सरस सलिल विशेष

वाकिआ 9 नवंबर, 2016 का है. मध्य प्रदेश के खंडवा जिला अस्पताल में 16 साला कल्पना (बदला नाम) ने एक बच्ची को जन्म दिया, लेकिन उसे अपनाने से इनकार कर दिया और अपने मांबाप के साथ घर लौट गई.

वह नवजात बच्ची जिला अस्पताल में बिन मां के रही, बाद में उसे बच्चों की परवरिश करने वाली एक संस्था को सौंप दिया गया. कल्पना एक साल पहले मांबाप के साथ अपने गांव सिंगोट से महाराष्ट्र गई थी, जहां उस के मांबाप मजदूरी कर पेट पालते थे.

एक दिन पड़ोस में ही रहने वाले सतीश नाम के नौजवान ने उस का बलात्कार किया, जिस से वह पेट से हो गई. सतीश ने उसे सख्त लहजे में धौंस दी थी कि अगर बलात्कार की बात किसी को बताई, तो वह उस के छोटे भाई को जान से मार डालेगा.

यह बात सुन कर कल्पना डर गई और किसी को नहीं बताया, लेकिन जब उस के पेट से होने की बात उजागर हुई, तो बात छिपी नहीं रह सकी. उस ने वापस खंडवा आ कर सच बताया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और बच्चा गिराया नहीं जा सकता था.

बच्ची के पैदा होने पर हकीकत पता चली, तो पुलिस ने सतीश को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. बलात्कार से पैदा हुई बच्ची से कल्पना का कोई मतलब नहीं, जो बच्चा पालने वाली संस्थाओं में जैसेतैसे पल तो जाएगी, लेकिन उस का कोई भविष्य नहीं है, जबकि उस के मांबाप दोनों जिंदा हैं. ऐसे में कानूनी पेचीदगियों के चलते उसे आसानी से किसी जरूरतमंद मियांबीवी को गोद भी नहीं दिया जा सकता.

क्या करती कल्पना

 क्या कल्पना ने गलत किया? इस सवाल पर बहस की गुंजाइशें मौजूद हैं, जो एक हद तक उस के हक में ही जाती हैं कि एक नाबालिग, कम पढ़ीलिखी लड़की कैसे एक दुधमुंही बच्ची को पालती, जो खुद अपना पेट पालने के लिए अपने मांबाप की मुहताज है?

यह गलती कल्पना की गरीबी के अलावा सामाजिक हैसियत के साथसाथ हवस के मारे सतीश की ज्यादा थी, जिस ने कल्पना की मजबूरी का फायदा उठाया और उसे जिंदगीभर के लिए जिस्मानी व दिमागी तकलीफ भोगने के लिए मजबूर कर दिया.

समाज ऐसे पैदा हुए बच्चों को किस नजरिए से देखता है, यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं कि उसे नाजायज कहा जाता है. जाहिर है, ऐसे में कल्पना के कान ताने सुनसुन कर पक जाते और उस का इज्जत और सुकून से जीना दूभर हो जाता, क्योंकि यह नाजायज बच्ची एक ऐसे ढोल की तरह उस के गले में पड़ी रहती, जिसे लोग अपना दिल बहलाने के लिए बजाते रहते.

अब कुछ साल बाद मुमकिन है कि कल्पना की शादी कहीं हो जाए. यह हालांकि मौके की बात है कि बात छिपी रहे और कोई दरियादिल नौजवान सच जानने के बाद उसे जीवनसाथी बनाने को तैयार हो जाए.

अगर ऐसा हुआ तो कल्पना का भविष्य तो संवर जाएगा, पर वह बेगुनाह बच्ची जिंदगीभर एक ऐसे जुर्म की सजा भुगतती रहेगी, जो उस ने किया ही नहीं था. वह तो एक जुर्म की उपज थी.

हालांकि मुमकिन यह भी है कि उसे भी कोई जरूरतमंद मियांबीवी गोद ले लें, उस की अच्छी परवरिश करें, तालीम दिलाएं और अपना नाम दें, पर इस से बलात्कार से पैदा हुए बच्चों की दिनोंदिन बढ़ती परेशानियां सुलझने वाली नहीं, क्योंकि देश में हर साल घूरों, डस्टबिनों, बसअड्डों और रेलवे स्टेशनों पर लाखों नाजायज बच्चे मरे हुए मिलते हैं.

