सरस सलिल विशेष

बिहार की राजधानी पटना के पुराने इलाके पटना सिटी के रानीपुरबेगमपुर ब्लौक के बभनगांवा गांव के सावित्रीसत्यवान मंदिर के पास हर साल अप्रैल के महीने में अंधविश्वास का एक मेला लगता है. ‘पंजर भोकवा’ के नाम से मशहूर इस मेले में अंधभक्तों का जमावड़ा लगता है और पोंगापंथ का जम कर नंगा और खूनी नाच चलता है. पोंगापंथियों का जत्था लोदीकटरा, हरनाहा टोला और नून का चौराहा से नाचतेगाते निकलता है. कई महल्लों से घूमता हुआ यह जत्था सावित्रीसत्यवान मंदिर पहुंचता है. इस जत्थे में शामिल लोगों में कोई अपनी जीभ के बीचोंबीच धारदार चाकू घुसा कर नाच रहा होता है, तो कोई पेट में नुकीली बरछी घोंप कर उछलकूद कर रहा होता है. कोई बांहों में तीर घुसेड़ कर अपने सिर को गोलगोल घुमा रहा होता है, तो कोई अपने गालों में खंजर चुभो कर ठहाके लगा रहा होता है.

भगवान को खुश करने के नाम पर अपने जिस्म के कई हिस्सों में धारदार हथियारों को चुभाने का पाखंड खुल कर चलता है. मर्द अपने जिस्म के अलगअलग हिस्सों में तीर और चाकू जैसी धारदार चीजें घोंप कर पागलों के अंदाज में नाचते हैं और औरतें गीत गा कर उन के अंधविश्वास को बढ़ावा देती हैं.

कानून और प्रशासन को ठेंगा दिखाने वाले इस मेले को हर साल कराया जाता है और परंपरा की दुहाई दे कर प्रशासन और पुलिस भी पोंगापंथियों की मदद करती है यानी उन के लिए रास्ता साफ करती चलती है. सड़कों और गलियों में लगे जाम से पुलिस वालों का कोई लेनादेना नहीं होता है. पुलिस और प्रशासन के अफसर धर्म और अंधआस्था के नाम पर चुपचाप पाखंड के इस तमाशे को सालों से देखते आ रहे हैं.

इस मेले के पीछे अंधविश्वास से भरी एक कहानी बताई जाती है कि राजा ध्रुतसेन के बेटे सत्यवान ने अपने पिता का राजपाट छीनने के बाद अपनी पत्नी सावित्री के साथ बभनगांवा गांव में आ कर कुछ दिन बिताए थे. उसी की याद में ‘पंजर भोकवा’ मेला कराया जाता है.

हैरान करने वाली बात यह है कि नुकीली चीजों को जिस्म में घुसा कर मर्द लहूलुहान हो जाते हैं और उन की बीवियां अपने पति की लंबी उम्र के लिए दुआएं मांगती हैं.

ऐसे लोगों से बात करने पर साफ हो जाता है कि उन के दिमाग में अंधविश्वास का अंधकार किस कदर बना हुआ है. इन जाहिलों को शायद पता ही नहीं है कि आज तकनीकी रूप से तरक्की करती दुनिया के बीच ऐसे ही लोग तरक्की में रोड़ा बने हुए हैं. ये लोग पोंगापंथ के चक्कर में फंस कर उसे बढ़ावा देने में लगे हुए हैं.

पिछले 19 सालों से ‘पंजर भोकवा’ मेले में भाग ले कर अपनी देह में बरछी और तीर घोंप कर नाचने वाला सकलदेव राय बताता है कि भगवान को खुश करने के लिए वह ऐसा करता है. शरीर में बरछी घुसाने के बाद भी न दर्द महसूस होता है और न ही खून निकलता है.

अपनी जीभ में चाकू घोंप कर नाचने वाला 42 साल का काशीनाथ बताता है कि वह पिछले 12 सालों से यह कर रहा है और आज तक उसे कोई परेशानी नहीं हुई.

जीभ, पसली, होंठ, कान, नाक, पेट, हथेली, उंगली, जांघ वगैरह में तीर, बरछी, चाकू वगैरह घोंप कर अंधविश्वास के नशे में नाचते लोगों को देख कर दिल दहल उठता है. शरीर के कई हिस्सों में लटके तीरों और चाकुओं को देख कर सिर चकरा जाता है. पोंगापंथ की घुट्टी पीने के बाद पागलपन की हद पार करने वालों के दिमाग के इलाज की जरूरत है.

मशहूर डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि शरीर के किसी भी हिस्से में छोटी सी सूई या कील चुभ जाती है, तो इनसान चीख पड़ता है, लेकिन ‘पंजर भोकवा’ मेले में अंधविश्वास के नाम

पर अंधे लोग तीरचाकू, लोहे की छड़ और बरछी शरीर में घोंप लेते हैं और हंसतेनाचते रहते हैं. यह दिमागी दिवालियापन के अलावा कुछ नहीं है.

बाबाओं के कहने पर ऊपर वाले को खुश करने के इस मेले में ज्यादातर जाहिल लोग ही शामिल होते हैं, जिन्हें आसानी से धर्म की घुट्टी पिलाई जा सकती है.

हर साल 14 से 16 अप्रैल तक ‘पंजर भोकवा’ मेला कराया जाता है. इन 3 दिनों के दौरान तंत्रमंत्र, झाड़फूंक, ओझाई के नाम पर बाबाओं और ओझाओं का मजमा लगता है. भूतप्रेत झाड़ने और डायन को पकड़ने का जम कर ड्रामा चलता है. खुलेआम तीर, भाला, छुरा, बरछी, तलवार, कटार वगैरह का प्रदर्शन किया जाता है और पुलिस प्रशासन भी आंखों पर पट्टी बांध कर अंधविश्वास को बढ़ावा देने में लगा रहता है.

अपने शरीर में धारदार चीजें चुभाने वालों का मानना है कि ऐसा करने से रुपएपैसे के साथसाथ सुखशांति मिलती है, पर ऐसे पागलपन में साल दर साल शामिल होने वाले अब भी गरीबी से जूझ रहे हैं. यह बात उन लोगों की समझ में नहीं आती है और न ही दूसरों के समझाने से वे समझने की कोशिश करते हैं.