सरस सलिल विशेष

सतयुग में एक केवट ने राम को नदी पार करा कर एहसान ही किया था लेकिन उस के एवज में शूद्र करार दी गई निषाद जाति का तिरस्कार और प्रताड़ना कलियुग और उस में भी लोकतंत्र की स्थापना तक जारी है. इस का प्रमाण इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रहे दर्जनों मुकदमे हैं जिन का सार यह है कि इस दौर के दबंग भी उन्हें उन के अधिकार के बजाय आशीर्वाद (वह भी सशुल्क) दे कर यह चौपाई गाते रहने की सलाह दे रहे हैं कि, कभीकभी भगवान को भी भक्तों से काम पड़े….यानी गंगा किनारे की रेत और बालू जैसे कीमती आइटमों पर मत्स्यजीवी यह जाति अपना हक न मांगे.

गोरखपुर लोकसभा सीट, जो संतमहंतों की जागीर बन गई थी, पर होनहार युवा पेशे से इंजीनियर प्रवीण निषाद ने भाजपा के उपेंद्र शुक्ला को धोबीपछाड़ दे कर क्या साबित कर दिया, यह भाजपा के चुनाव प्रबंधकों और आरएसएस के महानुभावों को समझ आ गया है कि अब दिखावे के दलितप्रेम की हांडी पर वोटों की डिश पकने वाली नहीं. अतिपिछड़े जागरूक हो रहे हैं और अब वे धर्म के नाम पर सवर्णों व ब्राह्मणों की पालकी ढोने या नैया पार लगाने को तैयार नहीं.