सरस सलिल विशेष

नवाज शरीफ अगर लंदन में ही बैठकर पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरने की  सोच रहे हैं, तो इससे उन्हें कुछ खास हासिल होने वाला नहीं. इतिहास गवाह है कि संकट के दौर में मुखिया सामने न हो, तो न कार्यकर्ता जोश में आते हैं, और न पार्टी. सजा सुनाए जाने के तत्काल बाद लाहौर सहित देश के तमाम इलाकों में स्वत:स्फूर्त प्रदर्शन जरूर हुए, लेकिन लाहौर जैसे गढ़ की स्थिति बता रही थी कि पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है.

दरअसल, ऐसे वक्त में नवाज को देश में होना चाहिए, भले ही वह जेल में रहें या बाहर. एक लोकप्रिय राजनेता होने के कारण कानून का पालन करते दिखना भी उनकी जिम्मेदारी है, भले ही इसकी कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े. उन्हें तो इस दर्द के लिए भी तैयार रहना होगा कि बेगम कुलसुम नवाज की बिगड़ी सेहत के बावजूद उन्हें छोड़कर आना पडे़, क्योंकि कानूनी प्रक्रिया के लिए भी उनका अदालत द्वारा तय समय सीमा में देश लौटना जरूरी है.

इस वक्ती हकीकत का उन्हें चाहे-अनचाहे हर सूरत में सामना करना ही होगा. पार्टी उम्मीदवार भी चुनाव अभियान के लिए उनका इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि उनके अलावा कोई और है भी नहीं, जो कुछ करिश्मा दिखा सके, हालांकि वे उनके सत्ता विरोधी स्वर में कुछ नरमी भी देखना चाहते हैं. वे इस वक्त अपनी उम्मीदवारी या चुनावी संभावनाओं को खतरा पैदा करने वाला कोई काम नहीं करना चाहेंगे.

इस वक्त कोई भी न्यायपालिका या सेना से टकराव के मूड में नहीं है. न ही कोई चुनाव टालने का बहाना देना चाहता है. सब जानते हैं कि नवाज के लिए 25 जुलाई के चुनाव कितने महत्वपूर्ण हैं और हस्तक्षेपकारी स्थिति के लिए पार्टी का चुनावों में बेहतर प्रदर्शन जरूरी है. यह नवाज के लिए आत्मपरीक्षण का भी वक्त है कि आखिर वह इस कीचड़ में फंसे कैसे?

उन्हें इस बात पर भी फिर से सोचने की जरूरत है कि सुप्रीम कोर्ट से अयोग्य ठहराए जाने के बाद उनके द्वारा अपनाई गई रणनीति कितनी उचित थी? सच तो यह है कि आज के हालात में उन्हें न सिर्फ तत्काल घर लौटना चाहिए, वरन अतीत को लेकर आत्मालोचन भी करना चाहिए.

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