सरस सलिल विशेष

बात स्वच्छ भारत अभियान के साथसाथ सरकारी भूमिपूजनों की भी पोल खोलती हुई है. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कुछ माह पहले भोपाल के कोलार इलाके में सीवेज नैटवर्क बिछाने के लिए समारोहपूर्वक एक और भूमिपूजन कर डाला था. इस का मतलब आम लोगों ने यही लगाया था कि अब जल्द या देरसवेर ही सही, सीवेज नैटवर्क का काम शुरू हो जाएगा. पर हैरत तब हुई जब यह उजागर हुआ कि 115 करोड़ रुपए का सीवेज नैटवर्क बिछाने के बाबत किसी कंपनी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई यानी टैंडर ही नहीं हुआ.

फिर मुख्यमंत्री ने किस बाबत भूमिपूजन किया था, इस सवाल का जवाब अब कभी शायद ही मिले लेकिन यह बात भी इस हास्यास्पद वाकिए के बाद उभर कर आई कि शिवराज सिंह चौहान ने अपने मंत्रियों और विधायकों को निर्देश दे दिए हैं कि चुनाव सिर पर हैं, ऐसे में भूमिपूजनों, शिलान्यासों और लोकार्पणों का सिलसिला रुकना नहीं चाहिए. दरअसल, इस से लगता है कि काम हो रहे हैं और सरकार को मुफ्त का प्रचारप्रसार भी मिलता है.

भूमिपूजन नाम से ही स्पष्ट है कि यह एक धार्मिक कृत्य या कर्मकांड है जिसे देशभर के नेता बड़ी श्रद्धा व आस्था से करते हैं सिर्फ इसलिए कि इस से उन की इमेज चमकी हुई दिखती है और सरकारी पैसे से पूजापाठ, पाखंडों का माहौल परवान चढ़ता होता है. जनप्रतिनिधियों को जनता को लुभाने का सब से आसान रास्ता पूजापाठ का ही लगता है. यही वह विकास है जो आजादी के बाद से उत्तरोत्तर हो रहा है. फर्क इतनाभर आया है कि पहले इसे कांग्रेस करती थी, अब भाजपा कर रही है.

एक से बढ़ कर एक भूमिपूजन

शिवराज सिंह चौहान औसतन हफ्तेभर में एक भूमिपूजन जरूर करते हैं लेकिन उन के मंत्रिमंडल के एक वरिष्ठ मंत्री उमाशंकर गुप्ता तो भूमिपूजन मंत्री के नाम से ही पहचाने जाने लगे हैं जो हर दूसरे दिन कोई न कोई भूमिपूजन करते हैं.

उमाशंकर गुप्ता जैसे दर्जनभर मंत्री भूमिपूजन के लिए कुख्यात हो चले हैं अब तक ये कितने भूमिपूजन कर चुके हैं, यह तो शायद ये भी न बता पाएं लेकिन क्रिकेट की तरह रिकौर्डों के नजरिए से देखें तो शिवराज सिंह मंत्रिमंडल के ही एकदूसरे वरिष्ठ सदस्य गोपाल भार्गव ने तो पिछले विधानसभा चुनाव में भूमिपूजन का रिकौर्ड ही बना डाला था.

सागर के नजदीक अपने विधानसभा क्षेत्र रहली में गोपाल भार्गव ने एक ही दिन में 2,551 भूमिपूजनों का रिकौर्ड बना कर सब को चौंका दिया था. तब इस रिकौर्ड को गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड में शामिल करने के बाबत भी हंसीमजाक हुआ था. अब गंगा उलटी बह रही है, कहा यह जा रहा है कि 5 वर्षों के शासनकाल में 2,551 भूमिपूजनों और शिलान्यासों में से 30 फीसदी काम भी पूरे नहीं हुए हैं जबकि इन की लागत 300 करोड़ रुपए से भी ज्यादा आई थी.

उमाशंकर गुप्ता और गोपाल भार्गव जैसे मंत्रियों ने हालांकि अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि जिस किसी ने विकास कार्यों या निर्माण कार्यों के भूमिपूजन किए हैं, वे निर्धारित समयसीमा में किए जाएं. लेकिन यह कहनेभर की बात है. ऐसा होना क्यों संभव नहीं है, यह शिवराज सिंह के कोलार वाले भूमिपूजन की हकीकत से समझा जा सकता है कि सीवेज नैटवर्क बिछाने के लिए कोई कंपनी आगे आई ही नहीं थी, लेकिन फिर भी हड़बड़ाहट में उन्होंने भूमिपूजन कर डाला था.

जाहिर है भूमिपूजन एक धार्मिक लत है जिस में कोई अहम और बड़ा प्रोजैक्ट हो तो केंद्रीय मंत्री बुला लिए जाते हैं और बात जब अरबों की परियोजनाओं की हो तो फिर प्रधानमंत्री इस के लिए उपयुक्त माने जाते हैं.

राजस्थान के उदयपुर में भी कुछ माह पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 हजार करोड़ रुपए की परियोजनाओं का शुभारंभ किया था. इस में दिलचस्प बात नरेंद्र मोदी द्वारा डिजिटल भूमिपूजन किया जाना थी.

