सरस सलिल विशेष

योग वाले अपने संभावित ग्राहक को अभिभूत करने के लिए आमतौर पर 2 रास्तों का सहारा लेते हैं. एक तो वे इस की अति प्राचीनता की दुहाई देते हैं, दूसरे, इस के आसनों के परिमाण की बहुलता का भारी प्रचार करते हैं.

यद्यपि पतंजलि ने अपने योगसूत्रों में स्थिर हो कर सुखपूर्वक बैठने को ही ‘आसन’ कहा है और किसी भी आसन विशेष का न उल्लेख किया है न वर्णन फिर भी उस के प्राचीनतम भाष्य (व्यासभाष्य) में 11 आसनों का उल्लेख मिलता है.

तद्यथा पद्मासनं वीरासनं भद्रासनं स्वस्तिकं दण्डासनं सोपाश्रयं पर्यंकं, क्रौंचनिषदनं,

हस्तिनिषदनमुष्ट्रनिषदनं समसंस्थानं स्थिरसुखं यथासुखं चेत्येवमादीनि.

(योगसूत्र 2/46 पर व्यासभाष्य)

[पद्मासन, वीरासन, भद्रासन, स्वस्तिक, दंडासन, सोपाश्रय, पर्यंकासन, क्रौंचासन, हस्तिनिषदन (हाथी आसन) उष्ट्रनिषदन (ऊंट आसन) और समसंस्थान-ये आसन स्थिर करने वाले तथा सुख देने वाले हैं.]

वैसे यदि योगसूत्रों के अलावा विशाल योगसाहित्य पर एक नजर डालें तो पता चलेगा कि किसी ग्रंथ में एक आसन का वर्णन है तो किसी में 2 का. एक ग्रंथ में 32 आसनों का वर्णन है. जैसे, त्रिशिखब्राह्मणोपनिषद् में एक आसन का; योगचूडामणि उपनिषद में 2 आसनों का; योगकुंडल्युपनिषद् व अमृतनाद उपनिषद् में 3 आसनों का; ध्यानबिंदु उपनिषद्, योगतत्त्व उपनिषद् और शिवसंहिता में 4 आसनों का; शांडिल्य उपनिषद् में 8 आसनों का; दर्शन उपनिषद्  में 9 आसनों का; वाराह उपनिषद् में 11 आसनों का, हठयोगप्रदीपिका में 15 आसनों का; त्रिशिख ब्राह्मण उपनिषद् (मंत्रभाग) में 17 आसनों का और घेरंड संहिता में 32 आसनों का वर्णन है.

इस विवरण से स्पष्ट है कि व्यासभाष्य, वाराह उपनिषद् तक के 10 ग्रंथों के रचे जाने के बाद लिखा गया, तभी उस में 11 आसनों का उल्लेख  है.

ध्यान रहे, ये ‘उपनिषद्’ गं्रथ प्राचीन उपनिषदों की अपेक्षा अर्वाचीन ग्रंथ हैं. इन्हें प्राचीन दर्शाने के उद्देश्य से इन के पीछे ‘उपनिषद्’ शब्द जोड़ दिया गया है.

इन ग्रंथों के बाद जो योग विषयक ग्रंथ रचे गए, उन में से कइयों ने न केवल आसनों को सीधे शिव से प्राप्त करने की बात की है बल्कि उन की संख्या भी चौरासी लाख बताई है :

आसनानि समस्तानि यावत्यो जीवयोनय:,

चतुरशीतिलक्षाणि शिवेन कथितानि तु.

(श्रीधर्मकल्पद्रुम, खंड 4, पृ. 13)

(कुल आसन 84 लाख हैं, जितनी कि जीवों की योनियां हैं. उन सब आसनों का ज्ञान शिव द्वारा दिया गया है.)

