सरस सलिल विशेष

घूस लेने के लिए तो पुलिस वाले बदनाम हैं ही, पर कई गंदी आदतें भी उन की इमेज बिगाड़ने वाली होती हैं. हालांकि पुलिस महकमे के मुलाजिमों ने कभी यह इमेज सुधारने की कोशिश भी नहीं की, लेकिन अब मध्य प्रदेश का पुलिस महकमा थोड़ी सख्ती दिखा रहा है, जिस से कि पुलिस वाले अपनी इन गंदी आदतों से छुटकारा पा लें. बीते दिनों पुलिस हैडक्वार्टर, भोपाल के आला अफसरों ने अपने महकमे के मुलाजिमों की बेवक्त हो रही मौतों की जानकारी सभी जिलों से मंगाई, तो रिपोर्ट देख कर हर कोई सकते में आ गया. तंबाकू की लत एक बड़ी वजह पुलिस वालों की मौतों की समझ आई, जिस सें टीबी और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियां होती हैं.

एक अंदाजे के मुताबिक, तकरीबन 70 फीसदी पुलिस वाले तंबाकू, गुटका, पान मसाला खाते हैं और बीड़ीसिगरेट का धुंआ भी जम कर उड़ाते हैं.

पिछले डेढ़ साल से सूबे में तकरीबन 450 पुलिस वालों की मौत अलगअलग बीमारियों से हुई थीं. इन में सब से ज्यादा 93 मुलाजिम हार्ट अटैक से मरे थे, कैंसर जैसी घातक जानलेवा बीमारी से 47 पुलिस वाले मरे थे, लिवर और किडनी की खराबी से तकरीबन 36 मुलाजिम मरे.

ये आंकड़े देख कर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि खानपान और आदतों का सेहत और जिंदगी से कितना गहरा ताल्लुक होता है. बुरी लत और गंदी आदतों के शिकार पुलिस वाले कभी सुधरेंगे, ऐसा लगता नहीं.

इस की एक नहीं, कई वजहें हैं. इस में कोई शक नहीं कि मलाईदार होने के बाद भी पुलिस की नौकरी बहुत ही तनाव भरी होती है और मुलाजिमों को देखा जाए, तो एक तरह से चौबीसों घंटे ड्यूटी पर रहना पड़ता है. सिपाही से ले कर बड़े अफसर तक चैन की नींद नहीं सो पाते, लेकिन इस के एवज में वे तरहतरह के नशे करें, तो कौन सा भला उन का या आम लोगों का होता है, यह वे नहीं बता पाते.

अच्छा फरमान लाया रंग

जब जानकारी इकट्ठा हो गई कि क्यों महकमे के मुलाजिमों की बेवक्त मौतें हो रही हैं, तो पुलिस कल्याण शाखा ने इस तरह की मौतों पर अंकुश लगाने के लिए एक फरमान सूबे के तमाम थानों के लिए जारी कर दिया.

इस फरमान में कहा गया है कि अब थानों और पुलिस से ताल्लुक रखते दूसरे दफ्तरों में तंबाकू का सेवन और धूम्रपान बरदाश्त नहीं किया जाएगा यानी एक तरह से खुद पुलिस के आला अफसरों ने यह मान लिया है कि उन के मुलाजिम इन नशे वाली लतों के शिकार हैं.

इन आला अफसरों को यह एहसास भी है कि अकेले फरमान जारी कर देने से बात नहीं बनने वाली. लिहाजा, उन्होंने इस में यह भी जोड़ दिया कि अब नियम से दफ्तरों और थानों के डस्टबिनों की जांच की जाएगी. अगर उन में पान या तंबाकू की पीक मिली, तो जिम्मेदार अफसरों से पूछा जाएगा और उन पर कार्यवाही भी की जाएगी. साथ ही, जो मुलाजिम पानतंबाकू खाता या बीड़ीसिगरेट पीता दिखा, तो उसे सजा दी जाएगी. यह सजा कैसी होगी, इस का जिक्र फरमान में नहीं किया गया है.

पुलिस कल्याण शाखा के एडीजी जीआर मीणा की मानें, तो ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि उन के महकमे द्वारा कराए गए सर्वे में यह बात उजागर हुई थी कि तंबाकू और धूम्रपान से होने वाली बीमारियों और उन से मौतों की बात की तसल्ली हुई थी.

यह फरमान पुलिस वालों की इस गंदी लत को काबू में करने के मकसद से जारी किया गया है. हमारी मंशा साफ है कि पुलिस वाले सेहतमंद रहें.

लागी छूटे न

भोपाल के अशोका गार्डन थाने के 45 साला एक हैड कांस्टेबल ने बताया कि नौकरी ज्वाइन करते वक्त वह तंबाकू नहीं खाता था, लेकिन जब पहली तैनाती रायसेन जिले के एक थाने में हुई, तो यह लत गले पड़ गई. उस थाने के सभी मुलाजिम तंबाकू खाते थे या बीड़ीसिगरेट पीते थे. थाना इंचार्ज को हथेली पर रगड़ा हुआ तंबाकू पसंद था और यह काम वे अपने मातहतों से करवाते थे.

उसे भी तंबाकूचूना रगड़ कर साहब को देना पड़ता था. वे उसे चैतन्य चूर्ण कहते थे और चौबीसों घंटे मुंह में दबाए उस की पीक थूकते थे. बस, वहीं से मेरी भी आदत पड़ गई.

