सरस सलिल विशेष

‘देश में आजादी के इतिहास की बात होती है, तो कुछ लोगों की चर्चा बहुत होती है. कुछ लोगों की आवश्यकता से अधिक होती है, लेकिन आजादी में जंगलों में रहने वाले हमारे आदिवासियों का योगदान अप्रतीक था. वे जंगलों में रहते थे. बिरसा मुंडा का नाम तो शायद हमारे कानों में पड़ता है, लेकिन शायद कोई आदिवासी जिला ऐसा नहीं होगा, जहां 1857 से ले कर आजादी आने तक आदिवासियों ने जंग न की हो, बलिदान न दिया हो. आजादी क्या होती है, गुलामी के खिलाफ जंग क्या होती?है, उन्होंने अपने बलिदान से बता दिया था.’

– नरेंद्र मोदी, 15 अगस्त, 2016.

भारत के प्रधानमंत्री ने यह बात लाल किले की प्राचीर से कही और सही बात कही, लेकिन एक बात जो उन की जबान पर आई, पर उन्होंने उसे दबा दिया और आदिवासियों की लड़ाई को आजादी तक ही सीमित कर दिया, वह लड़ाई अब भी जारी है, जिस का वर्तमान रूप माओवाद के नाम से जाना जाता है.

दरअसल, आदिवासी जनता देशीविदेशी पूंजीपतियों के रहमोकरम पर जिंदा नहीं रहना चाहती है और इस के लिए वह हर रोज जद्दोजेहद कर रही है. नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में आदिवासी जनता के बलिदानों का जिक्र कर के अपनेआप को पहले की सरकारों से अलग दिखाने की कोशिश की थी, लेकिन उन की सरकार का पूरा रवैया पहले की सरकारों जैसा ही है.

आर्थिक नीतियों को और तेज रफ्तार से लागू करने के नाम पर आदिवासियों के जीने के साधनों जल, जंगल और जमीन को छीना जा रहा है. इतना ही नहीं, ‘मेक इन इंडिया’ के नाम पर खनिजों को खानों से खोद कर देशीविदेशी लुटेरों को लूटने के लिए खुली छूट दी जा रही है. जंगल से लूटे गए माल को शहरों और विदेशों तक

में पहुंचाने के लिए जंगली इलाकों में 6 लाइन की सड़कें बनवाई जा रही हैं, समुद्री तटों पर बंदरगाह बनवाए जा रहे हैं.

इस लूट के विरोध में आदिवासी खड़े हैं. कहीं माओवादी आंदोलन की अगुआई में वे हथियारबंद हैं, तो कहीं धरनाप्रदर्शन के द्वारा इस लूट को रोकना चाहते हैं. उन्हें कहींकहीं थोड़ीबहुत जीत भी मिल जाती है.

माओवादी इलाकों में सरकारों के कई साल पहले लिए गए फैसले लागू नहीं किए जा सके. जैसा कि बस्तर के लोहंडीगुडा में 2044 हैक्टेयर जमीन में बनने वाला टाटा का स्टील प्लांट 5 जून, 2005 से 4-5 नवीनीकरण के बावजूद 2016 में रद्द कर दिया गया. यही हाल दूसरे इकरारनामों का भी है.

सरकार आदिवासियों की जद्दोजेहद के चलते इन कंपनियों के लिए जमीन छीन नहीं पा रही है. आदिवासियों ने जिस तरह से अंगरेजों की गुलामी को नहीं स्वीकारा था, उसी तरह से वे देशीविदेशी पूंजीपतियों की गुलामी को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं. वे अपनी आजादी को बचाए रखने के लिए अपने जीने के साधन जल, जंगल और जमीन पर हक चाहते हैं.

आदिवासी खुले में जीना चाहते हैं. इसी जिंदगी में उन को आजादी मिलती है. उन की आजादी और जीविका के साधनों को छीनने के लिए सरकार ने अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को खुली छूट दे रखी है कि आदिवासियों की हत्याबलात्कार करो, उन के घरों को लूटो.