हिम्मती पार्वती

 उस के उलट एक मामला दिल्ली के पौश इलाके का है, जहां पढ़ेलिखे और सुलझे दिलोदिमाग वाले लोग रहते हैं.  ऐसी ही एक कालोनी में तकरीबन 15 साल पहले पार्वती (बदला नाम) अपनी दुधमुंही बच्ची को ले कर आई थी और काम की तलाश में भटक रही थी.

सरस सलिल विशेष

पार्वती की दिक्कत कल्पना सरीखी ही थी. उस की बच्ची के बाप का कोई अतापता नहीं था. दिल्ली जैसे बड़े शहर में बच्ची को गोद में लटकाए वह काम की तलाश में घूमती रही और कामयाब भी रही. अच्छी बात यह थी कि यहां लोग कुरेदकुरेद कर बच्ची के पिता के बारे में नहीं पूछते थे.

एक साहब ने उसे सहारा दिया, तो पार्वती की जिंदगी ढर्रे पर आ गई. वह घरों में काम करने लगी और बच्ची धीरेधीरे बड़ी होती गई. अब वह बच्ची 12 साल की है और कोई पार्वती से यह नहीं पूछता कि उस का बाप कौन है.

पार्वती के साथ बलात्कार हुआ था या उस ने प्यार में धोखा खाया था, ये बातें उतनी अहम नहीं हैं, जितनी यह कि वह अपनी गुजरी जिंदगी के हादसे को भूल कर बच्ची की बेहतर परवरिश कर रही है और खुश है.

पार्वती की हिम्मत तो दाद देने के काबिल है ही, पर तारीफ उन लोगों की भी करना जरूरी है, जिन्होंने पार्वती के गुजरे कल से वास्ता न रखते हुए बच्ची को पालने में उस की मदद की.

दरअसल, कल्पना और पार्वती थीं तो एक ही हादसे की शिकार, पर उन्हें माहौल अलगअलग मिला था. कल्पना उस समाज में रहती थी, जहां बलात्कार से पैदा हुए बच्चे को हिकारत से देखा जाता है, साथ ही, पीडि़ता को किसी भी लैवल पर नहीं बख्शा जाता.

इस के उलट पार्वती को उन लोगों का सहारा मिल गया था, जो ऐसे हादसों को अपने एक अलग नजरिए से देखते हैं और कोई भेदभाव न रखते हुए हमदर्दी और इनसानियत से पेश आते हुए किसी की जिंदगी संवारने में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं.

क्या कहता है कानून

बलात्कार से पैदा हुए बच्चों के बारे में अब अदालतें भी पीडि़ता और बच्चे से हमदर्दी रखने लगी हैं, क्योंकि इस में उन की कोई गलती नहीं होती है.

13 दिसंबर, 2016 को दिल्ली हाईकोर्ट ने एक चर्चित मुकदमे में फैसला सुनाते हुए कहा था कि बलात्कार से जन्म लेने वाली औलाद निश्चित रूप से अपराधी के गंदे काम की उपज है और वह उस की मां को मुआवजे में मिली रकम से अलग मुआवजे की हकदार है.

इस मामले में एक पिता ने अपनी नाबालिग सौतेली बेटी से बलात्कार किया था, जिस पर उसे अदालत ने कुसूरवार पाए जाने पर उम्रकैद की सजा सुनाई थी. लेकिन बच्ची का क्या होगा, इस पर जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस आरके गाबा की बैंच ने उस बच्ची के भविष्य के बाबत अलग से मुआवजे की बात कही है.

ऐसे ही एक मामले में 4 नवंबर, 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी कहा था कि बलात्कार से पैदा हुई औलाद अपने असल पिता यानी बलात्कारी की जायदाद में बतौर वारिस हकदार होगी.

तब जस्टिस शबीहुल हसनैन और जस्टिस डीके उपाध्याय की बैंच ने पहल करते हुए यह हिदायत दी थी कि बलात्कार से पैदा हुई औलाद को दुराचारी की नाजायज औलाद माना जाएगा और उस का पिता की जायदाद पर हक होगा.

अदालत ने अपने फैसले में यह भी जोड़ा था कि अगर कोई और ऐसे बच्चे को गोद ले लेता है, तो उस का अपने असल पिता की जायदाद में कोई हक नहीं रह पाएगा.