यह अतिशयोक्तिपूर्ण संख्या निरा झूठ प्रतीत होती है, क्योंकि किसी प्राचीन ग्रंथ में जैसे जीवों की 84 लाख योनियों का विवरण नहीं मिलता, उसी तरह 84 लाख आसनों का भी कहीं विवरण उपलब्ध नहीं होता, न किसी प्राचीन ग्रंथ में, न किसी अर्वाचीन ग्रंथ में.

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दूसरा यह प्रश्न भी पैदा होता है कि शिव ने 84 लाख आसन बताए थे तो बाकी कहां चले गए? स्पष्ट है कि 84 लाख की संख्या एक मिथ के तौैर पर लोगों को अभिभूत करने के लिए गढ़ी गई है, जबकि वास्तविकता यह है कि पहले आसन एक था. फिर 2,3,4,8,9, 11,15,17 और 32 बने. इस वास्त- विकता पर परदा डालने के लिए योग वालों ने फिर यह कहना शुरू कर दिया कि 84 लाख आसनों में 84 आसन विशेष हैं और मृत्युलोक में 33 आसन मंगलजनक हैं :

तेषां मध्ये विशिष्टानि षोडशोनं शतं कृतम्,

आसनानि त्रयस्त्रिंशन्मर्त्यलोके शुभानि वै.

(श्रीधर्मकल्पद्रुम, खंड 4, पृ. 13)

भावार्थ यह है कि 84 लाख की बात निरी गप है, तभी तो उन में से 84 को विशेष कहा गया है. यह 84 का आंकड़ा भी काल्पनिक प्रतीत होता है. तभी तो मृत्युलोक में 33 आसनों के मंगलजनक होने की बात कही गई है. घेरंड संहिता (2/2) में तो 33 के स्थान पर भी 32 आसनों के ही मंगलजनक होने की बात कही गई है : तेषां मध्ये मर्त्यलोके द्वात्रिंशदासनं शुभम् (इन में भी 32 आसन मृत्युलोक के निवासियों के लिए शुभ अर्थात कल्याणदायक हैं).

इन दोनों ग्रंथों में एक आसन का अंतर है. बद्धपद्मासन नामक आसन श्रीधर्मकल्पद्रुम में अतिरिक्त है.

यहां कई बातें विचारणीय हैं. यदि मृत्युलोक के लिए 32/33 आसन ही मंगलजनक अथवा कल्याणकारक हैं, तब 84 या 84 लाख किस के लिए हैं? तब 8300068 फालतू आसनों का क्या औचित्य है? वे क्या किसी ‘दूसरी’ दुनिया के लोगों के लिए हैं या निरर्थक हैं? उन निरर्थक आसनों को बनाने वाले की क्या महानता है?

यह एक विडंबना है कि 84 लाख आसनों की डींग हांकने वाले 32 आसनों के बाद के आसनों के नाम व विवरण देने में अपने को एकदम असमर्थ पाते हैं. इन 32 आसनों को भी शिव द्वारा सिखाए हुए नहीं माना जा सकता, क्योंकि इन में से 2 आसन तो 13वीं शताब्दी के 2 योगियों द्वारा गढ़े हुए हैं. इसीलिए उन के नाम भी उन्हीं के नाम पर हैं.

पहला है, मत्स्येन्द्र आसन. मत्स्येन्द्र नाथ कामरूप (असम) के एक मछुआरे मीनपा के पुत्र थे और 13वीं शताब्दी में हुए. इसी तरह दूसरा आसन है गोरक्षासन. गोरक्षनाथ तिब्बती जनश्रुति के अनुसार बौद्ध बाजीगर थे. विद्वान इन्हें 13वीं शताब्दी में मानते हैं. कुछ इन का समय संवत 1250 बताते हैं, तो कुछ 1257. गोरक्षनाथ मत्स्येन्द्रनाथ का शिष्य था.

