सरस सलिल विशेष

हमारे यहां मूर्खों की कमी नहीं, एक  ढूंढ़ो हजार मिल जाते हैं. इन्हीं मूर्खों को ठग मनमाने तरीकों से ठग कर अपनी रियासतें खड़ी कर लेते हैं. वैसे ठगी का धंधा बहुत पुराना है. पहले के ठग पुराने तरीकों से लोगों को मूर्ख बना कर लूटते थे लेकिन आज ठगी के तरीकों में बदलाव आ गया है. अब नई टैक्नोलौजी के सहारे घरबैठे इंटरनैट, मोबाइल फोन आदि का सहारा ले कर जालसाजी की जाती है, विज्ञापनों के भ्रमजाल में फंसा कर लूटा जाता है. लेकिन मूर्खों में अब तक कोई बदलाव नहीं आया. वे जस के तस हैं. ऐसे लोग कभी सारदा चिटफंड जैसी फ्रौड कंपनियों द्वारा 2 के 4 किए जाने के लालच में अपना सबकुछ लुटा बैठते हैं तो कभी भविष्य बांचने वाले ज्योतिषियों, ढोंगी बाबाओं, संतों की बातों में आ कर अपनी गाढ़ी कमाई उन की झोली में डाल देते हैं. कभी कोई ठग मिट्टी की ईंटें सोने के दामों में इन के हाथों बेच देता है तो कभी नौकरी के नाम पर ये अपने लाखों रुपए फर्जी एजेंटों के हवाले कर देते हैं. आज के जमाने में ऐसे भी ठग हैं जो परचे बांट कर लोगों को आमंत्रित करते हैं और फिर उन्हें ठगते हैं.

एक आंकडे़ के मुताबिक, पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मीनगर, निर्माण विहार, शकरपुर व इन के आसपास लगभग 250 फर्जी प्लेसमैंट एजेंसियां काम कर रही हैं और परचे बांट कर युवकयुवतियों को नौकरी दिलाने के नाम पर चूना लगा रही हैं. 24 साल का अंकुल वर्मा गाजियाबाद के एक छोटे से गांव का रहने वाला है. वह दिल्ली के एक इंस्टिट्यूट में पढ़ रहा है. पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए वह काफी समय से पार्टटाइम नौकरी ढूंढ़ रहा था.

एक दिन उस ने सड़क पर लगे नौकरी दिलाने के एक विज्ञापन को देख कर उस पर दिए गए मोबाइल नंबर पर संपर्क किया. उसे इंटरव्यू के लिए नोएडा बुलाया गया, जहां एक छोटे से टैंपरेरी औफिस में एक मेज व कुछ कुरसियां पड़ी थीं और कुछ युवकयुवतियां बैठे थे. अंकुल से कुछ प्रश्न पूछने के बाद उस से एक फार्म भरवाया गया और जौब सिक्योरिटी के नाम पर उस से 500 रुपए वसूल कर उसे एक परची दे कर नोएडा स्थित एक्या टैक्नोलौजीज नामक कंपनी में भेज दिया गया जहां उस की नौकरी लगवा दिए जाने का दावा किया गया था. जब अंकुल वहां पहुंचा तो उसे पता चला कि इस कंपनी को कोई जानकारी ही नहीं थी कि उस के यहां किसी का इंटरव्यू होना है. अंकुल समझ गया कि दाल में कुछ काला है. उस ने विज्ञापन में दिए गए उस नंबर पर फिर संपर्क किया, फोन बंद था. अंकुल वापस उसी औफिस में पहुंचा जहां उस ने 500 रुपए दिए थे, लेकिन वह औफिस भी बंद निकला.

अंकुल ने कई चक्कर काटे, लेकिन औफिस नहीं खुला. यह 1 साल पुरानी घटना है. हाल ही में अंकुल जब लक्ष्मीनगर स्थित एक फर्जी प्लेसमैंट एजेंसी में नौकरी के लिए पहुंचा तो उसे होटल में वेटर की नौकरी दिलवाने का आश्वासन दे कर वरदी और जौब सिक्योरिटी के नाम पर उस से 1 हजार रुपए जमा करवाने को  कहा गया. यह छोटा सा औफिस लक्ष्मीनगर में एक बेसमैंट में चलाया जा रहा है जहां रमेश (बदला हुआ नाम) नाम का 25-26 साल का एक नौजवान युवक बौस बन कर बैठा है और उस के साथ काम करने वाली 3-4 लड़कियां आने वाले युवकों को नौकरी दिलाने का झांसा दे कर उन से 1 हजार रुपए वसूलने का जिम्मा संभालती हैं. यहां लंबे समय से युवकयुवतियों के साथ नौकरी दिलाने के नाम पर खिलवाड़ किया जा रहा है.