इस मामले में भी गरीब परिवार की एक 13 साला लड़की साल 2015 की शुरुआत में बलात्कार के चलते पेट से हो गई थी. घर वालों को जब इस बात का पता चला, तब तक सुरक्षित गर्भपात की मीआद यानी 21 हफ्ते से ज्यादा का वक्त बीत चुका था.

हालांकि लड़की के घर वालों ने बच्चा गिराने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था और लड़की का कहना यह था कि वह अपने साथ हुए इस बलात्कार के भयावह हादसे की निशानी को साथ ले कर नहीं जी सकती. आखिरकार उसे बच्चे को जन्म देना ही पड़ा, पर बच्चे को साथ रखने से उस ने भी इनकार कर दिया था.

तो क्या करें

हालांकि कानून अब बलात्कार से पैदा हुए बच्चों से हमदर्दी दिखा रहा है और बलात्कारी की जायदाद में से हिस्सा दिलाने की भी बात कर रहा है. पर उस समाज का नजरिया बदलने का कोई जरीया उस के पास भी नहीं है, जहां रह कर पीडि़ता और बच्चे को जिंदगी गुजारनी होती है.

ऐसे में बलात्कार से मां बनी ये लड़कियां क्या करें? कल्पना की तरह अस्पताल में बच्चा छोड़ कर कहीं भाग जाएं या पार्वती की तरह हिम्मत दिखाते हुए हालात से लड़तेजूझते उस की परवरिश करें, उसे मां का प्यार दें, उस की जिंदगी बचाएं. इन में से कोई एक रास्ता पीडि़ता को चुनना पड़ता है. ज्यादातर पीडि़ता कल्पना वाला रास्ता चुनने को मजबूर रहती हैं.

पर अब समाज का नजरिया बदल रहा है, इसलिए पीडि़ता को हिम्मत न हारते हुए बच्चे की परवरिश करना ही एक बेहतर उपाय है.

यह हालांकि बेहद मुश्किल भरा काम है, लेकिन नामुमकिन नहीं है, इसलिए बच्चे को दूर ले जा कर परवरिश करना एक कारगर उपाय है.

पर इस के लिए जरूरत हिम्मत और दिमाग के साथसाथ हमदर्दी हासिल करने की होती है, जो अकसर बड़ी कालोनियों के बड़े लोगों से मिल जाती है, लेकिन अपने माहौल और समाज के लोगों से नहीं मिलती.

प्यार में धोखा खाई लड़कियां भी कई दफा इसी तरह मां बन जाती हैं. हर कहीं ऐसी पीडि़ताएं मिल जाती हैं और अखबारों की सुर्खियां भी बनती हैं.

ऐसा जमाने से होता चला आ रहा है कि वासना के मारे मर्द गरीब लड़की जो अकसर छोटी जाति की होती थी, को अपनी हवस का शिकार बना कर उन्हें मां बना देते थे और अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेते थे.

अब जमाना लोकतंत्र का है और कानून ऐसी पीडि़ताओं के साथ है, जो पीडि़ता और बच्चे को हक भी दिलाता है. ऐसे में समाज भी लड़की की बेगुनाही समझते हुए उसे इज्जत से रहने दे, तो 2 जिंदगियां संवर सकती हैं, जो आम लोगों की तरह इज्जत से जीने की हकदार होती है.

कई हिंदी फिल्मों में इस बात को फिल्माया गया है कि कैसे हीरो हीरोइन को धोखा देता है और मां बना कर मुंह छिपा कर भाग जाता है. बाद में हीरो बड़ा हो कर अपने नाजायज बाप से अपनी मां के साथ हुई ज्यादती का बदला लेता है.

अमिताभ बच्चन की हिट फिल्में ‘त्रिशूल’ और ‘लावारिस’ भी इसी मुद्दे पर बनी थीं. लेकिन वे फिल्में थीं, जिन का हकीकत में एक हद तक ही लेनादेना होता है, इसलिए नजरिया आम लोगों को ही बदलना होगा कि बलात्कार के मामलों में लड़की या बच्चे का क्या कुसूर? वे गुनाहगार या नाजायज क्यों?

कोई जायज पिता बच्चे पैदा कर अपनी जिम्मेदारियों से मुकर जाए, तो भी औरत को बच्चे की परवरिश करनी पड़ती है, ताने सुनने पड़ते हैं और तरहतरह की ज्यादतियां सहन करनी पड़ती हैं. जब उन के बच्चे नाजायज नहीं, तो बलात्कार पीडि़ता के बच्चे नाजायज क्यों?