सरस सलिल विशेष

आज लाइफ भी फास्ट फूड जैसी बनती जा रही है. इंतजार, मेहनत और सब्र जैसे कहीं गायब होते चले जा रहे हैं. प्रेम भी फास्ट फूड जैसा होता जा रहा है. कहीं किसी किताब में रखा बरसों पुराना सूखा गुलाब, किसी उपन्यास के पन्ने पर सूख चुके आंसुओं के निशान कहीं उस पल को, उस लमहे को न तो पुराना होने देते हैं न ही भूलने देते हैं. कितने खुशनुमा पल होते होंगे वे जब अलसाई दोपहर में किसी की यादों में खोए समय को जीना, किसी घने वृक्ष की छाया में लेटेलेटे बादलों की मदहोशी में अपने को मदहोश कर लेना कितना अच्छा लगता है. नजदीक से ही चिडि़या का फुर्र से उड़ जाना कितना प्यारा एहसास होता है.

फिल्म ‘परदेश’ की नायिका नायक शाहरुख खान से कहती है कि मुझे ऐसा प्यार चाहिए जैसा तुम करते हो. शाहरुख कहता है कि मुझे भी ऐसा ही प्यार चाहिए जिस में शरारत हो, भोलापन हो, मस्ती हो, लेकिन उस में लालच और बनावट न हो. दिखावा, महंगे कपड़े, लिपेपुते चेहरे वाली युवतियां जो कपड़ों की तरह प्रेमी बदलती हैं, जिन के लिए प्रेम एक अराधना हो, एक तड़प हो, एक प्यास हो, एक मीठी कसक हो, एक नाजुक सा समर्पण हो. लेकिन कब तक इंतजार करूं, कहां हो तुम जिस की तलाश है मुझे. मेरे वे सब सपने अधूरे हैं. मैं उन सब सपनों में रंग भरना चाहता हूं.

यात्रा तो मैं ने फिरोजपुर जनता ऐक्सप्रैस से शुरू की थी, बोरीवली और बांद्रा तक, पर फिर तो लोकल ट्रेन से ही मेरा सफर पूरा हुआ.

चर्चगेट से बांद्रा और बोरीवली आतेजाते सफर का आनंद तो न जाने कहां उड़न छू हो गया, बस एक रूटीन सा बनता चला गया. ये सब मेरे जौब लगने के बाद हुआ, उस के पहले ऐसा नहीं था. बांद्रा में मेरा घर है. जब शुरुआती दिन थे तो बड़ा मजा आता था, कभी लोकल ट्रेन में जगह मिल जाती थी तो कभी खड़े हो कर ही सफर पूरा करना पड़ता था. लोकल ट्रेन में युवतियों को घूरने का अपना ही आनंद होता है.

कभीकभी ऐसे वाकेए होते थे, लगता था अफेयर हो रहा है, पर फिर टांयटांय फिस्स. युवती कहीं और बुक है, उस की कहीं और सैटिंग है, इसलिए समझ में नहीं आता कि यह पता कैसे चले कि युवती का कोई लवर नहीं है. बौयफ्रैंड और गर्लफ्रैंड वाली परिपाटी मेरी तो समझ में नहीं आती. इस में लव कहां से टपक पड़ा?

ऐसा ही एक वाकेआ है. एक युवती मुझे हमेशा टकराती थी. मुझे भी हर दिन जब वह नहीं दिखती थी तो उस का इंतजार रहता था. ऐसा कई बार हुआ कि वह नहीं मिली तो मैं दूसरे दिन उस का इंतजार करता रहा.

जब वह मिलती तो एकटक हम दोनों एकदूसरे को देखते रहते. मेरे व्हाट्सऐप पर भी सैकड़ों फ्रैंड थे. बीचबीच में उस युवती से ध्यान हटा कर मैं व्हाट्सऐप पर आए मैसेज पढ़ने में बिजी हो जाता, फिर मैसेज पढ़ने के बाद उस युवती की तरफ ध्यान देता, तो पाता कि वह भी अपने मोबाइल पर बिजी है. मोबाइल पर उस की उंगलियां बड़ी तेजी से चल रही हैं.

