सरस सलिल विशेष

वीआर्ईपी संस्कृति, वीआईपी प्रोटोकॉल और वीआईपी सुरक्षा जैसे तमाम विषयों की बेशक समीक्षा होनी चाहिए. इसमें कोई शक-शुब्हा नहीं कि प्रोटोकॉल और सुरक्षा जैसे मसलों को देखने वाले ताकतवर लोग मुल्क के संसाधनों का बेजा इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि वे इसे रुतबे और हैसियत से जोड़कर देखते हैं. फिर भी, जरूरी सुरक्षा और गैर-जरूरी प्रोटोकॉल में फर्क है.

ज्यादा विकसित शासन-व्यवस्थाओं में सार्वजनिक पदों पर बैठे लोग विभिन्न सुविधाओं और विशेषाधिकारों का इस्तेमाल काफी सावधानी व पारदर्शिता के साथ करते हैं. लेकिन पाकिस्तान में भ्रष्ट नौकरशाही और रौब-रुआब का भूखा राजनीतिक नेतृत्व अक्सर व्यावहारिक समझ और वास्तविक सुरक्षा जरूरतों का अतिक्रमण कर डालता है.

प्रधान न्यायाधीश साकिब निसार की सदारत में सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल महीने में अपने एक अहम फैसले के जरिए मुल्क भर के उन तमाम लोगों को मिली सरकारी सुरक्षा को हटाने का आदेश दिया था, जिन्हें वाजिब प्रक्रिया को अपनाए बिना सुरक्षा दी गई है. मसले को आगे बढ़ाते हुए आला अदालत ने ऐसे लोगों को सरकारी वाहन तुरंत वापस करने को कहा और उसने यह भी साफ किया था कि आगामी चुनावी मुहिम के दौरान नेताओं को अपनी हिफाजत का इंतजाम खुद करना चाहिए. मगर इस फैसले के भयानक नतीजे निकल सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने महंगे सरकारी वाहनों के बेजा इस्तेमाल व सुरक्षाकर्मियों की गलत तैनाती का वाजिब संज्ञान लिया है. अगर ऐसा न हो रहा होता, तो अदालती आदेश की तामील में जुटे सरकारी महकमे इतनी जल्दी दर्जनों की तादाद में गाड़ियां न बरामद कर पाते. लेकिन चुनाव से पहले राजनेताओं की सरकारी सुरक्षा पर सामूहिक रोक का फैसला मुनासिब नहीं है.

पिछले दो आम चुनाव इस बात के गवाह हैं कि अनेक नेताओं व उम्मीदवारों की जान पर कितने खतरे आए थे. 2008 में बेनजीर भुट्टो के कत्ल का खामियाजा तो पाकिस्तान की सियासत अब भी भुगत रही है. इसलिए सामूहिक रोक की बजाय वास्तविक जरूरत के आधार पर यह तय होना चाहिए.