3 राज्यों में किसानों से किए गए कर्ज माफी के वादे के बाद कांग्रेस की जीत से अब दूसरे राज्यों में भी कर्ज माफी के वादों की बरसात शुरू हो गई है. असम में कर्ज माफी की घोषणा कर दी गई है. गुजरात में भाजपा सरकार ने भी कर्जमाफी का ऐलान कर दिया है. हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर ने कहा है कि राज्य में उन की सरकार आने पर किसानों को कर्र्ज मुक्त कर दिया जाएगा. ओडिशा में भी भाजपा ने यह वादा किया है.

चुनावी वादों का हकीकत से सामना करना अब नेताओं के लिए बड़ा मुश्किल साबित हो रहा है. किसानों के किया गया कर्ज माफी का वादा अब राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ की नई सरकारों के लिए मुश्किल हो रहा है. मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सरकारों ने 41,100 करोड़ रुपए के कर्ज माफ करने की घोषणा तो कर दी पर इन राज्यों के पास इतना बजट ही नहीं है. राजस्थान सरकार इसीलिए अब तक घोषणा नहीं कर पाई है. यहां के नवनियुक्त मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कह चुके हैं कि वसुंधरा सरकार ने खजाने में पैसा ही नहीं छोड़ा.

बावजूद इस के असम में 600 करोड़ का कर्ज और गुजरात में 625 करोड़ का बिजली बिल माफ करने की घोषणा की गई है. तीन राज्यों में कर्जमाफी का वादा हिट रहा.

किसानों की कर्जमाफी का केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ गया है. कर्जमाफी का मुद्दा ले कर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेर रहे हैं. राहुल गांधी ने कहा कि मोदीजी के पास साढ़े चार साल थे. उन्होंने किसानों का एक रुपया भी माफ नहीं किया. हर किसान का कर्ज माफ होने तक हम मोदीजी को न बैठने देंगे, न सोने देंगे.

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि अगर भाजपा सरकार कर्ज माफ नहीं करती है तो अगले लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में सरकार बनने पर कांग्रेस गारंटी के साथ किसानों का कर्ज माफ करेगी.

असल में हमारे यहां राजाओं द्वारा खैरात बांट कर जयजयकार कराने की प्राचीन आदत है. लोगों को भी मुफ्त की खाने और दान लेने और देने की पुरानी संस्कृति है. इस कार्य को पुण्य माना गया है. राजा ज्यादातर दान ब्राह्मणों से प्रशंसा और अपने प्रचार के लिए दिया करते थे. साथ पुण्य की बात भी उन कन के मन में पुरोहितों द्वारा भर दी जाती थीं.

पुराने राजा रहे हों या आज की सरकारें, मुफ्त में कुछ नहीं दे रहीं. मुफ्त के नाम पर बेवकूफ बनाया जाता है. सरकारों के लिए माफ किए गए उस करोड़ों के कर्ज की भरपाई के लिए तरहतरह के टैक्स लगाना जरूरी हो जाता है.

आर्थिक विशेषज्ञ कह चुके हैं कि कर्ज माफी के वादों से बचना चाहिए. इस से देश पर भार बढ़ता है.सरकारें किसानों की उत्पादकता पर ध्यान नहीं दे रहीं. इस के लिए उन्हें अधिक से अधिक सुविधाएं दी जा सकती हैं. राजनीतिक दल इस तरह के वादों से मुफ्तखोरी की आदत बढ रहे हैं. उन्हें अपनी जेब से तो पैसा देना होता नहीं. कर्ज माफी का पैसा किसानों और आम जनता की जेब से ही निकलेगा.

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