मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के ब्लौक छपारा की भीमगढ़ कालोनी में छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले से आ कर रह रही लता डांस पार्टी में 40 लोग थे. इन में नौजवान लड़कियों की तादाद ज्यादा थी. भीमगढ़ कालोनी में पार्टी के सदस्यों ने डेरा डाला. किराए पर लिए गए कच्चेपक्के मकानों में बुनियादी सहूलियतों का टोटा था, पर इन्हें इस से कोई खास फर्क पड़ा, हो ऐसा लगा नहीं. अस्थायी गृहस्थी में जरूरत का सारा सामान था, मसलन खाना बनाने के बरतन, कपड़े रखने के लिए पेटियां, सूटकेस और इन के लिए सब से ज्यादा अहम मेकअप का सामान जो करीने से सजा कर रखा गया था. डांसरों की नई चमकीली ड्रैसें संभाल कर दीवार के सहारे टांग दी गई थीं. 3-4 अधनंगे बच्चे भी इन के साथ थे जो दिनभर हुड़दंग मचाते रहते थे पर गांव के दूसरे बच्चे इन के साथ नहीं खेलते थे, जिस का इन्हें मलाल था.

बच्चे तो ठहरे बच्चे, जो यह नहीं समझ पाए कि गांव के बच्चों को उन से दूर रहने की नसीहत और समझाइश दी गई है. पर बिगड़ते माहौल का अंदाजा डांस पार्टी की उम्रदराज मुखिया यानी मैनेजर जोति बाई को था और कमसिन, खूबसूरत, तीखे नैननक्श वाली डांसर रति को भी. पर इन्हें इस तरह के एतराज का तजरबा है, लिहाजा इन्होंने कोई खास तवज्जुह गांव वालों के एतराज पर नहीं की. फिर भी एक चिंता तो लग ही गई थी.

छपारा में डेरा डालने से पहले ये लोग थाने गई थीं और वहां अपनी आमद दर्ज कराई थी. आमद के साथ मुंहजबानी यह ब्योरा भी इन्होंने थानाध्यक्ष को दिया था कि हम नाचनेगाने वाले लोग हैं और हर साल यहां आ कर ठहरा करते हैं. ऐसा एहतियात के तौर पर इसलिए किया गया था कि अगर इस इलाके में कोई जुर्म हो तो गांव वाले उस का ठीकरा डांस पार्टी के सिर पर न फोड़ दें और दूसरा मकसद इस से भी ज्यादा अहम, अपने ग्रुप की सुरक्षा का था.

लता डांस पार्टी के आ जाने की खबर मिनटों में इलाके में फैल गई थी और अपने डेरे पर पहुंचने के तुरंत बाद ही जोतिबाई को बुकिंग मिलनी शुरू हो गई थीं. कुछ पुराने जान पहचान वाले लोग खासतौर से मिलने आए थे जिन्होंने यह तसल्ली कर ली थी कि डांस पार्टी साल के आखिर तक तो रुकेगी ही, और अगर काम मिलता रहा तो होली तक भी रुक सकती है.

डांस पार्टी के आ जाने की खबरभर से न केवल छपारा बल्कि आसपास के गांवों में भी रौनक सी आ गई थी. गांव देहातों में अब गणेश और दुर्गा की झांकियां इफरात से लगने लगी हैं जिन में तबीयत से नाच गाना होता है. कुकुरमुत्ते सी उग रही धार्मिक समितियों में राजनेता वोट पकाते हैं, पंडे पुजारी दक्षिणा झटकते हैं और आमलोग झांकी में बैठी मूर्ति के पांव पड़ कर सीधे जा पहुंचते हैं स्टेज के नीचे खासतौर से बने पंडाल में, जहां फिल्मी गानों की तर्ज पर रति के साथ दूसरी डांसर्स थिरक रही होती हैं.

डेरे पर डांस पार्टी की सुबह नहीं होती, बल्कि सीधे दोपहर होती है, क्योंकि नाचगाने का प्रोग्राम सुबह तक चलता है. इस दौरान गांव की आबादी के मुताबिक, 4-5 सौ से ले कर 2 हजार तक की तादाद में बैठे लोग अपने पसंदीदा गाने की फरमाइश स्टेज तक पहुंचाते और खूब नोट भी लुटाते हैं.

रातभर फरमाइशी गानों पर डांस पेश करते करते इन डांसर्स का अंग अंग दुखने लगता है पर इन का जोश कम नहीं होता. एक एक कर ये स्टेज पर आ कर नाचती हैं, कभी 2-4 के समूह में भी डांस पेश करती हैं.