भोपाल के ही एमपी नगर थाने के एक सबइंस्पैक्टर ने बताया कि हम पुलिस वालों की नौकरी तनाव में रहने के साथसाथ बोर करने वाली होती है. लिहाजा, इन्हें दूर करने के लिए हम लोग पानतंबाकू और बीड़ीसिगरेट का इस्तेमाल करते हैं. इस से टाइम पास भी हो जाता है और दिमाग भी बराबर काम करता रहता है.

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अपने तनाव यानी नशे के हक में ऐसी कई बातें पुलिस वालों ने बताईं, जिन्हें वे दलील की शक्ल देते लगे मानो इस के अलावा कोई और रास्ता ही न हो.

क्या इस फरमान के लागू होने से कुछ फर्क पड़ेगा? वे अपनी आदतें सुधारेंगे? इस पर इन सभी का जवाब था कि लत तो नहीं छोड़ सकते. हां, अब एहतियात बरतेंगे. तंबाकू या पान खा कर डस्टबिन में नहीं थूकेंगे, बल्कि बाहर जाएंगे या फिर वाश बेसिन में थूकेंगे और साफ कर देंगे.

एक सबइंस्पैक्टर ने तो यहां तक कहा कि शौचालय इस के लिए मुफीद जगह है. वहां बैठ कर इतमीनान से तंबाकूखैनी चबाएंगे और पानी डाल कर बाहर आ जाएंगे. रही बात डस्टबिन की, तो उसे साफ रखने में जरूर फुरती दिखाएंगे.

यानी सुधरेंगे नहीं

साफ लग रहा है कि इस फरमान का कोई खास असर नहीं हुआ है. कार्यवाही के डर से पुलिस वाले एहतियात बरतने की बात कर रहे हैं. भोपाल सहित राज्य के कई थानों की दीवारों और कोनों में लगे पानतंबाकू के दागधब्बों को साफ किया जा रहा है, जिस से कभी जांच हो, तो बात थाना इंचार्ज पर न आए.

लेकिन बात अकेले तंबाकू या सिगरेट की नहीं, फसाद की एक बड़ी जड़ शराब है, जिसे पुलिस वाले खुलेआम पीते हैं. भोपाल के होशंगाबाद रोड पर बने एक ढाबे वाले ने बताया कि देर रात ये ढाबों में बैठ कर छक कर शराब पीते हैं, क्योंकि उन्हें यह मुफ्त में मिलती है. हां, आम लोगों और मीडिया की नजर से बचने के लिए ये पुलिस वाले केबिन में या कोने की आड़ ले कर पीते हैं और खाना व मुर्गमुसल्लम भी मुफ्त खाते हैं. एवज में जब तक कोई बड़ी वजह न हो, परेशान नहीं करते.

इस ढाबे वाले के मुताबिक, छोटे मुलाजिमों का वास्ता रोज ऐसे मुजरिमों से पड़ता है, जो इस तरह की लतों के शिकार होते हैं. कोई जेबकतरा भी हवालात में आए, तो उस की तलब मिटाने के लिए ये ज्यादा दाम पर उसे तंबाकू और सिगरेट मुहैया कराते हैं. यानी मुजरिमों की संगत भी एक बड़ी वजह है.

एक सिपाही ने तो यहां तक कह डाला कि आला अफसर तो इस तरह कह रहे हैं, मानो वे दूध के धुले हों. खुद बंगलों में बैठ कर रोज शाम गला तर करते हैं. इस के बाबत सोड़ा, कोल्डड्रिंक, नमकीन, काजू और सिगरेट हमें ले जा कर देना पड़ता है. ये पहले खुद को तो सुधार लें, फिर हमें उपदेश या प्रवचन दें.

हमदर्दी नहीं इमेज की चिंता

15 सितंबर, 2016 को जबलपुर में एक असिस्टैंट सबइंस्पैक्टर सरेआम शराब के नशे में हुड़दंग मचाता पकड़ा गया था, तो पुलिस महकमे की जम कर छीछालेदर हुई थी.

यह पहला या आखिरी वाकिआ नहीं था, जिस में कोई पुलिस वाला ड्यूटी के दौरान ज्यादा शराब पीने के चलते नशे में बहक गया था.

इस तरह के तमाम नशे बड़े अफसर भी करते हैं, लेकिन वे खुद को काबू में रखते हैं. उलट इस कि छोटे मुलाजिमों को यह हुनर नहीं आता, जिन्हें सिखाने और सुधारने के लिए यह सारी कवायद की जा रही है.

वहीं, डस्टबिन देखने से समस्या का हल नहीं होने वाला, क्योंकि जो मुलाजिम हर रोज सुबूतों से छेड़छाड करते हुए खेलते हैं, वे इस तरह के फरमानों का तोड़ भी बखूबी जानते हैं.

सच तो यह है कि खुद पुलिस वाले ऐसी लत से छुटकारा नहीं पाना चाहते, क्योंकि उन्हें तो सबकुछ मुफ्त में  ही मिलता है और कोई अंकुश भी उन पर नहीं रहता. इन लोगों को किसी का डर नहीं रहता.

कुछ पुलिस वालों को नौकरी से बरखास्त कर देने से बात बनेगी, ऐसा लग भी नहीं रहा. घूसखोरी की लत ने पुलिस वालों को बेलगाम बना दिया है.

यह समस्या अकेले पुलिस महकमे की नहीं है, बल्कि दूसरे महकमों के मुलाजिम भी गंदी आदतों के शिकार हैं. उन पर भी लगाम कसे जाने की कवायद जरूरी है. तमाम सरकारी दफ्तरों में पीक का दिखना आम बात है और मुलाजिम भी नशे की गिरफ्त में रहते हैं, लेकिन इमेज पुलिस महकमे की ज्यादा खराब होती है.

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