अब यदि 13वीं शताब्दी के मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ द्वारा गढ़े गए आसन मिला कर कुल 32 बनते हैं तो स्पष्ट है कि आसन अभी कल तक नए गढ़े जाते रहे हैं. इन का शिव से कुछ लेनादेना नहीं है. उस का नाम केवल तथाकथित अति प्राचीनता से लोगों को अभिभूत करने के लिए किया जाता है.

इन आसनों का प्रयोजन क्या है? क्यों ये विविध रोगों की चिकित्सा के उद्देश्य से गढ़े गए हैं? इन का उद्देश्य न तो कभी बीमारियों का इलाज करना रहा है और न किसी आयुर्वेदीय गं्रथ ने ही इलाज के तौर पर कहीं इन का उल्लेख किया है. योगशास्त्रीय गं्रथों ने भी इन्हें चिकित्साशास्त्रीय चीजें नहीं माना है. उन्होंने इन्हें मन की चंचलता को रोकने के लिए इस्तेमाल में लाने की ही बात की है.

कुर्यात्तदासनं स्थैर्यमारोग्यं चांगला- घवम््.

(हठयोगप्रदीपिका 1/17)

(आसन मन की स्थिरता व आरोग्य लाता है और शरीर के भारीपन को दूर करता है.)

अभ्यासाद्यस्य देहोऽयं योगौपयिकतां व्रजेत्,

मनश्च स्थिरतामेति प्रोच्यते तदिहासनम्.

(श्रीधर्मकल्पद्रुम, खंड 4, पृ. 12)

(जिस के अभ्यास से शरीर योग के उपयुक्त और मन स्थिर हो जाता है, उस का नाम आसन है.)

योगेन चित्तस्य मलं शरीरस्य तु वैद्यकेन.

(योगवार्तिक/योगसूत्रभोजवृत्ति)

(योग से चित्त (मन) के मल दूर होते हैं और वैद्यक (आयुर्वेद) से शरीर के.)

जायते येन येनेह विहितेन स्थिरं मन:,

तत्तदेव विधातव्यमासनं ध्यान- साधनम्.

(योगशास्त्र 4/134)

(जिस आसन के करने से मन स्थिर हो, वही आसन करना चाहिए, क्योंकि आसन ध्यान का साधन होता है.)

इन उद्धरणों से स्पष्ट है कि योगासनों का उद्देश्य केवल मन को स्थिर व काबू में करना है. यदि किसी आसन से कोई अन्य लाभ होता है तो वह गौण है, उस का मुख्य उद्देश्य नहीं. यही कारण है कि जिन 32 आसनों का घेरंडसंहिता में वर्णन है, उन में से 22 आसनों का शारीरिक दृष्टि से कोई भी लाभ नहीं बताया गया है. उन के केवल लक्षण दिए हैं कि इस आसन को इस प्रकार करें, बस, मन को संयम में करने में मिलने वाली कथित सहायता ही इन का लाभ है.

जिन 10 आसनों के लाभ बताए गए हैं वे भी इस ढंग के हैं कि उन का चिकित्साशास्त्रीय दृष्टि से कोई विशेष अर्थ नहीं बनता. 5 आसनों के लाभ इस तरह बताए गए हैं :

एतद् व्याधिविनाशकारणपरं पद्मासनं प्रोच्यते.

(घेरंड संहिता 2/8)

(यह सब व्याधियों का विनाशक कहा जाता है.)

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भद्रासनं भवेदेतत् सर्वव्याधि- विनाशकम्.

(घेरंड संहिता 2/10)

(भद्रासन नामक आसन सब व्याधियों का विनाशक है.)

सिंहासनं भवेदेतत् सर्वव्याधि- विनाशकम्.

(घेरंड संहिता 2/15)

(सिंहासन नामक आसन सब व्याधियों का विनाशक है.)

मत्स्यासनं तु रोगहा.

(घेरंड संहिता 2/21)

(मत्स्यासन रोगों को दूर करने वाला है.)

सर्वरोगविनाशनम् भुजंगासनम्.

