सरस सलिल विशेष

उन्नाव कांड और कठुआ कांड पर समूचा देश सकते में है. जो गुस्सा निर्भया बलात्कार मामले में देखा गया, वैसा ही आक्रोश देशभर में उबल रहा है. घटनाओं के विरोध में महिला संगठन, छात्र संगठन और सामाजिक संगठन सड़कों पर कैंडल मार्च कर रहे हैं. जगहजगह धरना दे कर पीडि़ताओं को न्याय दिलाने की मांग की जा रही है. दोनों अमानवीय घटनाओं में सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा अपराधियों के बचाव में खड़े हो कर न्याय की राह में आड़े आने का रवैया हैरान कर देने वाला था. अपराधियों के साथ भगवा सत्ता और हिंदू संगठनों के समर्थन का खतरनाक रूप सामने आया है.

शुरू में भाजपा सरकार की जिस तरह से जयजयकार हो रही थी, 4 वर्ष होतेहोते अब उस के प्रति लोगों में आक्रोश देखा जाने लगा है. सरकार कई मोरचों पर असफल रही है. क्या भाजपा से सत्ता संभल नहीं रही है? देश में अराजक तत्त्वों का बोलबाला बढ़ रहा है और सरकार उन के आगे असहाय बनी दिख रही है. तमाम मंत्रालय निकम्मे साबित हो रहे हैं.

कुकर्मियों का बचाव 

कठुआ की घटना को लें. जम्मूकश्मीर के कठुआ जिले के सरन गांव की 8 वर्षीया आमना (बदला हुआ नाम) का पहले अपहरण हुआ. उसे करीब एक सप्ताह तक एक मंदिर में बंधक बना कर रखा गया. उस का यौनशोषण किया गया और फिर बेरहमी से मार डाला गया. अबोध आमना अल्पसंख्यक गुर्जर बकरवाल समुदाय की लड़की थी. अपराध शाखा द्वारा दायर आरोपपत्र के अनुसार यह जघन्य कांड अल्पसंख्यक समुदाय को इलाके से हटाने के लिए रची गई सोचीसमझी साजिश थी.

मामले में 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. अफसोस और शर्म की बात है कि मामला सामने आने के बाद हिंदू संगठनों ने तिरंगा ले कर भारत माता की जय बोलते हुए अपराधियों के समर्थन में सड़कों पर जुलूस निकाला. जुलूस में राज्य सरकार में शामिल भाजपा के 2 मंत्री भी शरीक थे जिन के खिलाफ हल्ला मचने पर पार्टी द्वारा उन से इस्तीफा देने को कहा गया.

इस बर्बर कांड को ले कर सोशल मीडिया पर जो गुस्सा निकल रहा है, उस में क्या हिंदू, क्या मुसलमान, क्या सिख यानी इंसाफ के लिए उमड़े आक्रोश के सामने तमाम धर्मों की दीवारें ढह गईं. हर धर्म, वर्ग, जाति के लोगों द्वारा आमना के साथ हुए बर्बर अत्याचार के लिए दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिए जाने की मांग की जा रही है.

विधायक का खौफ

उन्नाव की घटना भी ऐसी ही है. उत्तर प्रदेश के उन्नाव में एक युवती के साथ बलात्कार के मामले में भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर का नाम भी है. उन के अलावा 3 अन्य आरोपी हैं. मृतक की बेटी का आरोप है कि विधायक और उस के साथी लोगों ने उस के साथ गैंगरेप किया. दरअसल, ये लोग लड़की के परिवार से रंजिश रखते थे. उन को नीचा दिखाने व सबक सिखाने के लिए सालभर पहले रेप किया था.

अपने साथ हुए दुष्कर्म को ले कर लड़की मुकदमा लिखाने के लिए दरदर भटक रही थी. विधायक का नाम मुकदमे में लिखने को पुलिस तैयार नहीं हुई तो लड़की ने कोर्ट जा कर मुकदमा दर्ज कराया. जब कोर्ट के जरिए यह मुकदमा लिखा गया तो विधायक ने मुकदमा वापस लेने के लिए उस के पिता को पीटा और जेल भिजवा दिया, जहां उस की मौत हो गई. पूरे घटनाक्रम को देखें तो विधायक की धौंस पता चलती है.