कौन हैं ये

केवल राजनांदगांव या छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश के अधिकांश जिलों में ऐसी हजारों डांस पार्टियां हैं जो तकरीबन 8 महीने मध्य प्रदेश के किसी जिले में जा कर अपना डेरा डालती हैं और अपना पेट पालती हैं. इन डांसरों में कुछ आदिवासी जाति की लड़कियां हैं तो कुछ दूसरी छोटी जाति की भी हैं. गानेबजाने का जरूरी सामान डांस पार्टी अपने साथ ले कर चलती है.

नाचगाना इनका पुश्तैनी पेशा है. इन के समूह में मर्द कहने भर को होते हैं जिन का काम बाहरी भागदौड़ करना और डांस के दौरान स्टेज के नीचे तैनात रहना होता है, जिस से कभी कोई झगड़ा फसाद हो तो ये हालत संभाल लें. जब लड़कियां डांस कर रही होती हैं तब ये फरमाइशी पर्चियां बटोर रहे होते हैं.

ग्रुप की मुखिया जोति बाई बताती हैं, ‘‘हम तो अपनी दादी नानी के जमाने से इसी तरह प्रोग्राम देते चले आ रहे हैं. यही हमारा पेशा है. इस के अलावा हमें कुछ और पता नहीं.’’ हां, इतना जरूर है कि पहले ग्रुप का नाम डांस पार्टी न हो कर नौटंकी हुआ करता था जिन में गानों के साथ साथ कुछ पुराने जमाने के नाटक भी खेला करते थे.

डांस कहां से सीखा? पूछने पर रति झिझकती हुए बताती है, ‘‘उस ने डांस बचपन से बुआओं और मौसियों से सीखा है और लगभग सभी हिट फिल्मी गानों पर वह नाच लेती है. पहले टेपरिकौर्डर और कैसेट से गाने सुन अभ्यास करती थी पर अब सीडी व पैनड्राइव आ गई हैं जिन के जरिए वह नाचगानों का अभ्यास करती है.’’ रति आगे बताती है, ‘‘एक प्रोग्राम की बुकिंग 2-3 हजार रुपए की होती है पर पार्टी तगड़ी हो तो 8-10 हजार रुपए तक मिल जाते हैं.’’

ये पैसे न्योछावर के पैसों से अलग होते हैं जिन्हें ज्यादा से ज्यादा झटकने की हर डांसर कोशिश करती है कि भीड़ का दिल जीत सके क्योंकि पैसा अच्छे डांस पर ज्यादा बरसता है. एक प्रोग्राम में 4-5 हजार रुपए की न्योछावर मिलनी आम बात है. डेरे पर जा कर पूरे पैसे का हिसाब होता है और रकम सब में बराबर बंट जाती है. कुछ सीनियर डांसर्स को कुछ ज्यादा पैसा मिलता है क्योंकि वे अपने नाम से जानी जाती हैं और भीड़ जमा करने में उन की भूमिका अहम होती है.

नहीं हैं धंधेवालियां हम

रति और जोति दोनों मानती हैं कि हर किसी को उन्हें और उन के पेशे को ले कर गलतफहमी हो जाती है, जिसे वे जल्द दूर भी कर देती हैं. जब गांव वालों को बात समझ आ जाती है तो फिर कोई झंझट नहीं रह जाता. इसके बाद भी कुछ लोग पेशकश कर ही देते हैं जिन्हें ये  सख्ती दिखाते झिड़क देती हैं.

जोति और रति को भी अपना इतिहास पूरा नहीं मालूम जिस की उन्हें जरूरत भी महसूस नहीं होती पर अंगरेजों के जमाने से कुछ छोटी जाति वाले नाचगा कर अपना पेट भरते रहे हैं. पहले ये लोग जमींदारों या दूसरे पैसे वालों के यहां शादी ब्याह या दूसरे मौकों पर नाचते थे लेकिन जैसे जैसे वक्त गुजरता गया वैसे वैसे इन के पेशे में भी तबदीलियां आती गईं.

जमींदारी खत्म हुई तो ये लोग दूसरे सूबों में जा कर नाच गाना करने लगे और अब हालत यह है कि इन की जाति की लड़कियां मुंबई के डांस बारों तक जा पहुंची हैं. कुछ नागपुर, पुणे सहित महाराष्ट्र के दूसरे बड़े शहरों के डांसबार में पहुंच गई हैं. पर अधिकांश लड़कियां शहर जाना ठीक नहीं समझतीं, ये किसी मंडली में ही खुद को महफूज महसूस करती हैं.

