सरस सलिल विशेष

सीआईए के निदेशक माइक पोम्पियो की बात सीधी और साफ है. पाकिस्तान अपनी सीमा के भीतर आतंकियों के आश्रयस्थल खत्म नहीं करता है, तो अमेरिका इन्हें नष्ट करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. इसमें कुछ भी गोल-मोल नहीं है. संभव है, पोम्पियो के पास यह सब कहने का कोई खुफिया आधार हो.

इस टिप्पणी के कुछ ही घंटों के बाद अमेरिकी रक्षा सचिव जिम मैटिस अपनी एक दिनी सरकारी यात्र पर पाकिस्तान पहुंचे हैं. वे अफगानिस्तान संबंधी नई अमेरिकी रणनीति पर पाकिस्तान को मनाना चाहेंगे. शायद इसी दौरान वे पोम्पियो के बयान से अवगत कराए जाएं.

मैटिस सौहार्द के समर्थक रहे हैं. यात्रा के ठीक पहले एक पत्रकार से बातचीत में भी उन्होंने ऐसे ही संकेत दिए. अक्तूबर 2017 में उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान स्थित आतंकियों की शरणगाहों के मामले में अमेरिका एक मौका और देना चाहेगा. इसके बाद भी नतीजे न मिले, तो जो कुछ जरूरी होगा, किया जाएगा. वही बात फिर साफ हो रही है.

पाकिस्तान के पक्ष से सरकार इस दिशा में सकारात्मक है और अमेरिका से भी ऐसी ही उम्मीद है. पाकिस्तान में ड्रोन हमले सीमावर्ती फाटा क्षेत्र तक ही सीमित हैं, जबकि अमेरिका के पास देश में कहीं भी इसका इस्तेमाल करने की क्षमता है. इसमें कुछ खतरे भी अंतर्निहित हैं. मसलन, अमेरिका को लगता है कि उसे ऐसा करना चाहिए, तो वह वैसा ही करेगा. मगर यदि वह बिना पर्याप्त कारणों के पंजाब को लक्ष्य करता है, तो नतीजे गंभीर होंगे.

ऐसे में, यदि मैटिस ‘सुरक्षित ठिकानों’ की ऐसी कोई पुख्ता सूची साथ लाए हैं और पाकिस्तान उसका तार्किक खंडन न कर सका, तो चेहरा छिपाना मुश्किल होगा. क्योंकि जब कमान ट्रंप के हाथ में हो और व्हाइट हाउस शिकार पर उतारू हो, तो यह पाकिस्तान के लिए रूसी रूले खेलने का वक्त नहीं है.

मैटिस की मंशा निजी तौर पर भले ही सौहार्दपूर्ण हो, पर यह मानने में गुरेज नहीं कि यह बंद दरवाजों के पीछे चल रहे हार्ड बॉल के खेल को समझने का वक्त है. यह सोचने और स्वीकारने में कोई अतिरेक नहीं है कि हमारे संबंधों का यह संक्रमणकाल है. हम पूरी सकारात्मकता, लेकिन थोड़ी चिंता के साथ इसे देख रहे हैं.