सरस सलिल विशेष

अपने आक्रामक भाषण में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अवाम के उस अधिकार की रक्षा करने का आह्वान किया, जो उन्हें अपना नुमाइंदा चुनने की आजादी देता है. उन्होंने यह भी बताया कि तानाशाहों द्वारा बनाए गए कानून की वजह से वह सक्रिय सियासत से बाहर हुए हैं. उनका यह संबोधन पीएमएल-एन द्वारा उन्हें फिर से पार्टी अध्यक्ष चुने जाने के घंटे भर बाद आया. वह पार्टी की उसी जनरल कौंसिल की बैठक में अपनी बात रख रहे थे, जिसने यह फैसला लिया था कि नवाज शरीफ ही अगले चार वर्षो के लिए अध्यक्ष होंगे.

इस फैसले की राह नेशनल असेंबली से इलेक्शन बिल, 2017 को पारित कराकर आसान बनाई गई है. इससे पहले सीनेट ने इसे मामूली अंतर से पारित किया था. सियासी दलों की प्राथमिकता में क्लॉज 203 रही, जिसमें उस प्रावधान को हटाने की बात थी, जो संसद सदस्य के रूप में अयोग्य घोषित किसी शख्स को पार्टी-मुखिया बनने से रोकता था. क्लॉज 203 पर इतनी बहस हुई कि बिल की अन्य खास बातों को, मसलन निर्वाचन आयोग को व्यापक आजादी देना, जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की नई हदबंदी, चुनाव संबंधी विवादों के समाधान का बेहतर तरीका अपनाना, महिला मतदाताओं को जोड़ने पर जोर देना आदि नजरअंदाज कर दिया गया.

पीटीआई, शेख रशीद की एएमएल और दूसरी पार्टियों ने इस क्लॉज की खूब मजम्मत तो की ही, पीपीपी ने भी कहा कि इसे इसीलिए लाया गया है, ताकि एक शख्स को इससे फायदा मिल सके. हालांकि ध्यान रखना चाहिए कि इस प्रावधान को सबसे पहले अयूब खान ने लागू किया था, जिसे जुल्फिकार अली भुट्टो ने हटा दिया था. फिर 2002 में जनरल परवेज मुशर्रफ इसे इस मंशा के साथ दोबारा लेकर आए कि बेनजीर भुट्टो अपनी पार्टी की मुखिया न बन सकें.

बहरहाल, मौजूदा मतभेद दूर तलक जा सकता है. पाकिस्तान अवामी तहरीक इस क्लॉज के खिलाफ लाहौर हाईकोर्ट पहुंच गई है, जबकि पीटीआई भी सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह रही है. बेशक विश्लेषक आने वाले दिनों में और अधिक सियासी ड्रामे की उम्मीद पाल रहे हैं, पर अभी यह पीएमएल-एन व नवाज शरीफ की अकेली जंग ही दिख रही है.