सरस सलिल विशेष

उत्तर प्रदेश के इन विधानसभा चुनावों में अखिलेश राहुल और मोदी शाह की जोड़ी थी, तो मायावती अकेले ही चुनाव मैदान में थीं. तीनों एकदूसरे के खिलाफ लट्ठमार होली सी खेलते नजर आए. किसी ने जनता को यह भरोसा नहीं दिलाया कि जीत के बाद वह क्या करेगा  केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं, बल्कि बाकी राज्यों के चुनावों में भी मुद्दों की जगह जुमले उछालते रहे. यह केवल अपने देश की ही बात नहीं है, दुनिया के दूसरे देशों में होने वाले चुनावों में भी नेता जनता को ऐसे ही लुभाते नजर आते हैं.

अब चुनाव लड़ना एक प्रबंधन कला है, जिस में बड़ीबड़ी कंपनियां शामिल होने लगी हैं. गरीब से गरीब प्रदेश के नेता अब हैलीकौप्टर सेचलते हैं. विकास के मुद्दे हवा में हो गए हैं. यही वजह है कि चुनाव के बाद जीतहार का देश के विकास पर कोई खास असर नहीं पड़ता है.

चुनाव दर चुनाव यही कहानी अब जोर पकड़ती जा रही है. नेताओं के घोषणापत्र देख कर लगता है कि वे कितने अमीर हैं. राजनीतिक दलों का कोई भी उम्मीदवार करोड़पति से कम नहीं होता है. पर जनता वहीं की वहीं रहती है. यही वजह है कि देश का सब से बड़ा प्रदेश होने के बाद भी उत्तर प्रदेश के लोग रोजगार के लिए दूसरे प्रदेशों में जाने को मजबूर हैं.

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा के विधानसभा चुनावों से पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनावों में वोट मांगने के लिए जाति और धर्म का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. अदालत की इस सोच से यह उम्मीद जगी थी कि ये चुनाव जातिधर्म के असर से दूर होंगे. पर ऐसा दिखा नहीं. राजनीतिक दलों की सब से बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश थी, जहां पर जाति और धर्म का इस्तेमाल सब से ज्यादा होता है.

ऊपरी तौर पर हर दल ने जाति और धर्म से खुद को पूरी तरह से दूर बताया, पर जैसेजैसे चुनाव आगे बढ़ा, तो राजनीतिक दलों की पोल खुलने लगी. सभी दलों ने जाति और धर्म के समीकरणों और आंकड़ों को देख कर अपनेअपने उम्मीदवारों को टिकट बांटे. दरअसल, राजनीतिक दलों को यह पता है कि जनता विकास के मुद्दों की बात चाहे जितनी करे, पर वोट देते समय वह जातिधर्म के समीकरण से ऊपर नहीं उठ पाती है.

चुनाव के समय हर दल ने अपने उम्मीदवार की लिस्ट जारी की, तो उस का जाति और धर्म के आधार पर विश्लेषण भी किया गया. इस से साफ जाहिर होता है कि चुनाव में जातिधर्म पूरी तरह से हावी रहे. सभी दलों ने अपने प्रचारतंत्र के बहाने इस बात का खूब प्रचार किया कि उस पार्टी ने किस जाति और धर्म के लोगों को सब से ज्यादा टिकट दिए. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने किसी भी मुसलिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. ऊपरी तौर पर भाजपा ने इस बात का प्रचार नहीं किया. इस मुद्दे पर बहुत ज्यादा बात भी नहीं की. भाजपा चाहती तो इस मुद्दे को उछाल कर बड़ा भी कर सकती थी.

अदालत के आदेश की मंशा को ध्यान में रखते हुए शायद उस ने यह कदम नहीं उठाया.  वोटरों को बताया गया कि जहां एक तरफ बाकी सभी दल मुसलिम वोटरों का साथ पाने के लिए उन के लोगों को टिकट दे रहे हैं, वहीं भाजपा ने एक भी मुसलिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. यह बात बहुत हद तक लोगों पर असर डालने में कामयाब रही. इस की वजह से केवल अगड़ी जाति के वोटर ही नहीं, बल्कि दलित और पिछड़ी जाति के वोटर भी बिदकने लगे.