(घेरंड संहिता 2/42)

(भुजंगासन समस्त रोगों का नाश करता है.)

यदि कभी चिकित्साशास्त्रीय दृष्टि से इन आसनों की प्रामाणिकता सिद्ध भी हो जाए तो भी स्पष्ट है कि इन पांचों में से एक ही काफी होगा, शेष 4 एकदम व्यर्थ हैं; क्योंकि जब एक ही आसन ‘सब रोगों का निवारक’ है तो फिर अलगअलग बीमारियों के लिए अलगअलग आसन बताने वाले क्या केवल दुकानदारी नहीं कर रहे हैं?

अगले एक आसन के बारे में कहा गया है कि इस से थकावट दूर होती है:

शवासनं श्रमहरम्.

(घेरंड संहिता 2/19)

(शवासन थकावट को दूर करता है.)

क्या पूर्वोक्त ‘सर्वव्याधिहर आसन’ थकावट को दूर करने में असमर्थ है, जो इसे विशेषत: श्रमहर बताया गया है?

इसी तरह अगले मकरासन के बारे में कहा गया है कि यह शरीर की अग्नि को प्रज्वलित करता है :

देहाग्निकरं मकरासनं तत्.

(घेरंड संहिता 2/39)

क्या पहले कहे हुए ‘सर्वव्याधि नाशक’ आसन यह काम नहीं करते जो इस के लिए पृथक् से मकरासन की कल्पना की गई है? यदि वे नहीं करते तो फिर उन्हें ‘सर्वव्याधि नाशक’ कहने का क्या औचित्य है?

इसी तरह अगले 3 आसनों को सिद्धि देने वाले कहा गया है :

मुक्तासनं तु सिद्धिदम्.

(घेरंड संहिता 2/11)

(मुक्तासन सिद्धियों को देने वाला है.)

वज्रासनं भवेदेतत् योगिनां सिद्धिदायकम्.

(घेरंड संहिता 2/12)

(वज्रासन योगियों के लिए सिद्धियां प्रदान करने वाला है.)

गोरक्षासनमित्याहु : योगिनां सिद्धि- कारणम्.

(घेरंड संहिता 2/26)

(गोरक्षासन योगियों को सिद्धि प्रदान करने वाला है.)

क्या इन 3 आसनों को छोड़ कर शेष 29 आसन सिद्धि देने में असमर्थ हैं. यदि वे असमर्थ हों तो भी इन 3 विशेष आसनों के अस्तित्व का क्या औचित्य है? तीनों एक ही काम करते हैं. कथित सिद्धियां प्रदान करने का यह काम तो एक आसन ही कर सकता है. ऐसे में 2 आसनों को तो बेकार ही घोषित करना होगा. साथ ही शेष 29 आसन भी निरर्थक सिद्ध होंगे, क्योंकि वे तो सिद्धि देने में असमर्थ ही रहेंगे. इस दृष्टि से तो केवल 1 आसन काफी है. जब वह सिद्धि प्रदान करने में समर्थ है, तब स्पष्ट है कि वह सर्वव्याधियों को विनष्ट करने में भी समर्थ होगा. ऐसे में 32 आसनों का ही औचित्य सिद्ध करना कठिन हो जाएगा, 84 या 84 लाख की तो बात ही छोड़ो.

घेरंड संहिता ने मत्स्येन्द्र आसन, पश्चिमतान आसन और मयूर आसन का कोई लाभ विशेष नहीं बताया है. परंतु हठयोगप्रदीपिका ने इन के भी लाभ गिना दिए हैं :

मत्स्येन्द्रपीठं जठरप्रदीप्तिं प्रचंडरुग्मंडलखंडनास्त्रम्.

(हठयोग-प्रदीपिका 1/27)

[मत्स्येंद्र आसन जठराग्नि (पाचनशक्ति) को तेज करता है और प्रचंड रोगों के समूह को नष्ट करता है.]

