सरस सलिल विशेष

कहा जाता है कि चिट्ठियां आधी मुलाकात होती हैं. लेकिन यह कथन उन चिट्ठियों पर ही लागू होता है, जो इंसानों के आपसी रिश्तों को जोड़ती हैं. लेकिन देशों के रिश्तों में जो चिट्ठियां लिखी जाती हैं या जो संदेश भेजे जाते हैं, वहां इंसानी रिश्तों जैसी गरमी की उम्मीद व्यर्थ है. वहां चिट्ठियां या संदेश अक्सर महज प्रोटोकॉल भर होते हैं, यानी ऐसी औपचारिकता, जिसे निभाया ही जाना था. ऐसी चीजों में बहुत ज्यादा अर्थ खोजा जाए, तो मामला अनर्थ की ओर ही बढ़ता है.

पाकिस्तान में इमरान खान के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें जो संदेश भेजा है, उसका सार इतना ही है. पड़ोसी देश में आए नए प्रधानमंत्री को बधाई संदेश भेजना उनका कूटनीतिक दायित्व था, जिसे उन्होंने बदस्तूर निभाया भी. जाहिर है, ऐसे संदेश में दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की उम्मीद भी व्यक्त होनी ही थी.

प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा कि ‘भारत उम्मीद कर रहा है कि पाकिस्तान के साथ रचनात्मक और अर्थपूर्ण ढंग से बात आगे बढ़ेगी’. यह संदेश भेजते समय न तो प्रधानमंत्री मोदी और न ही विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को उम्मीद होगी कि इसे वार्ता का प्रस्ताव मान लिया जाएगा. लेकिन हुआ ऐसा ही.

न जाने किसी उत्साह में पाकिस्तान के नव-नियुक्त विदेश मंत्री शाह मुहम्मद कुरैशी ने इसे वार्ता का प्रस्ताव मान लिया. इतना ही नहीं, उन्होंने मीडिया को भी बताया कि भारतीय प्रधानमंत्री ने वार्ता का प्रस्ताव भेजा है. कुरैशी का यह बयान हैरत में डालने वाला इसलिए भी था कि इमरान खान के लिए सियासत नई चीज हो सकती है, कुरैशी के लिए वह नई चीज नहीं है. और तो और, कुरैशी तीन साल के लिए पाकिस्तान के विदेश मंत्री भी रह चुके हैं.

बेशक कुरैशी की मीडिया से बातचीत का विषय यह नहीं था, मंत्री पद संभालने के बाद वह पहली बार पत्रकारों से बात कर रहे थे. इस बातचीत में उन्होंने खासकर भारत और अफगानिस्तान से रिश्ते सुधारने की बात रखी. उन्होंने यह भी कहा कि भारत के साथ ऐसी निरंतर वार्ता चलनी चाहिए, जिसमें कोई बाधा न आए. और इसी के साथ उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री के वार्ता प्रस्ताव की बात भी जोड़ दी, जिसका नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय ने तुरंत ही खंडन कर दिया. मंत्रालय ने कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री ने तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को औपचारिक बधाई संदेश भेजा था, वार्ता का प्रस्ताव नहीं.

ऐसा अतिउत्साह में हुआ, भूलवश हो गया या फिर जान-बूझकर, किसी भी तरह से भारत-पाकिस्तान की वार्ता का मुद्दा एक बार फिर सतह पर आ गया है. यह सच है कि भारत ने पाकिस्तान के साथ वार्ता से कभी इनकार नहीं किया है. बल्कि हर बार उसने तमाम चीजों को भुलाकर बातचीत के लिए न सिर्फ हामी भरी है, बल्कि उसकी शुरुआत भी की है. लेकिन हर बार कोई बड़ी आतंकवादी वारदात हो जाती है और बातचीत टूट जाती है. इसकी वजह से इधर काफी समय से भारत का रुख यही रहा है कि बातचीत तभी हो सकती है, जब पाकिस्तान आतंकवादियों को समर्थन देना और भारत में उनका निर्यात करना बंद करेगा.

कुरैशी जिस निरंतर और अटूट वार्ता की बात कर रहे हैं, वे इन्हीं स्थितियों में हो सकती है. रिश्ते सुधारने की बात खुद इमरान खान भी कर चुके हैं, अगर वह सचमुच गंभीर हैं, तो उन्हें सबसे पहले आतंकवाद के मसले पर सोचना होगा.