कमाई ज्यादा नहीं

पैसा इन पर बरसता जरूर है लेकिन वह इतना नहीं होता कि ये लोग शान की जिंदगी जी पाएं. पेट भरने लायक ही ये कमा पाती हैं. इन लड़कियों के सपने बहुत बड़े नहीं हैं. कभी कभार शौकिया तौर पर ये कोई बड़ा शहर घूम आती हैं, वरना इन का पूरा वक्त अपनी डांस पार्टी के साथ घूमते रह कर प्रोग्राम करने और बारिश के 4 महीने अपने गांव में गुजारने में बीतते हैं. बारिश में चूंकि कमाई नहीं होती, इसलिए बाकी 8 महीने कमाया पैसा खर्च हो जाता है.

कुछ डांसर्स ने स्कूल का मुंह देखा है पर सिर्फ 2-4 साल के लिए ही. इस के बाद घुंघरुओं ने इन्हें जकड़ा तो जवानी कब आ कर चली गई, इन्हें पता भी नहीं चला. 35-40 वर्ष की होते होते कुछ डांसर्स शादी कर लेती हैं. बाद में यही अपनी डांस पार्टी बना लेती हैं क्योंकि तब तक इन्हें प्रोग्रामों और दूसरे कई मसलों का तजरबा हो जाता है.

कमाई का बड़ा हिस्सा ड्रैस और मेकअप के आइटमों पर खर्च हो जाता है. एक डांसर बताती है, ‘‘और कोई शौक हमें नहीं है, चांदी के गहने जरूर हम बनवाती हैं, यही हमारी बचत है जो बुढ़ापे में हमारा सहारा बनती है.’’

यह डांसर बताती है कि उस की दादी नानी सस्ते कौस्मेटिक प्रौडक्ट इस्तेमाल करती थीं पर ये लोग ब्रैंडेड प्रौडक्ट इस्तेमाल करती हैं.

बड़े शहरों के मुकाबले कस्बों में प्रोग्राम करना ये ज्यादा पसंद करती हैं क्योंकि वहां आमदनी ज्यादा होती है और अन्य अड़चनें भी कम रहती हैं. 6-8 महीने में ये तकरीबन 50 किलोमीटर के दायरे में आने वाले सभी गांवों में प्रोग्राम दे आती हैं.

छोटी जगहों में नाच गाने का चलन ज्यादा होने लगा है और लोगों के पास वक्त भी खूब होता है. नाच गाने के शौकीन लोग रातरातभर बैठे डांस का लुत्फ उठाते हैं और दिल खोल कर डांसरों पर पैसे लुटाते रहते हैं.

बावजूद इस के यानी हाड़ तोड़ मेहनत के, इन डांसरों की कमाई इतनी नहीं है कि ये बुढ़ापे को ले कर बेफिक्र हो सकें. इसलिए इन की हर मुमकिन कोशिश यह रहती है कि उम्र यानी जवानी रहते ज्यादा से ज्यादा पैसा कमा लें.

मुसीबतें भी कम नहीं

ये डांस पार्टियां कहीं भी जाएं, परेशानियां और मुसीबतें साए की तरह इन के पीछे लगी रहती हैं. कहीं पुलिस वाले परेशान करते हैं तो कहींकहीं स्थानीय रसूखदार नाक में दम कर डालते हैं.

डांसरों के साथ छेड़ छाड़ आम बात है, जिस की ये इतनी आदी हो जाती हैं कि ये उस का लुत्फ उठाने लगती हैं. हालांकि डांस के जलसों में भारी भीड़ के चलते कोई खास खतरा इन्हें नहीं रहता लेकिन दिक्कत उस वक्त पेश आती है जब गुंडे मवाली टाइप के लोग इन के डेरे के बाहर चक्कर काटना शुरू कर देते हैं.

ऐसे वक्त में डांस पार्टी की उम्रदराज औरतें काफी काम आती हैं जो इन शोहदों और लफंगों को ऐेसे काबू करती हैं कि ये दोबारा डेरे के पास नहीं फटकते. पर ऐसा करते वक्त इन्हें काफी सब्र, समझदारी और दिमाग से काम लेना पड़ता है. अगर चक्कर काटने वाले रसूखदारों के बेटे हों तो उन से निबटना थोड़ा मुश्किल होता है और उन्हें फटकारने पर कभीकभी लेने के देने पड़ जाते हैं.

