सरस सलिल विशेष

किशोरावस्था तक जो त्योहार मन को खूब भाते हैं वे युवावस्था आतेआते क्यों मन को कचोटने लगते हैं, इस बात का हमारे तीजत्योहार प्रधान देश में इस सवाल से गहरा संबंध है कि त्योहार कैसे मनाएं. 15-16 वर्ष की उम्र तक के किशोरों के तर्कों को हवा में उड़ा दिया जाता है लेकिन युवाओं के तर्कों का सहज जवाब आज तक कोई धर्म या उस का जानकार नहीं दे पाया.

यह दीगर बात है कि उन्हें गोलमोल वैज्ञानिक किस्म के जवाब दे कर संतुष्ट करने और धर्म से सहमत करने की कोशिशें की जाती हैं जिन के अपनेअलग माने होते हैं.

त्योहारों का संबंध समाज से ज्यादा है या धर्म से, इस सवाल के जवाब में भोपाल के एक प्राईवेट इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ रहे द्वितीय वर्ष के छात्र शाश्वत मिश्रा कहते हैं कि सिखाया तो यही गया है कि त्योहार किसी न किसी धार्मिक कारण के चलते मनाए जाते हैं जिन में आजादी कम बंदिशें ज्यादा होती हैं. बकौल शाश्वत, ‘‘भोपाल में पढ़ने आने के पहले तक घर में उसे नवरात्रि के दिनों में व्रत रखने को बाध्य किया जाता था लेकिन होस्टल में आ कर यह नियम टूट गया. इस से कोई खास फर्क नहीं पड़ा. उलटे, एक दबाव से मुक्ति मिली.’’

साफ यह हुआ कि भारतीय समाज बहुत ही वर्जनाओं में जीता है. त्योहारों के दिनों में तो खासतौर से व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कोई माने नहीं रह जाते.

शाश्वत के ही एक सहपाठी अनिमेष की राय उस से उलट है कि धर्म के दिशानिर्देशों को मानने में हर्ज क्या है. अनिमेष की नजर में इस बात को मुद्दा बनाया ही नहीं जाना चाहिए कि धर्म क्या कहता है. हमें त्योहारों के दूसरे पहलुओं को देखना चाहिए, मसलन सब से बड़ा त्योहार दीवाली एक सामाजिक उल्लास का प्रतीक है. इस दिन और रात हम एक विशिष्ट मानसिकता में रहते हैं. साफसफाई पर जोर दिया जाता है. घरों में नएनए सामान खरीदे जाते हैं. नए कपड़े पहने जाते हैं. पकवान बनते हैं. आतिशबाजी चलाई जाती है. ऐसे में धर्म का रोना ले कर बैठ जाना फुजूल का पूर्वाग्रह नहीं, तो क्या है.

विरोधाभासी जकड़न

5वीं क्लास में रटाया जाने वाला दीवाली का निबंध बांच रहा अनिमेष और उस निबंध को धार्मिक जकड़न बता रहा शाश्वत दरअसल 2 अलगअलग विचारधाराओं का प्रतिनिधत्व करते नजर आते हैं. पहली समझौतावादी है जबकि दूसरी तर्क आधारित है.

हैरत की बात यह है कि इन दोनों ने ही बीती 5 सितंबर को गणेश विसर्जन के दौरान होस्टल में साथ बैठ कर शराब पी थी और दोनों को ही इस में किसी गणेश या धर्म का खौफ नहीं लगा था. इन की नजर में यह झूमनेनाचने गाने का इवैंट था ठीक वैसे ही जैसा हर साल एक जनवरी को होता है.

फिर एक वर्ग क्यों तर्क को पूर्वाग्रह करार देते धर्म और उस की बंदिशों पर बहस या चर्चा करने से बचना चाहता है. इस सवाल का मनोवैज्ञानिक जवाब तो यही नजर और समझ आता है कि धार्मिक सिद्धांतों और निर्देशों का पालन करना बचपन से ही थोप दिया जाता है.

ऐसे में इन की सफाई समझने के बाद भी अधिकांश युवा धर्म के खोखलेपन को इसलिए स्वीकार लेते हैं और जिंदगीभर ढोते भी रहते हैं कि कौन फालतू के विवादों में फंसे, सदियों और पीढि़यों से जो होता आ रहा है उसे करते रहने में हमारा क्या बिगड़ता है.

बिगड़ता यह है

हर युवा का अपना एक दार्शनिक दृष्टिकोण भी होता है जो अपनी जिज्ञासाओं का समाधान चाहता है, लेकिन वह खोखली बातों से बहलने को तैयार नहीं होता, मसलन बहुत साधारण और प्रचलित यह धारणा कि दीवाली पर विधिविधान से पूजापाठ करने से लक्ष्मी आती है.

लक्ष्मी यानी पैसा अगर एक खास दिन पूजापाठ करने से आता होता तो मेहनत की जरूरत क्या, इस बात को अब अधिकांश युवा सोचने लगे हैं.

बीकौम की छात्रा अदिति की मानें तो अगर ऐसा है तो मैं रोज लक्ष्मीपूजा करने को तैयार हूं, लेकिन लक्ष्मी या कोई दूसरा देवीदेवता इस बात की गारंटी तो ले.

बीकौम करने के साथसाथ बैंक की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही अदिति का मानना है कि जो हासिल होगा वह लगन और मेहनत से होगा. मेहनत तो हम खूब करते हैं और उस से ही कैरियर बनता है पर हमारी लगन को धर्म का नाम प्रेरणा या उपलब्धि करार दे दिया जाता है.