इस विरोध को दबाने के लिए अंगरेजों की फूट डालो और राज करो की नीति के तहत साल 2004 में छत्तीसगढ़ में सलवाजुडूम चलाया गया, जिस में 650 गांव को जला दिया गया, औरतों से बलात्कार किए गए, सैकड़ों लोगों को मार दिया गया, लाखों लोग गांव छोड़ने पर मजबूर हुए, हजारों लोगों को उन के गांव से उठा कर कैंपों में रखा गया, जिस का खर्च टाटा और एस्सार जैसी कंपनियों ने उठाया.

सरकार द्वारा बनाई गई कमेटी का कहना है कि अमेरिका में कोलंबस के बाद जमीन हड़पने की सलवाजुडूम सब से बड़ी मुहिम थी. तब गृह मंत्री रह चुके पी. चिदंबरम ने आदिवासी इलाकों में माओवादियों के सफाए के लिए आपरेशन ग्रीन हंट चलवाया था. तब आदिवासी इलाकों में एक जंग सी छिड़ गई थी.

अमीर की सेना द्वारा फर्जी मुठभेड़, गांवों में लूटपाट, बलात्कार बढ़ गए. मिशन 2016 के तहत बस्तर इलाके में 134 लोगों की हत्याएं की गईं. सोनी सोरी के गुप्तांग में पत्थर डालने वाले अफसर को साल 2013 में राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से नवाज दिया गया. इसी तरह एसएसपी रहते हुए एसआरपी कल्लुरी को भी वीरता पुरस्कार दिया गया. 30 अक्तूबर, 2015 को नैशनल लैवल की औरतों का एक दल जगदलपुर और बीजापुर गया था. इस दल ने रिपोर्ट दी कि 19-20 से 24 अक्तूबर, 2015 के बीच छत्तीसगढ़ के बासागुडा थाने के तहत चिन्न गेल्लूर, गुंडुम और बुड़गी चेरू गांवों में सुरक्षा बलों ने वहां की औरतों के साथ लैंगिक हिंसा और मारपीट की.

पेदा गेल्लूर और चिन्न गेल्लूर गांवों में ही कम से कम ऐसी 15 औरतें मिलीं, जिन के साथ लैंगिक हिंसा की वारदातें हुई थीं. इन में से 4 औरतें जांच दल के साथ बीजापुर आईं और कलक्टर, पुलिस कमिश्नर व ऐडिशनल पुलिस कमिश्नर के सामने अपने बयान दर्ज कराए.

इन औरतों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था. पेट से हुई एक औरत के साथ नदी में ले जा कर कई बार सामूहिक बलात्कार किया गया. औरतों की छातियों को निचोड़ा गया, उन के कपड़े फाड़ दिए गए. मारपीट, बलात्कार के अलावा उन के घरों से रुपयापैसा लूटा गया. उन के चावल, दाल, सब्जी व जानवरों को खा लिया गया और जो बचा उसे साथ ले गए. घरों में तोड़फोड़ की गई और उन का सामान भी लूटा गया.

15 जनवरी, 2016 को मानवाधिकार संगठन के एक और समूह की टीम छत्तीसगढ़ गई थी. इस टीम का अनुभव भी अक्तूबर में गई टीम जैसा ही रहा था. इस तरह की खबरें बड़े अखबारों की बड़ी सुर्खियां नहीं बन पाती हैं. राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी खबरें तब आती हैं, जब बीजापुर के सरकिनागुडा जैसी घटना होती है, जिस में 17 गांव वालों, जिन में 6 बच्चे भी शामिल थे, को मौत की नींद सुला दिया जाता है.

ऐसी खबरों पर रायपुर से ले कर दिल्ली तक यह कह कर खुशियां मनाई जाती हैं कि बहादुर जवानों को बड़ी कामयाबी मिली है. नक्सलियों को मांद में घुस कर मारा, माओवादियों को धूल चटाई वगैरह. झीरम घाटी या सुकमा जैसी बड़ी घटनाएं होती हैं, तो बड़े अखबारों में इन को कायराना हमला, माओवादियों की हताशा बताया जाता है, जबकि आदिवासी अपने वजूद को बचाने के लिए एकजुट हो कर लड़ रहे हैं, चाहे आप इन की जद्दोजेहद को जिस नाम से भी पुकारें.