यहां पहुंचने पर हम ने पाया कि इस औफिस में एक पुलिस वाला भी बड़े दोस्ताना अंदाज में रमेश से अपने किसी रिश्तेदार की नौकरी लगवाने के लिए दबाव बना रहा था. रमेश व उस के यहां काम करने वाली एक लड़की निकिता (बदला हुआ नाम) ने हमें नौकरी देने का वादा किया और बताया कि हमें यहां आने वाले युवकों की जेब से किसी भी तरह 1 हजार रुपए निकलवाने होंगे. उन से ऐसे बात करनी होगी जिस से कि वे हमारी कंपनी पर आंख मूंद कर भरोसा कर लें. हमारी सैलरी इसी कार्यकुशलता के आधार पर निर्धारित की जानी थी कि हम 1 दिन में कितने युवकयुवतियों से रुपए निकलवाने में कामयाब हो पाते हैं. शुरू के 15 दिन हमें ट्रेनिंग पर रखे जाने की बात कही गई.

दरअसल, यहां आए युवकों को यहां मौजूद लड़कियां सोचनेविचारने का बिलकुल मौका नहीं देतीं और इस तरह बात करती हैं मानो यह नौकरी सिर्फ आज ही मिल सकती है. यदि देर की तो नौक री हाथ से निकल सकती है. ऐसे में युवक की जेब में जितने पैसे होते हैं उन्हें जमा करने क ो कह  कर बाकी दूसरे दिन जमा करवाने की मोहलत दे दी जाती है. हड़बड़ी में आ कर व्यक्ति तुरंत 1 हजार रुपए इन के हवाले कर देता है और फिर चक्कर पर चक्कर काटता रहता है और आखिरकार थक कर बैठ जाता है.

जब हम ने बतौर रिपोर्टर रमेश से इस बाबत बात की तो वह साफ मुकर गया कि वह किसी से भी 1 हजार रुपए नहीं लेता है. उस ने आगे कहा कि वह बिना पैसा लिए लोगों की नौकरी लगवाता है. लेकिन उस के पास इस बात का एक भी सुबूत नहीं था कि उस ने किसी की नौकरी लगवाई हो.

दरअसल, रमेश जैसे सैकड़ों ठग पूरी दिल्ली में चप्पेचप्पे पर अपना जाल बिछाए बैठे हैं और अंकुल जैसे सैकड़ों लड़केलड़कियों को मूर्ख बना रहे हैं. विशेष रूप से पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मीनगर, शकरपुर व निर्माण विहार में पुलिस की नाक के नीचे लंबे समय से चलाया जा रहा यह धंधा चरम पर है. गलियों में छोटेछोटे औफिस 6 से 8 हजार रुपए में किराए पर ले कर इस तरह के ठगी के धंधों को अंजाम दिया जा रहा है. हैरानी की बात यह है कि यह ठगी छिपा कर नहीं बल्कि खुल्लमखुल्ला बसों, सड़कों, चौराहों पर परचे व हैंडबिल बांट कर, अखबारों में भ्रमित विज्ञापन दे कर, दीवारों पर पोस्टर आदि चिपका कर की जा रही है. ठग बड़ी कंपनियों में पार्टटाइम व फुलटाइम नौकरियों व आकर्षक वेतन का लालच देते हैं.

और तो और, राह चलते भी आप के हाथ में कोई सड़क किनारे खड़ा व्यक्ति विज्ञापन का छोटा सा परचा पकड़ा कर कौल सैंटर, बैंकों, रिसैप्शनिस्ट, वेटर आदि की नौकरी के लिए तुरंत इंटरव्यू करवा सकता है. इस के लिए न कोई उम्र का बंधन और न किसी विशेष डिगरी या उच्च शिक्षा की आवश्यकता बताई जाती है. इस तरह बेरोजगार युवकयुवतियां इन ठगों के जाल में फंस जाते हैं. इन परचों में औफिस का कोई पता या नाम नहीं दिया गया होता है. बस, एक  मोबाइल नंबर छपा होता है जिस पर संपर्क करने पर इंटरव्यू के लिए बुलाया जाता है और फिर ठगी के बाद इन मोबाइल नंबरों को बंद कर दिया जाता है या ठगी के किसी नए धंधे में प्रयोग किया जाता है.