पद का घमंड

लखनऊ से 56 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के माखी गांव की पीडि़ता (बदला हुआ नाम कविता) के पिता और दोनों चाचा 15 साल पहले कुलदीप सिंह सेंगर के करीबी हुआ करते थे. कविता की 3 बहनें और 1 भाई है. एक ही जाति के होने के कारण उन में आपसी तालमेल भी बेहतर था. वे एकदूसरे के सुखदुख में साझीदार होते थे. दोनों ही परिवार माखी गांव के सराय थोक इलाके के रहने वाले थे. कविता के ताऊ सब से दबंग थे. कुलदीप सिंह सेंगर ने कांग्रेस से अपनी राजनीति शुरू की. चुनावी सफर में कांग्रेस का सिक्का कमजोर था तो वे विधानसभा का पहला चुनाव बसपा यानी बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लड़े और 2002 में पहली बार उन्नाव की सदर विधानसभा सीट से विधायक बने.

कुलदीप के विधायक बनने के बाद कविता के परिवारजनों के साथ कुलदीप का व्यवहार बदलने लगा. जहां पूरा समाज कुलदीप को विधायकजी कहने लगा था, वहीं कविता के ताऊ कुलदीप को उन के नाम से बुलाते थे. कुलदीप अपनी छवि को बचाने के लिए इस परिवार से दूरी बनाने लगे. कविता के पिता और उन के दोनों भाइयों को यह लगा कि कुलदीप के भाव बढ़ गए हैं. वे किसी न किसी तरह से कुलदीप को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहे. यह मनमुटाव बढ़ता गया. एक तरफ जहां कविता का परिवार कुलदीप का विरोध कर रहा था वहीं कुलदीप अपना राजनीतिक सफर बढ़ाते गए.

कविता के ताऊ के ऊपर करीब एक दर्जन मुकदमे माखी और दूसरे थानाक्षेत्रों में दर्ज थे. करीब 10 वर्षों पहले उन्नाव शहर में भीड़ ने ईंटपत्थरों से हमला कर के कविता के ताऊ को मार दिया. कविता के परिवार के लोगों ने इस घटना का जिम्मेदार विधायक कुलदीप को ही माना था. कविता के ताऊ की मौत के बाद उस के चाचा उन्नाव छोड़ कर दिल्ली चले गए. वहां उन्होंने अपना इलैक्ट्रिक वायर का बिजनैस शुरू किया. उन के ऊपर 10 मुकदमे दर्ज थे. कविता के पिता अकेले रह गए. उन के ऊपर भी 2 दर्जन मुकदमे दर्ज थे. नशा और मुकदमों का बोझ उन को बेहाल कर चुका था.

कुलदीप ने 2007 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर बांगरमऊ विधानसभा से जीता और 2012 में भगवंतनगर विधानसभा से चुनाव जीता. 2017 के विधानसभा चुनाव में कुलदीप ने भाजपा का साथ लिया और बांगरमऊ से विधायक बन गए. विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के परिवार की कविता के परिवार से रंजिश बनी रही. उन्नाव जिले की पहचान दबंगों वाली है. यहां अपराधी प्रवृत्ति के लोगों की बहुतायत है. माखी गांव बाकी गांवों में से संपन्न माना जाता है. यहां कारोबार भी दूसरों की अपेक्षा अच्छा चलता है.

योगी राज के लिए फांस 

सरस सलिल विशेष

विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के मामले को देखें तो पूरी बात साफ हो जाती है. सत्ता की हनक में अपना विरोध करने वाले के साथ विधायक कुलदीप सेंगर ने जो कुछ किया, वह अब योगी राज के गले में फांस बन गई है. उन्नाव से ले कर राजधानी लखनऊ तक केवल पुलिस ही नहीं, जेल और अस्पताल तक में जिस तरह से विधायक के विरोधी के साथ बरताव हुआ, वह किसी कबीले की घटना से कम नहीं है. पहले अपने विरोधी की पिटाई पानी डालडाल कर की जाती है. मरणासन्न अवस्था में उस के खिलाफ मुकदमा कायम करा कर पुलिस की मिलीभगत से जेल भेज दिया जाता है. घायल को ले कर पुलिस सरकारी अस्पताल जाती है जहां उस का इलाज करने के बजाय उसे जेल भेज दिया जाता है. घायल को जेल में सही इलाज नहीं मिलता जिस से वह तड़पतड़प कर मर जाता है.

