सरस सलिल विशेष

देश में जब चारों तरफ नफरत और हिंसा की आंधी चल रही हो, इस के बीच कहींकहीं प्रेम के टिमटिमाते दीए मन को खुश होने का एहसास देते हैं. ज्यादातर अखबार आजकल रिश्तों में फैल रही कड़वाहट के चलते होने वाले झगड़ों, हिंसा की खबरों से भरे रहते हैं. देखिए, रिश्तों में अपराध की कैसीकैसी अजीबो गरीब खबरें सुर्खियों में हैं.

नोएडा, उत्तर प्रदेश में औरत द्वारा औरत की घर में घुस कर गोली मार कर हत्या. वह औरत पति को छोड़ कर दूसरे मर्द के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रह रही थी.

अमेरिका में रह रहे बेटे को मुंबई पहुंचने पर फ्लैट में मां का कंकाल मिला. इंजीनियर बेटे की मां से एक साल पहले टैलीफोन पर बात हुई थी.

साइड न देने पर कार सवार नौजवान की लाठी डंडों से पीट पीट कर हत्या. खाना लगाने में देरी पर होटल मालिक और बेटे की ग्राहकों ने गोली मार कर जान ले ली.

खून की कमी के कारण पत्नी द्वारा फल मांगे जाने पर हुए झगड़े में पति ने पत्नी को मार डाला. रोहिणी में दोस्ती का प्रस्ताव ठुकराने पर युवक द्वारा सहपाठी युवती की गला दबा कर हत्या. बड़े भाई द्वारा छोटे भाई की हत्या. शराब के पैसे न देने पर बेटे द्वारा मां की हत्या. पिता द्वारा बेटे की हत्या. पत्नी द्वारा पति का कत्ल. पति द्वारा पत्नी की जान लेना जैसी वारदातें किसी भी इनसान को झकझोर सकती हैं.

ऐसी ही खबरों के बीच झारखंड के जशपुर में 75 साला रतिया राम और

70 साला जिमनी बरी के बीच पनपे प्यार और शादी व मणिपुर की नागरिक अधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला और उन के ब्रिटिश प्रेमी डैसमंड कोटिंहो के विवाह बंधन में बंधने की खबरें ठंडी बयार के समान हैं. इन दोनों जोड़ों की खबरें अखबारों, टैलीविज चैनलों पर फोटो और वीडियो समेत दिखाई जा रही हैं. इन्हें लोग ताज्जुब से देख रहे हैं. सचमुच यह प्रेम चारों ओर फैली नफरत के बीच हैरानी की ही बात है.

जशपुर के झग्गरपुर गांव के रहने वाले रतिया राम की पत्नी की 20 साल पहले मौत हो गई थी. उन की 2 बेटियां थीं, जिन की शादी हो गई.

कुछ महीने पहले रतिया राम अपनी बेटी के गांव झिक्की गए, वहीं उन की मुलाकात जिमनी बरी से हुई. वे भी अकेली रह रही थीं. उन के कोई औलाद नहीं थी. उन के पति की भी 20 साल पहले मौत हो गई थी. फिर कोई सहारा नहीं रहा. कोई जमीन जायदाद भी नहीं थी. दोनों ने मुलाकात के बाद एकदूसरे का दुखदर्द सुना, तो उन की हमदर्दी दोस्ती में बदल गई.

एक महीने तक चला यह रिश्ता प्यार में बदल गया. दोनों ने एक दूसरे का अकेलापन दूर करने का फैसला लिया. दोनों को सामाजिक बंदिशों का भी ख्याल आया, पर उन्होंने समाज का सामना करने की हिम्मत जुटाई.

वे दोनों एक हफ्ते तक एक ही घर में रहे. बाद में बगडोल पंचायत के सरपंच के पास पहुंचे और अपना फैसला बता कर मदद मांगी.

पंचायत समेत समूचे गांव ने मिल कर इस बुजुर्ग जोड़े की धूमधाम से शादी करा दी. उन्हें कई तोहफे दिए गए. शादी के जोड़े में दोनों बुजुर्गों के मुसकराते चेहरे देख कर हर किसी को अलग तरह की खुशी मिल रही थी.

दूसरी घटना इरोम शर्मिला की है, जो अपने ब्रिटिश प्रेमी डैसमंड कोटिंहो के साथ 17 अगस्त, 2017 को विवाह बंधन में बंध गईं. दोनों ने सब रजिस्ट्रार दफ्तर पहुंच कर एक दूसरे को माला पहनाई और एकदूसरे के हो गए.

यह अंतर्धार्मिक विवाह था, इसलिए उन्होंने स्पैशल मैरिज ऐक्ट के तहत अर्जी दी थी.

सरस सलिल विशेष

मणिपुर की इरोम शर्मिला आर्म्ड फोर्सेस स्पैशल पावर ऐक्ट के खिलाफ 16 साल से भूख हड़ताल कर रही थीं. पिछले दिनों मणिपुर में चुनाव हारने के बाद वे तमिलनाडु के कोडईकनाल आ गई थीं. कुछ समय से वे अपने इस दोस्त के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रह रही थीं.

इन दिनों प्रेमप्यार की खबरें कम ही आ रही हैं. इस तरह का प्यार निश्छल होता है. जहां लालच, चालाकी, त्याग नहीं, वहां प्रेम नहीं है. इन दोनों जोड़ों के बीच धर्म, जाति की बात कहीं नहीं है. इस के उलट रिश्तों में लालच सब से ऊपर हो गया है. बातबात पर समाज हिंसा पर उतारू दिखता है.

किसी भी सभ्य समाज में क्या कभी ऐसा होता है? लोग वहशी बनते जा रहे हैं. रिश्तों में जरा भी गंभीरता नहीं दिखती. लगता है कि समाज सब्र खो चुका है. बातबात पर लोग घरपरिवार, सार्वजनिक जगहों पर भिड़ जाते हैं, एकदूसरे की जान ले लेते हैं. समाज कहां जा रहा है?

मीडिया में भी सामाजिक और पारिवारिक संबंधों के बिगड़ते माहौल पर कोई बहस नहीं हो रही है. राजनीति और दूसरे गैरजरूरी मुद्दे टैलीविजन चैनलों के लिए ज्यादा अहम हो गए हैं.

समाज को अगर सही दिशा नहीं मिलेगी, तो गिरावट निश्चित है. यह दिशा कौन देगा? धर्म ही समाज में शांति, प्रेम, भाईचारा, अहिंसा, माफी देने का दावा करता है.

देशभर में हजारों धर्मगुरु अच्छी सीख देते सुनाई पड़ रहे हैं, पर वह अच्छाई असल में है कहां? समाज में बेकाबू होते इस गैरइनसानी बरताव की जिम्मेदारी किस की है?

धर्म ‘कलियुग’ कह कर पल्ला झाड़ लेता है. सियासत को समाज में झांकने की फुरसत ही नहीं है. आज की सियासत तो समाज को ही नहीं, बल्कि परिवार को भी बांट कर रखने में विश्वास रखती है. आखिर में यह जिम्मेदारी समाज सुधारकों पर आती है, पर समाज सुधारक भी कहां हैं? नफरत, वहशीपन की यह आग घरघर पहुंच गई है. यह समाजशास्त्रियों, विचारकों के लिए गंभीरता से सोचने का समय है.