मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना राज्यों के चुनाव को 2019 का सेमीफाइनल माना जा रहा है. इन सभी राज्यों में भाजपा की हार की संभावना प्रबल है. मिजोरम को छोड़ कर बाकी सभी 4 राज्य एक दूसरे की सीमाओं से लगे राज्य हैं. मुख्य मुकाबला मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में है. जहां कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने है.

भाजपा के लिये मुसीबत यह है कि वह इन राज्यों में लबे समय से राज्य कर रही है. इन राज्यों में विकास का ऐसा कोई काम नहीं हुआ जिसे उदाहरण के रूप में पेश किया जा सके. भाजपा के लिये राहत वाली बात यह है कि यहां कांग्रेस का समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पाटी से गठबंधन नहीं हुआ.

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पाटी ने गठबंधन न होने का ठीकरा कांग्रेस के सर फोड़ दिया है. बसपा ने कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के बयान को ही जिम्मेदार ठहराया तो सपा ने कांग्रेस के सुस्त रूख को इसका जिम्मेदार माना. बसपा की मायावती और सपा के अखिलेश यादव ने कांग्रेस के खिलाफ अपनी राय दी.

इसके बाद भी कांग्रेस की ओर से कोई आक्रमक बात नहीं कही गई. असल में सपा और बसपा दोनों ही कांग्रेस से यह चाहते थे कि वह मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में इन  दोनों दलों को ज्यादा से ज्यादा सीटे दे. जबकि उत्तर प्रदेश में वह कांग्रेस को कम से कम सीट देना चाहते थे. ऐसे में कांग्रेस के लिये गठबंधन करना लाभकारी नहीं लग रहा था.

गठबंधन के लिये जो फार्मूला सपा-बसपा उत्तर प्रदेश में लागू कर रहे थे वह मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में लागू नहीं करना चाहते थे. ऐसे में कांग्रेस के लिये जरूरी हो गया कि वह बिना महागठबंधन को तोड़े मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव को अकेले लड़े.

अगर कांग्रेस को यहां सफलता मिलती है तो उसकी हैसियत अपने से ही बढ़ जायेगी. उस पर दूसरे दलों का दबाव खत्म हो जायेगा. गठबंधन की गांठ न उलझे इस लिये अखिलेश और मायावती के बयान पर कांग्रेस जबाव नहीं देना चाहती. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस भले ही सत्ता की दौड़ में प्रबल दावेदार न हो पर बाकी प्रदेशों में वह सत्ता की दौड़ में मुख्य मुकाबले में है. इसके बाद भी उसने सपा-बसपा के आरोपों का जवाब न देकर बता दिया कि वह विपक्षी एकता की पक्षधर है.

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