विधायक की धौंस तो पूरे देश को सुनाई देने लगी. सरकार ने पहले बचाव किया. जब जनता से ले कर कोर्ट तक सरकार की नीयत पर सवाल उठने लगे तब दबाव में पूरा मामला सीबीआई को सौंपना पड़ा. सत्ता के आते ही योगी राज में भाजपाइयों की धौंस बढ़ गई है.

ऐसे सीन फिल्मों में देखने को मिल सकते हैं. पुलिस से ले कर जेल और अस्पताल तक के लोग विधायक की धौंस के आगे नतमस्तक बने रहे. जेल में जाने के दूसरे ही दिन घायल की मौत हो जाती है, मौत के बाद जागी सरकार के दबाव में पुलिस विभाग ने अपने कर्मचारियों को भले ही सस्पैंड कर दिया हो पर जिला जेल और अस्पताल के लोगों को कोई सजा नहीं दी गई है. अपना दामन बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी बना दी है.

बलात्कार का अनकहा सच

कविता के साथ हुए बलात्कार के मसले पर जो जानकारी सामने आई उस के अनुसार जून, 2017 में राखी (बदला हुआ नाम) नामक महिला कविता को ले कर विधायक कुलदीप के पास गई. विधायक ने उसे बंधक बना लिया उस के साथ बलात्कार किया गया. बलात्कार का आरोप विधायक के भाई और साथियों पर लगा. घटना के 8 दिनों के बाद कविता औरया जिले के पास मिली. कविता और उस  के पिता ने इस बात की शिकायत थाने में की. पुलिस ने 3 आरोपी युवकों को जेल भेज दिया. घटना में विधायक का नाम शामिल नहीं हुआ.

एकतरफा कार्यवाही

3 अप्रैल, 2018 को विधायक के छोटे भाई ने कविता के पिता के साथ मारपीट का मुकदमा वापस लिए जाने के लिए कहा. कविता और उस के परिवारजनों ने पुलिस में मुकदमा लिखाया. इस के साथ ही साथ विधायक के लोगों की तरफ से भी मुकदमा लिखाया गया. पुलिस ने क्रौस एफआईआर  दर्ज कीं और केवल कविता के पिता को जेल भेज दिया. कविता का आरोप है कि जेल में विधायक के लोगों ने उस के पिता की खूब पिटाई की.

8 अप्रैल को कविता अपने परिवारजनों के साथ राजधानी लखनऊ आई और सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कालीदास मार्ग स्थित आवास पर पहुंच गई. यहां उस ने आत्मदाह करने की कोशिश की. पुलिस ने उस को पकड़ लिया. गौतमपल्ली थाने में कविता को रखा गया.

वहां से पूरे मामले की जांच करने के लिए एसपी, उन्नाव से कहा गया. इस बीच जेल में ही कविता के पिता की मौत हो गई. पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में पिटाई और घाव में सैप्टिक हो जाने से मौत होने की पुष्टि हुई. पोस्टमौर्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर चोट के 14 निशान पाए गए.

योगी की मजबूरी

कविता के पिता की जेल में मौत के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति गरमा गई. विपक्षी दलों में समाजवादी पार्टी से ले कर कांग्रेस तक ने सरकार पर आरोप लगाने शुरू कर दिए. खुद विधायक कुलदीप सिंह सेंगर मुख्यमंत्री से मिलने गए. लेकिन उन्होंने विधायक से मुलाकात नहीं की. विधायक को यह संदेश दिया गया कि वे जांच में सहयोग करें. सरकार की सख्ती के बाद कविता के पिता से मारपीट के आरोपी विधायक के भाई अतुल सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. कविता ने इस के बाद भी अपनी लड़ाई जारी रखी है.