इति पश्चिमतानमासनम्,

उदयं जठरानलस्य कुर्यादुदरे कार्श्यमरोगतां च पुंसाम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/29)

(पश्चिमतान आसन जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, उदर को मध्य से कृश करता है और रोगों से मुक्त करता है.)

हरति सकलरोगानाशु गुल्मो- दरादीनभिभवति च दोषानासनं श्रीमयूरम्,

बहु कदशनभुक्तं भस्म कुर्यादशेषं जनयति जठराग्ंिन जारयेत्कालकूटम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/31)

[मयूरासन गुल्म, जलोदर आदि सब रोगों को नष्ट करता है, खाए हुए ज्यादा या कुत्सित अन्न को पचाता है, जठराग्नि को बढ़ाता है और कालकूट (विष) के प्रभाव को भी खत्म करता है.]

यहां यह विचारणीय है कि जो चीजें घेरंड संहिता को मालूम नहीं वे हठयोगप्रदीपिका को कैसे मालूम हो गईं? क्या ‘शिव’ इस के लेखक के कानों में फूंक मार गए थे या ऐसे ही मनमाने ढंग के इन 3 आसनों के गुण कल्पित कर लिए गए?

तीनों सब रोगों को दूर करते बताए गए हैं, तीनों जठराग्नि को प्रदीप करने वाले कहे गए हैं. यदि तीनों को एक सा काम ही करना है तो फिर इन तीनों का औचित्य ही क्या रह जाता है?

दूसरे, मयूरासन को विष को भी पचा जाने वाला किस आधार पर कहा गया है? यह एक आम धारणा है कि मयूर (मोर) सांप को खा जाता है, विष को पचा लेता है. उसी आधार पर यह कल्पना की गई है कि मयूरासन से विष को पचाया जा सकता है. यह बहुत स्थूलबुद्धि की बात है. स्पष्ट है, मयूर के शरीर की नकल करने वाला आसन, मयूरासन लगाने पर व्यक्ति के अंदर उस पक्षी के अंदरूनी सिस्टम सा कोई सिस्टम काम करना शुरू नहीं कर सकता.

स्पष्टत: इन आसनों के कथित लाभ कपोलकल्पित हैं : जो बात एक गं्रथ में थी, बाद के ग्रंथकार ने उसे और ज्यादा लुभावना व आकर्षक बनाने के लिए अपने ग्रंथ में अपनी ओर से और मिर्च मसाला लगा कर प्रस्तुत कर दिया. जिन आसनों के कथित लाभों की बाबत योगीराज घेरंड चुप थे, हठयोगप्रदीपिका के लेखक ने उन में से कइयों के लाभ अपनी ओर से जोड़ कर अपने ग्रंथ को ज्यादा लोकप्रिय बना लिया और अपना योगीराजत्व ज्यादा श्रेष्ठ घोषित करवा लिया.

यहां यह भी विचारणीय है कि क्या किसी योगी ने इन योगासनों से कभी पाचन शक्ति बढ़ाई है? क्या किसी ने विष खा कर इन की सहायता से कभी अपनी जान बचाई है? क्या इन के कारण कोई रोग से मुक्त हुआ है? क्या इन के कोई प्रामाणिक उदाहरण हैं?

मेरा खयाल है, हम आधुनिक योगियों के उदाहरण न ले कर प्राचीन व प्रामाणिक उदाहरण ही लें. 1883 ई. में आर्यसमाज के संस्थापक योगीराज स्वामी दयानंद सरस्वती को विष दे दिया गया था. वे योगाभ्यास व योगासन किया करते बताए जाते हैं. परंतु कोई भी आसन उन्हें विष के घातक प्रभाव से नहीं बचा सका.