यही तो रोना है, वाट लगा दी फेसबुक और व्हाट्सऐप ने. समझ नहीं आता किस के व्हाट्सऐप पर कितने फ्रैंड्स हैं. कितनी देर और कबकब चैटिंग हो रही है. मेरे एक फ्रैंड ने बताया कि उस के 2 हजार फ्रैंड्स हैं. मैं ने बड़े आश्चर्य से उसे देखा और पूछा, ‘‘2 हजार?’’

‘‘हां, 2 हजार, फ्रैंड्स,‘‘ उस ने बड़े गर्व से बताया.’’

मैं ने उस से पूछा, ‘‘2 हजार में से मुलाकात कितनों से होती है?’’

‘‘मुलाकात, कैसी मुलाकात? लाइक करो, शेयर करो, कमैंट्स करो, हो गई मुलाकात. यदि कोई पसंद नहीं है तो उसे डिलीट कर दो या फिर ब्लौक कर दो,’’ कह कर वह जोरजोर से हंसने लगा.

मुझे आज अपने उस दोस्त की याद आई और मैं सोचने लगा कि यह युवती भी या तो मैसेज कर रही है या फिर मैसेज पढ़ कर डिलीट मार रही होगी. मैं भी तो ऐसा ही करता हूं न. आज के युग में, आज के समय के साथ चल रहा हूं, फिर यह दिमागी टैंशन क्यों? क्या चाहता हूं मैं, समझ नहीं आता?

यह दोस्ती यानी फ्रैंडशिप भी क्या चीज हो गई है लाइक करते रहो, कमैंट्स करते रहो, शेयर करो, कभीकभार कोई पट जाए तो फ्रैंडशिप, मिलने के लिए गोते लगाते रहो. कहीं मुलाकात हो गई तो ठीक है

नहीं तो डिलीट मारते रहो. इंटरनैट की फ्रैंडशिप फ्रैंडशिप नहीं बल्कि भाजीतरकारी खरीदनेबेचने जैसी हो गई है.

हां, तो मैं बता रहा था कि कभी तो वह युवती बिजी मिलती और कभी मैं बिजी हो जाता. हम दोनों उड़ती नजर एकदूसरे पर डालते और दोनों चर्चगेट पर उतर कर अपनीअपनी राह पकड़ लेते. ये सब तब होता जब लोकल ट्रेन में जगह मिल जाती अन्यथा खड़ेखड़े ही सफर करना पड़ता.

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एक दिन मैं हमेशा की तरह लोकल टे्रन में चढ़ा ही था कि मेरी नजरें कहीं कोई टिकने की जगह तलाश रही थीं. दूर तक नजर डाली, लेकिन कहीं कोई चांस नहीं दिखा. नजर जैसे ही नजदीक वाली सीट पर पड़ी वही युवती सीट पर विराजमान थी. मैं ने उसे रिक्वैस्ट भरी नजरों से देखा. एक मधुर मुसकराहट से उस की तरफ देखा. उस ने उस रिक्वैस्ट का सम्मान करते हुए मुझे आंखों से इशारा किया और थोड़ी सी जगह बना दी. अंधा क्या चाहे दो आंखें. मैं तुरंत जा कर उस के साथ बैठ गया.

लोकल ट्रेन ने अपनी स्पीड पकड़ी. मैं ने उस युवती से बातों का सिलसिला जारी रखने की कोशिश में अपना मोबाइल निकाला और बिजी दिखाने की कोशिश करने लगा, लेकिन मुझे लग रहा था कि जैसे शरीर में कान उग आए हों. आखिर मैं ने ही बात शुरू की.

‘‘आप चर्चगेट तक जाएंगी?’’ मैं ने थोड़ा फ्रैंडली होने की कोशिश की.

‘‘हां, चर्चगेट तक. लगभग रोज ही देखते हैं आप,’’ युवती मुसकराते हुए बोली.