शांति बहाली के लिए लोगों को उन का अधिकार देना पड़ेगा. राज व्यवस्था की जड़ में शोषण, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार है. माओवाद उन्मूलन के नाम पर भी व्यवस्था भ्रष्टाचार करती है. जवानों के हथियार खरीदने से ले कर उन के खाने के सामान तक में कमीशन लिया जाता है और उन को खराब क्वालिटी का खाना और साजोसामान दिया जाता है. फर्जी माओवादी को आत्मसमर्पण कराने के बाद पैसा डकार लिया जाता है.

सरकार भूल जाती है कि जनता टैक्स इसलिए देती है, ताकि वह लोगों को सिक्योरिटी दे और शांति बनाए रखे. कोई भी इनसानों के बहने वाले खून पर खुशी नहीं मना सकता. यहां तक कि माओवादी भी मानते हैं कि जवान उन के दुश्मन नहीं हैं. वे कहते हैं कि सैनिकों पर की गई कार्यवाही को जवाबी हमले के रूप में देखना चाहिए.

जो जवान मारे गए हैं, वे सड़क बनाने से जुड़ी सिक्योरिटी में लगे हुए थे. मारे गए जवानों को इस सड़क से कोई फायदा नहीं होने वाला था. ये जवान गरीब परिवारों से आते हैं और उन का परिवार जिस जगह पर रहता है, उन के यहां भी ऐसी सड़कें नहीं होंगी. उन के परिवारों को टूटेफूटे रास्तों से ही अस्पताल व स्कूलकालेज जाना पड़ता होगा. लेकिन छत्तीसगढ़ के दूरदराज इलाकों में भी अच्छी सड़कों को बनाया जा रहा है, ताकि पूंजीपतियों द्वारा वहां की प्राकृतिक संपदा को लूट कर ले जाया जा सके. इन्हीं लूटों में से कुछ हिस्सा पा कर शासक वर्ग उन की सिक्योरिटी करने के लिए इन जवानों को वहां भेजता है, जिस का विरोध वहां की जनता कर रही है.

माओवादियों का कहना है कि वे हिंसावादी नहीं हैं, लेकिन सामंती ताकतों, देशीविदेशी कारपोरेट घरानों की नुमाइंदगी करने वाली सरकारों द्वारा हर पल की जा रही हिंसा के जवाब में वे भी हिंसा को अंजाम देने के लिए मजबूर हैं. रायपुर की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है, ‘हम सभी को अपने गरीबान में झांकना चाहिए, सचाई खुद ब खुद सामने आ जाएगी. इस घटना में दोनों तरफ से मरने वाले अपने देशवासी हैं, इसलिए कोई भी मरे, तकलीफ हम सब को होती है. लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था को आदिवासी इलाकों में जबरदस्ती लागू करवाना, उन को जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जला देना, आदिवासी औरतों के साथ बलात्कार करना, आदिवासी औरतें नक्सली?हैं या नहीं, इस का प्रमाणपत्र देने के लिए उन की छाती को निचोड़ कर देखा जाता है.

‘टाइगर प्रोजैक्ट के नाम पर आदिवासियों को जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है, जबकि संविधान की 5वीं अनुसूची में शामिल होने के चलते सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को हड़पने का. आखिर यह सबकुछ क्यों हो रहा है. सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं, जिन्हें उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है. आदिवासी जल, जंगल और जमीन खाली नहीं करेंगे, क्योंकि यह उन की मातृभूमि है.’

इस समस्या का समाधान सैनिक हल नहीं है. अभी तक की सरकारी रिपोर्ट बताती है कि नक्सलवाद की वजह सामाजिक व आर्थिक समस्या है. मारे गए जवान सौरभ के पिता की बातों पर ध्यान देना होगा, जो सुझाव देते हैं कि सरकार ठंडे दिमाग से बातचीत के जरीए इस मसले का हल निकाले. नक्सलियों को मुख्यधारा में लाए, उन्हें काम दे, उन के बालबच्चों को पढ़ाए.

लोगों को काम मिलेगा, तो नक्सली नहीं पैदा होंगे. अगर शांति लानी है, तो इस समस्या का हल दमन से नहीं, राजनीतिक बातचीत से निकलेगा, नहीं तो धरती खून से लाल होती रहेगी, देशवासी मरते रहेंगे, जेलों में लोग सड़ते रहेंगे और लोग गुलाम सरीखी जिंदगी जीने को मजबूर रहेंगे और यह जंग यों ही चलती रहेगी.