गौतम बुद्ध को भी योगीराज बताया जाता है. इसीलिए कई लोग तो बुद्धधर्म का अर्थ ही योग/विपश्यना बताते हैं. पालि त्रिपिटक में आता है कि पावा नगरी में बुद्ध ने शूकरमार्दव खाया था और फलत: उन्हें खून गिरने की बीमारी लग गई थी. इस (शूकरमार्दव) के लोगों ने भिन्नभिन्न अर्थ किए हैं. पहला और प्रसिद्ध अर्थ तो ‘एक वर्ष के सूअर का मांस’ है.

दूसरे इस का अर्थ ‘नर्म चावल को 5 गोरस से पकाने पर बना खाद्य पदार्थ’ बताते हैं और तीसरे इसे ऐसा रसायन बताते हैं जिस से मृत्यु पर विजय प्राप्त होती है. पहला अर्थ कई लोगों को इसलिए नहीं पचता कि इस से बुद्ध के मांसाहारी होने की बात सिद्ध होती है. दूसरा अर्थ उन्हें मांसाहारी के स्थान पर शाकाहारी सिद्ध करने के लिए किया जाता है. यहां हमारा उद्देश्य इस विवाद में पड़ना नहीं है कि वे मांसाहारी थे या शाकाहारी, बल्कि यह बताना मात्र है कि उन की पाचनशक्ति गड़बड़ा गई, वह बीमार पड़ गए.

तीसरा अर्थ आत्मविरोधी है, क्योंकि जो रसायन मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से आयुर्वेद व रसायन शास्त्र के अनुसार तैयार किया व करवाया गया था, वही बुद्ध की मृत्यु का कारण बना. यह अर्थ तो आयुर्वेद व रसायनशास्त्र के ढोल की पोल ही खोलता दिखाई देता है.

बुद्ध की वह बीमारी किसी भी योगासन से ठीक नहीं हो पाई. यदि वह योगी थे तो उन्होंने इन का आश्रय अवश्य लिया होगा. फलत: इसी बीमारी के कारण उन की मृत्यु हो गई.

इसी प्रकार महावीर स्वामी के बारे में भगवतीसूत्र के 15वें शतक में आता है कि उन्हें गोशाल के शाप के कारण अत्यंत पीड़ाकारी पित्त ज्वर का दाह उत्पन्न हो गया था व खूनी दस्त आने लगे थे. इस पर उन्होंने योगासन नहीं किए, कोई योगाभ्यास नहीं किया, बल्कि उन्होंने ‘कुक्कुट मांस’ का प्रयोग किया. ‘जैन धर्मदर्शन’ (1999) नामक पुस्तक में, जो राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सरकारों द्वारा पुरस्कृत है, डा. मोहनलाल मेहता लिखते हैं, ‘‘सिंह अनगार के आने पर महावीर ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा, ‘मैं अभी नहीं मरूंगा, किंतु 16 वर्ष तक और ‘जिन’ के रूप में विचरण करूंगा. अत: तू मेंढिक ग्राम में रेवती गृहपत्नी के यहां जा.

उस ने मेरे लिए 2 कपोतशरीर (कबूतर) उपस्कृत कर, तैयार कर रखे हैं, किंतु उन का मुझे प्रयोजन नहीं है. उस के यहां बासी (कल का) मार्जारकृत कुक्कुट मांस (बिल्ली द्वारा मारे गए मुर्गे का मांस) है, वह ले आ. उस का मुझे प्रयोजन है.’ सिंह अनगार रेवती गृहपत्नी के यहां गए एवं महावीर की आज्ञानुसार कुक्कुट मांस लाए. महावीर ने उस का सेवन किया, जिस से उन का पीड़ाकारी रोग शांत हुआ.’’