‘‘आप?’’ युवती ने सवाल किया.

‘‘चर्चगेट, जौब है वहां,’’ मैं ने अपने हाथ की खूबसूरत घड़ी देखते हुए कहा. इतनी देर में उस के मोबाइल पर लगातार कई मैसेज आ गए और मेरी बातें बीच में ही छोड़ कर वह फोन पर मैसेज देखने में बिजी हो गई.

मैं ने भी अपना मोबाइल निकाला और व्हाट्सऐप में बिजी हो गया. इतनी देर में चर्चगेट आ गया. हम दोनों वहीं उतर गए. उतरतेउतरते मैं ने उस से पूछा, ‘‘आप का नाम?’’

‘‘नीरा,’’ जवाब मिला. फिर वह भीड़ में कहीं गुम हो गई. मेरे नाम में उसे इंट्रैस्ट नहीं था शायद.

कुछ दिन बाद फिर वह मुझे मिली. मैं ने उस से पूछा, ‘‘नीराजी आप, इतने दिन बाद?’’

‘‘नहीं, मैं रैगुलर आ रही हूं,’’ फिर वह पर्स से छोटा सा आईना निकाल कर अपनी लिपस्टिक ठीक करने लगी.

‘‘अरे, मैं ने आप का नाम तो पूछा ही नहीं.’’

‘‘जितेंद्र.’’

‘‘ओह… उस ने अपने होंठों को गोल घुमाया. अगर मैं आप को जीतू कहूं तो,’’ नीरा ने मस्ती भरे स्वर में कहा.

‘‘और मैं आप को नीरू…’’ मैं कहां पीछे हटने वाला था.

‘‘ओके जीतू.’’

‘‘ओके नीरू.’’

फिर क्या था. हमारी मुलाकात लोकल ट्रेन में रोज होने लगी.

हम दोनों अकसर अब शाम को जौब से लौटने के बाद चर्चगेट पर एकदूसरे का इंतजार करने लगे. वहां से साथसाथ ही वापसी के लिए लोकल ट्रेन में बैठते. वह बोरीवली उतरती और मैं दादर.

मुझे एहसास होने लगा था कि मैं उसे चाहने लगा हूं, लेकिन वह भी मुझे चाहती है या नहीं यह कैसे पता चले? इसी कशमकश में रोज उस के साथ बंधता चला जा रहा था. कभीकभी चर्चगेट पर हम दोनों किसी रेस्तरां में जा कर स्नैक्स, कौफी व आइसक्रीम जम कर ऐंजौय करते.

मुझे वह अब अच्छी लगने लगी थी. उस का व्यवहार देख कर मुझे लगता कि वह भी मुझे चाहती है. उस का जीतूजीतू कह कर बोलने का अंदाज मुझे भाने लगा था, लेकिन कभीकभी बीच में बातों के दौरान जब वह व्हाट्सऐप पर बिजी हो जाती, तब मैं खुद को ठगा सा महसूस करता. लगता था कि जैसे जबरदस्ती आ गया हूं, लेकिन मैं कर भी क्या सकता था.

अकसर लोकल ट्रेन में मुझे एक युवती इधरउधर घूमती दिखती थी. उस के बिखरे बाल, कुछकुछ फटेपुराने कपड़े. हम लोग अकसर हर फ्राइडे को नाश्तापार्टी करते थे तो वह युवती भी हमारे आसपास मंडराने लगती थी. हम उसे भी नाश्ता करवा देते थे, तो वह बहुत खुश हो जाती थी.

उस के कपड़े व हावभाव देख कर उस के पागल होने का भ्रम होता था, इसलिए मैं ने उस का नाम ही बावली रख दिया था. उस की बड़ीबड़ी काली आंखें जो अकसर खोईखोई रहती थीं. मासूमियत से भरा सांवला चेहरा, चेहरे पर बालसुलभ चंचलता, उम्र होगी यही कोई 24-25 वर्ष.

