सरस सलिल विशेष

देश में मूर्तिपूजा बड़े पैमाने पर होती है. लोग मूर्ति की पूजा तब तक करते हैं जब तक वह अच्छी और सुंदर दिखती है. मूर्ति के टूटते, बदरंग होते या नई मूर्ति के आते ही पुरानी मूर्ति को पूजाघर से हटा दिया जाता है.

ज्यादातर मूर्तियां मिट्टी और प्लास्टर औफ पेरिस से तैयार की जाती हैं. इन को अलगअलग रंगों से रंग कर खूबसूरत बनाया जाता है. इन रंगों में खतरनाक रसायन मिले होते हैं. ये खतरनाक रसायन पर्यावरण के लिए खतरा बन गए हैं.

कुछ सालों से मिट्टी और प्लास्टर औफ पेरिस के साथ प्लास्टिक से बनी मूर्तियां भी बिकने लगी हैं. इन को कार और दूसरे वाहनों में लटकाया जाता है. ये भी समय के साथ बेकार हो जाती हैं. ऐसे में बेकार और टूटीफूटी मूर्तियों से लोगों का मोह भंग हो जाता है. और इन मूर्तियों को घर से बाहर फेंक दिया जाता है.

यह मामला अंधविश्वास और पाखंड से जुड़ा होता है. पंडों का आदेश है कि इन मूर्तियों का अपमान न किया जाए. इस कारण इन मूर्तियों को नदी के पानी में या फिर किसी पेड़ के नीचे जड़ों के पास रख दिया जाता है.

मूर्तियों पर चढ़े रंग में खतरनाक रसायन मिला होता है. यह पानी में मिल कर इसे पीने वालों को नुकसान पहुंचाता है.

पेड़ के किनारे रखे जाने पर यह रसायन पेड़ की जड़ों में जा कर पेड़ को सुखाने का काम करता है. इस से यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है. आज के समय में कूड़ाकचरा, प्लास्टिक कचरा और ईकचरा को ठिकाने लगाना मुश्किल हो रहा है. ऐसे में टूटी हुई मूर्तियों को ठिकाने लगाने का काम भी मुश्किल हो गया है. यह बात अदालत तक ने महसूस की है. उस ने टूटी मूर्तियों को नदी के किनारे गड्ढा खोद कर उस में दबाने को कहा है. कई बार तो लोग मूर्तियों को नदी की रेलिंग पर या पुल पर लगी जाली पर लटका कर चले जाते हैं.

आज भी किसी न किसी तरह से लोग नदी में मूर्तियों को फेंकना सब से पुण्य का काम मानते हैं. वे मूर्तियां ही नहीं, पूजन का बाकी सामान भी वहां पर फेंक देते हैं. पुल के करीब कूड़ादान भी रखा जाने लगा है पर इस में मूर्तियां कोई नहीं डालता. लोगों को इस बात का डर बैठाया गया है कि कूड़ेदान में मूर्तियां डालने से उन का अहित होगा. अगर यह डर न बैठाया जाए तो भक्त कैसे अपनी गाढ़ी कमाई मंदिरों में बिना वजह मनमरजी से देंगे.

अंधविश्वास बना परेशानी

देवताओं की मूर्ति को बेकार होने और टूटने के बाद भी किसी भी जगह पर नहीं फेंका जा सकता, मूर्तियों को कूड़ाघर या नाली में नहीं फेंका जा सकता, ऐसा करने से भगवान नाराज हो सकते हैं. इस बात का डर लोगों के मन में बैठा दिया गया है. ऐसे में टूटी मूर्तियों को नदी या पेड़ के पास रख दिया जाता है.

इस मसले पर समाज सुधारक सुधाकर सिंह कहते हैं, ‘‘आज घरों में मूर्तियों की संख्या बढ़ गई है. मूर्तियों के पास देवताओं के फोटो, पेंटिंग्स और कलैंडर बड़ी संख्या में घरों में लगने लगे हैं. हर घर में छोटेबड़े मंदिर होते हैं. इन में 10 से 12 मूर्तियां होती ही हैं. बैडरूम से ले कर ड्राइंगरूम तक में मूर्तियां, फोटो और कलैंडर लगाए जाने लगे हैं. ऐसे में इन का निबटारा कठिन काम होने लगा है.’’

दीवाली के दिनों में ये मूर्तियां ज्यादा दिखती हैं. दीवाली या किसी त्योहार के मौके पर सफाई के समय मूर्तियों को घर से बाहर निकाला जाता है और उन को बाहर फेंक दिया जाता है. दीवाली में नई मूर्तियों के साथ पूजा करने का प्रावधान है. जब नई मूर्तियां घर में आती हैं तो पुरानी बाहर फेंक दी जाती हैं. ये बेकार मूर्तियां पर्यावरण का बड़ा खतरा बन रही हैं.