सरकारी भूमिपूजनों का अपना अलग स्लैब होता है, उसी के हिसाब से नेता बुलाए जाते हैं. बड़े भूमिपूजनों में पंडित भी बड़ा बुलाया जाता है. चूंकि बड़े पंडे की दक्षिणा भी ज्यादा होती है, इसलिए यह खर्च अब ठेकेदारों से कराया जाने लगा है. पूजन सामग्री भी इन्हीं से मंगाई जाने लगी है, जिन का मकसद पूजा के बहाने अधिकारियों व नेताओं की निगाह में चढ़ना होता है.

बाद में यही ठेकेदार भूमिपूजन के अपने खर्च में पांचगुना पैसा किसी भी मद में बिल में लगा देते हैं, जो सहर्ष पास हो जाता है. यानी अगर एक भूमिपूजन में ठेकेदार ने 20 हजार रुपए खर्च किए हैं तो काम मिल जाने पर वह उस का मुनाफा 80 हजार रुपए और वसूलता है.

जाहिर है भूमिपूजन एक तरह से भ्रष्टाचार और हेरफेर की एक स्वीकृत वजह और बुनियाद है जिस पर धर्म का ठप्पा लगा होने से कोई एतराज नहीं जताता. संविधान में कहीं नहीं लिखा कि सरकारी विकास कार्यों का भूमिपूजन किया जाए और उस का खर्च संबंधित विभाग या फिर ठेकेदार या फिर दोनों संयुक्त रूप से उठाएं.

सरकारी कार्यक्रमों में भूमिपूजनों पर खुलेआम जिन करोड़ों रुपयों की बरबादी होती है, वह जनता का पैसा है.

भगवान भरोसे विकास कार्य

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भूमिपूजन को धर्म के नजरिए से देखें तो मान्यता यह है कि इस के करने से निर्माण कार्य में कोई दैवीय विघ्न यानी बाधा नहीं आती. भूमिपूजन की शुरुआत और कलश स्थापना पान के पत्तों व गणेश पूजा से होती है. पंडे के मंत्रोच्चार के बाद आमंत्रित नेता प्रतीकात्मक रूप से 1-2 बार फावड़ा या कुदाल जमीन पर चला देता है. इस के बाद नारियल फोड़ा जाता है फिर मावे से बनी मिठाई का प्रसाद वितरण किया जाता है. पूजन का अंत भगवान की जय से ही होता है.

यानी विकास कार्य योजनाओं से नहीं, बल्कि भगवान की कृपा और इच्छा से होते हैं. इस अलोकतांत्रिक परंपरा को क्यों ढोया जा रहा है, इस सवाल का जवाब कोई स्पष्ट रूप से देने को तैयार नहीं होता. सिवा इस के, चूंकि ऐसा होता आ रहा है, इसलिए हर्ज क्या है.

हर्ज यह है कि इस में जनता के पैसे की इफरात से बरबादी होती है और सरकारी तौर पर अंधविश्वासों व पंडावाद को बढ़ावा मिलता है.

भूमिपूजन में अगर कोई दम होता तो पुलियाएं गिरती नहीं, हैंडपंप खराब नहीं पड़े होते और सरकारी इमारतों से पानी नहीं टपक रहा होता. ऐसे वाकिए और हादसे जब होते हैं तो हर कोई सरकार और ठेकेदार को घटिया निर्माण के बाबत कोसता है लेकिन भूमिपूजन को दोष कोई नहीं देता. इसी धार्मिक मानसिकता का फायदा नेता और जनप्रतिनिधि खूब उठाते हैं.

कोई उन्नीस नहीं

मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता के के मिश्रा की मानें तो भूमिपूजन जनता से टैक्स की शक्ल में वसूले गए पैसों की बरबादी है. सरकार सस्ती वाहवाही भूमिपूजन के जरिए लूटती है. सरकार को इस फुजूलखर्ची पर रोक लगानी चाहिए.

के के मिश्रा जैसे तेजतर्रार नेता इस सवाल पर बगलें झांकते नजर आते हैं कि यह रिवाज तो कांग्रेस के शासनकाल के दौरान भी था और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह भी सरकारी तौर पर खूब भूमिपूजन करते थे.

भूमिपूजन अगर एक तरह से धर्म या राजनीति का हिस्सा है तो कांग्रेस भी इस में कभी पीछे नहीं रही. गुजरात चुनाव के दौरान जब राहुल गांधी वहां के मंदिरों में गए थे तो इस पर खूब हायहाय मची थी. मुद्दा तिलक या जनेऊ भी था पर सच यह भी था कि इस से राहुल गांधी और कांग्रेस की कमजोरी ही उजागर हुई थी.

जरूरत इस बात की है कि अब आम लोग ही सरकारी भूमिपूजनों पर एतराज जताएं कि विकास कार्य हों पर उन का धार्मिकीकरण न किया जाए क्योंकि इस में सिर्फ पैसे की बरबादी होती है और किसी को कुछ हासिल नहीं होता.

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