बिरसा मुंडा का नाम तो शायद हमारे कानों में पड़ता है, लेकिन शायद कोई आदिवासी जिला ऐसा नहीं होगा, जहां 1857 से ले कर आजादी आने तक आदिवासियों ने जंग न की हो, बलिदान न दिया हो.