सरस सलिल विशेष

श्रीलंका में सब कुछ ठीक रहा, तो चुनाव अभियान में वित्तीय अनुशासन कायम किया जा सकेगा. सरकार इसके लिए चुनाव खर्च सीमा तय करने वाला विधेयक लाने जा रही है, जिसके मसौदे के प्रस्ताव पर कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है. निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने वाला यह कानून स्थानीय से लेकर संसदीय चुनावों तक पर लागू होगा. यह पैसे के दम पर वोट खरीदने की प्रवृत्ति के साथ ही चुनावी हिंसा व भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में भी मददगार साबित होगा.

चुनाव खर्च सीमित करने की मांग हमेशा होती रही है, पर राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में कोई सकारात्मक पहल कभी सामने नहीं आई. अंतिम बार 2016 में इस मुद्दे पर बहस हुई थी और सभी दलों व निर्वाचन आयोग के बीच सहमति भी बन गई थी, मगर फिर मामला ठंडे बस्ते में चला गया.

खबरों के अनुसार, नया कानून निर्वाचन आयोग को उम्मीदवारों के आर्थिक स्नेतों और उनके आय-व्यय की जांच का अधिकार तो देगा, पर देखना होगा कि यह चुनाव खर्च पर वाकई नियंत्रण लगा पाता है या कि महज एक और कानून बनकर रह जाता है.

सवाल यह भी है कि आयोग उम्मीदवारों के अघोषित खर्चो, तस्करी की दुनिया से सीधे चुनावी बाजार में लगने वाले पैसे, छोटे-छोटे स्तरों पर होने वाले बड़े खर्चो पर कैसे निगरानी रखता है? बड़ी जरूरत तो नेताओं के आत्मानुशासन की है जिसके बिना हर पहल बेमानी है. छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि चुनाव फंड सिर्फ नकद के रूप में नहीं आता है. यह कैसे तय होगा कि कोई माफिया या फंड फाइनेंसर नकद के स्थान पर किसी और रूप में सीधे मतदाता तक कुछ ऐसी चीज नहीं पहुंचा देगा जो उसे प्रभावित कर सके.

ऐसे तमाम मामले हैं, जब सारे उपाय बेकार साबित हुए और नई-नई तरकीबें आती रहीं. यही सबसे बड़ी चुनौती है और सफलता का सबसे बड़ा मंत्र भी. दरअसल कानून तो ऐसा होना चाहिए, जो तत्काल असर दिखाए और गड़बड़ करने वालों की उम्मीदवारी चुनाव प्रक्रिया के दौरान ही रद्द की जाए. एक बार चुने जाने के बाद शिकायतों के निस्तारण की लंबी प्रक्रिया में जाने का कोई मतलब नहीं रह जाता.