(जैन धर्मदर्शन, पृष्ठ 39-40)

यहां भी ‘कुक्कुट मांस’ शब्द के अर्थ बदल कर शाकाहारी बनाने के यत्न किए गए हैं परंतु डा. मेहता लिखते हैं, ‘‘मांसाहारपरक शब्दों को शाकाहारपरक अर्थ कर के इस दोष को दूर करने का प्रयत्न किया जाता है किंतु इस से चिंतक को संतोषप्रद समाधान प्राप्त नहीं होता. जिन अमुक शब्दों का प्रयोग इस शतक में किया गया है, जिन का कि शाकाहारपरक अर्थ किया जाता है, उन शब्दों का प्रयोग आगमिक साहित्य में अन्यत्र जहां कहीं हुआ है, साधारण प्रचलित अर्थ में ही हुआ है, अर्थात उन का झुकाव मांसाहारपरक अर्थ की ओर ही है.

(पृष्ठ 31-32)

हम यहां इस विवाद में नहीं पड़ना चाहते कि कुक्कुट मांस का मांसाहारी अर्थ ठीक है या शाकाहारी, हमारा उद्देश्य केवल यह बताना है कि वह जब बीमार पड़े, तब उन्होंने योगासन नहीं किए, योगाभ्यास नहीं किया, बल्कि उस बीमारी को शांत करने में समर्थ वस्तुओं/औषधियों का प्रयोग किया और फलत: 16 वर्ष जीवित रहे.

ये तीनों उदाहरण प्रसिद्ध व मान्य योगियों के हैं. इन से योगासनों के दावों की पोल ही खुलती नजर आती है. स्वामी दयानंद योगी होने के बावजूद मृत्यु को प्राप्त हुए; कोई योगासन काम नहीं आया; कोई विष के प्रभाव को नष्ट नहीं कर सका. गौतम बुद्ध की भी योगासनों से न बीमारी ठीक हुई, न पाचनशक्ति बढ़ पाई और वह मृत्यु को प्राप्त हुए. महावीर की बीमारी भी ठीक हो जाती है और वह 16 वर्ष तक बाद में जीते भी हैं; क्योंकि वे रोगनाशक औषधि का प्रयोग करते हैं, न कि योगासनों का, योगाभ्यास का.

इन उदाहरणों में बहुत कुछ छिपा है. हमें इन से शिक्षा ग्रहण करनी होगी और आसनों के यौगिक मकड़जाल से निकल कर औषधि की शरण ग्रहण करनी होगी.

हठयोग प्रदीपिका ने 84 आसनों का सार केवल 4 आसन बताए हैं.

चतुरशीत्यासनानि शिवेन कथितानि च,

तेभ्यश्चतुष्कमादाय सारभूतं ब्रवीम्यहम्.

सिद्धं पद्मं तथा सिंहं भद्रं चेति चतुष्टयम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/33-34)

(शिव ने जो 84 आसन कहे हैं, उन के सारभूत 4 आसन हैं – सिद्धासन, पद्मासन, सिंहासन और भद्रासन.)

हठयोगप्रदीपिका में इन में से 2 पद्मासन और भद्रासन को ही सर्वव्याधि विनाशक कहा गया है. सिंहासन को उस ने सर्वव्याधि विनाशक के पद से च्युत कर दिया है, हालांकि घेरंड संहिता इसे भी सर्वव्याधि विनाशक घोषित करती है. (देखें, घेरंड संहिता 2/15). लेकिन हठयोग- प्रदीपिका इसे योगियों द्वारा पूज्य और सब आसनों में उत्तम बताती है :

सिंहासनं भवेदेतत्पूजितं योगिपुंगवै:,

बंधत्रितयसंधानं कुरुते चासनोत्तमम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/52)

(सिंहासन श्रेष्ठ योगियों द्वारा पूजित, मूलबंध आदि तीनों बंधों को संनिधान करने वाला और सब आसनों में उत्तम है.)

अब यदि यह सब में उत्तम है, तो यह सर्वव्याधि विनाशक क्यों नहीं हो सकता? जब दूसरे सर्वव्याधि विनाशक आसन विद्यमान हैं, तब यह उस गुण से रहित होते हुए भी सब में उत्तम कैसे हो सकता है? लगता है, अपना श्रेष्ठत्व प्रतिपादित करने के लिए घेरंड की कुछ बातों को तोड़नामरोड़ना या बदलना जरूरी समझा गया. यह ईर्ष्याजनित मनमानापन क्या वैज्ञानिकता है?