भाजपा के साथ-साथ सपा-कांग्रेस गठबंधन और बसपा ने मुसलिम वोटरों को ध्यान में रख कर ही पाटी के टिकट बांटे थे. बसपा को यह उम्मीद थी कि सपा की घरेलू लड़ाई के बाद मुसलिम वोट सपा से दूर हो कर बसपा को जाएंगे, क्योंकि परिवार के विवाद में फंसी सपा चुनावी लड़ाई में भाजपा से पिछड़ जाएगी. मुसलिम वोटर हमेशा भाजपा के खिलाफ वोट करेंगे. ऐसे में बसपा ने सब से ज्यादा मुसलिम उम्मीदवारों को टिकट दे दिए.

लेकिन जब कांग्रेससपा का गठबंधन हो गया, तो बसपा का यह गेम पलट गया. अब मुसलिम वोट एकमुश्त बसपा को जाने के बजाय बिखर गए. बसपा के लिए मुसीबत यह हो गई कि दलित वोट हिंदुत्व के झांसे में आने लगे. इस बात का अहसास होते ही बसपा प्रमुख मायावती ने आरक्षण के दांव का इस्तेमाल किया.

दलित जातियां अब केवल आरक्षण के मुद्दे पर भी अगड़ी जातियों के विरोध में जा सकती हैं. बसपा प्रमुख ने भाजपा और संघ को आरक्षण विरोधी बताना शुरू किया. मायावती ने कहा कि भाजपा संघ के दबाव में है. ऐसे में वह धीरेधीरे आरक्षण को खत्म करने की योजना बना रही है.

भाजपा ने बड़ी होशियारी से आरक्षण के किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया. वह आरक्षण जैसे मुद्दों का जवाब देने की जगह जुमलेबाजी पर उतर आई. सपाकांग्रेस गठबंधन ने भी इस जुमलेबाजी में हिस्सा लिया. ऐसे में पूरा चुनाव ही मुद्दों से भटक गया.

पूरे चुनाव में उत्तर प्रदेश की विकास योजनाओं का कहीं जिक्र नहीं हुआ. राजनीति के अपराधीकरण, राजनीति में पैसों के चलन पर कोई बात नहीं हुई.

सीधेतौर पर जाति और धर्म की चर्चा से खुद को दूर रखते हुए अप्रत्यक्ष रूप से उन बातों का जिक्र किया गया, जो जाति और धर्म को बढ़ावा देती थीं. इस में ‘गधों’, ‘कसाबआतंकी’, ‘ईददीवाली’, ‘कब्रिस्तानश्मशान’ जैसे जुमले खूब उछाले गए. बड़ेबड़े नेताओं के चुनावी भाषण पूरी तरह से जुमलेबाजी से भरे नजर आए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में सपा, कांग्रेस और बसपा को ‘स्कैम’ बताया. अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी की बात का जवाब देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री केवल मन की बात करते हैं, काम की बात नहीं करते हैं. चुनावों की शुरुआत में विकास और काम के मुद्दों पर भाषण हुए, पर बाद में ये सब दरकिनार हो गए और बेकार की बातें उछलने लगीं.

इस चुनाव में विरोधी दलों का नामकरण भी अलगअलग तरह से करने का काम हुआ. भाजपा ने सपाकांग्रेस गठबंधन को ‘स्कैम’ करार देते हुए अखिलेशराहुल पर कटाक्ष कर के कहा कि एक से उस के पिता दुखी हैं, तो दूसरे से उस की माता दुखी हैं. बसपा को नया नाम देते हुए भाजपा के नेताओं ने उसे ‘बहिनजी संपत्ति पार्टी’ कहा, तो बसपा ने नरेंद्र मोदी को ‘एंटी दलितमैन’ और भाजपा को ‘भारतीय जुमला पार्टी’ कहा.

अखिलेश यादव ने भाजपा को ‘चालू पार्टी’ का नाम दिया और बसपा को ‘पत्थरों वाली सरकार’ का नाम दिया. मायावती ने अखिलेश यादव को ‘बबुआ’ कहा. भाजपा ने अखिलेश और मुलायम के पितापुत्र विवाद को खूब उछालने का काम किया. सपा को ‘कुनबा पार्टी’ करार दिया.

सब से खास बात तो यह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को उत्तर प्रदेश का गोद लिया बेटा करार दिया. इस पर उत्तर प्रदेश बाल संरक्षण आयोग की सदस्य नाहिद लारी खान ने एतराज जताते हुए इसे गोद लेने संबंधी कानून का मजाक  बताया.