एक ही समय में ये ठग कई टैंपरेरी औफिस खोल कर कई निजी कंपनियों के नाम से बेरोजगारों का पैसा हड़प रहे हैं.  एक जगह ठगी करने के बाद ये अपनी दुकान दूसरी जगह खोल कर अपना धंधा फिर से शुरू कर देते हैं. हैरानी तो तब होती है जब इन मामूली पढ़ेलिखे ठगों के निशाने पर पढ़ेलिखे लोग होते हैं जिन्हें फंसा कर ये अपनी उंगलियों पर नचाते हैं. पहले तो आश्वासन दिया जाता है कि बस 1 हजार रुपए देते ही नौकरी आप के हाथ में. जैसे ही 1 हजार रुपए इन के हाथ में आ जाते हैं, ये कहते हैं कि आप की 15 दिन की ट्रेनिंग होगी जिस के लिए 1 हजार से 15 हजार और जमा करवाने होंगे. जबकि ऐसी किसी टे्रनिंग के बारे में पहले नहीं बताया जाता.

टे्रनिंग के बाद 10-20 हजार रुपए वेतन वाली नौकरी मिल जाने का झांसा दिया जाता है. फंसा हुआ व्यक्ति यह पैसा भी जमा करवा देता है. इस के बाद उसे लंबे समय तक टाला जाता है और अंत में धमका कर या हाथापाई कर के भगा दिया जाता है. कभीकभी ट्रेनिंग के बाद किसी युवक को यदि किसी कंपनी में भेज भी दिया जाता है तो वहां उसे मात्र 4 या 5 हजार रुपए वेतन पर सफाईकर्मी या चपरासी की नौकरी पर रखा जाता है.

दरअसल, ठगी के ये ठिकाने लक्ष्मीनगर या शकरपुर में इसलिए हैं क्योंकि इस क्षेत्र में होस्टल व कंपीटिशन की किताबों की दुकानों की भरमार है, जहां छात्रछात्राएं बड़ी संख्या में देखे जाते हैं. इसी का लाभ उठा कर ठगी का धंधा करने वाले विशेषकर इन युवकयुवतियों को ही अपना निशाना बनाते हैं. इन फर्जी प्लेसमैंट एजेंसियों पर नौकरी पाने के लिए नौजवान लड़केलड़कियों का जमावड़ा लगा रहता है.

ऐसी ही ठगी करने वाले एक व्यक्ति ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया, ‘‘पूर्वी दिल्ली में जितने नौकरी दिलाने के नाम पर औफिस खुले हैं वे सब ठगी के ठिकाने हैं. आज तक इन्होंने कभी किसी को नौकरी नहीं दिलाई और न ही किसी कंपनी के साथ इन का कोई कौंटै्रक्ट होता है. धोखाधड़ी के इस धंधे को बिना किसी बाधा के चालू रखने के लिए पुलिस को हफ्ता पहुंचाया जाता है. इसलिए ठगी का शिकार हुआ कोई व्यक्ति जब शिकायत ले कर पुलिस के पास जाता है तो उसे बहाने बना कर बैरंग लौटा दिया जाता है. ये धंधा पूर्वी दिल्ली के अलावा नेहरू प्लेस, पीतमपुरा, बदरपुर व जनकपुरी में भी जोरों पर है. मौडलिंग या फिल्मों में काम दिलाने के नाम पर भी लूट का धंधा चल रहा है.’’

वास्तव में ये कम पढ़ेलिखे ठग बड़ी आसानी से लोगों को अपने झांसे में फंसा लेते हैं. इन में से कुछ ऐसे ठग भी मिल जाएंगे जिन की बुरी नजर सिर्फ आप की जेब पर ही नहीं बल्कि खूबसूरत लड़कियों पर भी रहती है. ये लोग अपने पास आने वाली खूबसूरत लड़कियों को अच्छी नौकरी दिलाने के एवज में शारीरिक संबंध बनाने का प्रस्ताव रखते हैं. अधिकतर दूसरे शहरों से आए भोलेभाले युवकयुवतियां नौकरी की आवश्यकता के चलते आसानी से इन के चंगुल में फंस कर अपना सबकुछ गंवा बैठते हैं.