पकौडि़यों की सुगंध हो या समोसे की, बावली समोसे और पकौडि़यां ले कर खुश हो कर चली जाती. बावली का ध्यान एक फेरी वाला रखता था, जो अकसर लोकल ट्रेन में बावली के पीछेपीछे घूमता रहता था. उस फेरी वाले को देखते ही बावली खुश हो जाती थी.

खुशी के मारे उस के अंगअंग में बिजली सी दौड़ने लगती थी. खुशी के जो भाव उस की आंखों में देखने को मिलते थे. उन में एक जनून सा दिखता था. एक प्रेम करने वाले की आंखों में ही ऐसा जनून होता है, क्या बावली फेरी वाले से प्रेम करती है?

वह जनून, वह नशा, मुझे कब मिलेगा? प्रेम के इस बावलेपन का न जाने कब से मैं इंतजार कर रहा हूं. क्या पता नीरू मुझे इस बावलेपन के साथ चाहने लगे? यह सोच कर मैं ने सामने बैठी नीरू को देखा पर वह व्हाट्सऐप पर बिजी थी. मैं ने अपनी नजरें फेर लीं.

चर्चगेट आने का अनाउंसमैंट हो चुका था. मैं अपना बैग लिए गेट पर आ गया था. मैं ने देखा कि नीरू भी ठीक मेरे साथ ही आ कर खड़ी हो गई थी.

चर्चगेट आते ही हम दोनों उतर पड़े.

‘‘ओके जीतू, अभी अपनेअपने औफिस चलते हैं शाम को यहीं मिलेंगे.’’

‘‘ओके नीरू,’’ मैं ने कहा.

‘‘बायबाय,’’ कहती हुई नीरू अपनी मंजिल की तरफ चली गई और मैं अपनी मंजिल की तरफ. चलतेचलते मैं सोच रहा था कि अच्छा सा मौका देख कर नीरू को अपने प्यार का इजहार कर ही दूंगा, लेकिन कब? कल शाम को. औफिस के बाद मेरिन ड्राइव का प्रोग्राम बनाता हूं.

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औफिस पहुंच कर टेबल पर फैली डाक को समेटा, फिर कंप्यूटर खोल कर ईमेल चैक करने लगा, लेकिन मन था कि नीरू की तरफ ही दौड़ कर पहुंच रहा था. काम में मन नहीं लग रहा था, रहरह कर मन उचट रहा था. जैसेतैसे शाम हुई, मैं ने नीरू को मैसेज किया, ‘‘कल शाम को डिनर हम साथ करेंगे और मेरिन ड्राइव भी चलेंगे.’’

‘‘ओके जीतू,’’ नीरू की स्वीकृति आ गई.

वापसी में नीरू नहीं दिखाई दी. मैं ने उस का इंतजार भी किया, जहां वह अकसर मिलती थी, लेकिन जब वह दिखी नहीं तो मैं लोकल ट्रेन में बैठ गया और सोचने लगा कि हो सकता है वह निकल गई हो या देर से आए. कुछ सोच कर मैं ने मैसेज किया कि तुम कहां पर हो?

‘‘ओह… सौरी जीतू मैं तो घर आ गई.‘‘ नीरू का कुछ देर बाद जवाब आ गया.

‘‘क्या तुम औफिस से जल्दी निकल गई थी?’’ मैं ने मैसेज किया.

‘‘ हां. मेरा एक फ्रैंड आ गया था, उस के साथ मैं मौल गई थी और फिर घर आ गई. डौंटवरी हम कल मेरिन ड्राइव पर मिलेंगे. बायबाय,’’ नीरू का मैसेज आ गया.

‘‘ओके नीरू,’’ मैं ने मैसेज पढ़ कर जवाब दे दिया.