निकम्मी साबित होती सरकार

दोनों मामलों को ले कर पूरे देश में भाजपा की किरकिरी हो रही है. शुरू में भाजपा सरकार द्वारा विकास की जो योजनाएं पेश की गईं अब उन का जिक्र ही नहीं है. स्वच्छता अभियान फेल हो गया. राजधानी दिल्ली में चारों ओर बेशुमार गंदगी का आलम देखा जा सकता है. ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ नारे की धज्जियां उड़ रही हैं. विश्व के देशों की भ्रष्टाचार लिस्ट में भारत उसी जगह पर विराजमान है. बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ता जा रहा है. हिंदुत्व उन्माद देश के युवाओं को निगल रहा है. उन में नशाखोरी बढ़ती जा रही है.

कृषि में कोई सुधार होता नहीं दिखता. किसानों की आय दोगुनी करने की बात की जा रही है पर कैसे होगी, ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है, यह नहीं बताया जा रहा. उलटे, किसानों का गुस्सा और बढ़ रहा है. किसानों की आत्महत्याओं की दर घटने का नाम नहीं ले रही. युवा रोजगार के लिए सड़कों पर उतरे दिखाईर् पड़ रहे हैं. महिलाएं सुरक्षा के लिए आंदोलनरत हैं. विद्यार्थियों की परीक्षाओं के पेपर सुरक्षित नहीं हैं.

स्टार्टअप, स्टैंडअप इंडिया, न्यू इनोवेशन, प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना जैसी ललचाने वाली स्कीमों की अब चर्चा ही नहीं है.

इन सब के अलावा जिन चीजों का सब से अधिक विकास हुआ, वे हैं सामाजिक वैमनस्यता, जातीय व धार्मिक विभाजन और गहरा हुआ, घृणाहिंसा कभी गोरक्षा के नाम पर तो कभी वंदेमातरम के नाम पर. जातीय अस्मिता, धर्म, संस्कृति, लव जिहाद, आरक्षण विरोध, दलितों पर हिंसा जैसे मामलों को ले कर देश में नफरत का माहौल पैदा किया गया. ऐसे मामलों में सरकार कोई नियंत्रण नहीं कर पाई. उलटा, सरकार इन के समर्थन में खड़ी नजर आई.

अपराधियों को सत्ता का कवच

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि कठुआ से उन्नाव तक अन्याय की घटनाएं हावी हैं और सत्ता प्रतिष्ठान का अहंकार न्याय की राह रोक रहा है. बलात्कार मामलों को ले कर भाजपा सरकार और उस के हिंदू संगठन अपराधियों के बचाव में आ खड़े हुए. असल में समूची हिंदुत्व संस्कृति ही स्त्रियों के यौनशोषण की समर्थक और उस की स्वतंत्रता की विरोधी रही है. यकीन न हो तो प्राचीन गं्रथ उठा कर देख लीजिए.

धर्म अमानवीय अपराधों पर कवच बना हुआ है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यों ही पूर्व गृहराज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद को अपनी शिष्या के साथ बलात्कार का मामला वापस नहीं ले लिया. पीडि़त शिष्या राष्ट्रपति से आरोपी स्वामी के खिलाफ वारंट जारी करने की मांग करे तो करे, योगी सरकार तो धर्र्म की राह पर है. दोषी तो स्त्रियां हैं, उन्हें नरक का द्वार, पाप की गठरी, मर्द के लिए भोग्या करार दिया गया है. भाजपा इसी सोच की ही तो पोषक है.

मोदी और योगी के राज में गायों को बचाने के लिए मनुष्यों की जानें ले लेने और स्त्री की अस्मत व जान की तुच्छ कीमत मानने वाली संस्कृति की पैराकारी ही तो की जा रही है. असल में धर्मों में श्रम की नहीं, निकम्मेपन की पैरवी है. भाजपा सरकार वही कर रही है. रामराज्य का यूटोपिया प्रचारित किया जा रहा है

अक्षम मंत्रालय, अकर्मण्य मंत्री

सरकार के तमाम मंत्री निकम्मे साबित हो रहे हैं. वित्त मंत्री बीमार हैं. विदेश मंत्री लाचार हैं. बैंकों का अरबों रुपया ले कर फ्रौड कारोबारी देश से भागे जा रहे हैं. तिजोरी के रक्षक होने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक के बाद एक मामले सामने आने पर चुप्पी साधे हैं.

