क्यों खोला? मुझे पता था कि कोई सरकारी मुलाजिम सब से पंगा ले सकता है पर अपनी सरकार के बंदों से नहीं.

दोस्तो, सरकारी जमीन पर सरकारी नाम का पकौड़ा भंडार नहीं खुलेगा, तो क्या अपने घर में खुलेगा? सरकार के नाम की दुकानें सरकार की गैरकानूनी तौर पर कब्जाई जगह पर ही खुल कर शोभा पाती हैं. नियमानुसार सरकारी जमीन पर सरकारी बंदे ही कब्जा कर सकते हैं. आम आदमी सरकारी जमीन पर कब्जा करना तो दूर, उस ओर देखने की भी हिम्मत करे तो उस की आंखें निकाल दी जाएं.

अपने पकौड़ा भंडार का ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ नाम रखने के चलते सब ने यही सोचा कि मैं सरकार का राइट नहीं तो लैफ्ट हैंड जरूर हूं, बल्कि थानेदार साहब ने तो मेरे कच्चे पकौड़ों की तारीफ करते हुए मेरी पीठ थपथपा कर यहां तक कह डाला कि ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ के लिए फर्नीचर की जरूरत हो तो बता देना. आधे रेट में दिलवा दूंगा. अगर कोई विपक्ष वाला मेरे ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ की ओर आंख उठा कर भी देखे तो वह थानेदार उस की आंख तो आंख, आंत तक निकाल कर हाथ में दे देगा.

हफ्तेभर में ही सरकार के पकौड़ों के साथ अपने अधकच्चे, अधपके पकौड़ों का कदमताल करवाने का यह फायदा हुआ कि हर कोई अपने को सरकारी पकौड़ों का ग्राहक बताने के चक्कर में मेरे पकौड़ों को बिन दांतों के भी चटकारे लेले कर अपने पेट में धकियाता रहा. सब को यही लगता रहा कि जैसे वे मेरे पकौड़े नहीं, बल्कि सरकार के पकौड़े खा रहे हों. मुझ से किसी की यह भी कहने की हिम्मत नहीं हुई कि पकौड़ों में नमक नहीं है, पकौड़ों में मिर्च ज्यादा है. मैं देखते ही देखते सरकारी पकौड़ों का अहम हिस्सा हो गया. विपक्ष वाले भी अपने को सरकार का हिस्सा साबित करने के बहाने अपने मुंह पर नकाब लगाए आते और मेरे पकौड़ों को सरकारी पकौड़ों का हिस्सा मान कर अपने को सरकार के बंदे घोषित करवा कर चुपचाप पकौड़े खा जाते.

चटनी की जगह पानी होता तो उसे भी चटकारे लेले पीते. यह सरकार की मुहर का प्रोडक्ट भी बड़ा अजीब होता है दोस्तो, सरकार के प्रेमी उसे यों चाटते हैं कि… मैं मजे से बेखौफ हो कर जितना मन करता, पकौड़ों में बेसन के बदले मक्के का आटा मिला देता. तेल हुआ तो हुआ, वरना खाली कड़ाही में ही पकौड़े तल दिए. महीनेभर से इसी तरह सरकारी पकौड़ों के नाम पर जनता को ठगने का अपना काम बुलंदियों पर था. सौ ग्राम के बदले 75 ग्राम तोलो तो भी कोई पूछने वाला नहीं. सरकार अपनी, तो तराजू भी अपनी. सरकार अपनी, तो मिर्च भी अपनी. सरकार अपनी, तो सड़े आलू भी अपने. सब मजे से ठीकठाक चल रहा था कि पता नहीं कहां से एक हाथी पर, दूसरा साइकिल पर, तो तीसरा दिन में ही लालटेन जलाए अपने को सैंपल भरने वाले बता कर आ धमके.

सैंपल भरने वाले पहले भी आते थे पर ‘सरकारी पकौड़ा भंडार’ का मुकुट मेरी दुकान के माथे पर लगा पढ़ दुम दबाए माफी मांगते आगे हो लेते थे. सैंपल भरने वालों में से एक ने मेरी सरकारी पकौड़ों की परात को घूरते हुए पूछा, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘सरकारी पकौड़े हैं और क्या…’’ मैं ने गुर्राते हुए कहा. ‘‘कच्चे? जनता को बीमार करना है क्या?’’ ‘‘जनता तो जन्मजात ही बीमार है सर, इसलिए इस व्यवस्था में उस के सेहतमंद होने की सोचना भी फुजूल है. अब रही बात मेरे पकौड़ों की, तो सरकारी मुहर और नाम वाले पकौड़े चाहे कैसे भी हों, वे पके ही होते हैं. हर कोण से सेहत के लिए बढि़या ही होते हैं,’’ मैं ने सरकार के पक्ष में कहा, पर फिर भी वे चुप न हुए.

मन किया सरकार को फोन लगा दूं कि ये बेतुके से सैंपल भरने वाले कहां से भेज दिए आप ने जो सरकारी मुलाजिम होने के चलते सरकार के ‘मेड इन इंडिया’ पकौड़ों पर ही सवाल उठा रहे हैं. ‘‘पकौड़ों के नाम पर जनता को ठगते हो?’’ लालटेन वाले ने मुंह में पकौड़ा डाल कर मुंह बिचकाते हुए पूछा.

‘‘सर, लुट चुकी जनता का अब और क्या ठगना…’’ मैं ने दोनों हाथ जोड़े कहा तो साइकिल पर बैठा सैंपल भरने वाला नीचे उतरा और बोला, ‘‘अब ये पकौड़े नहीं चलेंगे,’’ फिर उस ने हाथी पर से पकौड़ों की क्वालिटी चैक करने वाली मोबाइल किट निकाली और उस में 2 सरकारी पकौड़े डाले.

5 मिनट तक वह उस किट में उन पकौड़ों को हिलाता रहा. उस के बाद पकौड़ों का घोल देख कर उस ने कहा, ‘‘पकौड़ों का सैंपल फेल…’’ ‘‘पर सर, ये मेरे निजी नहीं, सरकारी पकौड़े हैं.’’

‘‘होते रहें. बहुत खिला लिए जनता को कच्चे, मिलावटी पकौड़े. कल से पकौड़ों की दुकान बंद.’’ ‘‘तो मेरा क्या होगा साहब?’’

‘‘सरकार की जनता को उल्लू बनाने वाली अगली स्कीम का इंतजार करो,’’ उन में से एक ने कहा और वे तीनों मदमाते आगे हो लिए.

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