आजकल गांवों में सभी नेता हो गए हैं जिन की पहुंच ऊपर तक होती है. लिहाजा, वे बेइज्जत किए जाने पर हल्ला मचा देते हैं कि ये डांस पार्टियां माहौल खराब कर रही हैं. वे लोग प्रचार यह करते हैं कि इन डेरों पर नाचने वालियां नहीं, बल्कि धंधेवालियां हैं. लिहाजा, इन्हें भगाया जाए.

एक बड़ी परेशानी उस वक्त भी खड़ी हो जाती है जब गांव या कसबे के किसी बाहुबली का संदेश आ जाता है कि साहब अकेले में अपनी हवेली पर डांस देखना चाहते हैं और इस बाबत मुंहमांगी रकम देने को तैयार हैं. रंगीन मिजाज रसूखदारों की हवेली में जा कर डांस करना खतरे वाला काम होता है क्योंकि नशे में वे मनमानी पर उतारू हो आएं तो उन से निबटना आसान काम नहीं होता. ऐसी हालत में कई बार डांसरों को वह सब झेलना पड़ता है जिस से वे खुद को अब तक बचाए रखे थीं.

इन परेशानियों से बचने के लिए ये उन बड़े लोगों से दूर ही रहती हैं जो भीड़ में अक्सर डांस देखना अपनी तौहीन समझते हैं.

छपारा की भीमगढ़ कालोनी के लोगों ने थाने जा कर इस डांस पार्टी की शिकायत की थी कि इन लोगों के यहां आने से माहौल खराब हो रहा है. इस पर भीमगढ़ पुलिस चौकी के इंचार्ज जी पी शर्मा ने शिकायत करने वालों से पूछा था कि आप ही बताइए, किस कानून के तहत इन पर इल्जाम लगा कर कार्यवाही की जाए. ये लोग अपना हुनर दिखा कर पेट पाल रहे हैं और कानून हर किसी को इस की इजाजत देता है.

इस पर गांव वालों ने सरपंच राजकुमारी काकोडि़या की अगुआई में यह शिकायत की थी कि इन लोगों के खुले में शौच जाने से गंदगी फैलती है जबकि उन की पंचायत निर्मल ग्राम पंचायत है.

छोटी जाति से चिढ़

इस इल्जाम में कोई खास दम नहीं था, इसलिए पुलिस वालों ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया. लेकिन हर कोई जानता है कि इन डांसर्स से चिढ़ की एक अहम वजह उन की छोटी जाति का होना भी है.

चिढ़ भी इतनी कि छोटी जाति वालों को सार्वजनिक स्थलों से पानी नहीं भरने दिया जाता. उन के साथ होने वाला जातिगत भेदभाव किसी सुबूत का भले मुहताज नहीं हो, लेकिन छपारा के मामले से एक बात यह भी हैरत अंगेज तरीके से लगातार हुई कि सार्वजनिक शौचालयों तक में इन के साथ भेदभाव होने लगा है.

अगर इन डांसरों के खुले में शौच जाने से ग्राम पंचायत निर्मल नहीं रह जाती है तो इन्हें सार्वजनिक शौचालयों में क्यों नहीं जाने दिया गया, इस सवाल का जवाब शायद ही कोई सरपंच दे पाए.

हकीकत यह है कि चूंकि ये आदिवासी और दूसरी छोटी जाति की थीं, इसलिए आंख में खटक रही थीं. ये बिंदास हो कर नाच का अपना हुनर पेश कर रही थीं, इसलिए इन्हें माहौल खराब करने वाली कहा गया. सालों से यह डांस पार्टी यहां आ रही है और सभी तरह के लोग इन के डांस का लुत्फ उठाते हैं. धार्मिक जलसे इन से आबाद होने लगे, इसलिए कई ऊंची जाति वाले भी इन की तरफदारी करने लगे हैं क्योंकि उन की खुदगरजी इन से जुड़ी है और पूरी भी होती है. इसीलिए इन्हें आसानी से खदेड़ा नहीं जा सकता.