विदेश मंत्री का काम सिर्फ इतना दिखाई देता है कि वे विदेश में फंसे किसी भारतीय नागरिक को देश में बुलाने के साधन मुहैया करा दें. कानून मंत्री मजबूर दिखते हैं. उन के सामने पहली बार देश की सर्वोच्च न्याय संस्था में मतभेद उभर कर जगजाहिर हो रहे हैं. न्याय व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है. समूचा न्यायतंत्र भ्रष्टाचार में जकड़ चुका है. संवैधानिक न्याय व्यवस्था पर सरकार के नियंत्रण की मंशा उजागर हो रही है. न्यायाधीशों की नियुक्ति से ले कर फैसलों तक पर शक और सच उजागर हो रहे हैं.

सूचना प्रसारण मंत्री फेक न्यूज के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रस्ताव ला रही हैं. सरकार प्रैस नाम की संस्था को मजबूत करने के बजाय उसे सैंसर करना चाह रही है. पत्रकारिता के मूल्यों को रौंदा जा रहा है.

महिला रक्षा मंत्री की कोई कामयाबी अब तक कहीं प्रदर्शित नहीं हुई. गृहमंत्री से आंतरिक सुरक्षा नहीं संभल रही. वे केवल कड़ी कार्यवाही का आश्वासन देते सुनाई पड़ते हैं. फर्जी मुठभेड़ों के बल पर तमगे बांटे जा रहे हैं.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय से शिक्षक, छात्र, अभिभावक सब परेशान हैं. पेपर लीक हो रहे हैं. स्कूलों, कालेजों, यूनिवर्सिटियों में अध्यापक नहीं हैं, अध्यापक हैं तो पढ़ाईर् नहीं है. निचले वर्गों के साथ भेदभाव है. शिक्षा संस्थानों को 5 हजार साल पुरानी हिंदू गुरुकुल, आश्रमों की शिक्षा पद्धति का अड्डा बनाया जा रहा है. कहा जाता है कि तमाम मंत्रालयों का काम प्रधानमंत्री कार्यालय देखता है. पर लगता नहीं कि पीएमओ समूचे देश को संभाल पा रहा है. पीएमओ ने सारे मंत्रियों को अकर्मण्य बना दिया है.

वोट की खातिर

धर्म के एजेंडे के अनुसार ऐसे काम होते दिख रहे हैं जो देश और समाज के हित में नहीं हैं. भाजपा सीधेसीधे पौराणिक व्यवस्था थोपना चाहती है. वोटों की खातिर भाजपा पिछड़ों और दलितों को अपनाना तो चाहती है पर इन्हें वर्णव्यवस्था के तहत पिछड़ा और दलित बनाए रख कर. सामाजिक स्तर पर उसे जातियों और उपजातियों के विभाजित हिंदू ही स्वीकार्य हैं. हिंदू एकता उस के लिए राजनीतिक मुद्दा है, सामाजिक मुद्दा नहीं, इसलिए पिछड़ों और दलितों में राजनीतिक एका तो करा दिया जाता है पर सामाजिक एकता नहीं हो पाती. (देखें अगला लेख : दलित आक्रोश)

विकास कहां

देश में विकास इसलिए नहीं हो पा रहा क्योंकि भाजपा की संघी सोच श्रम को नीचा मानती आई है और जो श्रम करने वाला वर्ग है यानी पिछड़े और दलित, वे खुद भी ब्राह्मण बनना चाह रहे हैं. क्या हम वैसी संस्कृति पर गर्व कर सकते हैं जो इंसान को बांटती हो, उन्हें एकदूसरे से छोटा करार देती हो, जैंडर भेदभाव रखती हो और विकास से दूर जा रही हो.

भाजपा के सत्ता संभालनेचलाने में नाकाम होने के पीछे उस की सदियों पुरानी सडि़यल और निकम्मेपन की सोच है. नई और मेहनत करने की सोच सिकुड़ती जा रही है जबकि जाहिलों का जमावड़ा बढ़ रहा है. निठल्ले साधुओं को मंत्री बनाया जा रहा है जो इस देश के लिए घातक ही तो है. ऐसे में विकास कहां से होगा, सामाजिक समरसता कहां से आएगी.

VIDEO : ट्राइंगुलर स्ट्रिप्स नेल आर्ट

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