पहले ये मूर्तियां नैचुरल कलर से बनाई जाती थीं तो कम प्रभाव डालती थीं. अब ये कैमिकल कलर से बनाई जाती हैं तो ज्यादा प्रभाव डालने लगी हैं. कैमिकल रंग सेहत के लिए नुकसानदायक होते हैं.

इन कारणों से ही अदालत ने मूर्तियों के विसर्जन के लिए नदी के किनारे गड्ढे बनाने को कहा है. इस से भी पर्यावरण के होने वाले नुकसान को रोका नहीं जा सकता है.

प्रदूषण पर नहीं पाबंदी

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नदी में फैलते प्रदूषण को रोकने के लिए तमाम तरह के प्रयास और कानून बन रहे हैं. इस के बाद भी नदियों में प्रदूषण कम नहीं हो पा रहा है. केवल मूर्तियां ही नहीं, मंदिर के फूल और दूसरी गंदगी भी फेंक दी जाती है. मंदिरों को नदी के प्रदूषण का जिम्मेदार नहीं माना जाता है जबकि सब से अधिक प्रभाव इन सब का ही पड़ता है.

मंदिरों के किनारे अब हर नदी में आरती का कार्यक्रम होने लगा है. असल में मंदिर के बाद नदियां इस तरह की आरती कमाई का नया जरिया हो गईर् हैं. इन पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं है. नदी के किनारे बड़ी संख्या में मंदिर बने होते हैं. यहां पूजापाठ से ही नहीं, भक्तों के स्नान करने से गंदगी फैलती है. इस पर जब तक पाबंदी नहीं लगेगी, नदियां साफ नहीं होंगी.

गंगा जैसी नदी, जिसे साफ करने में करोड़ों रुपए का बजट लगता है, का पानी भी पीने के लायक नहीं रह गया है. भक्त नदी का गंदा पानी पी कर देवीदेवताओं को खुश करने की कोशिश करते हैं. कई बार ऐसे लोग बीमारी का भी शिकार हो जाते हैं. इस के बाद भी वे यह स्वीकार नहीं करते क्योंकि उन को डर रहता है कि ऐसा करने से भगवान नाराज हो सकते हैं.

नदियों के प्रदूषण को रोकने के लिए उन के किनारे लगने वाली हर गंदगी को रोकना होगा चाहे वह मंदिर की हो या मंदिर के बाहर की. आज के समय में खतरनाक किस्म के कैमिकल का प्रयोग किया जाने लगा है. जो पानी को ज्यादा प्रदूषित करता है. ऐसे में टूटी हुई मूर्तियों को नदी और पेड़ दोनों के किनारे से दूर रखना होगा, तभी पर्यावरण में सुधार हो सकेगा.

करोड़ों का है मूर्तियों का कारोबार

मूर्तियां पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा रही हैं, इस विषय पर अदालत के आदेश के बाद से बहस भले ही शुरू हो गई हो पर अभी भी इस को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है. जरूरत इस बात की है कि इस परेशानी को भी गंभीरता से लिया जाए. लखनऊ जैसे शहर, जहां की आबादी करीब 50 लाख है, के करीब 10 लाख परिवारों में घरों के अंदर छोटे मंदिर हैं. एक घर में करीब 10 से 12 मूर्तियां होती हैं. ऐसे में हर साल 1 करोड़ 20 लाख मूर्तियां नई आती हैं. इतनी बड़ी संख्या में मूर्तियों का निबटारा सरल काम नहीं है. मूर्तियां बनाने में लगा खतरनाक रंग पर्यावरण के लिए खतरा बनता जा रहा है.

पर्यावरण के साथसाथ मूर्तियों का खरीदनाबेचना बड़ा आर्थिक कारोबार है. ऐसे में इस कारोबार से जिन को मुनाफा होता है वे इसे रोकने की राह में सब से बड़ा रोड़ा हैं. वे इस कारोबार को लगातार बढ़ाने में लगे हैं. जिस से पर्यावरण पर खतरा बढ़ता जा रहा है.

एक मूर्ति की कीमत करीब 50 रुपए से ले कर 1 हजार रुपए तक या इस से अधिक भी हो सकती है. ऐसे में आसानी से समझा जा सकता है कि 1 करोड़ 20 लाख मूर्तियों पर कितना पैसा खर्च होता होगा. इस के अलावा तमाम तरह की पूजा जैसे दुर्गापूजा, गणेश उत्सव और तमाम तरह के आयोजनों में मूर्तियां पहले लाई जाती हैं, फिर उन को हटाया जाता है. नदियों के किनारे या तालाब में इन को पानी में प्रवाहित किया जाता है.