फिर वही रूटीन, दूसरे दिन मैं लोकल ट्रेन में खड़ा हो गया, बैठने तक की कहीं जगह नहीं मिली. इसलिए व्हाट्सऐप वगैरा भी देख नहीं पाया. सिर्फखयालों में वही लोकल ट्रेन में घूमने वाली बावली आ रही थी, उस की आंखों में छाया प्यार का जनून क्या कभी मुझे नसीब होगा. जब कहीं सचाई होती है तो शरीर के पोरपोर से टपकने लगती है. आंखों में उस प्रेम का नशा हमेशा बना रहता है, व्यक्ति भीड़ में भी खुद को अकेला महसूस करता है. वह खोयाखोया रहता है.

आज कहीं बावली दिखी भी नहीं, लेकिन नीरू में रहरह कर मुझे वह बावली दिखने लगती. खयालों के इसी भंवर में उलझताउलझता मैं औफिस पहुंच गया. फाइलों के हर पेज पर मुझे नीरू और बावली की शक्ल दिखती. कभीकभी दोनों चेहरे एक होने लगते तो कभी अलगअलग. कंप्यूटर पर भी मुझे नीरू और बावली  की ही शक्लें दिखतीं. जैसेजैसे शाम नजदीक आ रही थी मेरे दिल की धड़कनों का ग्राफ बढ़ता जा रहा था.

जैसे ही ड्यूटी का समय खत्म होने को आया, मैं ने मैसेज छोड़ दिया, ‘‘नीरू, कहां हो तुम?’’

‘‘मैं चर्चगेट पर हूं,’’ नीरू का मैसेज आया.

फिर क्या था मैं ने जल्दीजल्दी अपने बालों को ठीक किया और चर्चगेट की तरफ चल दिया.

ठीक 10 मिनट बाद मैं नीरू के सामने था. हम दोनों ने एकदूसरे को देखा और टैक्सीस्टैंड की तरफ बढ़ गए. कुछ समय बाद हमारी टैक्सी मैरिन ड्राइव की तरफ जा रही थी. मैं हसरत भरी नजरों से नीरू की तरफ देखने लगा. नीरू ने आज पिंकग्रीन कलर का सूट पहना था. ग्रीन लैगिंग्स, पिंक शौर्ट स्लीवलैस कुरती और ग्रीन दुपट्टा गले में मफलर की तरह लपेट रखा था. कुरती में शरीर के अंदर की झलक साफसाफ दिख रही थी. मैं ने नजरें फेर लीं. मुझे आधुनिक ड्रैस पसंद है, लेकिन भोंड़ापन मैं सहन नहीं कर पाता. जब अफेयर है तो भोंड़ापन चलेगा.

मैरिन ड्राइव पर भीड़ उस दिन बाकी दिनों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही थी, लेकिन मुंबईवासियों के लिए यह आम बात है. हम ने अपनी जगह निश्चित की. हमारे सामने विशाल समुद्र अपनी ताकत पर गुमान करता हुआ हिलौरे भर रहा था. हम दोनों उस शोर में अपनी दोस्ती को प्रेम का रूप देने वाले थे.

समझ में नहीं आ रहा था कि मैं बात कहां से शुरू करूं. इतने में नीरू के मोबाइल पर मैसेज की लाइन लग गई और वह व्हाट्सऐप में बिजी हो गई. मैं ने भी अपना मोबाइल निकाला और फेसबुक देखने लगा, पर दिल नहीं लगा. आखिर मैं ने झल्ला कर फोन बंद कर दिया. सोच लिया कि एक बार तो बात कर ली जाए. मैं ने देखा नीरू अभी भी व्हाट्सऐप पर ही उलझी हुई है.

मैं ने कहा, ‘‘नीरू छोड़ो भी मोबाइल, हम यहां बात करने आए हैं कि मोबाइल व्हाट्सऐप देखने.’’

‘‘ओके जीतू, सिर्फ 2 मैसेज और बचे हैं. बस, फिर में फ्री हूं.’’

मैं ने मन को समझाया कि 5-10 मिनट और सही.

आखिर 10 मिनट बाद नीरू फ्री हुई, ‘‘बोलो न, तुम कुछ बोलना चाहते थे,’’ नीरू ने मोबाइल पर्स में रखा और मुझ से बोली.