नौकरी के नाम पर ही नहीं, आप को पार्टटाइम, फुलटाइम बिजनैस में इनवैस्ट कर के अपना पैसा दोगुना करने का प्रलोभन भी दिया जाता है. इन के दरवाजे गृहिणियों, स्टूडैंट्स, रिटायर्ड आदि हर किसी के लिए खुले होते हैं. बस, जेब में पैसा होना चाहिए. यहां आप को शुरू में तो पैसा कमाने के लिए बिजनैस का बड़ा आसान तरीका बताया जाता है लेकिन समय के साथसाथ आप को इस फ्रौड बिजनैस के जाल में पूरी तरह उलझा दिया जाता है और आप के हजारों रुपए डूब चुके होते हैं और तब व्यक्ति जैसेतैसे इस से बाहर आने में ही अपनी भलाई सम?ाता है.

सरस सलिल विशेष

नौकरी दिलाने के गिरोह पूरे भारत में सक्रिय हैं जो भोलेभाले लोगों से लाखों रुपए की ठगी कर के फरार हो जाते हैं. विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर एजेंट इन युवकों से लाखों रुपए वसूल कर इन्हें अवैध तरीके से विदेशों में छोड़ कर भाग आते हैं. रेलवे, एमसीडी, पीडब्लूडी, मैट्रो ट्रेन, स्कूलों, सेना आदि में नौकरी दिलाने के नाम पर पूरे देश में सक्रिय ये गिरोह लोगों को लाखों का चूना लगा कर चंपत हो जाते हैं.

दरअसल, ठगी का यह धंधा और ये ठग इसलिए कभी कम नहीं होते क्योंकि भारत जैसे करोड़ों की आबादी वाले देश में आम जनता को लालच दे कर ठगना बड़ा आसान है. यह ठीक है कि बेरोजगारी और गरीबी के कारण लोग इन ठगों के चंगुल में फंसने को बाध्य हो जाते हैं. ऐसे सैकड़ों गिरोह निजी कंपनियों के नाम से हमारे और आप के बीच सक्रिय हैं.

यहां सवाल यह नहीं है कि ठग ठगी क्यों करता है बल्कि इस से बड़ा सवाल है कि आखिर हम ठगे क्यों जाते हैं? वास्तव में क्या हम पढ़ेलिखे हो कर भी इतने बेवकूफ हैं कि कोई भी राह चलता व्यक्ति हमें मूर्ख बना कर ठग ले. हमारे सोचनेसम?ाने की शक्ति क्या इतनी क्षीण हो चुकी है कि हम यह भी नहीं भांप पाते कि सारदा चिटफंड जैसी धोखेबाज कंपनी 1 लाख लोगोंका पैसा कैसे दोगुना कर देगी, कहां से लाएगी वह इतना पैसा. दरअसल, हमें भेड़चाल की आदत लग चुकी है. जिस तरफ 10 लोगों को दौड़ते देखा, सब उधर ही भागने लगते हैं. चाहे वे 10 लोग कुएं में ही कूदने क्यों न जा रहे हों. सम?ादार लोग दूसरों की गलतियों से सीख लेते हैं लेकिन इस तरह के मूर्ख जब तक खुद खड्डे में नहीं गिर जाते तब तक संभलते नहीं हैं. ऐसे लोगों के बल पर ही धोखाधड़ी के नएनए धंधे पनप रहे हैं.

यदि आप को सड़क पर कहीं किसी दीवार आदि पर नौकरी दिलाने का कोई विज्ञापन चिपका दिखे या नौकरी के नाम पर कोई आप से पैसा मांगे तो कतई उस के झांसे में न आएं. ये बहुरुपिए ठग आप से कहीं भी किसी भी रूप में टकरा जाएंगे और आप को ठग कर रफूचक्कर हो जाएंगे.

ऐसे मौके कम ही आते हैं जब ये ठग पकड़े जाते हों, इसलिए ठगे जाने के बाद हायतौबा करने से अच्छा है कि इन से सचेत और सावधान रहें.