सरस सलिल विशेष

दिल्ली के आसपास के कई बिल्डरों के, ग्राहकों का पैसा ले कर, बैठ जाने से युवाओं का अपने घर का सपना चकनाचूर हो गया है. जेपी, यूनीटैक आम्रपाली, सुपरटैक, वैब जैसी कई बिल्डर कंपनियों ने उन युवाओं को उकसाया जो 60-70 लाख रुपए लगा कर अपना मकान पाने को उत्सुक थे. युवाओं को लगा कि अपनी बचत, अच्छे वेतन व बैंक लोन के जरिए वे मकान खरीद सकेंगे और 3-4 साल में ऐसे फ्लैट के मालिक बन जाएंगे जहां पास में स्विमिंग पूल होगा, क्लब होगा, टैनिस कोर्ट होगा और थोड़ी दूरी पर ही मल्टीप्लैक्स वाला मौल होगा.

नोएडा, गुड़गांव में खासतौर पर कितने ही प्रोजैक्ट खटाई में पड़े हुए हैं, क्योंकि एक तो सरकारों ने बिल्डरों को समय पर अनुमति नहीं दी, दूसरे, बिल्डरों ने न केवल कानून तोड़ कर ज्यादा पैसा बनाया बल्कि उन्होंने ग्राहकों से वसूला पैसा मकान बनाने की जगह दूसरे प्रोजैक्ट्स में लगा दिया. अकेले जेपी ग्रुप की वजह से 20 हजार खरीदार अपनी जमापूंजी खो चुके हैं.

मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा हुआ है पर कोर्ट कछुए की चाल चल रही है जबकि कल के युवा अब प्रौढ़ होेने लगे हैं और उन का छोटा बैंकलोन, महाकर्ज बन गया है. बैंकों ने इन बिल्डरों को जो कर्ज दिया था वह अलग डूब रहा है और लगभग 30 हजार से 50 हजार करोड़ रुपए खंडहरों में बदल रहे हैं. यह है हमारे देश की हालत जहां गरीबों को तो छोडि़ए, थोड़े खातेपीतों को भी चूसने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती.

देश का हाल यह है कि आज कोई भी वर्ग संतुष्ट नहीं है. पिछले सालों में दिखाए गए अच्छे दिनों के सपने वैसे ही टूट रहे हैं जैसे इन हजारों युवाओं के अपने घरों के सपने टूट गए हैं.

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