‘‘नीरू, देखो, मैं साफसाफ बात करना चाहता हूं, घुमाफिरा कर बात करना मुझे नहीं आता.’’

‘‘बोलो न यार, कह कर नीरू ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया.’’

मुझ में थोड़ी हिम्मत आई. मैं ने उस के हाथ को महसूस किया, नौर्मल था, लेकिन मुझे मेरा हाथ बेहद गरम महसूस हो रहा था. दिल में हलकी सी घबराहट भी महसूस कर रहा था.

‘‘देखो, नीरू, हम अच्छे दोस्त हैं, क्या हम लाइफ पार्टनर नहीं बन सकते? एकदूसरे को हम समझते भी हैं. हमारे विचार और पसंद भी काफी मिलतेजुलते हैं, तुम क्या सोचती हो?’’ मैं ने कहा.

वह बड़े ध्यान से मेरा चेहरा देखने लगी. फिर खिलखिला कर जोर से हंस दी. मेरा कलेजा मुंह को आने लगा. मैं खुद को हताश सा महसूस करने लगा.

‘‘क्यों, क्या मैं ने कोई गलत बात कही?’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं भोलूराम, नहीं. तुम ऐसा कैसे सोच सकते हो?’’ नीरू ने कहा.

‘‘क्या मतलब?’’ मैं ने आश्चर्य से देखा.

‘‘अरे यार, फेसबुक, व्हाट्सऐप पर मेरे लगभग हजार फ्रैंड्स हैं, कई फ्रैंड्स से अकसर मिलती रहती हूं, उस दिन जो औफिस से जल्दी गई थी वह मेरा फेसबुक फ्रैंड था, जिस के साथ मुझे शौपिंग भी करनी थी और उसी की गाड़ी में चली गई थी. इस में प्रेम वाली बात कहां से आ गई? तुम भी इन्हीं में से एक फ्रैंड हो,’’ नीरू ने बिंदास हो कर कहा.

मेरे पांवों के नीचे की जमीन ने खिसकना शुरू कर दिया था. मैं गूंगा बन गया था.

‘‘और, जीतू, तुम्हारे कितने फ्रैंड्स हैं व्हाट्सऐप पर,’’ नीरू ने मेरा कंधा पकड़ कर झकझोरा.

मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.

‘‘यही कोई 15-20 युवक युवतियां कुल मिला कर,’’ मैं ने बड़ी मुश्किल से कहा.

‘‘15-20,’’ नीरू ने जो हंसना शुरू किया तो उस की हंसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी.

‘‘क्या फायदा इतनी फ्रैंडलिस्ट से. क्या सभी से दोस्ती हो जाती है,’’ मैं ने फिर समझाने की कोशिश की.

‘‘काहे की दोस्ती, कुछ लोगों से मिलतेजुलते रहो, बाकी को मैसेज भेजते रहो,’’ नीरू ने कहा.

‘‘चलें, आप की बात खत्म हो गई हो तो,’’ नीरू ने कहा और पूछा ‘‘डिनर कहां लेंगे?’’

‘‘डिनर, हां याद आया मुझे, डैडी के साथ एक फंक्शन में जाना है, डिनर मैं वहीं करूंगा,’’ मैं ने झूठ बोला.

‘‘क्या बकवास करते हो?’’ नीरू गुस्से से भड़क गई, ‘‘फालतू में टाइम खराब किया.’’

जब मैं घर पहुंचा तो मेरे शरीर में जान तो बची नहीं थी. यह दूसरी युवती थी, जिस ने मेरे दिल को इस कदर तोड़ा था. मुझे संभलने में महीनों लग गए, पर मैं ने व्हाट्सऐप और फेसबुक पर दायरा सीमित कर लिया. कसम खा ली व्हाट्सऐप और फेसबुक पर दोस्ती नहीं करूंगा.

VIDEO : नेल आर्ट डिजाइन – टील ब्लू नेल आर्ट

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