चिंता की बात, कला में भी भेदभाव है. किसी सरकारी या गैर सरकारी बड़े जलसे में कोई नामी डांसर स्टेज पर डांस पेश करे तो उस का नाम और फोटो अखबारों में छपता है और टीवी चैनल्स में भी उन्हें दिखाया जाता है. पीढि़यों से नाच रही जोति और रति बाई का डांस, डांस नहीं है बल्कि माहौल खराब करने वाला पेशा है, जबकि उन के बारे में ऐसा कहा जाता है, तो तय है दोहरापन लोगों की सोच में है. जिन्हें सरकार बड़े बड़े इनाम, तमगे और खिताब दे दे वह कला हो जाती है और ये कलाकार, जिन के हिस्से में हवाईयात्रा, बड़े बंगले और एयरकंडीशन वगैरा तो दूर की चीजें हैं, पेटभर खाने के लाले पड़े रहते हैं, जाने क्यों कलंक करार दिए जाने लगते हैं.

छपारा के एक युवा पत्रकार हाशिम खान की मानें तो यह छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार की हकीकत उजागर करती बात है कि वहां के बाशिंदों को रोजगार के लिए यहां वहां भटकना पड़ रहा है. जाहिर है सरकारी योजनाओं का फायदा इन्हें नहीं मिल पा रहा है जिन्हें ले कर बड़ेबड़े दावे किए जाते हैं. इन के बच्चे पढ़ नहीं पा रहे, इस की जिम्मेदारी किस की है, कहां गया सर्वशिक्षा अभियान और रोजगार का वादा. इन बातों पर गौर किया जाना चाहिए.

सरस सलिल विशेष

हाशिम का जोश और आरोप अपनी जगह ठीक है पर गड़बड़ ऊपर से भी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परंपरागत व्यवसायों को बढ़ावा देने की बात करते रहते हैं लेकिन वह राज मिस्त्रियों और कुम्हारों तक में सिमटी रहती है.

देशभर में एक अंदाजे के मुताबिक, घुमक्कड़ नाचनेगाने वालियों की तादाद सवा करोड़ से भी ज्यादा है पर इन के लिए न कुछ सोचा जा रहा, न ही कुछ किया जा रहा. मानो नाचगाना कोई गुनाह हो.

गांव गांव घूम कर आम और खास लोगों का दिल बहलाने वाली ये डांसर्स उम्रभर तपती हैं, तब कहीं जा कर अपना और अपने घरवालों का पेट भर पाती हैं. इस पर भी तरह तरह की जिल्लतें, जलालतें और दुश्वारियां इन्हें उठानी पड़ती हैं.

इन्हें समाज में बराबरी का दर्जा या इज्जत न मिले, यह खास हर्ज की बात नहीं, हर्ज की बात है इन्हें दोयम दर्जे का मानना, इन्हें धकियाना व धकेलना और इन पर घटिया इलजाम लगाना.

बदलाव इतनाभर आया है जो इन के लिहाज से अच्छा है या बुरा, यह तय कर पाना मुश्किल है कि अब धार्मिक जलसे छोटी जाति वाले भी करने लगे हैं और झांकियों में भी अपनी गाढ़ी कमाई खर्च करने लगे हैं, इसलिए वे इन छोटी जाति वालों व डांसर्स को बुलाने लगे हैं, नचाने लगे हैं और पैसा बरसाने लगे हैं. यह बात ऊंची जाति वालों को रास नहीं आ रही, मानो भगवान को पूजने और खुश करने का हक उन्हीं को है.

धर्म के नाम पर छोटी जाति वाले कैसेकैसे ठगे जा रहे हैं, यह अलग मुद्दा है पर इन डांसर्स का इस में अहम रोल है जो गणेश और दुर्गा की झांकियों में नाचगा कर रौनक ला देती हैं.

नोटबंदी की मार

छपारा की डांस पार्टी शिकायतों और दबाव में आ कर नहीं गई, पर 8 नवंबर की नोटबंदी इन डांसर्स को भी महंगी पड़ी. जैसे ही बड़े नोटों का चलन बंद हुआ तो अफरा तफरी मच गई और नोटों की कमी की मार इन छोटे स्तर की डांसर्स पर भी पड़ी. मुंबई के डांस बार हों या देहात के नाचने गाने वाले कलाकार, सभी को पैसों के लाले पड़ गए.

छोटी जगहों में डांसरों पर छोटे नोट ज्यादा लुटाए जाते हैं. जब उन का ही टोटा पड़ गया तो इस डांस पार्टी ने राजनांदगांव वापस जाने में ही भलाई समझी.

अब आने वाले कल को ले कर जोति बाई पसोपेश में है कि क्या होगा. सालभर की कमाई का कोटा पूरा नहीं हुआ था. इसलिए खानेपीने की समस्या सब लोगों के सामने मुंहबाए खड़ी है. नोटों की किल्लत के चलते इन का पूरा हिसाब किताब गड़बड़ा गया है.

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