इस चक्कर में विभिन्न योगीराजों को यह भी दिखाई नहीं देता कि वे परस्पर विरोधी बातें कर रहे हैं और अपनी ही बातों को काटे जा रहे हैं.

हठयोगप्रदीपिका के लेखक स्वात्माराम योगींद्र सिद्धासन को भी सब से उत्तम आसन घोषित करते हुए कहते हैं :

नासनं सिद्धसदृशम्.

(हठयोगप्रदीपिका 1/43)

(सिद्धासन के समान अन्य कोई आसन नहीं है.)

अब यदि सिंहासन सब में उत्तम है, तो सिद्धासन लासानी (अनुपम) कैसे हो सकता है?

जो उत्तम है, वह अनुपम (लासानी, अद्वितीय) क्यों नहीं और जो लासानी (अनुपम) है, वह उत्तम क्यों नहीं? क्या योगीराज ने झोंक में लिखा है या होश में? होश में तो ऐसा लिखना संभव नहीं, फिर झोंक के लिखे को कोई होशवाला व्यक्ति कैसे प्रामाणिक व सत्य बात के रूप में स्वीकार कर सकता है?

योगीराज इसी सिद्धासन की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं :

किमन्यैर्बहुभि: पीठै: सिद्धे सिद्धासने सति,

प्राणानिले सावधाने बद्धे केवलकुंभके.

(हठयोगप्रदीपिका 1/41)

(सिद्धासन के सिद्ध होने पर दूसरे बहुत से आसनों का क्या लाभ? इस सिद्धासन से केवलकुंभक प्राणायाम बंधने पर दूसरे सब आसन वृथा समझने चाहिए).

यहां स्वात्माराम योगींद्र ने केवल एक आसन पर आ कर शेष को व्यर्थ घोषित कर दिया है. यह वही निष्कर्ष है जिसे हम पहले ही प्रतिपादित कर चुके हैं, ‘इस दृष्टि से तो केवल एक आसन काफी है. ऐसे में 32 आसनों का ही औचित्य सिद्ध करना कठिन है, 84 या 84 लाख की तो बात ही छोड़ो.’

जब स्वयं योग के ग्रंथ ही एक आसन को छोड़ कर सब को वृथा घोषित करते हैं, जब विभिन्न ग्रंथों के माहात्म्यों पर तार्किक दृष्टि से विचार करने के बाद आम आदमी भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचता है कि एक के सिवा शेष सब आसन व्यर्थ हैं, तब योग वालों का बीसियों योगासनों को भिन्नभिन्न रोगों, दर्दों, विकृतियों आदि के इलाज के लिए मनमाने रूप में, बिना किसी वैज्ञानिक व प्रामाणिक आधार के, परोसते फिरना क्या अर्थ रखता है? इन की बड़ीबड़ी सजी दुकानों, इन के बड़ेबड़े कारोबारों को देख कर मनुस्मृति में प्रयुक्त ‘योग’ शब्द का स्मरण हो आता है, जिस का अर्थ सभी भाष्यकारों के अनुसार ‘छल’ है.

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि यदि योगासनों का चिकित्सा शास्त्रीय दृष्टि से कोई महत्त्व है, यदि इन से वास्तव में रोग दूर होते हैं तो इस काम के लिए एक ही ‘सर्वव्याधि विनाशक’ आसन पर्याप्त है. शेष सारी उठापटक एकदम फालतू है. विडंबना यही है कि इस एक आसन का भी कोई संतोषजनक व प्रामाणिक चिकित्साशास्त्रीय आधार उपलब्ध नहीं है. अत: योगा वालों के जंजाल से बचने में ही भला है.