उत्तर प्रदेश पुलिस का पहला काम नेताओं की सुरक्षा और दूसरा का धर्मिक यात्राओें का प्रबंधन इसके बाद बचे समय में कानून व्यवस्था और अपराध प्रबंधन का काम. उत्तर प्रदेश में पुलिस कुछ इस तरह से अपने काम की प्राथमिकता रखती है. हर दिन किसी न किसी महापुरूष का जन्मदिन उसकी मूर्ति और जुलूस की सुरक्षा करनी होती है. हर त्यौहार पर तमाम धर्मिक संगठन धर्मिक यात्रायें निकालते है इनमें कोई झगड़ा न हो इसकी जिम्मेदारी पुलिस की प्राथमिकता में है. जिन जिन त्यौहारो में जुलूस नहीं निकलते थे उनमें भी जुलूस निकलने लगे. ऐसे धर्मिक जूलूसों को निकालने से पहले ना तो किसी तरह की अनुमति ली जाती है और ना ही कोई सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया जाता है. जुलूस में पैदल और मोटर साइकिलों का प्रयोग किया जाता है और वाहन सुरक्षा का कोई नियम पालन नहीं होता. बेबस पुलिस एक भी मोटर वाहन एक्ट में चालान नहीं कर पाती है.

सामाजिक मुद्दों के जानकार मानते है कि अब धर्मिक जुलूस धर्म से अधिक राजनीति और समाज पर दबाव दिखाने के लिये आयोजित होते है. धर्म के नाम पर प्रशासन इनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठा पाता है. ऐसे में यह निरकुंश होकर सड़को को जाम करते हैं. कई जुलूसों में अस्त्राशस्त्रा का भी खुलकर प्रयोग होता है जो एक तरह से आतंक फैलाता है. ऐसे धर्मिक जुलूस बहुतायत में तनाव और झगड़ों की वजह बनता है. दलित चिंतक राम चन्द्र कटियार कहते है जिस प्रदेश का मुखिया संत महंत हो वहां धर्मिक जुलसों पर पांबदी कैसे लग सकता है?’

पुलिस विभाग के एक अधिकारी कहते हैं हमारें लिए सबसे पहली प्राथमिकता धर्म के नाम पर निकलने के नियंत्रण की होती है. पुलिस विभाग के पास लोगों की संख्या कम है. ऐसे में पुलिस विभाग अपनी प्राथमिकता के अनुसार काम करती है. नेताओं की सुरक्षा के बाद धर्मिक जुलूस और कानून व्यवस्था मुद्दे पर काम करती है. यह सच है कि पुलिस पर काम का इतना दबाव है कि वह अपराध की विवेचना में समय नहीं दे पाती. ऐसे में छोटेछोटे अपराधों पर पुलिस का ध्यान नहीं जा पाता. यह जरूरी है कि ऐसे धर्मिक जुलूसों में कमी लाई जाए.

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