बसपा प्रमुख मायावती के पास अब इतने विधायक भी नहीं बचे हैं जो 2018 में उनकी राज्यसभा से सदस्यता खत्म होने के बाद दोबारा राज्यसभा या विधानपरिषद का सदस्य बना सकें. मायावती को अब चुनाव लड़ कर ही लोकसभा या विधानसभा का सदस्य बनना होगा. 25 साल में पार्टी वापस वहीं पहुंच गई जहां से वह चली थी. ऐसे में मायावती को वोटिंग मशीन की नहीं अपने दलित वर्ग बैंक की चिंता करने की जरूरत है. पार्टी को अपने दलित हित के स्टैंड पर वापस लौटना होगा नहीं तो हिन्दुत्व का शिकार हो रहे दलित पूरी तरह से बसपा से दूर हो जायेंगे.

दलित अब वोटबैंक बनने को तैयार नहीं हैं. उसे केवल पार्टी के नाम से जोड़ा नहीं जा सकता. 2007 में बसपा को बहुमत से सरकार बनाने का अवसर पाकर भी मायावती सरकार ने दलितों की तरक्की के लिये ठोस काम नहीं किये. उसके बाद से ही बसपा का जनाधार टूटने लगा था. मायावती इस सच को आज भी स्वीकार नहीं कर पा रही. 2009 के लोकसभा, 2012 के 2014 के लोकसभा और अब 2017 के विधानसभा चुनावों में लगातार बसपा को गिरावट का सामना करना पड़ा है. इसका कारण यह है कि बसपा से लगातार गैर जाटव जातियों का मोहभंग हो रहा है. इस कमी को पूरा करने के लिये बसपा से भदलित-मुसलिम्य समीकरण बनाने का जो प्रयास किया वह उल्टा पड गया.

दलितों में पूजा-पाठ करने वाले लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. यह लोग वोट के धार्मिक ध्रुवीकरण के समय बसपा के पक्ष में नहीं खड़े होते. 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने बसपा की इस कमजोर नस को भांप कर काम करना शुरू किया. भाजपा ने गैर जाटव जातियों को अपने से जोड़ा और बसपा को कमजोर करने में सफलता हासिल की थी. असल में 2007 में पहली बार बसपा की बहुमत से सरकार बनी थी. उसके पहले 3 बार मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनी थी. एक बार भी उनको पूरे समय काम करने का मौका नहीं मिला. ऐसे में वह अपने लोगों को यह समझाने में सफल हो जाती थीं कि उनको काम करने का मौका नहीं मिला.

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