सरस सलिल विशेष

यानी कुछ अच्छा हुआ तो व्रत, उपवास और पूजापाठ की वजह से हुआ और मनमाफिक नहीं हुआ तो किस्मत खराब थी या मेहनत में कोई कमी थी. जिस की जिम्मेदारी लेने से कोई तैयार नहीं. युवा पीढ़ी कभी भाग्यवादी नहीं रही, इसलिए वह त्योहारों की धार्मिक जकड़न से मुक्ति चाहती है जो उसे आसानी से नहीं मिल रही. ऐसे में वह या तो अनिमेष की तरह समझौता कर लेती है यानी धार्मिक जकड़न के आगे हथियार डालती है या फिर शाश्वत की तरह अपने सवाल व तेवर कायम रखती है.

मिलता यह है

सवालों और तर्कों का गहरा संबंध युवाओं के आत्मविश्वास से है. जो युवा जवाब न मिलने पर धार्मिक जकड़नों को नकारने लगे हैं उन में एक अलग तरह का आत्मविश्वास होता है क्योंकि वे दिमागीतौर पर किसी रूढि़ या चमत्कार के गुलाम नहीं रहते.

कम मात्रा में ही सही ये वे युवा हैं तो संतुष्ट रहते हैं, किसी संदेह में नहीं जीते. लेकिन जिन युवाओं ने असमंजस पाल रखा है वे कैरियर में सफल भले ही हो जाएं पर संतुष्ट नहीं रह पाते. इसलिए उन में आत्मविश्वास बेहद कम होता है.

हर दौर में युवा यह सवाल पितृपक्ष के दिनों में जरूर करते हैं कि जब ब्राह्मण के जरिए खायापिया पूर्वजों तक पहुंच जाता है तो वे मोबाइल फोन क्यों नहीं ले लेते जिस से पूर्वजों से बातचीत ही हो जाए. सोशल मीडिया पर यह सवाल या दलील इस साल भी खूब वायरल हुई थी. लेकिन इस पर बहस नहीं हुई. यह बेहद निराशाजनक बात है. वजह, युवा फेसबुक और व्हाट्सऐप पर धर्म व जाति के आधार पर तो खूब एकदूसरे पर कीचड़ उछालते हैं लेकिन एक मामूली सवाल का जवाब नहीं दे पाते.

यह युवावर्ग कहीं जवाब मांगने की जिद पर अड़ न जाए, इसलिए हर साल धार्मिक जकड़न शिथिल कर दी जाती है, जिस का मकसद या साजिश युवाओं को धर्म के मकड़जाल में उलझाए रखना होता है.

एक नई जकड़न

मिसाल झांकियों की लें तो अब युवा शराब पी कर विसर्जन समारोह में नाचगा सकते हैं. इस से अब धर्म भ्रष्ट नहीं होता. जींसटौप पहने युवतियों को भी नाचनेगाने की छूट मिल गई है और अब वे धार्मिकतौर पर अछूत नहीं रही हैं. गणेश और दुर्गा के साथ सैल्फी खींचते युवा अगर यह समझते हैं कि वे धार्मिक जकड़न से अपनी कोशिशों के चलते इस तरह मुक्त हो रहे हैं तो यह उन की गलतफहमी ही है.

दरअसल, उन्हें एक नई जकड़न में कसा जा रहा है जिस में धर्म की रस्सी थोड़ी मुलायम है. बंद कोठरी से निकाल कर किसी कैदी को हवा और रोशनी देने वाली खिड़की वाली कोठी में रख दिया जाए तो उसे थोड़ी राहत तो मिलेगी पर रिहाई नहीं. कुंडी ज्यों की त्यों ही बंद रहती है.

युवाओं को इस जकड़न को त्योहारों के मद्देनजर समझना होगा कि मिल रही रियायतें रिहाई नहीं हैं, एक नए किस्म की जकड़न हैं. जिन की तुलना उस आलीशान मौल से की जा सकती है जिस में चमकदमक है और डिस्काउंट भी लेकिन घाटा उठाने को दुकानदार तैयार नहीं. यह लुभाने का नया तरीका है जिस से प्रोडक्ट इस तरह बेचा जाए कि खरीदार को लगे कि उस का फायदा हुआ है.

त्योहार अगर सामाजिक भाईचारे व उल्लास के प्रतीक होते तो उन में पूजापाठ व्रत, उपवास और दर्जनों बंदिशों की जरूरत नहीं पड़ती. अगर त्योहार आज भी कुछ छूट के साथ ही सही, धर्म के मुताबिक मनाया जा रहा है तो यह एक साजिश है जिस में युवाओं की मरजी की कोई अहमियत नहीं रह जाती.

युवा कब तक इस धार्मिक जकड़न से नजात पाएंगे इस सवाल का जवाब कभी नहीं मिला. हां, व्यक्तिगत स्तर पर हिम्मत करते वे खुद को मुक्त कर पाए तो जरूर दूसरे भी उन के पीछे चलेंगे और त्योहारों का सही लुत्फ उठा पाएंगे. किसी शाश्वत और अनिमेष का गणेश विसर्जन पर शराब पीना कोई चुनौती, बुद्धिमानी या बगावत की बात नहीं थी क्योंकि वे दूसरे तरह से अपनी सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं और इस से धर्म को एतराज नहीं, तो यह जकड़न का नया संस्करण नहीं तो और क्या है?